बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
धनेशे पापसंयुक्ते धने पापसमन्विते।
असत्यवादी पिशुनः पवनव्याधिसंयुतः॥४८॥
धनेश पापग्रह से युत हो और धनभाव में पापग्रह हो तो झूठ बोलने
वाला, कृपण और वातव्याधि से युक्त होता है॥४८॥
अथ सहजभावफलम्—
सभौमो भ्रातृभावेशो त्रिकभिन्नं च चेत् स्थितः।
भ्रातृक्षेत्रगतो वापि भ्रातृभावं विनिर्दिशेत्॥४९॥
मंगल के साथ तीसरे भाव के स्वामी त्रिक (६।८।१२) से भिन्न स्थान
में वा तीसरे भाव में हो तो भाइयों का सुख होता है॥४९॥
तौ पापयोगतः पापक्षेत्रयोगेन वा पुनः।
उत्पाट्य सहजान्सद्यो निहन्ता शास्त्रनिश्चयात्॥५०॥
वे ही दोनों पापग्रह से युत हों और त्रिक में हों तो भाइयों का जन्म होता
है, किन्तु बचते नहीं हैं॥५०॥
स्त्रीग्रहो भ्रातृभावेशः स्त्रीग्रहो भ्रातृगोऽपि वा।
भगिनी स्यात्तदा भ्राता पुंगृहे पुंग्रहो यदि॥५१॥
यदि भ्रातृभाव का स्वामी स्त्रीग्रह हो और तीसरे भाव में भी स्त्रीग्रह
हो तो बहिनें होती हैं। पुरुष ग्रह हो तो भाई होते हैं॥५१॥
भ्रातृभे कारके वापि शुभयुक्तनिरीक्षिते।
भावे वा बलसम्पूर्णे भ्रातॄणां वर्धनं भवेत्॥५२॥
भ्रातृभाव वा भ्रातृकारक शुभग्रह से युत-दृष्ट हो और भ्रातृभाव पूर्ण
बलवान् हो तो भाइयों की वृद्धि होती है॥५२॥
केन्द्रत्रिकोणगे वापि स्वोच्चमित्रस्ववर्गगे।
नाथे वा कारके वापि भ्रातृलाभं वदेद्बुधः॥५३॥
यदि भ्रातृभावेश वा भ्रातृकारक केन्द्र-त्रिकोण में अपने उच्चमित्र आदि
स्ववर्ग में हो तो भाइयों का लाभ होता है॥५३॥
भ्रातृभे बुधसंयुक्ते तदीशे चन्द्रसंयुते।
कारके मन्दसंयुक्ते भगिन्येकाग्रतो भवेत्॥५४॥
भ्रातृभावेश चन्द्रमा से युक्त हो और भ्रातृभाव में बुध हो और भ्रातृकारक
शनि से युत हो तो उसके पहले एक बहन होती है॥५४॥