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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 287, कुल 800 में से

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पृष्ठ 287

आयुर्दायाध्यायः २८९
कारके शुभसंयुक्ते स्वतुङ्गे शुभखेचराः।
कक्षावृद्धिर्भवेत्तत्र निर्विशङ्कं द्विजोत्तम॥६७॥
कारक शुभग्रह से युक्त हो और शुभग्रह अपने उच्च में हों तो
कक्षावृद्धि होती है॥६७॥
पापकारकजैर्हासो वृद्धिर्वा कथिता द्विज।
अथैव गुरुणा कक्षाह्रासवृद्धिं वदाम्यहम्॥६८॥
इस प्रकार पापग्रह से उत्पन्न कक्षा की ह्रास वृद्धि मैंने कहा। इसी प्रकार
गुरु से कक्षा की ह्रास-वृद्धि कह रहा हूँ॥६८॥
वित्ते व्यये लग्नषष्ठे त्रिकोणे पापयोर्द्विज।
कक्षाह्रासो भवेत्तत्र पूर्ववद्द्विजसत्तम॥६९॥
गुरु से दूसरे, बारहवें, लग्न, छठे और त्रिकोण में पापग्रह हों तो कक्षा
का ह्रास पूर्ववत् होता है॥६९॥
गुरौ नीचे स्वतुङ्गे च संयुक्तेऽशुभखेचरैः।
कक्षाह्रासो भवेत्तत्र निर्विशङ्कं द्विजोत्तम॥७०॥
गुरु अपने नीच में अथवा अपनी उच्चराशि में पापग्रहों से संयुक्त हो
तो कक्षा का ह्रास होता है॥७०॥
वित्तगे च गुरौ ज्ञेयं पूर्ववन्नियमं द्विज।
प्रागुक्तार्थकृतेयं कक्षा सर्वा प्रकथ्यते॥७१॥
गुरु दूसरे भाव में हो तो पूर्ववत् कक्षाह्रास-वृद्धि को समझना चाहिए।
पूर्वोक्त कक्ष क्रम के ही लिए यह सब कहा गया है॥७१॥
तथैव शुभयोगेषु चापवादं वदाम्यहम्।
उक्तस्थाने शुभैर्योगे पूर्णेन्दुशुक्रयोर्द्विज॥७२॥
उक्त स्थानों में शुभग्रह के योग का अपवाद कह रहा हूँ। उक्त स्थानों
में शुभग्रह का योग पूर्णचन्द्र, शुक्र का हो तो॥७२॥
योगप्रकरणे कक्षाह्रासाय न तु वृद्धये।
तत्रैकराशिवृद्धिश्च भवत्येव न संशयः॥७३॥
कक्षा का ह्रास ही होता है, न कि वृद्धि, एक राशि की वृद्धि ही होती
है॥७२॥
पूर्ववच्चोक्तपापेषु शनिना योगकारकः।
कक्षाह्रासश्च तत्रैव यत्रैको राशिह्रासकृत्॥७४॥