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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

इस ग्रन्थ के बारे में

बृहन्नारदीय पुराण, जिसे नारदपुराण भी कहा जाता है, परम्परा में महर्षि व्यास से जोड़ा जाता है। इसका पूर्वभाग सनक आदि कुमारों द्वारा नारद को दिए गए उपदेशों के रूप में है, जिनमें धर्म, भक्ति, व्रत, तीर्थ, मन्त्र-साधना और वेदाङ्गों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द) का विस्तृत वर्णन आता है। इसकी एक विशेषता अठारह पुराणों की विषय-सूची है, जिसमें प्रत्येक पुराण की श्लोक-संख्या और विषय बताए गए हैं; स्कैन में 'पञ्चविंशतिसाहस्रं...' और 'प्रभासस्य च माहात्म्यं...' जैसे श्लोक इसी अंश के हैं।

यह संस्करण हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग की पुराण-प्रकाशन योजना के अन्तर्गत छपा 'बृहन्नारदीयपुराणम् (पूर्वभागः)' है, जिसमें संस्कृत मूल के साथ व्याकरण-वेदान्ताचार्य तारिणीश झा का हिन्दी अनुवाद है। प्रथम संस्करण शक 1910, अर्थात् 1989 ई. में प्रकाशित हुआ; प्रकाशक सम्मेलन के प्रधान मन्त्री डॉ. प्रभात मिश्र शास्त्री थे।

प्रकाशकीय वक्तव्य इस पुराण के ही एक श्लोक से आरम्भ होता है, जिसमें कहा गया है कि जैसे नदियों में गंगा और सरोवरों में पुष्कर श्रेष्ठ है, वैसे ही पुराणों में नारदीय। पुस्तक 1008 पृष्ठों की है।

८०६ नारदीयपुराणम्
कदाचित्ललिता देवी पुंरूपा कृष्णविग्रहा । ससर्ज षोडशकलास्ताः सर्वास्तत्समप्रभाः ॥१६॥
तासां मन्त्रं तथा ध्यानं यन्त्राचादिकं तथा । वर्णये सर्वतन्त्रेषु रहस्यं मुनिसत्तम ॥१७॥
वातो मरुच्चाग्निवह्नी धराक्षे जलचारिणी । विमुखं चरशुचिविभू वनस्वशक्तयः स्वराः ॥१८॥
प्राणस्तेजः स्थिरा वायुरायुश्चापि प्रभा तथा । व्यकुमध्यं तथा नादो दावकः पाय इत्यय ॥१९॥
व्योमरयः शिखी गोत्रा तोयं शून्यजवी द्युतिः । भूमी रसो नभो व्याप्तं दाहषच्चापि रसांबु च ॥२०॥
वियत्स्पर्शश्च हृद्धंसहलाग्नासो हलास्त्रिकाः । चन्द्रावली च ललिता हंगेला नायके मते ॥२१॥
ग्रासस्थिता स्वयं राधा स्वयं शक्तिस्वरूपिणी । शेषास्तु षोडशकला द्वात्रिंशत्कलाः स्मृताः ॥२२॥
वाङ्मयं निखिलं व्याप्तमाभिरेव मुनीश्वर । ललिताप्रमुखानां तु षोडशीत्वमुपागता ॥२३॥
श्रीराधा सुन्दरी देवी तान्त्रिकैः परिकीर्त्यते । कुरुकुल्ला च वाराही चन्द्रालिललिते उभे ॥२४॥
संभूते मन्त्रवर्गं तेऽभिधास्येऽहं यथातथम् । हृत्प्राणेलाहंसदाहवह्विस्तैर्वल्ललितेरिता ॥२५॥
त्रिविधा हंसभेदेन शृणु तां च यथाक्रमम् । हंसाद्ययाऽञ्चा मध्या स्यादादिमध्यस्थहंसया ॥२६॥
तृतीया प्रकृतिः सैव तुर्या तैरंत्यमायया । आसु तुर्याभवन्मुक्त्यै तिस्रोऽन्याःस्युश्च संपदे ॥२७॥
इति त्रिपुरसुन्दर्या विद्या सम्यक्समीरिता । दाहम्भीरसाक्ष्मास्वैर्वशिनीबीजमीरितम् ॥२८॥
प्राणो रसाक्षियुतः कामेश्वर्यक्षरं महत् । शून्यमंबुरसावह्निख्वयोगान्मोहनीमनुः ॥२९॥
व्याप्तं रसाक्ष्मास्वयुतं विमलाबीजमीरितम् । ज्यानभोदाहवह्निख्वयोगैः स्यादरुणामनुः ॥३०॥
जपिन्यास्तु समुद्दिष्टः सर्वत्र जयदायकः । कं नभो दाहसहितं व्याप्तक्ष्मास्वयुतं मनुः ॥३१॥
सर्वेश्वर्याः समाख्यातः सर्वसिद्धिकरः परः । ग्रासो नभोदाहवह्निख्वैर्युक्तः कौलिनीमनुः ॥३२॥
एतैर्मनुभिरष्टाभिः शक्तिभिर्वर्गसंयुतैः । वाग्देवतांतैर्न्यासः स्याद्येन देव्यात्मको भवेत् ॥३३॥
रंध्रे भाले तथाज्ञायां गले हृदि तथा न्यसेत् । नामावाधारके पादद्वये मूलाग्रकावधि ॥३४॥
षड्दीर्घाढचेन बीजेन कुर्यात्तथैव षडंगकम् । लोहितां ललितां बाणचापपाशांकुशौः करैः ॥३५॥
एक समय ललिता देवी ने पुरुषरूप में कृष्ण के समान शरीर वाली सोलह कलाओं का सृजन किया ।
उन सबकी कान्ति एक जैसी थी। मुनिश्रेष्ठ ! अखिल तंत्रों में उन सब के मन्त्र, ध्यान, यंत्र तथा पूजनादि क्रम
जैसे वर्णित हैं, वैसे मैं सुना देता हूँ। "वातो मरुत् ...... शक्तिस्वरूपिणी"- यह मंत्र है। उपर्युक्त सोलह
कलाओं के अतिरिक्त अन्य भी सोलह कलायें हैं, जिन्हें मिला देने से बत्तीस कलायें होती हैं। मुनीश्वर !
निखिल वाङ्मय जगत् को इन देवियों ने ही व्याप्त कर रखा है। ललिता आदि देवियाँ षोडशी कहलाती
हैं ॥१६-२३॥ तांत्रिक लोग श्री राधा को सुन्दरी देवी कहते हैं। कुरुकुल्ला, वाराही, चन्द्रालि और ललिता
ये उनकी सखियाँ हैं। अब मैं मंत्रसमूह को यथार्थतः बता रहा हूँ। "हृत्प्राण......"- यह ललिता का
"हंसाद्यया......"- यह त्रिपुर सुन्दरी का मंत्र । "दाह......"- यह वशिनी का मंत्र है। "प्राणो"
.. यह कामेश्वरी का मंत्र है। शून्यम् ......"-यह मोहनी का मंत्र है। "व्याप्तम् ....."-यह
यह विमला का मंत्र है। "ज्यान....."-यह अरुणा का मन्त्र है। "ग्रासो......"-यह कौलिनी का
मन्त्र है। वाग्देवता तथा अष्ट शक्तियों के साथ इन मन्त्रों का न्यास करने से देवी को आत्मोयता प्राप्त होती
है । ॥२४-३३॥ ब्रह्मरंध्र, ललाट, कंठ, हृदय, नाभि, मूलाधार, चरणद्वय, और मूलाग्र में न्यास करना चाहिये ।
छह दीर्घ मात्राओं से युक्त बीजमन्त्र से षडंग न्यास करना चाहिये । अनन्तर हाथों में बाण, धनुष, पाश तथा

