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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 224, कुल 800 में से

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पृष्ठ 224

२२६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
षष्ठाष्टमे तृतीये च लाभे सम्बन्धनीचकृत्।
यो ग्रहः पश्यते लग्नं राजयोगप्रदायकः ।।२७।।
छठें, आठवें और तीसरे भाव में अपनी नीचराशि का ग्रह भी
योगकारक होता है। इनमें से जो ग्रह लग्न को देखता हो वह राजयोगकारक
होता है।।२७।।
राजयोगो जन्मलग्नं पश्येदुच्चग्रहो यदि।
षष्ठाष्टमगते नीचे लग्नं पश्यति योगकृत् ।।२८।।
यदि अपनी उच्चराशि में स्थित ग्रह को देखता हो तो राजयोग होता है।
छठे, आठवें में अपने नीच राशि में बैठा ग्रह को देखे तो राजयोग होता
है।।२८।।
षष्ठाष्टमाधिपे नीचे लग्नं पश्यति वाथवा।
तृतीये लाभगे नीचे लग्नं पश्यति राज्यदः ।।२९।।
अथवा षष्ठेश वा अष्टमेश अपनी नीचराशि में होकर लग्न को
देखते हों अथवा तीसरे, ग्यारहवें भाव में होकर लग्न को देखते हों तो
राजयोग करते हैं।।२९।।
षष्ठाष्टमाधिपौ खेटौ शुभौ नीचाश्रितौ यदा।
पश्यतो जन्मलग्नं च राजयोग उदाहृतः ।।३०।।
षष्ठेश, अष्टमेश शुभग्रह हों, अपनी नीचराशि में होकर लग्न को देखते
हों तो राजयोग होता है।।३०।।
इति राजयोगाध्यायः।
अथ राजप्रधानयोगाध्यायः
राज्येशोऽपि जनुर्लग्नादमात्येशयुतेक्षिते।
अमात्यकारकेणापि प्रधानत्वं नृपालये ।।१।।
राज्येश (दशमेश) जन्मलग्न से पंचमेश से और अमात्यकारक से युत-
दृष्ट हो तो राजा के यहाँ प्रधान होता है।।१।।
लाभेशो वीक्षिते लाभे पापदृष्टिविवर्जिते।
तदा राज्यालये विप्र प्रधानत्वं कुलेऽपि च ।।२।।
लाभेश लाभस्थान को देखता हो और पापग्रह से दृष्ट-युत न हो तो राजा
के यहाँ प्रधान होता है।।२।।