बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
इस ग्रन्थ के बारे में
बृहन्नारदीय पुराण, जिसे नारदपुराण भी कहा जाता है, परम्परा में महर्षि व्यास से जोड़ा जाता है। इसका पूर्वभाग सनक आदि कुमारों द्वारा नारद को दिए गए उपदेशों के रूप में है, जिनमें धर्म, भक्ति, व्रत, तीर्थ, मन्त्र-साधना और वेदाङ्गों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द) का विस्तृत वर्णन आता है। इसकी एक विशेषता अठारह पुराणों की विषय-सूची है, जिसमें प्रत्येक पुराण की श्लोक-संख्या और विषय बताए गए हैं; स्कैन में 'पञ्चविंशतिसाहस्रं...' और 'प्रभासस्य च माहात्म्यं...' जैसे श्लोक इसी अंश के हैं।
यह संस्करण हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग की पुराण-प्रकाशन योजना के अन्तर्गत छपा 'बृहन्नारदीयपुराणम् (पूर्वभागः)' है, जिसमें संस्कृत मूल के साथ व्याकरण-वेदान्ताचार्य तारिणीश झा का हिन्दी अनुवाद है। प्रथम संस्करण शक 1910, अर्थात् 1989 ई. में प्रकाशित हुआ; प्रकाशक सम्मेलन के प्रधान मन्त्री डॉ. प्रभात मिश्र शास्त्री थे।
प्रकाशकीय वक्तव्य इस पुराण के ही एक श्लोक से आरम्भ होता है, जिसमें कहा गया है कि जैसे नदियों में गंगा और सरोवरों में पुष्कर श्रेष्ठ है, वैसे ही पुराणों में नारदीय। पुस्तक 1008 पृष्ठों की है।
द्विनवतितमोऽध्यायः
सूत उवाच
एतच्छ्रुत्वा नारदस्तु कुमारस्य वचो मुदा । पुनरप्याह सुप्रीतो जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम् ॥१॥
नारद उवाच
साधु साधु महाभाग सर्वलोकोपकारकम् । महातंत्रं त्वया प्रोक्तं सर्वतंत्रोत्तमोत्तमम् ॥२॥
अधुना श्रोतुमिच्छामि पुराणाख्यानमुत्तमम् । यस्मिन्यस्मिन्पुराणे तु यद्यदाख्यानकं मुने ।
तत्सर्वं मे समाचक्ष्व सर्वज्ञस्त्वं यतो मतः ॥३॥
सूत उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं विप्रा नारदस्य शुभावहम् । पुराणाख्यानसंप्रश्नं कुमारः प्रत्युवाच ह ॥४॥
सनत्कुमार उवाच
पुराणाख्यानकं विप्र नानाकल्पसमुद्भवम् । नानाउथासमायुक्तमद्भुतं बहुविस्तरम् ॥५॥
ऋषिः सनातनश्चायं यथा वेद तथाऽपरः । न वेद तस्मात्पृच्छ त्वं बहुकल्पविदां वरम् ॥६॥
अध्याय ६२
संक्षेप में ब्रह्मपुराण का इतिहास
सूत बोले- कुमार के वचन को सुनकर जिज्ञासु नारद परम प्रसन्न हुए और कल्याण की बातें फिर
पूछने लगे ॥१।
नारद बोले- महाभाग ! साधु ! साधु ! आपने अखिल लोकोपकारक तथा समस्त तन्त्रों में उत्तम महा-
तन्त्र को बता दिया । अब मैं पुराणों के पवित्र आख्यान को सुनना चाहता हूँ । मुने ! जिस-जिस पुराण में जो
आख्यान आते हैं, वह सब मुझे बता दीजिये, क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं ॥२-३॥
सूत बोले- विप्रवृन्द ! नारद के पुराणाख्यान सम्बन्धी कल्याणकारक प्रश्न को सुनकर कुमार कहने
लगे ॥४॥
सनत्कुमार बोले- "विप्र ! अनेक कल्पों में होने वाले, पुराणों के आख्यान विविध कथाओं से युक्त,
अद्भुत तथा अत्यन्त विस्तृत हैं। ये सनातन नामक ऋषि अपर वेदावतार ही हैं। ये अनेक कल्पज्ञाताओं में श्रेष्ठ
हैं। इनसे तुम अपनी जिज्ञासा पूरी कर लो ॥५-६॥"
८६२ नारदीयपुराणम्
श्रुत्वेत्थं नारदो वाक्यं कुमारस्य महात्मनः । प्रणम्य विनयोपेतः सनातनमथाब्रवीत् ॥७॥
नारद उवाच
ब्रह्मन्पुराणविच्छ्रेष्ठ ज्ञानविज्ञानतत्पर । पुराणानां विभागं मे साकल्येनानुकीर्तय ॥८॥
यस्मिन् श्रुते श्रुतं सर्वं ज्ञाते ज्ञातं कृते कृतम् ॥६॥
वर्णाश्रमाचारधर्मं साक्षात्कारमुपैष्यति । कियन्ति च पुराणानि कियत्संख्यानि मानतः ॥१०॥
किंकिमाख्यानयुक्तानि तद्वदस्व मम प्रभो । चातुर्वर्ण्याश्रया नानाव्रतादीनां कथास्तथा ॥११॥
सृष्टिकमेण वंशानां कथाः सम्यक्प्रकाशय । त्वत्तोऽधिको न चान्योऽस्ति पुराणाख्यानवित्प्रभो ॥१२॥
तस्मादाख्याहि मह्यं त्वं सर्वसन्देहभंजनम् ।
सूत उवाच ॥१३॥
ततः सनातनो विप्राः श्रुत्वा नारदभाषितम् ।
नारायणं क्षणं ध्यात्वा प्रोवाचाथ विदां वरः ।
सनातन उवाच ॥१४॥
साधु साधु मुनिश्रेष्ठ सर्वलोकोपकारिका
पुराणाख्यानविज्ञाने यज्जाता नैष्ठिकी मतिः । तुभ्यं समभिधास्यामि यत्प्रोक्तं ब्रह्मणा पुरा ॥१५॥
मरीच्यादिऋषिभ्यस्तु पुत्रस्नेहावृतात्मना । एकदा ब्रह्मणः पुत्रो मरीचिर्नाम विश्रुतः ॥१६॥
स्वाध्यायश्रुतसंपन्नो वेदवेदांगपारगः । उपसृत्य स्वपितरं ब्रह्माणं लोकभावनम् ॥१७॥
प्रणम्य भक्त्या पप्रच्छ इदमेव मुनीश्वर । पुराणाख्यानममलं यस्त्वं पृच्छसि मानव ॥१८॥
महात्मा कुमार की यह बात सुनकर नारद विनयपूर्वक सनातन को प्रणाम करके निवेदन करने लगे ॥७॥
नारद बोले—ब्रह्मन् ! पुराणवेत्ताओं में श्रेष्ठ ! ज्ञान-विज्ञान से भरे पुराणों के आख्यानों को समग्रतया
मुझे बता दीजिये, जिनके सुनने से सब कुछ सुना हुआ जानने से जाना हुआ तथा करने से किया हुआ हो जाता
है और जिनमें वर्णाश्रमधर्म एवम् आचारधर्म का साक्षात्कार कराया गया है। प्रभो ! कितने पुराण हैं ? उनकी
कितनी संख्या है ? कौन-कौन-से आख्यान कहे गये हैं ? सब कुछ मुझे बतला दीजिये। नानाव्रत, चातुर्वर्ण्य तथा
सृष्टिक्रम से वंशों की कथायें सम्यक् प्रकार से कहिये। आपसे बढ़ कर पुराणों का ज्ञाता कोई नहीं है। इसलिये
मेरे समस्त संशयों का आप निराकरण कीजिये।
सूत बोले—विप्रगण ! तदुपरान्त नारद का वचन सुनकर वेत्ताओं में श्रेष्ठ सनातन क्षण भर नारायण
का ध्यान कर कहने लगे।
सनातन बोले—मुनिश्रेष्ठ ! साधु ! साधु ! पुराणों के आख्यान सुनने में जो तुम्हारी प्रीति हुई है,
उससे सकल लोकों का उपकार होगा। प्राचीन काल में पुत्र-स्नेह-वशीभूत ब्रह्मा ने मरीचि आदि ऋषियों से जो
बताया था, वह मैं तुमसे कहूँगा। मुनीश्वर ! एक समय अत्यन्त विख्यात, वेदवेदांगपारंगत स्वाध्याय संपन्न
ब्रह्मपुत्र मरीचि अपने पिता लोककर्ता ब्रह्मा के समीप जाकर भक्ति पूर्वक प्रणाम करते हुए यही पुराणों के
पवित्र आख्यान, जो तुमने प्रश्न किया है, पूछ बैठे ॥८-१८॥
द्विनवतितमोऽध्यायः ८६३
मरीचिरुवाच
भगवन्देवदेवेश लोकानां प्रभवाप्यय । सर्वज्ञ सर्वकल्याण सर्वाध्यक्ष नमोऽस्तु ते ॥१९॥
पुराणबीजमाख्याहि मह्यं शुश्रूषवे पितः । लक्षणं च प्रमाणं च वक्तारं पृच्छकं तथा ॥२०॥
ब्रह्मोवाच
शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि पुराणानां समुच्चयम् । यस्मिञ्ज्ञाते भवेज्ज्ञातं वाङ्मयं सचराचरम् ॥२१॥
पुराणमेकमेवासीत्सर्वकल्पेषु मानव । चतुर्वर्गस्य बीजं च शतकोटिप्रविस्तरम् ॥२२॥
प्रवृत्तिः सर्वशास्त्राणां पुराणादभवत्ततः । कालेनाग्रहणं दृष्ट्वा पुराणस्य महामतिः ॥२३॥
हरिर्व्यासस्वरूपेण जायते च युगे युगे । चतुर्लक्षप्रमाणेन द्वापरे द्वापरे सदा ॥२४॥
तदष्टादशधा कृत्वा भूर्लोके निर्दिशत्यपि । अद्यापि देवलोके तु शतकोटिप्रविस्तरम् ॥२५॥
अस्त्येव तस्य सारस्तु चतुर्लक्षेण वर्ण्यते । ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं च वायवीयं तथैव च ॥२६॥
भागवतं नारदीयं मार्कंडेयं च कीर्तितम् । आग्नेयं च भविष्यं च ब्रह्मवैवर्तलिंगके ॥२७॥
वाराहं च तथा स्कांदं वामनं कूर्मसंज्ञकम् । मात्स्यं च गारुडं तद्वद्ब्रह्मांडाख्यमिति त्रिषट् ॥२८॥
एकं कथानकं सूत्रं वस्तुः श्रोतुः समाह्वयम् । प्रवक्ष्यामि समासेन निशामय समाहितः ॥२९॥