अष्टाशीतितमोऽध्यायः ८०७
दधानां कामराजांके यन्त्रितां मुदितां स्मरेत् । मध्यस्थदेवी त्वेकैव षोडशाकारतः स्थिता ॥३६॥
यतस्तस्मात्तनी तस्यास्त्वन्याः पंचदशार्चयेत् । ऋषिः शिवश्छंद उक्ता देवता ललितादिकाः ॥३७॥
सर्वासामपि नित्यानामावृतीर्नामसंचये । पटले तु प्रयोगांश्च वक्ष्याम्यग्रे सविस्तरम् ॥३८॥
अथ षोडशनित्यासु द्वितीया या समीरिता । कामेश्वरीति तां सर्वकामदां शृणु नारद ॥३९॥
शुचिः स्वेन युतस्त्वार्यो ललिता स्याद्द्वितीयकः । शून्यमग्नियुतं पश्चाद्वयोम्व्याप्तेन संयुतम् ॥४०॥
प्राणो रसाग्निसहितः शून्ययुग्मं चरान्वितम् । नभोगोला पुनश्चैषां दाहेन संयोजिता ॥४१॥
अंबु स्याच्चरसंयुक्तं नवशक्तियुतं च हृत् । एषा कामेश्वरी नित्या कामदैकादशाक्षरी ॥४२॥
मूलविद्याक्षरैरेव कुर्यादंगानि षट् क्रमात् । एकेन हृदयं शीर्षं तावताथो द्वयं द्वयात् ॥४३॥
चतुर्भिर्नयनं तद्वदस्त्रमेकेन कीर्तितम् । दृक्श्रोत्रनासादितये जिह्वाहृन्नाभिगुह्यके ॥४४॥
व्यापकत्वेन सर्वांगे मूर्द्धादिप्रपदावधि । न्यसेद्विद्याक्षराण्येषु स्थानेषु तदनंतरम् ॥४५॥
समस्तेन व्यापकं तु कुर्यादुक्तक्रमेण तु । अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि नित्यपूजासु चोदितम् ॥४६॥
येन देवी सुप्रसन्ना ददातीष्टमयत्नतः । बालार्ककोटिसंकाशं माणिक्यमुकुटोज्ज्वलाम् ॥४७॥
हारग्रैवेयकांचोभिरूर्मिकानूपुरादिभिः । मंडितां रक्तवसनां रत्नाभरणशोभिताम् ॥४८॥
षड्भुजां त्रीक्षणांमिंदुकलाकलितमौलिकाम् । पञ्चाष्टषोडशद्वन्द्वट्कोणचतुरस्रगाम् ॥४९॥
मंदस्मितलसद्वक्त्रां दयामंथरवीक्षणाम् । पाशांकुशौ च पुंड्रेक्षुचापं पुष्पशितोमुखम् ॥५०॥
रत्नपात्रं सीधुपूर्णं वरदं बिभ्रतीं करैः । ततः प्रयोगान्कुर्वीत सिद्धे मंचे तु साधकः ॥५१॥
तृतीयामथ वक्ष्यामि नाम्ना तु भगमालिनी । कामेश्वर्यादिरादिः स्याद्रसश्चापस्थिरारसः ॥५२॥
अंकुश धारण करने वाली लोहिता तथा ललिता का स्मरण करे। एक ही प्रधान देवी सोलहों देवियों के रूप में
अवस्थित है। उन्हीं की प्रतिमा में इतर पन्द्रह देवियों की अर्चना करनी चाहिये । उक्त मन्त्र के ऋषि शिव
हैं, छंद पंक्ति है और देवता ललिता आदि हैं। आगे चलकर समस्त नित्य देवियों के नामों तथा पटल-प्रयोगों
को विस्तार पूर्वक बतलाऊँगा ॥३४-३८॥ नारद ! सोलह नित्य कलाओं में अखिल कामना दायक कामेश्वरी
नामक जो दूसरी देवी हैं, उनके विषय में अब सुनो । "शुचि......हृत्"--यह नित्य कामेश्वरी का मन्त्र है।
जो मनोरथ को पूर्ण करनेवाली तथा एकादश अक्षरों से युक्त हैं। मूलविद्या के अक्षरों से क्रमशः षडंग न्यास
करना चाहिये। एक अक्षर से हृदयन्यास, दो से शीर्षन्यास, चार से नेत्रन्यास और एक से अस्त्रन्यास करना
चाहिये। नेत्र, कर्ण, नासिका, जिह्वा, हृदय, नाभि, गुह्य, शिर, तथा चरणों से व्यापक न्यास करना चाहिये ।
पुनः उक्त स्थानों में विद्याक्षरों का न्यास करके सामस्त्येन व्यापक न्यास करना चाहिये। अब नित्य पूजा में
निर्देशित ध्यान को बता देता हूँ, जिससे देवी सुप्रसन्न होकर मनोरथ को पूर्ण करतो है ॥३६-४६॥
कोटि बाल सूर्यों के समान कान्तिवाली, मणि मुकुट के सदृश उज्ज्वल, हार, कण्ठाभरण, कांची एवम्
अंगूठो से अलंकृत, रक्तवस्त्रवाली, रत्न के आभूषणों से भूषित, छह भुजाओं तथा तीन नेत्रों वाली, चन्द्रकला से
सुशोभित ललाटवाली, पाँच, आठ, सोलह, दो तथा छह कोणों से युक्त एवम् चौकोर मंडल वाली, मन्द मुसकान
से सुशोभित मुखवाली, दयार्द्र दृष्टि वाली, हाथों में पाश, अंकुश, पुंड्रेक्षु (माधवी लता) के धनुष, पुष्पबाण,
और मद्यपूर्ण तथा वरदायक रत्नपात्र को धारण करने वाली देवी का ध्यान करना चाहिये। मंत्र की सिद्धि
हो जाने पर साधक उसके प्रयोगों को करे ॥४७-५१॥ अब तीसरी भगमालिनी देवी के बारे में कहूँगा।

