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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 292, कुल 800 में से

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पृष्ठ 292

२९४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
प्राणीरुद्रशुभैर्दृष्टे पूर्वोक्तफलदायकः।
शुभयोगे न सन्देहो रुद्रशूलान्तमायुषि।।१४।।
यदि रुद्रग्रह शुभ दृष्ट हो तो पूर्वोक्त फल को देने वाला होता है और
शुभ युक्त हो तो रुद्रशूलान्त आयु होती है, इसमें संदेह नहीं है।।१४।।
स्थित एव फलं जन्म कथितं कारणान्तरे।
निरुक्ते शुभसंयोगे किं कीर्तयति भो द्विज ।।१५।।
पूर्वमेवं फलं सांधो समुत्कृष्टे तदेव चेत्।
सुतरां तदेव वक्तव्यं निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ।।१६।।
कारणान्तर से पूर्वोक्त फल होता है किन्तु शुभयोग में कोई कारणांतर
नहीं होता है।।१६।।
अनेन पूर्वयोगेन फलं किञ्चिद्धि न्यूनता।
आद्योदितादुक्तकालात्पूर्वं पश्चान्मृतिर्यदि ।।१७।।
निरुक्तयोगश्च तदा ह्यपवादं वदाम्यहम्।
रविं विहाय नितरां पापयोगो भवेद्द्विज ।।१८।।
इसमें भी यदि पूर्वोक्त फल यदि उत्कृष्ट हो तो वही होता है। यदि पूर्वोक्त
फल में कुछ न्यूनता हो और उसके पूर्व पीछे मृत्यु हो जाय तो
यह योग निष्फल होता है।।१८।।
योगोऽयं निष्फलो वाच्यः पुरा ब्रह्मप्रणोदितः।
इदं फलं न भवति योगेऽस्मिन्द्विजसत्तम।।१९।।
नाशयोगस्य वक्तव्यं फलं वापि भयङ्करम्।
अधुना सम्प्रवक्ष्यामि गौणरुद्रस्य वै द्विज ।।२०।।
किन्तु नाश होने के योग का फल भयंकर होता है। अब मैं गौणरुद्र
का विवेचन कर रहा हूँ।।१९-२०।।
गुणप्रकर्षेण फलं विशेषेण तवाग्रतः।
गौणरुद्रे महाप्राज्ञ मन्दारेन्दुनिरीक्षिते ।।२१।।
अब मैं गुण की प्रकर्षता से फल-विशेष को कह रहा हूँ। गौणरुद्र शनि,
भौम, चन्द्र से देखा जाता हो।।२१।।
अभावे शुभयोगस्य पापयोगोत्तरे तथा।
शूलान्तात्फल विप्रेन्द्र आयुर्दायं भवत्यपि ।।२२।।