ब्राह्मं पुराणं तत्रादौ सर्वलोकहिताय वै । व्यासेन वेदविदुषा समाख्यातं महात्मना ॥३०॥
तद्वै सर्वपुराणाद्ययं धर्मकामार्थमोक्षदम् । नानाख्यानेतिहासाढ्यं दशसाहस्रमुच्यते ॥३१॥
देवानां च सुराणां च यत्रोत्पत्तिः प्रकीर्तिता । प्रजापतीनां च तथा दक्षादीनां मुनीश्वर ॥३२॥
मरीचि बोले—भगवन् ! देवदेवेश ! लोकों के उत्पादक तथा विनाशक ! सर्वज्ञ ! सर्वकल्याण ! सर्वाध्यक्ष
आपको नमस्कार है । पिता ! मुझ शुश्रूषु को पुराण के बीज, लक्षण, प्रमाण, वक्ता तथा प्रष्ठा के विषय में
समझाइये ॥१९-२०॥
ब्रह्मा बोले—वत्स ! सुनो, मैं पुराणों का संग्रह बतला रहा हूँ, जिसके जान लेने से चराचर सहित संपूर्ण
वाङ्मय ज्ञात हो जाता है । मानद ! समस्त कल्पों में एक ही पुराण चतुर्वर्ग का बीजरूप तथा सौ करोड़ श्लोकों
में विस्तृत था । उस पुराण से सकल शास्त्रों की उत्पत्ति हुई । समय-समय पर लोकों में उस विस्तृत पुराण के
ग्रहण करने की अक्षमता देखकर महामति हरि व्यासरूप से युग-युग में अवतार लेते हैं । प्रत्येक द्वापर युग में
चतुर्लक्ष श्लोकों के प्रमाण से उस पुराण को अट्ठारह भागों में विभक्त करके भूलोक में छोड़ देते हैं ॥२१-२४ १/२॥
देवलोक में आज भी उस पुराण का सौ करोड़ श्लोकों में विस्तार है । उस शतकोटि विस्तृत पुराण का
सार चार लाख श्लोकों में वर्णन किया गया है । ब्राह्म, पाद्म, वैष्णव, वायवीय, भागवत, नारदीय, मार्कंडेय,
आग्नेय, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त्त, लिंग, वाराह, स्कांद, वामन, कूर्म, मात्स्य, गारुड, तथा ब्रह्मांड—ये अठारह पुराणों
के नाम हैं । सब का एक ही कथानक-सूत्र हैं । उस सूत्र को तथा वक्ता और श्रोता के नाम को मैं संक्षेप से बता
देता हूँ, तुम सावधानी से सुनो । सब पुराणों में प्रथम पुराण ब्राह्म है, जिसकी रचना वेद के विद्वान् महात्मा
व्यास ने अखिल लोकों के कल्याण के लिये की । वह सर्वप्रथम पुराण कहलाता है; धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को
देता है । उसमें अनेक आख्यान तथा इतिहास भरे हैं; श्लोकों की संख्या दस हजार हैं ॥२५-३१॥
मुनीश्वर ! ब्रह्मपुराण में देवों, असुरों, प्रजापतियों तथा दक्ष, आदिकों की उत्पत्ति बताई गई हैं; लोकेश्वर
८६४ नारदीयपुराणम्
ततो लोकेश्वरस्याथ सूर्यस्य परमात्मनः । वंशानुकीर्तनं पुण्यं महापातकनाशनम् ॥३३॥
यत्रावतारः कथितः. परमानन्दरूपिणः । श्रीमतो रामचंद्रस्य चतुर्व्यूहावतारिणः ॥३४॥
ततश्च सोमवंशस्य कीर्तनं यत्र वर्णितम् । कृष्णस्य जगदीशस्य चरितं कल्मषापहम् ॥३५॥
द्वीपानां चैव सर्वेषां वर्षाणां चाप्यशेषतः । वर्णनं यत्र पातालस्वर्गाणां च प्रदृश्यते ॥३६॥
नरकाणां समाख्यानं सूर्यस्तुतिकयानकम् । पार्वत्याश्च तथा जन्म विवाहश्च निगद्यते ॥३७॥
दक्षाख्यानं ततः प्रोक्तमेकाम्रक्षेत्रवर्णनम् । पूर्वभागोऽयमुदितः पुराणस्यास्य नारद ॥३८॥
अस्योत्तरे विभागे तु पुरुषोत्तमवर्णनम् । विस्तरेण समाख्यातं तीर्थयात्राविधानतः ॥३९॥
अत्रैव कृष्णचरितं विस्तरात्समुदीरितम् । वर्णनं यमलोकस्य पितृश्राद्धविधस्तथा ॥४०॥
वर्णाश्रमाणां धर्माश्च कीर्तिता यत्र विस्तरात् । विष्णुधर्मयुगाख्यानं प्रलयस्य च वर्णनम् ॥४१॥
योगानां च समाख्यानं सांख्यानां चापि वर्णनम् । ब्रह्मवादसमुद्देशः पुराणस्य प्रशंसनम् ॥४२॥
एतद्ब्रह्मपुराणं तु भागद्वयसमन्वितम् । वर्णितं सर्वपापघ्नं सर्वसौख्यप्रदायकम् ॥४३॥
सूतशौनकसंवादं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् । लिखित्त्वैतत्पुराणं यो वैशाख्यां हेमसंयुतम् ॥४४॥
जलधेनुयुतं चापि भक्त्या दद्याद्विजातये । पौराणकाय संपूज्य वस्त्रभोज्यविभूषणैः ॥४५॥
स वसेद्ब्रह्मणो लोके यावच्चंद्रार्कतारकम् । यः पठेच्छृणुयाद्वापि ब्राह्मानुक्रमणीं द्विज ॥४६॥
सोऽपि सर्वपुराणस्य श्रोतुर्वक्तुः फलं लभेत् । शृणोति यः पुराणं तु ब्राह्मं सर्वं जितेंद्रियः ॥४७॥
परमात्मा सूर्य के वंश का वर्णन किया गया है, जो महापातकों का नाशक है; चतुर्व्यूहावतारी परमानन्दरूपी
श्रीमान् रामचन्द्र का अवतार वर्णित है; सोमवंश का कीर्तन तथा जगदीश कृष्ण के पापनाशन चरित्र का वर्णन
आता है; अखिल द्वीपों, वर्षों, पाताल, स्वर्ग तथा नरक का आख्यान मिलता है; सूर्य की स्तुति एवम् कथा,
पार्वती का जन्म और विवाह वर्णित किया गया है; दक्ष का आख्यान और एकाम्रक्षेत्र का वर्णन भी मिलता है।
नारद ! इतना तो उस पुराण के पूर्वभाग का विषय है ॥३२-३८॥
उत्तर भाग में विस्तार से पुरुषोत्तम क्षेत्र का वर्णन और तीर्थयात्रा का विधान बताया गया है। इसी भाग
में विस्तार से कृष्णचरित्र यमलोक, पितृश्राद्ध, वर्णाश्रमधर्म, विष्णुधर्म, युग, प्रलय, योग तथा सांख्य का वर्णन
किया गया है; ब्रह्मवाद का उद्देश्य कथन तथा पुराण की प्रशंसा की गई है । बस, यही विषय ब्रह्मपुराण के दोनों
भागों में आते हैं ।
यह पुराण सकल पापनाशक, सर्वसौख्यदायक एवम् भुक्ति-मुक्ति प्रदायक हैं। उसमें सूत और शौनक का
संवाद हुआ है ॥३९-४३॥
वैशाख की पूर्णिमा को जो व्यक्ति वस्त्र, भोज्य तथा आभूषणों से पौराणिक ब्राह्मण का पूजन कर सुवर्ण
तथा जलधेनु सहित लिखित ब्रह्मपुराण की पुस्तक प्रदान करता है, वह जब तक सूर्य-चन्द्रमा रहते हैं तब तक
ब्रह्मलोक में वास करता है। जो द्विज ब्रह्मपुराण का श्रवण या पाठ करता है, उसे समस्त पुराणों के पारायण तथा
श्रवण करने का फल मिलता है। जो जितेन्द्रिय होकर नियमपूर्वक हविष्य भक्षण करते हुए ब्रह्मपुराण का श्रवण
द्विनवतितमोऽध्यायः ८६५
हविष्याशी च नियमात्स लभेदब्रह्मणः पदम् । किमत्र बहुनोक्तेन यद्यदिच्छति मानवः
तत्सर्वं लभते वत्स पुराणस्यास्य कीर्तनात् ॥४८॥
इति श्री बृहन्ना० पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे ब्राह्मपुराणेतिहासकथनं नाम
द्विनवतितमोऽध्यायः ॥६२॥
त्रिनवतितमोऽध्यायः
ब्रह्मोवाच
शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि पुराणं पद्मसंज्ञकम् । महत्पुण्यप्रदं नृणां शृण्वतां पठतां मुदा ॥१॥
यथा पंचेन्द्रियः सर्वः शरीरीति निगद्यते । तथेदं पंचभिः खंडैरुदितं पापनाशनम् ॥२॥
पुलस्त्येन तु भीष्माय सृष्ट्यादिक्रमतो द्विज । नानाख्यानेतिहासाद्यैर्यत्रोक्तो धर्मविस्तरः ॥३॥
पुष्करस्य च माहात्म्यं विस्तरेण प्रकीर्तितम् । ब्रह्मयज्ञविधानं च वेदपाठादिलक्षणम् ॥४॥
करता है, उसे ब्रह्मपद की प्राप्ति होती है। वत्स ! अधिक क्या कहें, उस पुराण के कीर्तन करने से मनुष्य
जो कुछ चाहता है, वह सब उसे मिल जाता है ॥४४-४८॥
श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में ब्रह्मपुराण का इतिहास कथन नामक
बानबेवाँ अध्याय समाप्त ॥६२॥
अध्याय ६३
पद्मपुराण की विषय-सूची
ब्रह्मा बोले—पुत्र ! सुनो, अब मैं हर्ष से पद्मपुराण के सम्बन्ध में कहूँगा, जो सुनने तथा पढ़ने वालों के
लिये महापुण्यदायक है। जैसे पांच इन्द्रियों से युक्त प्राणी शरीरी कहलाता है, उसी तरह पांच खण्डों से युक्त यह
पुराण पापनाशन कहा जाता है। द्विज ! इस पुराण में जहाँ पुलस्त्य ने भीष्म से सृष्टि के आदि से लेकर अनेक
आख्यान, इतिहास, धर्म, पुष्करमाहात्म्य, ब्रह्मयज्ञविधान, वेदपाठ आदि के लक्षण, दान तथा व्रतों का पृथक्
१०९ ना० पु०
८६६ नारदीयपुराणम्
दानानां कीर्तनं यत्र व्रतानां च पृथक्पृथक् । विवाहः शैलजायाश्च तारकाख्यानकं महत् ॥५॥