८०८ नारदीयपुराणम्
धरायुक्तश्चरो पश्चात्स्थिरा पश्चाद्रसः स्मृतः । स्थिराशून्येऽग्निसंयुक्ते रसः स्यानदनंतरम् ॥५३॥
स्थिरा इसहिता चोत्था सदाहोऽग्निरसः स्थिरा । नभश्च मरुता युक्तं रसवर्णसमन्वितम् ॥५४॥
ततो रसः स्थिरा पश्चान्मरुता सह योजिता । चंदहंसचरोऽथोवतो रसोऽथ स्यात्स्थिरा पुनः ॥५५॥
स्थिराद्यन्विता हंसो व्याप्तेन च चरेण च । रसः स्थिरा ततो व्याप्तम् भूयुतं शून्यवग्नियुक् ॥५६॥
रसः स्थिरा ततः साग्निशून्यं तद्विपुतो महत् । रयः शून्यं चाग्नियुतं हृदाहं साच्च तत्परम् ॥५७॥
रसः स्थिरांबु च वियत्स्वयुतं प्राण एव च । दाहोऽग्नियुग्रसस्तस्मात्स्थिराक्षमा दाहसंयुता
सचरः स्याज्जवोपेर्दविद्या तार्तीयतः क्रमात् ॥५८॥
चतुष्टयमथार्णानांरसंस्तदनु च स्थिरा । हृद्द्युयुक्क्ष्मया दाहः सचरःस्याज्जवा च हृत् ॥५९॥
दाहोऽम्बुमरुता युक्तो व्योम्नि साग्निरसस्तुतः । स्थिरा तु महता युक्ता शून्यं साग्निनभश्चरौ ॥६०॥
हंसो व्याप्तनमध्व्युक्तः शून्यं व्याप्तमतोऽबु च । दाहो भान्नाचरयुता तथा दाहस्तथा रवः ॥६१॥
हृद्धरासहितं दाहरवौ चरसमन्वितौ । रसः स्थिरा ततः प्राणो रसाग्निसहितो भवेत् ॥६२॥
शून्ययुग्मं चरयुतं ततः पूर्वमतः परम् । शून्ययुग्मं च गोत्रा स्याद्दाहयुक्तांबुना चरः ॥६३॥
प्राणो रसा चरयुतो गोत्रव्यस्मितः परम् । गोत्रादाहमरुद्युक्ता त्वंबुन्द्यासमतो भवेत् ॥६४॥
युक्तोऽांवेश्च भूयुतं वाश्चरेण समन्वितम् । ग्रासो धरायुतः पश्चाद्रसः शक्त्या समन्वितः ॥६५॥
ग्रासो भूलोहितो विप्र रसो व्याप्तं ततश्च हृत् । दाहोनांबु च हृत्पश्चाद्र्यंऽब्बुमरुदन्वितः ॥६६॥
शून्यं च केवलं चैव रसश्च सवरस्थिरा । वियदंबुयुतं दाहस्त्वग्नियुक्तयुतः शुचिः ॥६७॥
भूमी रसाक्ष्मास्त्रयुना पंचैकांतारिताः स्थिताः । तदंतरित बीजानि स्वसंयुक्तानि पंच वै ॥६८॥
तानि क्रमाज्जयालचरो रसो भूश्च नभोयुता । हंसश्चरयुतो द्विः स्यात्ततः प्राणो रसाग्नियुक् ॥६९॥
शून्य युग्मं चरयुतं हृद्दाहोंबुमरुद्युतः । व्योमाग्निसहितं पश्चाद्रसश्च मरुता स्थिरा ॥७०॥
शून्यं साग्निनभश्चैत्र चरेण सहितं तथा । अंबु पश्चाद्वियत्तस्मान्नभश्च मरुदन्वितम् ॥७१॥
शून्यं व्याप्तं च दद्युक्तं रयदाहस्ववह्निभिः । हंसः सदाहोंबुरसा चरस्वैः संयुतो भवेत् ॥७२॥
हंसः सदाहवह्निस्थैर्युक्तमंत्र्यमुदीरितम् । सप्तत्रिंशच्छतार्णैः स्यान्नित्या सौभगमालिनी ॥७३॥
अतानि मंत्रवर्णैः स्युराद्येन हृदुदीरितम् । ततश्चतुर्भिः शीर्ष स्याच्छिखा त्रिभिरुदीरिता ॥७४॥
गुणवेदक्षरैः शेषाण्यंगानि षडिति क्रमात् । अरुणांमरुणाकल्पां सुन्दरीं सुस्मिताननाम् ॥७५॥
त्रिनेत्रां बाहुभिः षड्भिरुपेतां कमलासनाम् । कह्लारपाशपुंड्रेक्षुकोदंडान्वामबाहुभिः ॥७६॥
दधानां दक्षिणैः पद्ममंकुशं पुष्पसायकम् । तथाविधाभिः परितो युतां शक्तिगणैः स्तुतैः ॥७७॥
"कामेश्वरी ......... उदीरितम्"—यह नित्या सोभगमालिनी का मन्त्र है। इसमें तीन हजार सात सौ अक्षर
हैं। मन्त्र के अक्षरों से अंगन्यास करना चाहिये । आद्य अक्षर से हृदय का, चार अक्षरों से शिर का, तीन से
शिखा का और सात से शेष छः अंगों का क्रमशः न्यास करे। तत्पश्चात् रक्तवर्णा, सुन्दरी, मन्द मुसकान
से युक्त मुखवाली, तीन नेत्रोंवाली, छः भुजाओं वाली, कमलासन पर बैठनेवाली बायें हाथों में लाल कमल,
पाश तथा साखकी लता का धनुष धारण करने वाली, दाहिने हाथों में पद्म, अंकुश तथा पुष्प-सायक रखने
वाली, शक्ति गणों से स्तुत तथा कामोन्मत्त देवियों से परिवृत भगमालिनी का ध्यान करे। विप्रन्द्र! यह जगन्मो-