माहात्म्यं च गवादीनां कीर्तितं सर्वपुण्यदम् । कालकेयादिदैत्यानां वधो यत्र पृथक्पृथक् ॥६॥
ग्रहाणामर्चनं दानं यत्र प्रोक्तं द्विजोत्तम । तत्सृष्टिखण्डमुद्दिष्टं व्यासेन सुमहात्मना ॥७॥
पितृमात्रादिपूज्यत्वे शिवशर्मकथा पुरा । सुव्रतस्य कथा पश्चाद्वृत्रस्य च वधस्तथा ॥८॥
पृथोर्वेनस्य चाख्यानं सुनीथायाः कथा तथा । सुकलाख्यानकं चैव धर्माख्यानं ततः परम् ॥६॥
पितृशुश्रूषणाख्यानं नहुषस्य कथा ततः । ययातिचरितं चैव गुरुतीर्थनिरूपणम् ॥१०॥
राज्ञा जैमिनिसंवादो बह्वाश्चर्यकथायुतः । कथा ह्याशोकसुन्दर्या हुण्डदैत्यवधान्विता ॥११॥
कामोदाख्यानकं तत्र विहुण्डवधसंगुतम् । कुंजलस्य च संवादश्च्यवनेन महात्मना ॥१२॥
सिद्धाख्यानं ततः प्रोक्तं खंडस्यास्य फलोहनम् । सूतशौनकसंवादं भूमिखंडमिदं स्मृतम् ॥१३॥
ब्रह्माण्डोत्पत्तिस्तद्विता यत्राभिषिच सौतिना । सन्तूमि लोकसंस्थानं तीर्थाख्यानं ततः परम् ॥१४॥
नर्मदोत्पत्तिकथनं तत्तीर्थानां कथाः पृथक् । कुरुक्षेत्रादितीर्थानां कथा पुण्या प्रकीर्तिता ॥१५॥
कालिन्दापुण्यकथनं काशीमाहात्म्यवर्णनम् । गयायाश्चैव माहात्म्यं प्रयागस्य च पुण्यकम् ॥१६॥
वर्णाश्रमानुरोधेन कर्मयोगनिरूपणम् । व्यासजैमिनिसंवादः पुण्यकर्मकथान्वितः ॥१७॥
समुद्रमथनाख्यानं व्रताख्यानं ततः परम् । ऊर्जपंचाहमाहात्म्यं स्तोत्रं सर्वापराधनुत् ॥१८॥
एतत्स्वर्गभिधं विप्र सर्वपातकनाशनम् । रामाश्वमेधं प्रथमं रामराज्याभिषेचनम् ॥१९॥
अगस्त्याद्यागमनञ्चैव पौलस्त्यान्वयकीर्त्तनम् । अश्वमेधोपदेशश्च हयचर्या ततः परम् ॥२०॥
नानाराजकथाः पुण्या जगन्नाथानुवर्णनम् । वृन्दावनस्य माहात्म्यं सर्वपापप्रणाशनम् ॥२१॥
कथन, पार्वती का विवाहवर्णन, तारक तथा कालकेय आदि दैत्यों का वध, गो आदिकों का माहात्म्यवर्णन, ग्रहों
का अर्चन तथा दान बतलाये हैं, उसे महात्मा व्यास ने सृष्टि खंड कहा है॥१-६॥
पिता-माता के पूज्यत्व के विषय में शिवशर्मा की कथा, सुव्रत की कथा, वृत्रवध, पृथुवेन का आख्यान,
सुनीथा की कथा, सुकला का आख्यान, धर्माख्यान, पितृशुश्रूषा का आख्यान, नहुष की कथा, ययातिचरित्र,
गुरुतीर्थनिरूपण, राजा और जैमिनि का अनेक आश्चर्यजनक कथाओं से युक्त संवाद, अशोकसुन्दरी की कथा,
हुंडदैत्य का वध, कामोदा-आख्यान, विहुंडवध, महात्मा च्यवन के साथ कुंजल का संवाद, सिद्धाख्यान, और
सूत-शौनक-संवाद जहाँ निर्दिष्ट किये गये हैं, उसका नाम भूमिखण्ड है ॥७-१३॥
जहाँ सूतपुत्र द्वारा ऋषियों से ब्रह्मांड की उत्पत्ति का वर्णन, भूलोक का संस्थान, तीर्थाख्यान, नर्मदोत्पत्ति-
कथन, तीर्थों की पृथक्-पृथक् कथायें, कुरुक्षेत्र आदि तीर्थों की पवित्र कथा, कालिन्दीपुण्यकथन, काशीमाहात्म्य
वर्णन, गया तथा प्रयाग का माहात्म्यवर्णन, वर्णाश्रम के अनुरोध से कर्मयोगनिरूपण, व्यास और जैमिनि का
संवाद, पुण्यकर्म की कथा, समुद्रमंथन का आख्यान, व्रताख्यान,कार्तिक के पाँच दिनों का माहात्म्य और सर्वापरा-
धनोदनस्तोत्र, बतलाये गये हैं, उसे स्वर्गखण्ड कहते हैं, जो सकल पातकों का नाशक है ।
विप्र ! रामाश्वमेध, रामराज्याभिषेक, अगस्त्य आदि का आगमन, पौलस्त्यवंशवर्णन, अश्वमेध का उप-
देश, अश्वचर्या, अनेक राजाओं की पवित्र कथायें, जगन्नाथ वर्णन, समस्त पापनाशन, वृन्दावन का माहात्म्य,
कृष्णावतार की नित्यलीलाओं का कथन, माधवस्नानमाहात्म्य, स्नान, दान तथा अर्चन का फल, पृथ्वी तथा
त्रिनवतितमोऽध्यायः ८६७
नित्यलीलानुकथनं यत्र कृष्णावतारिणः । माधवस्नानमाहात्म्यं स्नानदानाच्चने फलम् ॥२२॥
धरावराहसंवादो यमब्राह्मणयोः कथा । संवादो राजदूतनां कृष्णस्तोत्रनिरूपणम् ॥२३॥
शिवशंभुसमायोगो दधीच्याख्यानकं ततः । भस्ममाहात्म्यमतुलं शिवमाहात्म्यमुत्तमम् ॥२४॥
देवरातसुताख्यानं पुराणप्रशंसनम् । गौतमाख्यानकं चैव शिवगोता ततः स्मृता ॥२५॥
कल्पांतरे रामकथा भारद्वाजाश्रमस्थिता । पातालखंडमेतद्धि शृण्वतां पठतां सदा ॥२६॥
सर्वपापप्रशमनं सर्वाभीष्टफलप्रदम् । पर्वताख्यानकं पूर्वं गौर्ये प्रोक्तं शिवेन वै ॥२७॥
जालंधरकथा पश्चाच्छ्रीशैलाद्यनुकीर्तनम् । सगरस्य कथा पुण्या ततः परमुदीरितम् ॥२८॥
गंगाप्रयागकाशीनां गयायाश्चाधिपुण्यकम् । अन्नादिदानमाहात्म्यं तन्महाद्वादशीव्रतम् ॥२९॥
चतुर्विशेकादशीनां माहात्म्यं पृथगीरितम् । विष्णुधर्मसमाख्यानं विष्णुनामसहस्रकम् ॥३०॥
कार्त्तिकव्रतमाहात्म्यं माघस्नानफलं ततः । जम्बूद्वीपस्य तीर्थानां माहात्म्यं पापनाशनम् ॥३१॥
साभ्रमत्ययाश्च माहात्म्यं नृसिंहोत्पत्तिवर्णनम् । देवशर्मादिकाख्यानं गीतामाहात्म्यवर्णनम् ॥३२॥
भक्त्याख्यानं च माहात्म्यं श्रीमद्भागवतस्य ह । इन्द्रप्रस्थस्य माहात्म्यं बहुतीर्थकथान्वितम् ॥३३॥
मन्त्ररत्नाभिधानं च त्रिपाद्भूत्यनुवर्णनम् । अवतारकथाः पुण्या मत्स्यादीनामतः परम् ॥३४॥
रामनामशतं दिव्यं तन्माहात्म्यं च वाडव । परीक्षणं च भृगुणा श्रीविष्णोर्वैवमस्य च ॥३५॥
इत्येतदुत्तरं खण्डं पंचमं सर्वपुण्यदम् । पंचखंडयुतं पाद्मं यः शृणोति नरोत्तमः ॥३६॥
स लभेद्वैष्णवं धाम भुक्त्वा भोगानिहेप्सितान् । एतद्वै पंचपंचाशत्सहस्रं पद्मसंज्ञकम् ॥३७॥
पुराणं लेखयित्वा वै ज्येष्ठयां स्वर्णब्जसंयुक्तम् । यः प्रदद्यात्सुसत्कृत्य पुराणज्ञाय मानव ॥३८॥
वाराह का संवाद, यम और ब्राह्मण की कथा, राजा का दूतों से संवाद, कृष्णस्तोत्रनिरूपण, शिव तथा शम्भु का
समायोग, दधीच का आख्यान, अतुलनीय भस्ममाहात्म्य, उत्तम शिवमाहात्म्य, देवरात के पुत्र का आख्यान,
पुराणों की प्रशंसा, गौतमाख्यान, शिवगोता और कल्पांतर में भारद्वाजआश्रम सम्बन्धी राम की कथा जिसमें
वर्णित है, वह पातालखंड है, जो सुनने तथा पढ़ने वालों के लिये सकलपापनाशक एवम् वांछितफलदायक है ॥१४-
२६॥
पांचवें खण्ड का नाम उत्तर है। इसमें गौरी के प्रति शंकर द्वारा पर्वत का आख्यान, जालंधर कथा,
श्रीशैल आदि का कीर्तन, सगर की पवित्र कथा, गंगा, प्रयाग, काशी तथा गया का पुण्यवर्णन, अन्नादिदान
माहात्म्य, महाद्वादशीव्रत, चोबीस एकादशियों का पृथक्-पृथक् माहात्म्यवर्णन, विष्णुधर्म का आख्यान, विष्णु-
सहस्रनाम, कार्तिक व्रतमाहात्म्य, माघस्नानफल, जम्बूद्वीप के तोर्थों का पापनाशक माहात्म्य, साभ्रमती का
माहात्म्य, नृसिंहोत्पत्तिवर्णन, देवशर्मा आदि का आख्यान, गीतामाहात्म्यवर्णन, भक्ति का आख्यान, श्रीमद्भागवत
का माहात्म्य, अनेक तीर्थ कथाओं के साथ इन्द्रप्रस्थ का माहात्म्य, मन्त्ररत्न का कथन, त्रिपाद्भूति का वर्णन,
मत्स्य आदि अवतारों की पवित्र कथायें, राम नाम का सतनाम तथा दिव्यमाहात्म्य और भृगु द्वारा श्रीविष्णु के
वैभव का परीक्षण बतलाये गये हैं। यह खंड समस्त पुण्यों को देने वाला है ॥२७-३५॥
जो श्रेष्ठ मनुष्य पांच खंडों से युक्त पद्मपुराण का श्रवण करेगा, वह इस लोक में अभिलषित भोगों का
भोग कर वैकुण्ठ को जायेगा । मानद ! जो व्यक्ति पचपन हजार श्लोकों से परिपूर्ण पद्मपुराण को लिखकर
ज्येष्ठ की पूर्णिमा में पौराणिक ब्राह्मण को स्वर्ग कमल सहित यह पुराण प्रदान करता है, वह सर्वदेववन्द्य होकर
८६८ नारदीयपुराणम्
स याति वैष्णवं धाम सर्वदेवनमस्कृतः । पद्मानुक्रमणीमेतां यः पठेच्छृणुयात्तथा ॥३९॥
सोऽपि पद्मपुराणस्य लभेच्छ्रवणजं फलम् ॥४०॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे पद्मपुराणानुक्रमणिकावर्णनं नाम
त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥९३॥
चतुर्नवतितमोऽध्यायः
श्रीब्रह्मोवाच
शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि पुराणं वैष्णवं महत् । त्रयोविंशतिसाहस्रं सर्वपातकनाशनम् ॥१॥
यत्रादिभागे निर्दिष्टाः षडंशा शक्तिजेन ह । मैत्रेयायादिमे तत्र पुराणस्यावतारिकाम् ॥२॥
आदिकारणसर्गश्च देवादीनां च संभवः । समुद्रमथनाख्यानं दक्षादीनां ततोऽन्वयः ॥३॥
ध्रुवस्य चरितं चैव पृथोश्चरितमेव च । प्राचेतसं तथाख्यानं प्रह्लादस्य कथानकम् ॥४॥
विष्णुलोक को जाता है। जो मानव पद्मपुराण की इस अनुक्रमणी को सुनेगा या पढ़ेगा, वह भी इस पुराण के
श्रवणजन्य फल को प्राप्त करेगा ॥३६-४०॥
श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में पद्मपुराण का अनुक्रमणिका वर्णन नामक
तिरानवेवां अध्याय समाप्त ॥६३॥
अध्याय ९४
विष्णुपुराण की विषय-सूची
श्री ब्रह्मा बोले- वत्स ! सुनो, अब मैं अखिल पातकों के नाश करने वाले तथा तेईस हजार श्लोक वाले
विष्णु महापुराण के सम्बन्ध में कहूँगा, जिसके आदि भाग में पराशर ने छह अंशों का निर्देश किया है। उसके
प्रारंभ में मुनि ने मैत्रेय से पुराण की अवतारिका बतलाई है। तदनन्तर सृष्टि का आदिकारण, देवादिकों की
उत्पत्ति, समुद्रमंथन का आख्यान, दक्ष आदि का वंशवर्णन, ध्रुव का चरित्र, प्रचेता का आख्यान, प्रह्लाद का
कथानक, राज्यों का पृथक्-पृथक् अधिकार वर्णन-ये सब बातें प्रथम अंश में कही गई हैं ॥१-४१/२॥ द्वितीय अंश
चतुर्नवतितमोऽध्यायः ८६६
पृथुराज्याधिकाराख्या प्रथमोऽश ईरितिः । प्रियव्रताऽन्वयाख्यानं द्वीपवर्षनिरूपणम् ।।५।।
पातालनरकाख्यानं सप्तस्वर्गनिरूपणम् । सूर्यादिवारकथनं पृथग्लक्षणसंयुक्तम् ।।६।।
चरितं भरतस्याथ मुक्तिमार्गनिदर्शनम् । निदाघऋभुसंवादो द्वितीयोंऽश उदाहृतः । ७।
मन्वन्तरसमाख्यानं वेदव्यासावतारकम् । नरकोद्धारकं कर्म गदितं च ततः परम् ।।८।।
सगरस्योर्वसंवादे सर्वधर्मनिरूपणम् । श्राद्धकल्पं तथोद्दिष्टं वर्णाश्रमनिबन्धनम् ।।६।।
सदाचारश्च कथितो मायामोहकथा ततः । तृतीयोंऽशाऽयमुदितः सर्वपापप्रनाशनः ।।१०।।
सूर्यवंशकथा पुण्या सोमवंशाऽनुकीर्तनम् । चतुर्थेऽशे मुनिश्रेष्ठ नानाराजकथान्वितम् ।।११।।
कृष्णोवतारसंश्लो गोकुलोथा कथा ततः । पूतनाविवधो बाल्ये कोमारेऽघाविहिंसनम् ।।१२।।
कौशोरे कंसहननं माथुरं चरितं तथा । ततस्तु यौवने प्रोक्ता लीला द्वारवतीभवा ।।१३।।
सर्वदैत्यवधो यत्र विवाहाश्च पृथग्विधाः । यत्र स्थित्वा जगन्नाथः कृष्णो योगेश्वरेश्वरः ।।१४।।
भूभारहरणं चक्रे परेषां हननार्दिभिः । अष्टावक्रोपाख्यानं पंचमोंऽश ईरितिः ।।१५।।
कलिजं चरितं प्रोक्तं चातुर्विध्यं लयस्य च । ब्रह्मज्ञानसमुद्देशः खांडिक्यस्य निरूपितः ।।१६।।
केशिध्वजेन चेत्येष षष्ठोऽशः परिकीर्तितः । अतः परं तु सूतेन शौनकादिभिरादरात् ।।१७।।
पृष्टेन बोधिताः शश्वद्विष्णुधर्मोत्तराह्वयाः । नानाधर्मकथाः पुण्या व्रतानि नियमा यमाः ।।१८।।
धर्मशास्त्रं चार्थशास्त्रं वेदांतं ज्योतिषं तथा । वंशाख्यानं प्रकरणात् स्तोत्राणि मन्त्रस्तथा ।।१६।।
नानाविद्यास्तथा प्रोक्ताः सर्वलोकोपकारिकाः । एतद्विष्णुपुराणं वै सर्वशास्त्रार्थसंग्रहम् ।।२०।।
वाराहकल्पवृत्तांतं व्यासेन कथितं त्विह । यो नरः पठते भक्त्या यः श्रृणोति च सादरम् ।।२१।।
तावुभौ विष्णुलोकं हि व्रजेतां भुक्तभोगकौ । तल्लिखित्वा च यो दद्यादाषाढ्यां घृतधेनुना ।।२२।।
में प्रियव्रत का वंशवर्णन, द्वीपों और वर्षों का निरूपण, रवि आदि दिनों का पृथक्-पृथक् लक्षण निर्देश, भरत का
चरित्र-वर्णन मुक्तिमार्ग का निदर्शन, निदाघ और ऋभु का संवाद, कहा गया है। सकल पापनाशन तृतीय अंश में
मन्वन्तर का आख्यान, वेदव्यास का अवतार, नरकोद्धारक कर्म, सगर तथा ओर्व का संवाद, समस्त धर्मों का
निरूपण, श्राद्धकल्प, वर्णाश्रमनिबन्धन, सदाचार तथा माया-मोह की कथा बताई गई है। मुनिश्रेष्ठ ! चतुर्थ अंश
में अनेक राजाओं की कथा, कृष्णावतार के विषय में प्रश्न, गोकुल की कथा, (कृष्ण की) बाल्यावस्था में पूतना
आदि का वध, कौमार अवस्था में अघासुर आदि की हिंसा, किशोरावस्था में कंस हनन तथा मथुरा का चरित्र-
वर्णन, युवावस्था में द्वारिका की लीला, अखिल दैत्यों का वध और अनेक विवाह बतलाये गये हैं ॥५-१३३॥
जिस अंश में जगन्नाथ एवम् योगेश्वरेश्वर कृष्ण ने शत्रुओं को मारकर पृथ्वी का भार उतारा, वह पाँचवां अंश
है। छठें अंश में कलि का चरित्र, चार प्रकार के लय, ब्रह्मज्ञान, केशिध्वजोपाख्यान और खांडिक्य की मंत्रणा
बताई गई है।
एतदुपरान्त शौनक आदि ऋषियों से आदरपूर्वक पूछे जाने पर सूत ने शाश्वत विष्णु धर्म संबन्धी अनेक
कथायें, व्रत, नियम, यम धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, वेदान्त, ज्योतिष, प्रकरणवश वंशाख्यान, स्तोत्र, मंत्र तथा
अखिल लोकोपकारक अनेक तरह की विद्यायें बताई हैं। इस विष्णुपुराण में सब शास्त्रों का तत्त्व संगृहीत
है ॥१४-२०॥ व्यास ने इस पुराण में वाराहकल्प का वृत्तान्त वर्णन किया है। जो नर आदरपूर्वक इसका पाठ
करता है और जो श्रवण करता है, वे दोनों सकल भोगों को भोगकर विष्णुलोक को जाते हैं। द्विज ! जो इसको लिख
सहितं विष्णुभक्ताय पुराणार्थविदे द्विज । स याति वैष्णवं धाम विमानेनार्कवर्चसा ॥२३॥
यश्च विष्णुपुराणस्य समनुक्रमणीं द्विज । कथयेच्छृणुयाद्वापि स पुराणफलं लभेत् ॥२४॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे विष्णुपुराणानुक्रमणी-
निरूपणं नाम चतुर्नवतितमोऽध्यायः ॥६४॥
पञ्चनवतितमोऽध्यायः
ब्रह्मोवाच
शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि पुराणं वायवीयकम् । यस्मिञ्छ्रुते लभेदाम रुद्रस्य परमात्मनः ॥१॥
चतुर्विंशतिसाहस्रं तत्पुराणं प्रकीर्तितम् । श्वेतकल्पप्रसंगेन धर्मानत्राह मारुतः ॥२॥
तद्वायवीयमुदितं भागद्वयसमन्वितम् । सर्गादिलक्षणं यत्र प्रोक्तं विप्र सविस्तरम् ॥३॥
मन्वंतरेषु वंशाश्च राज्ञां ये तत्र कीर्तिताः । गयासुरस्य हननं विस्तराद्यत्र कीर्तितम् ॥४॥
कर आषाढ़ की पूर्णिमा में पुराणवेत्ता तथा विष्णुभक्त विप्र को घृतधेनु सहित इसे प्रदान करता है, वह
सूर्य के समान चमकने वाले विमान से वैकुण्ठ को प्रयाण करता है। जो विष्णुपुराण की अनुक्रमणी को पढ़ेगा
या सुनेगा, उसे भी संपूर्ण पुराण का फल प्राप्त होगा ॥२१-२४॥
श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में विष्णुपुराणानुक्रमणी निरूपण नामक
चौरानबेवां अध्याय समाप्त ॥९४॥
अध्याय ६५
वायुपुराण की विषय सूची
ब्रह्मा बोले—विप्र ! सुनो, मैं वायवीय पुराण कहूँगा, जिसे सुनकर मनुष्य परमात्मा रुद्र के धाम को
प्राप्त करता है। उस पुराण में चौबीस हजार श्लोक हैं, वायु ने श्वेतकल्प के प्रसंग से धर्मों को बतलाया है।
उसमें दो भाग हैं। प्रथम भाग में सृष्टि आदि का लक्षण विस्तारपूर्वक बतलाया गया है, मन्वन्तरों में जहाँ जो
राजा हुए हैं, उनका वंशवर्णन किया गया है; गयासुर का वध विस्तार से वर्णित हुआ है, मासों का माहात्म्य
पञ्चनवतितमोऽध्यायः ८७१
मासानां चैव माहात्म्यं माघस्योक्तं फलाधिकम् । दानधर्मा राजधर्मा विस्तरेणोदितास्तथा ॥५॥