अक्षरोक्ताभिरन्याभिः स्मरोन्मादमदात्मभिः । एषा तृतीया कथिता वनिता जनमोहिनी ॥५७॥
चतुर्थीं शृणुविप्रेन्द्र नित्यक्लिन्नासमाह्वयाम् । हंसस्तु दाहवह्निस्थैर्युक्तः प्रथममुच्यते ॥५८॥
कामेश्वर्यास्तृतीयादिवर्णानामष्टकं भवेत् । हृदंबुमरुता युक्तः स एवैकादशाक्षरः ॥५९॥
एकादशाक्षरी चेयं विद्याऽनैरंगकल्पनम् । आद्येन मन्त्रवर्णेन हृदयं समुदीरितम् ॥६०॥
द्वाभ्यां द्वाभ्यां तु शेषाणि अंगानि परिकल्पयेत् । न्यसेदंगुष्ठमूलादिकनिष्ठोप्रांतमूर्द्धगम् ॥६१॥
शेषं तद्वत्तये न्यस्य हृद्दृक्वक्त्रेष्वे नसोर्द्वयोः । त्वचि ध्वजे च पायौ च पादयोर्णकानन्यसेत् ॥६२॥ ॥६३॥
अरुणांमरुणाकल्पामरुणशुकधारिणीम् । अरुणस्रग्विलेपां तां चारुस्मेरमुखाम्बुजाम् ॥६४॥
नेत्रत्रयोल्लसदद्वक्त्रां भाले घर्मार्बुमौक्तिकै । विराजमानां मुकुटलसदर्द्धेन्दुशेखराम् ॥६५॥
चतुर्भिर्बाहुभिः पाशमंकुशं पानपात्रकम् । अभयं बिभ्रतों पद्ममध्यासीनां मदालसाम् ॥६६॥
ध्यात्वैवं पूजयेन्नित्यक्लिन्नां नित्यां स्वशक्तिभिः । पुण्या चतुर्थी गदिता नित्या क्लिन्नाह्वया मुने ॥६७॥
वनिता नवनीतस्य दाविकाग्निर्जयादिना । भूः स्वेन युक्ता प्रथमं प्राणो दाहेन तद्युतः ॥६८॥
रसो दाहेन तद्युक्तं प्रभादाहेन तद्युता । ज्या च दाहेन तद्युक्ता नित्याक्लिन्नांतगद्वयम् ॥६९॥
एषा नवाक्षरी नित्या भेरुण्डा सर्वसिद्धिदा । प्रणवं ठद्वयं त्यक्त्वा मध्यस्थैः षड्भिरक्षरैः ॥७०॥
षडंगानि प्रकुर्वीत वर्णन्यासं ततः परम् । रंध्राद्यामुखकंठेषु हृन्नाभ्यां धारयद्वयम् ॥७१॥
न्यसेन्मंत्राणर्नवकं मातृकान्यासपूर्वकम् । अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि देव्याः सर्वार्थसिद्धिदम् ॥७२॥
तप्तकांचनसंकाशदेहां नेत्रत्रयान्विताम् । चारुस्मितां चितमुखीं दिव्यालंकारभूषिताम् ॥७३॥
ताटंकहारकेयूररत्नस्तबकमंडिताम् । रसनान्नूपुरोर्म्यादिजूंबणैरतिसुन्दरीम् ॥७४॥
पाशांकुशौ चर्मखड्गौ गदावह्निधनुःशरान् । करैर्दधानामासीनां पूजायां मत्परां स्थिताम् ॥७५॥


हिनी वनिता तीसरी कही गई है। अब नित्य क्लिन्ना नामक चौथी देवी के विषय में सुनो। "हंसः....
एकादशाक्षरः"--यह उनका मन्त्र है। ॥५२-८०॥ मंत्र के प्रथमाक्षर से हृदय का और दो दो अक्षरों से शेष
अंगों का न्यास करे । अंगुष्ठ के मूल में कनिष्ठा के अन्त में शिर पर, पादतलों में, हृदय, नेत्र, कर्ण, त्वचा,
लिंग, गुदा तथा चरणों में वर्णों का न्यास करे। तदनन्तर रक्तवर्णा, रक्तवस्त्रा, रक्तमाला तथा रक्त लेप
धारण करनेवाली, ईषत् हास्ययुक्त मुखकमल वाली, त्रिनेत्र से सुशोभित आनन वाली, मोतीकण सदृश घर्मबिंदु
से युक्त भाल पर अर्धचन्द्र धारण करनेवाली, चार हाथों में पाश, अंकुश, पानपात्र तथा अभयास्त्र रखनेवाली,
कमलों के बीच बैठनेवाली और मद से अलसा नित्यक्लिन्ना देवी का ध्यान करके अपनी शक्त्यनुसार उनकी
पूजा करे । मुने ! चौथी नित्यक्लिन्ना के बारे में सुना दिया। अब पांचवी भेरुंडा नामक देवी के विषय में
सुनो, जो समस्त सिद्धियों को देने वाली है। "वनिता....... द्वयम्"-यह उनका नवाक्षर मन्त्र है। इसमें
प्रणव तथा दो ठकारों को छोड़कर शेष छह अक्षरों से षडंगन्यास करना चाहिये । तदनन्तर मातृकान्यास पूर्वक
रन्ध्र, मुख, कंठ, हृदय तथा नाभि में मन्त्र के अक्षरों का न्यास कर देवी का सकलसिद्धिदायक ध्यान करना
चाहिये । उनका शरीर तप्त सुवर्ण के समान चमकता है, उनके तीन नेत्र हैं, हास्य मनोहर होता है, मुख
प्रसन्न रहता है, शरीर दिव्य आभूषणों से विभूषित है, ताटंक (तड़की) हार, केयूर, रत्नावली, कांची, नूपुर
तथा अंगूठी आदि अलंकरण उनके सौन्दर्य को बढ़ा रहे हैं, हाथों में पाश, अंकुश, चर्म, खड्ग, गदा, वह्नि,
धनुष तथा बाण सुशोभित हैं और स्वयं देवी पूजा पर बैठी हुई हैं। उनकी चारों तरफ उन्हीं के समान तेज-
१०२ ना० पु०