भूपातालककुब्द्योमचारिणां यत्र निर्णयः । व्रतादीनां च पूर्वोऽयं विभागः समुदाहृतः ॥६॥
उत्तरे तस्य भागे तु नर्मदातीर्थवर्णनम् । शिवस्य संहितोक्ता वै विस्तरेण मुनीश्वर ॥७॥
यो देवः सर्वदेवानां दुर्विज्ञेयः सनातनः । स तु सर्वात्मना यस्यास्तीरे तिष्ठति संततम् ॥८॥
इदं ब्रह्मा हरिरिदं साक्षाच्चेदं परो हरः । इदं ब्रह्म निराकारं कैवल्यं नर्मदाजलम् ॥६॥
ध्रुवं लोकहितार्थाय शिवेन स्वशरीरतः । शक्तिः कापि सरिद्रूपा रेवेयमवतारिता ॥१०॥
ये वसंत्युत्तरे कूले रुद्रस्यानुचरा हि ते । वसन्ति याम्यतीरे ये लोकं ते यांति वैष्णवम् ॥११॥
ओंकारेश्वरमारभ्य यावत्पश्चिमसागरः । संगमाः पंच च त्रिंशन्नदीनां पापनाशनी ॥१२॥
दशकमुत्तरे तीरे त्रयोविंशतिदक्षिणे । पंचविंशत्तमः प्रोक्तो रेवासागरसंगमः ॥१३॥
संगमः सहितान्येव रेवातीरद्वयेऽपि च । चतुःशतानि तीर्थानि प्रसिद्धानि च संति हि ॥१४॥
षष्टितीर्थसहस्राणि षष्टिकोट्यो मुनीश्वर । संति चान्यानि रेवायास्तीरयुग्मे पदे पदे ॥१५॥
संहितेयं महापुण्या शिवस्य परमात्मनः । नर्मदाचरितं यत्र वायुना परिकीर्तितम् ॥१६॥
लिखित्त्वेदं पुराणं तु गुडधेनुसमन्वितम् । श्रावण्यां यो ददेद्भक्त्या ब्राह्मणाय कुटुम्बिने ॥१७॥
रुद्रलोके वसेत्सोऽपि यावदिन्द्राश्चतुर्दश । यः श्रावयेद्वा शृणुयाद्वायवीयमिदं नरः ॥१८॥
नियमेन हविष्याशी स रुद्रो नात्र संशयः । यश्चानुक्रमणीमेतां शृणोति श्रावयेत्तथा ॥१९॥
एवम् माघ का फल प्रचुरतया बताया गया है; दानधर्म तथा राजधर्मों का विस्तृत वर्णन है ॥१-५॥
भू, पाताल, दिशा तथा आकाशचारियों का और व्रत आदिकों का निर्णय किया गया है। मुनीश्वर ! उत्तर भाग
में नर्मदातीर्थ तथा शिवसंहिता का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। जैसे जो सनातन देव समस्त देवों से
दुर्ज्ञेय हैं, वे सब प्रकार से नर्मदा नदी के तट पर सदा वास करते हैं। नर्मदा का जल ब्रह्मा, साक्षात् हरि, हर,
निराकार ब्रह्म तथा निर्वाण रूप है। निश्चय ही लोककल्याण के लिये शिव ने अपने शरीर से किसी शक्ति को
रेवा नदी के रूप में अवतरित किया है। जो नर्मदा के उत्तर तट पर वास करते हैं, वे मानो रुद्र के अनुचर हो
हैं। जो दक्षिण तट पर वास करते हैं, वे विष्णुलोक को जाते हैं। ओंकारेश्वर से लेकर पश्चिमसागर पर्यन्त
पैंतीस पापनाशिनी नदियों का संगम है ॥६-१२॥ ग्यारह नदियाँ तो रेवा के उत्तर तीर से मिली हैं और तेईस
दक्षिण तट से। पैंतीसवां संगम तो समुद्र के साथ ही नर्मदा का माना जाता है। रेवा के उभय तट पर संगमीय
तीर्थों सहित चार सो प्रसिद्ध तीर्थ विराजते हैं। मुनीश्वर ! साठ करोड़ और साठ हजार अन्य तीर्थ भी रेवा
के युगल तटों के पद-पद में विद्यमान हैं। परमात्मा शिव की यह संहिता महापुण्यदायिनी है, जिसमें वायु ने
नर्मदा का चरित्रवर्णन किया है। श्रावणी पूर्णिमा के दिन जो व्यक्ति इस पुराण को लिखकर गुडधेनु सहित कुटुम्बी
ब्राह्मण को भक्तिपूर्वक समर्पित करता है, वह तब तक रुद्रलोक में वास करता है जब तक चौदहों इन्द्र हो जाते
हैं। जो नर नियम पूर्वक हविष्य-भोजन करते हुए उस वायुपुराण को सुनता है या सुनाता है, वह रुद्र होता है,
८७२ नारदीयपुराणम्
सोऽपि सर्वपुराणस्य फलं श्रवणजं लभेत् । ॥२०॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे वायुपुराणानुक्रमणिकानिरूपणं
नाम पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥९५॥
षण्णवतितमोऽध्यायः
ब्रह्मोवाच
मरीचे शृणु वक्ष्यामि वेदव्यासेन यत्कृतम् । श्रीमद्भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ॥१॥
तदष्टादशसाहस्रं कीर्तितं पापनाशनम् । सुरपादपरूपोऽयं स्कंधैर्द्वादशभिर्युतः ॥२॥
भगवानेव विप्रेन्द्र विश्वरूपी समीरितः । तत्र तु प्रथमस्कंधे सूतर्षीणां समागमे ॥३॥
व्यासस्य चरितं पुण्यं पांडवानां तथैव च । पारीक्षितमुपाख्यानमितीदं समुदाहृतम् ॥४॥
परीक्षिच्छुकसंवादे सृष्टिद्वर्यानिरूपणम् ब्रह्मानारदसंवादे देवताचरितामृतम् ॥५॥
इसमें संशय नहीं । जो इस अनुक्रमणिका का श्रवण करता है या कराता है, उसे भी संपूर्ण वायुपुराण सुनने का
फल लाभ होता है ॥१३-२०॥
श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्द्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में वायुपुराण का अनुक्रमणिका वर्णन
नामक पंचानबेवां अध्याय समाप्त ॥९५॥
अध्याय ९६
श्रीमद्भागवत के द्वादश स्कन्ध के अनुसार उसकी अनुक्रमणी
श्रीब्रह्मा बोले—मरीचे ! सुनो, वेदव्यास ने श्रीमद्भागवत नामक जो ब्रह्मसम्मत पुराण का निर्माण
किया है, उसे मैं कहूँगा । उस पाप-नाशन पुराण में अठारह हजार श्लोक हैं । बारह स्कंधों में वह विभक्त है ।
विप्रेन्द्र ! वह कल्पवृक्ष के समान है । विश्वरूपी भगवान् का ही उसे स्वरूप समझना चाहिये । उसके प्रथम स्कंध
में सूत और ऋषियों का संवाद हुआ है, जिसमें व्यास तथा पांडवों का पवित्र चरित्र और परीक्षित का उपाख्यान
वर्णित किया गया है ॥१-४॥ परीक्षित और शुक के संवादरूप द्वितीय स्कंध में श्रीमान् व्यास ने सृष्टिद्वय का
षण्णवतितमोऽध्यायः ८७३
पुराणलक्षणं चैव सृष्टिकारणसंभवः । द्वितीयोऽयं समुदितः स्कंधो व्यासेन धीमता ॥६॥
चरितं विदुरस्याथ मैत्रेयेणास्य संगमः । सृष्टिप्रकरणं पश्चाद्ब्रह्मणः परमात्मनः ॥७॥
कापिलं सांख्यमप्यत्र तृतीयोऽयमुदाहृतः । सत्याश्चरितमादौ तु ध्रुवस्य चरितं ततः ॥८॥
पृथोः पुण्यसमाख्यानं ततः प्राचीनबर्हिषम् । इत्येष तुर्यो गदितो विसर्गे स्कंध उत्तमः ॥६॥
प्रियव्रतस्य चरितं तद्वंशानां च पुण्यदम् । ब्रह्मांडांतर्गतानां च लोकानां वर्णनं ततः ॥१०॥
नरकस्थितिरित्येष संस्थाने पंचमो मतः । अजामिलस्य चरितं दक्षसृष्टिनिरूपणम् ॥११॥
प्रह्लादचरितं पुण्यं वर्णाश्रमनिरूपणम् । सप्तमो गदितो वत्स वासनाकर्मकीर्तने ॥१२॥
वृत्राख्यानं ततः पश्चान्मरुतां जन्म पुण्यदम् । षष्ठोऽयमुदितः स्कंधो व्यासेन परिपोषणे ॥१३॥
गजेन्द्रमोक्षणाख्यानं मन्वंतरनिरूपणे । समुद्रमथनं चैव बलिवैमवबंधनम् ॥१४॥
मत्स्यावतारचरितमष्टमोऽयं प्रकीर्तितः । सूर्यवंशसमाख्यानं सोमवंशनिरूपणम् ॥१५॥
वंश्यानुचरिते प्रोक्तो नवमोऽयं महामते । कृष्णस्य बालचरितं कौमारं च व्रजस्थितिः ॥१६॥
कैशोरं मथुरास्थानं यौवनं द्वारकास्थितिः । भूभारहरणं चात्र निरोधे दशमः स्मृतः ॥१७॥
नारदेन तु संवादो वसुदेवस्य कीर्तितः । यदोश्च दत्तात्रेयेण श्रीकृष्णेनोद्धवस्य च ॥१८॥
यादवानां मिथोऽत्तश्च मुक्तावेकादशः स्मृतः । भविष्यकलिनिर्देशो मोक्षो राज्ञः परीक्षितः ॥१९॥
वेदशाखाप्रणयनं मार्कंडेयतपः क्रिया । सौरो विभूतिरुदिता सात्वती च ततः परम् ॥२०॥
पुराणसंख्याकथनमाश्रये द्वादशो ह्ययम् । इत्येवं कथितं वत्स श्रीमद्भागवतं तव ॥२१॥
वक्तुः श्रोतुश्चोपवेष्टुरनिमोदितुरेव च । साहाय्यकर्तुर्गदितं भक्तिभुक्तिविमुक्तिदम् ॥२२॥
निरूपण किया है तथा ब्रह्मा और नारद के संवाद में देवताओं का चरित्र, पुराणों का लक्षण और सृष्टि का
कारण बतलाया है । तृतीय स्कंध में विदुर का चरित्र, मैत्रेय के साथ उसका संगम, परमात्मा ब्रह्मा का सृष्टि-
प्रकरण और कपिलनिर्मित सांख्य शास्त्र का निरूपण किया गया है । चतुर्थ स्कंध में सत्या एवम् ध्रुव का चरित्र,
पृथु तथा प्राचीन बहिष् का पवित्र उपाख्यान आता है । पंचम स्कंध में प्रियव्रत तथा उनके वंशजों का पवित्र
चरित्र, ब्रह्मांड के अन्तर्वर्ती लोकों तथा नरकों की स्थिति दिखलाई गई है । छठे स्कंध में अजामिल का चरित्र,
दक्षसृष्टि का निरूपण, वृत्राख्यान और मरुतों का उद्भव बताया गया है । वत्स ! सातवें स्कंध में वासनाजन्य कर्मों
का कथन, प्रह्लाद का चरित्र और वर्णाश्रमों का निरूपण किया गया है ॥५-१३॥ अष्टम स्कंध में मन्वन्तरों का
निरूपण, गजेन्द्रमोक्ष का आख्यान, सागरमंथन, बलिवैभव बंधन तथा मत्स्यावतार का चरित्र वर्णन किया गया
है । महामते ! नवम स्कंध में सूर्यवंश का आख्यान, सोमवंश का निरूपण तथा वंशावालों का चरित्र वर्णन मिलता
है । दशम स्कंध में कृष्ण की बाललीला, कौमार अवस्था में उनका व्रजवास, कैशोर अवस्था में मथुरावास,
युवावस्था में द्वारकावास तथा भूभार का हरण बतलाया गया है । एकादश स्कंध में नारद और वसुदैव का संवाद,
यदु तथा दत्तात्रेय का संवाद, श्रीकृष्ण एवम् उद्धव का संवाद और यादवां का परस्पर नाश बताया गया है ।
द्वादश स्कंध में भविष्यकाल का निर्देश, राजा परीक्षित् का मोक्ष, वेदशाखाप्रणयन, मार्कंडेय का तप, सौरी
सनातनी विभूति और पुराणों की संख्या का निर्देश किया गया है ।
वत्स ! यह श्रीमद्भागवत तुमसे कहा है, जो वक्ता, श्रोता, उपदेष्टा, अनुमोदिता तथा साहाय्यकर्ता को
मुक्ति, मुक्ति एवम् भक्ति प्रदान करता है ॥१४-२२॥ भगवद्भक्ति के इच्छुक को चाहिये कि वह भादों की पूर्णिमा
११० ना० पु०
८७४ नारदीयपुराणम्
प्रोष्ठपद्यां पूर्णिमायां हेमसिंहसमन्वितम्। देयं भागवताख्यं द्विजाय प्रीतिपूर्वकम् ॥२३॥
संपूज्य वस्त्रहेमाद्यैर्भगवद्भक्तिमिच्छता । योऽप्यनुक्रमणीमेतां श्रावयेच्छृणुयात्तथा ॥
स पुराणश्रवणजं प्राप्नोति फलमुत्तमम् ॥२४॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे श्रीमद्भागवतानुक्रमणी-
निरूपणं नाम षण्णवतितमोऽध्यायः ॥९६॥
*
सप्तनवतितमोऽध्यायः
श्रीब्रह्मोवाच
शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि पुराणं नारदीयकम्। पञ्चविंशतिसाहस्रं बृहत्कल्पकथाश्रयम् ॥१॥
सूतशौनकसंवादः सृष्टिसंक्षेपवर्णनम् । नानाधर्मकथाः पुण्याः प्रवृत्ते समुदाहृताः ॥२॥
प्राग्भागे प्रथमे पादे सनकेन महात्मना । द्वितीये मोक्षधर्माख्ये मोक्षोपायनिरूपणम् ॥३॥
वेदांगानां च कथनं शुकोत्पत्तिश्च विस्तरात् । सनंदनेन गदिता नारदाय महात्मने ॥४॥
महातंत्रे समुद्दिष्टं पशुपाशविमोक्षणम् । मंत्राणां शोधनं दीक्षामंत्रोद्धारश्च पूजनम् ॥५॥
प्रयोगाः कवचं नामसहस्रं स्तोत्रमेव च । गणेशसूर्यविष्णूनां शिवशक्त्योरनुक्रमात् ॥६॥
में वस्त्र, सुवर्ण आदि से प्रीतिपूर्वक भगवद्भक्त ब्राह्मण की पूजा कर स्वर्णसिंह समेत भागवतपुराण समर्पित करे।
जो व्यक्ति इस अनुक्रमणिका को सुनेगा या सुनावेगा, उसे भी पुराण सुनने का उत्तम फल मिलेगा ॥२३-२४॥
श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्द्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में श्रीमद्भागवतानुक्रमणी निरूपण
नामक छानबेवां अध्याय समाप्त ॥९६॥
अध्याय ९७
श्रीनारदीयपुराण की विषयानुक्रमणी
श्रीब्रह्मा बोले-विप्र ! अब नारदीयपुराण को सुनो । उसमें पचीस हजार श्लोक हैं; वह बृहत्कल्प की
कथा से युक्त है । पूर्वार्ध के प्रथम पाद में सूत और शौनक का संवाद, सृष्टि का संक्षिप्त वर्णन तथा महात्मा सनक
द्वारा अनेक धर्म कथायें कही गई हैं । मोक्षधर्म नामक द्वितीय पाद में सनंदन ने महात्मा नारद से मोक्ष का
उपाय, वेदांगों तथा शुक की उत्पत्ति बताई है ॥१-३½॥ तृतीय पाद में मुनि सनत्कुमार ने नारद से महातंत्रोद्दिष्ट
पशुपाशविमोक्षण, मंत्रों का संशोधन, दीक्षा, मंत्रोद्धार, पूजन, प्रयोग, कवच, सहस्रनाम, गणेश, सूर्य, विष्णु, शिव
सप्तनवतितमोऽध्यायः ८७५
सनत्कुमारमुनिना नारदाय तृतीयेके । पुराणलक्षणं चैव प्रमाणं दानमेव च ॥७॥
पृथक्पृथक् समुद्दिष्टं दानकालपुरःसरम् । चैत्रादिसर्वमासेषु तिथीनां च पृथक्पृथक् ॥८॥
प्रोक्तं प्रतिपदादीनां व्रतं सर्वाघनाशनम् । सनातनेन मुनिना नारदाय चतुर्थके ॥६॥
पूर्वभागोऽयमुदितो बृहदाख्यानसंज्ञितः । अस्योत्तरे विभागे तु प्रश्न एकादशीव्रते ॥१०॥
वसिष्ठेनाथ संवादो मांघातुः परिकीर्तितः । रुक्मांगदकथा पुण्या मोहिन्युत्पत्तिकर्म च ॥११॥
वसुशापश्च मोहिन्यै पश्चादुद्धरणक्रिया । गंगाकथा पुण्यतमा गयायात्रानुकीर्तनम् ॥१२॥
काश्या माहात्म्यमतुलं पुरुषोत्तमवर्णनम् । यात्राविधानं क्षेत्रस्य बह्वाख्यानसमन्वितम् ॥१३॥
प्रयागस्याथ माहात्म्यं कुरुक्षेत्रस्य तत्परम् । हरिद्वारस्य चाख्यानं कामोदाख्यानकं तथा ॥१४॥
बदरीतीर्थमाहात्म्यं कामाक्षायास्तथैव च । प्रभासस्य च माहात्म्यं पुष्कराख्यानकं ततः ॥१५॥
गौतमाख्यानकं पश्चाद्वेदपादस्तवस्ततः । गोकर्णक्षेत्रमाहात्म्यं लक्ष्मणाख्यानकं तथा ॥१६॥
सेतुमाहात्म्यकथनं नर्मदातीर्थवर्णनम् । अवन्त्याश्चैव माहात्म्यं मथुरायास्ततः परम् ॥१७॥
वृन्दावनस्य महिमा वसुर्ब्रह्मांतिके गतिः । मोहिनीचरितं पश्चादेवं वै नारदीय कम् ॥१८॥
यः शृणोति नरो भक्त्या श्रावयेद्वा समाहितः । स याति ब्रह्मणो धाम नात्र कार्या विचारणा ॥१९॥
यस्त्वेताविषुपूर्णायां धेनूनां सप्तकान्वितम् । प्रवद्याद्विद्वद्वर्याय स लभेन्मोक्षमेव च ॥२०॥
यश्चानुक्रमणीमेतां नारदीयस्य वर्णयेत् । शृणुयाद्वैकचित्तेन सोऽपि स्वर्गति लभेत् ॥२१॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे नारदीयपुराणानुक्रमणी-
कथनं नाम सप्तनवतितमोऽध्यायः ॥६७॥
तथा शक्ति के स्तोत्र बताये हैं । तृतीय पाद में सनत्कुमार मुनि ने नारद से पुराणों का लक्षण तथा प्रमाण, दान तथा
दान-काल आदि को पृथक्-पृथक् बतलाया है । चैत्र आदि मासों में प्रतिपदा आदि तिथिक्रम से पृथक्-पृथक् व्रतनिरूपण
किया है । सनातन मुनि ने चतुर्थपाद में नारद को यह बतलाया है । इतना पूर्वभाग है, जो बृहदाख्यान कहलाता है
॥४-९॥ पुराण के उत्तरार्ध में एकादशीव्रत संबन्धी प्रश्न, वसिष्ठ और मांधाता का संवाद, पवित्र रुक्मांगदकथा,
मोहिनी की उत्पत्ति और कर्म, मोहिनी के प्रति पुरोहित वसु का शाप तथा उद्धारक्रिया, पुण्यतम गंगाकथा,
गयायात्राकीर्तन, काशीमाहात्म्य, अतुलनीय पुरुषोत्तम-वर्णन, अनेक आख्यान युक्त पुरुषोत्तम क्षेत्र का यात्राविधान,
प्रयाग, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, कामोदा, बदरीतीर्थ, कामाक्षा, प्रभास, पुष्कर तथा गौतमतीर्थ का माहात्म्य,
वेदपादस्तुति, गोकर्णक्षेत्र माहात्म्य, लक्ष्मणाख्यान, सेतुमाहात्म्य, नर्मदातीर्थ-वर्णन, अवंती, मथुरा तथा वृन्दावन
की महिमा, ब्रह्मा के निकट वसु का गमन और फिर मोहिनी का चरित्र चित्रण किया गया है । यही नारदीयपुराण
है ॥१०-१८॥ जो मनुष्य समाहित होकर भक्तिपूर्वक इसको सुनता है अथवा सुनाता है, उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति
होती है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं । जो व्यक्ति आश्विन की पूर्णिमा में सात धेनुओं के साथ यह
पुराण उत्तम ब्राह्मण को प्रदान करता है, उसे मोक्ष प्राप्त होता है । जो नारदीयपुराण की इस अनुक्रमणी का वर्णन
करेगा या तन्मनस्क होकर सुनेगा, उसे भी स्वर्ग की प्राप्ति होगी ॥१९-२१॥
श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में नारदीयपुराणानुक्रमणी कथन नामक