८१० नारदीयपुराणम्
शक्तीश्च तत्समाकारतेजोहेतिभिरन्विताः । पूजयेत्तद्बहिः स्मितास्या विजयादिकाः ॥९६॥
पंचम्यं समाख्याता भेरुंडाख्या मुनीश्वर । यस्याः स्मरणतो नश्येद्गरलं विविधं क्षणात् ॥९७॥
या तु षष्ठी द्विजश्रेष्ठ सा नित्या वह्निवासिनी । तद्विधानं शृणुष्वाद्य साधकानां सुसिद्धिदम् ॥९८॥
भेरुंडायग्रिमार्धं स्यान्नित्यक्लिन्नाद्यनन्तरम् । ततोऽम्बुशून्ये हंसाग्निह्युत्तमंबुमरुद्युतम् ॥९६॥
हृदग्निना युतं शून्यं ठ्याप्तेन शुचिना च युक् । शून्यं नमः शक्तियुतं नवार्णेयमुदाहृता ॥१००॥
विद्या द्वितीयबीजेन स्वरान्दीर्घान्नियोजयेत् । मायांतान्षड्भिरेवांगान्याचरेत्सकरांगयोः ॥१०१॥
नवाक्षराणि विद्याया नवरंध्रेषु विन्यसेत् । व्यापकं च समस्तेन कुर्यादात्मसिद्धये ॥१०२॥
सर्वास्वपि च विद्यासु व्यापकन्यासमाचरेत् । तप्तकांचनसंकाशां नवयौवनसुन्दरीम् ॥१०३॥
चारुस्मेरमुखांभोजां विलसन्नयनत्रयाम् । अष्टाभिर्बाहुभिर्युक्तां माणिक्याभरणोज्ज्वलाम् ॥१०४॥
पद्मरागकिरीटांशुसंभेदारुणितांबराम् । पीतकौशेयवसनां रत्नमंजीरमेखलाम् ॥१०५॥
रक्तमौक्तिकसंभिन्नस्तबकाभरणोज्ज्वलाम् । रत्नाब्जकंबुपुंड्रे क्षुचापपूर्णेन्दुमंडलम् ॥१०६॥
दधानां बाहुभिर्वामैः कह्लारं हेमशृंगकम् । पुष्पेषुं मातुलिंगं च दधानां दक्षिणेः करैः ॥१०७॥
स्वस्वनामाभिरभितः शक्तिभिः परिवारिताम् । एवं ध्यात्वार्चयेद्वह्निवासिनों वह्निविग्रहाम् ॥१०८॥
यस्याः स्मरणतो वश्यं जायते भुवनत्रयम् । अथ या सप्तमी नित्या महावज्रेश्वरी मुने ॥१०६॥
तस्या विद्यां प्रवक्ष्यामि साधकानां सुसिद्धिदाम् । द्वितीयं वह्निवासिन्या नित्यक्लिन्ना चतुर्थकम् ॥११०॥
पंचमं भगमालायं भेरुंडाया द्वितीयकम् । नित्यक्लिन्नाद्वितीयं च तृतीयं षष्ठसप्तमौ ॥१११॥

वाली और ईषत् हास्य युक्त मुखवाली विजया आदि देवियों की पूजा करे। मुनीश्वर ! यह भेरुंडा नामक
पांचवीं देवी के विषय में कहा है, जिनके स्मरण करने से तत्क्षण तीन प्रकार के विष नष्ट हो जाते हैं ॥८१-९७॥
द्विजश्रेष्ठ ! अब जो छठी वह्निवासिनी नामक नित्या देवी है, उनके विधान को सुनो । वह साधकों को
सिद्धि प्रदान करती हैं। 'भेरुंडा' 'शक्तियुतम्'-यह उनका मन्त्र है। वह नवाक्षरी कहलाती हैं।
द्वितीय विद्याबीज मन्त्र से दीर्घ स्वर वर्णों का विनियोग करे। तत्पश्चात् छः अक्षरों से षडंगन्यास करे। विद्या-
बीज के नौ अक्षरों का नौ रंध्रों में न्यास करे। पुनः आत्मसिद्धि के लिये सामस्त्येन व्यापक न्यास करना चाहिये।
सकल विद्याओं में व्यापक न्यास करना चाहिये । तदनन्तर देवी का इस प्रकार ध्यान करे कि वह तप्त सुवर्ण के
समान हैं, नवयौवना तथा सौन्दर्य से परिपूर्ण है, मुखारविन्द मन्द मुसकान से युक्त है। तीन नेत्र सुशोभित हो
रहे हैं, उनकी आठ बाँहें है, मणि के आभूषणों से कान्ति उज्ज्वल हो रही है, मुकुटस्थ पद्मरागमणि की
किरणों से वस्त्र रक्तिम-सा दीखता है, वे पीत रेशमी वस्त्र पहने हुई हैं, नूपुर एवम् कांची रत्नों की बनी हुई
है। लाल मोतियों के गुच्छेदार आभूषणों से आकृति उज्ज्वल प्रतीत होती है, बाये हाथों में रत्न, कमल, शंख,
माधवीलता के धनुष तथा पूर्ण चन्द्रमण्डल को और दाहिने हाथों में श्वेत कमल, स्वर्णशृंग, पुष्पबाण तथा
बीजपुर को धारण किये हुई हैं, शक्तियां चारों ओर से घेरे हुई हैं। इस प्रकार अग्निशरीरधारिणी वह्नि-
वासिनी देवी का ध्यान करके पूजन करे, जिनके स्मरणमात्र से तीनों लोक वशीभूत हो जाते हैं ॥९८-१०८॥
मुने ! अब जो सातवीं महावज्रेश्वरी नामक नित्यादेवी हैं, उनके मन्त्र आदि को बता देता हूँ। वे साधकों को
सिद्धि देने वाली हैं। "द्वितीयम् द्वयम्" -यह उनका मन्त्र है। उसको मायाबीज से संपुटित करके
क्रमशः षडंगन्यास करना चाहिये । प्रत्येक अक्षर को शक्तिसंपुटित करके नेत्र, कर्ण, नासिका, वक्षःस्थल, नाभि,

अष्टाशीतितमोऽध्यायः ८११
अष्टमं नवमं चापि पूर्वं स्याद्दंतितं पुनः । द्वयमेकैक मथ च दृष्टद्वयमथ द्वयम् ॥११२॥
मायया पुटितं कृत्वा कुर्यादंगानि षट् क्रमात् । प्रत्येकं शक्तिपुटितैर्मंत्रार्णैर्दशभिर्न्यसेत् ॥११३॥
दृक्श्रोत्रनासावाग्वक्षोनाभिगुह्येषु च क्रमात् । रक्तां रक्तांबरां रक्तगंधमाल्याविभूषणाम् ॥११४॥
चतुर्भुजां त्रिनयनां माणिक्यमुकुटोज्ज्वलाम् । पाशांकुशामिक्षुचापं दाडिमीशायकं तथा ॥११५॥
दधानां बाहुभिर्नेत्रैर्दयासुप्रीतिशीतलैः । पश्यंती साधकेअस्त्रषट्कोणाब्ज महीपुरे ॥११६॥
चक्रमध्ये सुखासीनां स्मेरवक्त्रसरोरुहाम् । शक्तिभिः स्वस्वरूपाभिरावृतां पीतमध्यगाम् ॥११७॥
सिंहासनेऽभितः प्रेंखत्पोतस्थाभिश्च शक्तिभिः । वृतां ताभिर्विनोदानि यातायातादिभिः सदा ॥११८॥
कुर्वाणामरुणांभोधौ चिंतयेन्मन्त्रनायकम् । एषा तु सप्तमी प्रोक्ता दूतीं चाप्यष्टमीं शृणु ॥११९॥
वज्रेश्वर्य्यचिमात्रं स्याद्विद्यदग्नियुतं ततः । अंबु स्यान्मरुता युक्तं गोत्रा क्ष्मासंयुता ततः ॥१२०॥
रयोव्यासेन शुचिना युतः स्यात्तदनंतरम् । अष्टार्णा वह्निवासिन्या दूती नित्या समीरिताः ॥१२१॥
षड्दीर्घस्वरयुक्तेन विद्यायाः स्यात्षडंगकम् । तेनैव पुटितैर्वर्णैरन्यच्छ्रोत्रादिपञ्चसु ॥१२२॥
षष्ठकं नसि विन्यस्य व्यापकं विद्यया न्यसेत् । निदाघकालमध्याह्नदिवाकरसमप्रभाम् ॥१२३॥
नवरत्नकिरीटां च त्रीक्षणामरुणांबराम् । नानाभरणसंभिन्नदेहकांतिविराजिताम् ॥१२४॥
शुचिस्मितामष्टभुजां स्तूयमानां महर्षिभिः । पाशं खेटं गदां रत्नचषकं वामबाहुभिः ॥१२५॥
दक्षिणेरंकुशं खड्गं कट्ठारं कमलं तथा । दधानां साधकाभीष्टदानोद्यमसमान्विताम् ॥१२६॥
ध्यात्वैवं पूजयेद्देवीं दूतीं दुर्नीतिनाशिनीम् । इत्येषा कथिता तुभ्यं समस्तापत्तिनिवारिणी ॥१२७॥
श्रीकरी शिवतावासकारिणी सर्वसिद्धिदा । अथ ते नवमीं नित्यां त्वरितां नाम नारद ॥१२८॥


तथा गुह्यों में क्रमशः दश अक्षरों का न्यास करे । तदनन्तर रक्तवर्णा, रक्तवस्त्रा, रक्त गंध तथा माला से विभू-
षिता, चतुर्भुजा, त्रिनयना, उज्ज्वल मणि का मुकुट पहनने वाली, हाथों में पाश, अंकुश, माधवीलता के धनुष और
दाडिम के बाणों को धारण करनेवाली; दया एवम् प्रीतियुक्त शीतल नेत्रोंवाली, साधक के ऊपर दृष्टिपात करने
वाली, अस्त्र, षट्कोण, अष्टदल कमल, भूपूर तथा चक्रमध्य में सुख से बैठने वाली; मुस्कराते हुए मुखारविंद वाली,
अपने समान स्वरूप वाली शक्तियों से आवृत्त, पीतमध्यगामिनी और सिंहासनारूढ होकर चामर डुलानेवाली
तथा निकट आते जाने वाली शक्तियों के साथ मनोविनोद करनेवाली मन्त्रनायिका देवी का लाल समुद्र में ध्यान
करे । यह तो सातवीं देवी बतलाई गई है। अब आठवीं दूती के बारे में भी सुन लो ॥१०९-११९॥ "बजे-
श्वरी ...... समीरिता"—यह उनका मन्त्र है। इसमें छः दीर्घस्वर हैं, जो विद्या के षडंग कहलाते हैं ।
उन्हीं स्वरों से संपुटित वर्णों से कर्ण आदि पाँच अंगों में न्यास करे । छठें वर्ण का नासिका में न्यास करके विद्या
से व्यापकन्यास करना चाहिये । तदनन्तर ग्रीष्म ऋतु के मध्याह्नकालीन दिनकर के समान कान्तिवाली, नवरत्नों
के बने मुकुट पहननेवाली, त्रिनेत्रा, रक्तवस्त्रा, अनेक आभूषणों से आभूषित सुमनोहर गात्रवाली, पवित्र हास्यवाली,
आठ भुजाओं वाली, महर्षियों से वन्दित की जाने वाली, वाम हस्तों में पाश, धनुष, गदा तथा रत्न का
प्याला और दक्षिण करों में अंकुश, खड्ग कटार तथा कमल धारण करनेवाली, साधकों की कामना पूर्ण
करने के लिये सदा उद्यत रहनेवाली और दुर्नीति का नाश करने वाली दूती देवी का ध्यान करके
पूजन करे। यह समस्त विपत्तियों का निवारण करने वाली, कल्याणकारिणी, सकलसिद्धिदायिनी