सत्तानबेवां अध्याय समाप्त ॥९७॥
अष्टनवतितमोऽध्यायः
ब्रह्मोवाच
अथ ते संप्रवक्ष्यामि मार्कण्डेयाभिधं मुने । पुराणं सुमहत्पुण्यं पठतां शृण्वतां सदा ॥१॥
यत्राधिकृत्य शकुनीन्सर्वधर्मनिरूपणम् । मार्कण्डेयपुराणं तन्नवसाहस्रमीरितम् ॥२॥
मार्कण्डेयमुनेः प्रश्नो जैमिनेः प्राक्समीरितः । पक्षिणां धर्मसंज्ञानां ततो जन्मनिरूपणम् ॥३॥
पूर्वजन्मकथा चैषां विक्रिया चादिवस्पतेः । तीर्थयात्रा बलस्याथ द्रौपदेयकथानकम् ॥४॥
हरिश्चन्द्रकथा पुण्या युद्धमाडीवकाभिधम् । पितापुत्रसमाख्यानं दत्तात्रेयकथा ततः ॥५॥
हैहयस्याथ चरितं महाख्यानसमन्वितम् । मदालसाकथा प्रोक्ता ह्यलर्कचरितान्विता ॥६॥
सृष्टिसंकीर्तनं पुण्यं नवधा परिकीर्तितम् । कल्पांतकालनिर्देशो यक्षसृष्टिनिरूपणम् ॥७॥
रुद्रादिसृष्टिरप्युक्ता द्वीपचर्यानुकीर्तनम् । मनूनां च कथा नाना कीर्तिताः पापहारिकाः ॥८॥
तासु दुर्गाकथार्यन्तं पुण्यदा चाष्टमेऽन्तरे । तत्पश्चात्प्रणवोत्पत्तिस्त्रयीतेजःसमुद्भवा ॥९॥
मार्तण्डस्य च जन्माख्या तन्माहात्म्यसमन्विता । वैवस्वतान्वयश्चापि वत्सप्रीश्चरितं ततः ॥१०॥
खनित्रस्य ततः प्रोक्ता कथा पुण्या महात्मनः । अविक्षिच्चरितं चैव किमिच्छव्रतकीर्तनम् ॥११॥
अध्याय ९८
मार्कण्डेयपुराण की विषयानुक्रमणी
श्रीब्रह्मा बोले—मुने ! अब मैं पढ़ने तथा सुनने वालों के लिये महापुण्यदायक मार्कण्डेयपुराण के संबन्ध में
कहूँगा, जिसमें शकुनियों को अवलम्बन करके समस्त धर्मों का निरूपण किया गया है। मार्कण्डेयपुराण में नौ हजार
श्लोक हैं। उसमें जैमिनि से मार्कण्डेयमुनि का प्रश्न, धर्मसंज्ञक पक्षियों का जन्म-निरूपण, पूर्वजन्मकथा, दिवस्पति की
विक्रिया, बलभद्र की तीर्थयात्रा, द्रौपदेयकथानक, हरिश्चन्द्रकथा, आडी तथा बक का युद्ध, पिता-पुत्र का आख्यान,
दत्तात्रेयकथा, हैहय-चरित्र का महाआख्यान, मदालसाकथा, अलर्कचरित, नवधा सृष्टिकीर्तन, कल्पांतकाल निर्देश,
यक्षसृष्टिनिरूपण, रुद्रादिसृष्टि, द्वीपचर्या, मनुओं की अनेक पापहरिणी कथायें, उनमें अष्टम मन्वन्तर में अत्यन्त
पुण्यप्रद दुर्गा की कथा, प्रणवोत्पत्ति, त्रयोतेज का उद्भव, मार्तंड का जन्म तथा माहात्म्य, वैवस्वतवंश वर्णन,
वत्सप्री का चरित्र, महात्मा खनित्र की पवित्र कथा, अविक्षित् का चरित्र, किमिच्छव्रतकीर्तन, नरिष्यंतचरित,
इक्ष्वाकुचरित, नलचरित, रामचंद्र की सत्कथा, कुशवंशाख्यान, सोमवंश का कीर्तन, पुरूरवा तथा नहुष की अद्भुत
कथा, ययातिचरित्र, पवित्र-यदुवंशकीर्तन, श्रीकृष्णबालचरित्र, मथुरा का चरित्र, द्वारकाचरित, सकल अवतारों की
नरिष्यंतस्य चरितं इक्ष्वाकुचरितं ततः । नलस्य चरितं पश्चाद्रामचन्द्रस्य सत्कथा ॥१२॥
कुशवंशसमाख्यानं सोमवंशानुकीर्तनम् । पुरुरवःकथा पुण्या नहुषस्य कथाद्भुता ॥१३॥
ययातिचरितं पुण्यं यदुवंशानुकीर्तनम् । श्रीकृष्णबालचरितं माथुरं चरितं ततः ॥१४॥
द्वारकाचरितं चाथ कथा सर्वावताराजा । ततः सांख्यसमुद्देशः प्रपञ्चासत्त्वकीर्तनम् ॥१५॥
मार्कण्डेयस्य चरितं पुराणश्रवणे फलम् । यः शृणोति नरो भक्त्या पुराणमिदमादरात् ॥१६॥
मार्कण्डेयाभिधं वत्स स लभेत्परमां गतिम् । यस्तु व्याकुरुते चैतच्छैवं स लभते पदम् ॥१७॥
तत्तच्छ्लोल्लिखित्वा यः सौवर्णकरिसंयुतम् । कार्तिकां द्विजवर्याय स लभेद्ब्रह्मणः पदम् ॥१८॥
शृणोति श्रावयेद्वापि यश्चानुक्रमणीमिमाम् । मार्कण्डेयपुराणस्य स लभेद्वान्छितं फलम् ॥१९॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे मार्कण्डेयपुराणानुक्रमणी-
निरूपणं नामाष्टनवतितमोऽध्यायः ॥९८॥
•
नवनवतितमोऽध्यायः
ब्रह्मोवाच
अथातः संप्रवक्ष्यामि त्वाग्नेयपुराणकम् । ईशानकल्पवृत्तांतं वसिष्ठायानलोऽब्रवीत् ॥१॥
तत्पंचदशसाहस्रं नानाचरितमद्भुतम् । पठतां शृण्वतां चैव सर्वपापहरं नृणाम् ॥२॥
कथा, सांख्यशास्त्र का उद्देश, प्रपंचसत्त्वकीर्तन, मार्कण्डेयचरित्र तथा पुराणश्रवण का फल बताया गया है। वत्स !
जो मानव भक्ति एवम् आदर से मार्कण्डेयपुराण का श्रवण करता है, उसे परम गति की प्राप्ति होती है। जो
इसका पाठ करता है उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है। जो इसे लिखकर कार्त्तिकी पूर्णिमा के दिन उत्तम ब्राह्मण
को स्वर्णगजसहित इसे समर्पित करता है, वह ब्रह्मपद को प्राप्त करता है। मार्कण्डेयपुराण की इस अनुक्रमणी को
जो सुनता है या सुनाता है, उसे वांछित फल की प्राप्ति होती है ॥१-१९॥
श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में मार्कण्डेयपुराणानुक्रमणीनिरूपण नामक
अठानबेवां अध्याय समाप्त ॥९८॥
अध्याय ९९
अग्निपुराण की विषयानुक्रमणी
श्री ब्रह्मा बोले--अब इसके बाद मैं तुम्हें अग्निपुराण सुनाऊंगा । अग्नि ने वसिष्ठ से ईशानकल्प का
वृत्तान्त सुनाया था। यह पुराण अनेक अद्भुत चरित्रों से युक्त तथा पन्द्रह सहस्र श्लोकों में विभक्त है।
८७८ नारदीयपुराणम्
प्रश्नः पूर्वं पुराणस्य कथा सर्वावतारजा । सृष्टिप्रकरणं चाथ विष्णुपूजादिकं ततः ॥३॥
अग्निकार्यं ततः पश्चान्मन्त्रमुद्रादिलक्षणम् । सर्वदीक्षाविधानं च अभिषेकनिरूपणम् ॥४॥
लक्षणं मंडलादीनां कुशामार्जनं ततः । पवित्रारोपणविधिर्देवालयविधिस्ततः ॥५॥
शालग्रामादिपूजा च मूर्तिलक्षण पृथक्पृथक् । न्यासादीनां विधानं च प्रतिष्ठापूर्वकं ततः ॥६॥
विनायकादिपूजा च नानादीक्षाविधिः परम् । प्रतिष्ठा सर्वदेवानां ब्रह्मांडस्य निरूपणम् ॥७॥
गंगादितीर्थमाहात्म्यं द्वीपवर्षानुवर्णनम् । ऊर्ध्वाधोलोकरचना ज्योतिश्चक्रनिरूपणम् ॥८॥
ज्योतिषं च ततः प्रोक्तं शास्त्रं युद्धजयार्णवम् । षट्कर्म च ततः प्रोक्तं मंत्रमंत्रौषधीगणः ॥९॥
कुब्जिकादिसमर्चत्वं षोढा न्यासविस्तरयाः । कोटिहोमविधानं च मन्वंतरनिरूपणम् ॥१०॥
ब्रह्मचर्यादिधर्मांश्च श्राद्धकल्पविधिस्ततः । ग्रहयज्ञस्ततः प्रोक्तो वैदिकस्मार्तकर्म च ॥११॥
प्रायश्चित्तानुकथनं तिथीनां च व्रतादिकम् । वारव्रतानुकथनं नक्षत्रव्रतकीर्तनम् ॥१२॥
मासिकव्रतनिर्देशो दीपदानविधिस्तथा । नवव्यूहार्चनं प्रोक्तं नरकाणां निरूपणम् ॥१३॥
व्रतानां चापि दानानां निरूपणमिहोदितम् । नाडीचक्रसमुद्देशः संध्याविधिरनुत्तमः ॥१४॥
गायत्र्यर्थस्य निर्देशो लिंगस्तोत्रं ततः परम् । राज्याभिषेकमन्त्रोक्तिर्द्धर्मकृत्यं च भूभुजाम् ॥१५॥
स्वप्नाध्यायस्ततः प्रोक्तः शकुनादिनिरूपणम् । मंडलादिकनिर्देशो रणदीक्षाविधिस्ततः ॥१६॥
रामोक्तनीतिनिर्देशो रत्नानां लक्षणं ततः । धनुर्विद्या ततः प्रोक्ता व्यवहारप्रदर्शनम् ॥१७॥
देवासुरविमर्दाख्या ह्यायुर्वेद निरूपणम् । गजादीनां चिकित्सा च तेषां शांतिस्ततः परम् ॥१८॥
गोनरादिचिकित्सा च नानापूजास्ततः परम् । शांतयश्चापि विविधाश्छन्दः शास्त्रमतः परम् ॥१९॥
साहित्यं च ततः पश्चादेकार्णादिसमाह्वयाः । सिद्धशब्दानुशिष्टिश्च कोशः स्वर्गादिवर्गकः ॥२०॥
प्रलयानां लक्षणं च शारीरकनिरूपणम् । वर्णनं नरकानां च योगशास्त्रमतः परम् ॥२१॥
इसके पढ़ने-सुनने वाले मनुष्यों के सकल पाप दूर हो जाते हैं। इसमें पहले पुराण संवन्धी प्रश्न किया गया है।
पश्चात् समस्त अवतारों की कथा, सृष्टिप्रकरण, विष्णु पूजन, अग्निकार्य, मन्त्र तथा मुद्रा आदि का लक्षण,
अखिल दिशाओं का विधान, अभिषेक निरूपण, मंडल आदि का लक्षण, कुशा का मार्जन, पवित्रारोपणविधि