८१२ नारदीयपुराणम्
प्रवक्ष्यामि यशोविद्याधनारोग्यसुखप्रदाम् । आद्यं तु वह्निवासिन्या दूत्यादिस्तदनन्तरम् ॥१२६॥
हंसो धरा स्वयं युक्तस्तेजोवज्रसमन्वितम् । वायुः प्रभाचरयुता ग्रासशक्तिसमन्वितः ॥१३०॥
हृद्वारयेण दाहनेन वह्निस्वावाष्टमं तथा। हंसःक्षमाखंडुतो ग्रासश्चरयुक्तो द्वितीयकः ॥१३१॥
द्वितिनारदयुता नित्या त्वरिता द्वादशाक्षरी । विद्या चतुर्थवर्णादिसप्तमिस्त्वक्षरैस्तथा ॥१३२॥
कुर्यादंगानि युग्मार्णैः षट्क्रमेण करांगयोः । शिरोललाटकंठेषु हृन्नाभ्याधारके तथा ॥१३३॥
ऊरुयुग्मे तथा जानुद्वये जंघाद्वये तथा। पादयुग्मे तथा वर्णान्मंत्रजाग्दश विन्यसेत् ॥१३४॥
द्वितीयोपांत्यमध्यस्थैर्मंत्राणैरितरैरपि । ताराद्यैः शृणु तद्ध्यानं सर्वसिद्धिविधायकम् ॥१३५॥
श्यामवर्णशुभाकारां नवयौवनशोभिताम् । द्विद्विक्रमादष्टनागैः कल्पिताभरणोज्ज्वलः ॥१३६॥
ताटंकमंगदं तद्वद्रसना नूपुरं च तैः । विप्रक्षत्रियविट्शूद्रजातिभिर्मीमविग्रहैः ॥१३७॥
पल्लवांशुकसंवीतां शिखिपिच्छकृतैः शुभैः । वलयैर्भूषितभुजां माणिक्यमुकुटोज्ज्वलाम् ॥१३८॥
बर्हिबर्हकृतापोडां तच्छत्रां तत्पताकिनीम् । गुंजागुणलसद्वक्षःकुचकुंकुममंडलाम् ॥१३९॥
त्रिनेत्रां चारुवदनां मंदस्मितमुखांबुजाम् । पाशांकुशवरामीतिलसद्भुजचतुष्टयाम् ॥१४०॥
ध्यात्वैवं तोतलां देवीं पूजयेच्छक्तिभिर्वृताम् । तदग्रस्था तु फट्कारीशरचापकरोज्ज्वला ॥१४१॥
प्रसीदेत्फलदाने च साधकानां त्वरान्विता । एषा तु नवमी नित्या त्वरिताक्ता मुनीश्वर ॥१४२॥
विघ्नदुःखप्रशमनी सर्वाभीष्टप्रदायिनी । शुचिः स्वेन युतस्वाद्यो रसावृत्तित्समन्वितः ॥१४३॥
प्राणो द्वितीयः स्वयुतो वनदुच्छक्तिभिः परः । इतीरिता त्र्यक्षराख्या नित्येयं कुलसुन्दरी ॥१४४॥
यस्याः स्मरणमात्रेण सर्वज्ञत्वं प्रजायते । त्रिभिस्तै कथितैर्मूलवर्णैः कुर्यात्त्वडंगकम् ॥१४५॥
तथा शिव के शरीर में निवास करने वाली हैं, नारद ! इनका वर्णन तो हो चुका, अब त्वरिता नामक नवीं
नित्यादेवी का वर्णन करूंगा, जो यश, विद्या, धन, आरोग्य तथा सुख देने वाली हैं । "आद्यम्' ... 'द्वादशाक्षरी"
—यह उनका मन्त्र है। चतुर्थ अक्षर विद्याबीज है। सात अक्षरों से अंगन्यास करे। युग्म वर्णों से क्रमशः
षडंगन्यास करके शिर, ललाट, कंठ, हृदय, नाभि, मूलाधार, ऊरुद्वय, जानुद्वय, जंघाद्वय तथा चरणद्वय में मन्त्र के
दश वर्णों का न्यास करे ॥१२०-१३४॥ मन्त्र के प्रथम, द्वितीय, छठे तथा ग्यारहवें अक्षर का भी न्यास करना
चाहिये। अब उनके सकलसिद्धिदायक ध्यान का वर्णन सुनो। उनका वर्ण श्याम है, आकृति शोभन है, नवीन
यौवन प्रस्फुरित हो रहा है, शरीर में ताटंक, केयूर, कांची तथा नूपुर के स्थान में दो-दो करके क्रमशः
आठ उज्ज्वल, भीमकाय एवं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों के नागों के आभूषण हैं, लाल वस्त्र पहने
हुई हैं, मयूरपुच्छ के बने वलयों से भुजायें आभूषित हैं, शुभ्र मणि का मुकुट, मयूरपिच्छ के शिरोभूषण, छत्र
एवम् पताका धारण किये हुई हैं ॥१३५-१३८½॥ वक्षःस्थल पर गुंजा की माला लटक रही है, उरोज कुंकुम
आच्छादित हैं, नेत्र तीन हैं, आनन मनोहर है, मुखारविंद मन्द मुस्कान से युक्त है, चारों हाथों में पाश, अंकुश,
वरद एवम् अभयद अस्त्र सुशोभित हो रहे हैं ॥१३९-१४०॥
इस प्रकार शक्तियों से परिवेष्टित तोतला देवी का ध्यान करके पूजन करे। उनके आगे उज्ज्वल धनुष-
बाण धारण करने वाली 'फट्' शब्द करने वाली तु देवी की पूजा करे, जो साधकों को अविलम्ब फल प्रदान
करती हैं। मुनीश्वर ! यह त्वरिता नामक नवीं नित्या देवी का वर्णन हुआ, जो विघ्न तथा दुःस्वप्न का नाश
करने वाली और अखिल कामनाओं को देने वाली है। अब कुलसुन्दरी नामक त्र्यक्षरा नित्या देवी के विषय में सुनो,