देवालयविधि, शालग्रामादि पूजा, पृथक्-पृथक् मूर्तिचिह्न न्यासादि का विधान, प्रतिष्ठापूर्वक, विनायक आदि की
पूजा, अनेक दीक्षा विधि, समस्त देवों की प्रतिष्ठा, ब्रह्मांड का निरूपण, गंगादि-तीर्थ-माहात्म्य, द्वीपों तथा वर्षों
का वर्णन, ऊर्ध्व तथा अधोलोक की रचना, ज्योतिश्चक्र निरूपण ॥१-८॥ ज्योतिष, मंत्र और यन्त्रौषधिसमूह,
षट्कर्म, युद्धजयशास्त्र, कुब्जा आदि की समर्चा, छः प्रकार की न्यासविधि, कोटिहोम विधान, मन्वन्तर निरूपण
ब्रह्मचर्य आदि धर्म, श्राद्ध-कल्पविधि, ग्रहयज्ञ, वैदिक तथा स्मार्तं कर्म, प्रायश्चित्त कथन, तिथि अनुसार व्रतादि,
दिनव्रतानुकथन, नक्षत्रव्रतकीर्तन, मासिकव्रत निर्देश, दीपदानविधि, नवव्यूहार्चन, नरकों का निरूपण, नाडीचक्र-
समुद्देश, संध्याविधि, गायत्री के अर्थ का निर्देश, लिगस्तोत्र, राज्याभिषेकमन्त्र, राजाओं का धर्मकार्य, स्वप्ना-
ध्याय, शकुनादि निरूपण, मंडलादिक निर्देश, रणदीक्षाविधि, रामोक्तनीति निर्देश, रत्नों का लक्षण, धनु-
विद्या और व्यवहार प्रदर्शन, देवासुर विमर्दाख्यान, आयुर्वेदनिरूपण, गजादि चिकित्सा, उनकी शान्ति ॥९-१८॥
गो, नर आदि की चिकित्सा, अनेक प्रकार की पूजा, विविध शान्ति, छंदःशास्त्र, साहित्य, एकार्णादि समाह्वय-
सिद्ध-शब्दानुशिष्ट स्वर्गादिवर्गविशिष्टकोष, प्रलयों का लक्षण, शारीरक निरूपण, नरकवर्णन, योगशास्त्र,
शततमोऽध्यायः ८७६
ब्रह्मज्ञानं ततः पश्चात्पुराणश्रवणे फलम् । एतदाग्नेयकं विप्र पुराणं परिकीर्तितम् ॥२२॥
तल्लिखित्वा तु यो दद्यात्सुवर्णकमलान्वितम् । तिलधेनुयुतं चापि मार्गशीर्ष्यां विधानतः ॥२३॥
पुराणार्थविदे सोऽथ स्वर्गलोके महीयते । एषानुक्रमणी प्रोक्ता तवाग्नेयस्य मुषितवा ॥२४॥
शृण्वतां पठतां चैव नृणां चेह परत्र च ॥२५॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपावेऽग्निपुराणानुक्रमणीनिरूपणं
नामैकोनशततमोऽध्यायः ॥६६॥
शततमोऽध्यायः
ब्रह्मोवाच
अथ ते संप्रवक्ष्यामि पुराणं सर्वसिद्धिदम् । भविष्यं भवतः सर्वलोकाभीष्टप्रदायकम् ॥१॥
यत्राहं सर्वदेवानामादिकर्ता समुद्गतः । सृष्ट्यर्थं तत्र संजातो मनु स्वायंभुवः पुरा ॥२॥
स मां प्रणम्य पप्रच्छ धर्मं सर्वार्थसाधकम् । अहं तस्मै तदा प्रीतः प्रावोचं धर्मसंहिताम् ॥३॥
पुराणानां यदा व्यासो व्यासं चक्रे महामतिः । तदा तां संहितां सर्वां पंचधा व्यभजन्मुनिः ॥४॥
ब्रह्मज्ञान, और पुराणश्रवण का फल बतलाया गया है । विप्र ! यह आग्नेय पुराण का वर्णन हुआ । जो व्यक्ति
इस पुराण को लिखकर अग्रहण की पूर्णिमा में विधिपूर्वक सुवर्ण कमलं तथा तिलधेनु सहित यह पुराण पौराणिक
द्विज को समर्पित करता है, वह स्वर्ग में पूजित होता है । आग्नेय पुराण की इस अनुक्रमणी को जो सुनेगा तथा
पढ़ेगा, उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी ॥१९-२५॥
श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में अग्निपुराणानुक्रमणीनिरूपण
नामक निन्यानवेवां अध्याय समाप्त ॥६६॥
अध्याय १००
भविष्यपुराण की विषयानुक्रमणी
श्री ब्रह्मा बोले— अब मैं सर्वसिद्धिदायक तथा अखिलकामनापूरक भविष्यपुराण के संबन्ध में कहूँगा ।
उस पुराण में मैं सब देवों का आदिकर्ता माना गया हूँ । पहले सृष्टिकार्य के लिये स्वायंभुव मनु का प्रादुर्भाव
हुआ । उसने मुझे प्रणाम कर समस्त प्रयोजनों को सिद्ध करने वाले धर्म के विषय में प्रश्न किया । तब मैं
प्रीतिपूर्वक धर्मसंहिता को सुनाने लगा । जब महामति व्यास को पुराणों के व्यष्टीकरण करने की इच्छा हुई तब
यहाँ पृष्ठ का पूर्ण एवं यथावत पाठ प्रस्तुत है:
८८० | नारदीयपुराणम्
अघोरकल्पवृत्तांतं नानावर्यकथान्वितम् । तत्रादिमं स्मृतं पर्व ब्राह्मं यत्रास्त्युपक्रमः ॥५५॥
सूतशौनकसंवादे पुराणप्रश्नसंक्रमः । आदित्यचरितप्रायः सर्वाख्यानसमन्वितः ॥५६॥
सृष्ट्यादिलक्षणोपेतः शास्त्रसर्वस्वरूपकः । पुस्तलेखकलेखानां लक्षणं च ततः परम् ॥५७॥
संस्काराणां च सर्वेषां लक्षणं चात्र कीर्तितम् । पक्षस्यादितिथीनां च कल्पाः सप्त च कीर्तिताः ॥५८॥
अष्टम्याद्याः शेषकल्पा वैष्णवे पर्वणि स्मृताः । शैवे च कामतो भिन्नाः सौरे चांत्यकथान्वयः ॥५६॥
प्रतिसर्गाद्वयं पश्चान्नानाख्यानसमन्वितम् । पुराणस्योपसंहारसंहितं पर्व पंचमम् ॥६०॥
एषु पंचसु पूर्वेस्मिन् ब्रह्मणो महिमाधिकाः । धर्मे कामे च मोक्षे तु विष्णोश्चापि शिवस्य च ॥६१॥
द्वितीये च तृतीये च सौरे वर्गचतुष्टये । प्रतिसर्गाद्वयं त्वंत्यं प्रोक्तं सर्वकथान्वितम् ॥६२॥
सप्तविष्यं विनिर्दिष्टं पर्वव्यासेन धीमता । चतुर्दशसहस्रं तु पुराणं परिकीर्तितम् ॥६३॥
भविष्यं सर्वदेवानां साम्यं यत्र प्रकीर्तितम् । गुणानां तारतम्येन समं ब्रह्म ति हि श्रुतिः ॥६४॥
तं लिखित्वा तु यो दद्यात्पौष्यां विद्वान्विमत्सरः । गुडधेनुयुतं हेमवस्त्रमाल्याविभूषणैः ॥६५॥
वाचकं पुस्तकं चापि पूजयित्वा विधानतः । गंधाद्यैर्भोज्यभक्ष्यैश्च कृत्वा नीराजनादिकम् ॥६६॥
यो वै जितेंद्रियो भूत्वा सोपवासः समाहितः । अथ वैकहविष्यासी कीर्तयेच्छृणुयादपि ॥६७॥
स मुक्तः पातकैर्घोरैः प्रयाति ब्रह्मणः पदम् । योऽप्यनुक्रमणीमेतां भविष्यस्य निरूपिताम् ॥६८॥
पठेद्वा शृणुयाच्चैतां भुक्तिं मुक्तिं च विदति ॥६९॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे भविष्यपुराणानुक्रमणी-
निरूपणं नाम शततमोऽध्यायः ॥१००॥
तब मुनिने संपूर्ण संहिता को, पाँच भागों में विभक्त कर दिया। उसमें अनेक आश्चर्यजनक कथाओं से युक्त
अघोर कल्प का वृत्तान्त है। उसका पहिला पर्व ब्राह्म है, जिसमें उसका उपक्रम है ॥५५॥ उसी पर्व में सूत
और शौनक के संवाद में पुराणप्रश्न, सर्वाख्यानयुक्त आदित्यचरित्र, सृष्टि आदि के लक्षणों से युक्त सकलशास्त्र
स्वरूप, पुस्तक लेखक और लेख्य का लक्षण, समस्त संस्कारों का लक्षण और प्रतिपदादि तिथियों के सात कल्प
वर्णित हुए हैं। वैष्णवपर्व में अष्टमी आदि अवशिष्ट कल्पों का वर्णन है। शैव पर्व में कामानुसार विभिन्नता
सौर पर्व में अन्त्यकथा और प्रतिसर्ग पर्व में अनेक आख्यान तथा पुराण का उपसंहार बतलाया गया है। इस
तरह पाँच पर्व होते हैं। प्रथम पर्व में ब्रह्मा का महिमा, द्वितीय में विष्णु एवम् धर्म, काम और मोक्ष को
तृतीय में शिव की, चतुर्थ में सूर्य की और पांचवे में समस्त कथायें बताई गई है। धीमान् व्यास ने पर्वों में
विभक्त करके भविष्यपुराण की रचना की है। इस पुराण में चौदह हजार श्लोक हैं ॥५६-६३॥
इसमें सकल देवों की कथा समभाव से कही गई है। श्रुति भी 'गुणों के तारतम्य से ब्रह्म सम है' ऐसा
कहती है। जो विद्वान् इस पुराण को लिखकर पौषी पूर्णिमा के दिन गुडधेनु, सुवर्ण, वस्त्र, माला, सुगंधित द्रव्य,
भोज्य तथा भक्ष्य पदार्थों से विधिपूर्वक ब्राह्मण एवम् पुस्तक की पूजा कर इसे समर्पित करता है, वह घोर पातकों
से विमुक्त होकर ब्रह्मपद को प्राप्त करता है। जो इन्द्रियसंयमपूर्वक उपवास या हविष्यभोजन करते हुए सावधानी
से इसका श्रवण तथा कीर्तन करता है, उसे भी पूर्वकथित फल की प्राप्ति होती है। जो भविष्यपुराण की इस
अनुक्रमणी को पढ़ेगा या सुनेगा, वह भोग-मोक्ष लाभ करेगा ॥६४-१॥
श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में भविष्यपुराणानुक्रमणिनिरूपण नामक सौवां अध्याय समाप्त ॥१००॥