अष्टाशीतितमोऽध्यायः ८१३
आदिमध्यावसानेषु पूजाजपविधिक्रमात् । प्रत्ये कं तैस्त्रिभिर्भेदैर्दीर्घस्वरसमन्वितैः ॥१४६॥
कुर्यात्करांगषक्वणां न्यासं प्रोक्तं यथाविधि । ऊर्ध्वप्राग्दक्षिणोदग्व पश्चिमाधरनामभिः ॥१४७॥
सुविनद्यंतरस्थैस्तन्तदात्मसु यथाक्रमम् । आधाररंध्रहृत्स्र्वेकं द्वितीयं लोचनत्रये ॥१४८॥
तृतीयं श्रोत्रचिबुके चतुर्थं घ्राणतालुषु । पंचमं चांसनाभीषु ततः पाणिपदद्वये ॥१४९॥
मूलमध्याग्रतो न्यस्येत्तन्नवधा मूलवर्णकैः । लोहितां लोहिताकारशक्तिवृंदानिवेष्विताम् ॥१५०॥
लोहितांशुकभूषाल्रत्नलेपनां षण्मुखांबुजाम् । अनर्घ्यरत्नघटितमाणिक्यमुकुटोज्ज्वलाम् ॥१५१॥
रत्नस्तबकसंच्छिन्नलसद्रक्षःस्थलां शुभाम् । कारुण्यानंदपरमामरुणांबुजविष्टराम् ॥१५२॥
भुजैर्द्वादशभिर्युक्तां सर्वेषां सर्ववाङ्मयीम् । प्रवालाक्षस्रजं पद्मं कुंडिकां रत्ननिर्मिताम् ॥१५३॥
रत्नपूर्णं तु चषकं लुंगीं व्याख्यानमुद्रिकाम् । दधानां दक्षिणैर्वार्मः पुस्तकं चारुणोत्पलम् ॥१५४॥
हैमों च लेखनीं रत्नमालां कंबुवरं भुजैः । अभितः स्तूयमानां च देवगंधर्वकिन्नरैः ॥१५५॥
यक्षरक्षसदैत्यार्षिसिद्धविद्याधरादिभिः । ध्यात्वैवमर्चयेन्नित्यां वाग्लक्ष्मीकान्तिसिद्धये ॥१५६॥
सितां केवलवाक्सिद्ध्यै लक्ष्म्यै हेमप्रभामपि । धूमाभां वैरिविद्विष्टयौ मृतये निग्रहाय च ॥१५७॥
नीलां च मकीकरणे स्मरेत्तत्तदपेक्षया । इत्येषा दशमी नित्या प्रोक्ता ते कुलसुन्दरी ॥१५८॥
नित्यानित्यां तु दशमीं त्रिकुटां वच्मि सांप्रतम् । हंसश्च हृत्प्राणरसाद्वाहकणैः समन्वितः ॥१५९॥
विद्यया कुलसुंदर्या योजितः संप्रदायतः । नित्यानित्यत्रिवर्णयं षड्भिः कूटाक्षरैर्युता ॥१६०॥
जिनके स्मरणमात्र से सर्वज्ञत्व की प्राप्ति होती है। "शुचिः ....... परः"—यह उनका मन्त्र है। तीन
मूल वर्णों से षडंगन्यास करना चाहिये ॥१४१-१४५॥ आदि, मध्य और अवसान में पूजा तथा जप के विधानक्रम
से दीर्घस्वरयुक्त तीन बीजमन्त्रों से हाथ, हृदय तथा मुख में न्यास करना चाहिये। ऊपर, नीचे, पूरब, दक्षिण
और उत्तर दिशा में भी मूलवर्णों से न्यास करना चाहिये। मूलाधार, रंध्र तथा हृदय में प्रथम अक्षर, तीनों
नेत्रों में द्वितीय अक्षर, कान एवम् ठुड्ढी में तृतीय अक्षर, नाक तथा तालू में चतुर्थ अक्षर, कंधे तथा नाभि में
पंचम अक्षर और हाथ, पैर, मूल तथा अन्त में छठे, सातवें, आठवे और नवें अक्षर का न्यास करना चाहिये।
तदनन्तर देवी का ध्यान करे कि उनका वर्ण लाल है, रक्तवर्ण शक्तियां उनकी परिचर्या में लगी हैं, शरीर में रक्त
वस्त्र, आभूषण, माला तथा लेप सुशोभित हैं, उनके छह मुखकमल हैं, बहुमूल्य रत्नजटित शुभ्र मणि का मुकुट
शोभायमान हो रहा है, वक्षःस्थल पर रत्नावली लटक रही है, स्वयं देवी मानों करुणा एवम् परमानन्द की प्रति-
मूर्ति हैं, रक्तकमल के आसन पर बैठी हुई हैं। उनकी आठ भुजायें हैं, वे सर्ववाङ्मयी हैं, दाहिने हाथों
में मूंगा तथा रुद्राक्ष की माला, पद्म, रत्ननिर्मित कमण्डलु, रत्नपूर्ण चषक (प्याला), 'लुंगी' नामक व्याख्यान
मुद्रिका को और बायें हाथों में पुस्तक, लाल कमल, सुवर्ण की लेखनी, रत्नमाला और उत्तम शंख को धारण
किये हुई हैं, उनकी चारों ओर से देव, गंधर्व, किन्नर, यक्ष, राक्षस, दैत्य, ऋषि, सिद्ध, विद्याधर आदि स्तुति
कर रहे हैं ॥१४६-१५५॥
इस प्रकार ध्यान करके वाणी, लक्ष्मी तथा कान्ति की सिद्धि के लिये नित्या देवी की अर्चना करे।
केवल वाक्सिद्धि के लिये सिता देवि की, लक्ष्मी की सिद्धि के लिये हेमप्रभा की, और शत्रुविद्वेष, मृत्यु तथा
निग्रह करने के लिये धूमाभा की पूजा करे। मूक बनाने के लिये नीला देवी का स्मरण करना चाहिये। यह
दसवीं नित्या कुलसुन्दरी का वर्णन किया है। अब दसवीं नित्या-अनित्या त्रिकुटा का वर्णन करूंगा। "हंस ...

८१४ नारदीयपुराणम्
प्रतिलोमाविमौ रूपैद्विसप्ततिमिदा मता । यस्या भजनतः सिद्धो नरः स्यात्खेचरः सुखी ॥१५६१॥
निग्रहानुग्रहौ कर्तुं क्षमः स्याद्भुवनत्रये । दीर्घस्वरसमेताभ्यां हंसहृद्ब्यां षडंगकम् ॥१५६२॥
भ्रूमध्ये कण्ठहृन्नाभिगुह्याधारेषु च क्रमात् । विद्याक्षराणि क्रमशो न्यसेद्बिन्दुयुतानि च ॥१५६३॥
व्यापकं च समस्तेन विधाय विधिना पुनः । ध्यायेत्समस्तसम्पत्तित्हेतोः सर्वात्मिकां शिवाम् ॥१५६४॥
उद्यद्भास्करबिम्बाभां माणिक्यमुकुटोज्ज्वलाम् । पद्मरागकृताकल्पामरुणांशुकधारिणीम् ॥१५६५॥
चारुस्मितलसद्वक्त्रषट्सरोजविराजिताम् । प्रतिवक्त्रं त्रिनयनां भुजैर्द्वादशभिर्युताम् ॥१५६६॥
पाशाक्षगुणपुङ्गेक्षुचापखेटत्रिशूलकान् । करैर्वामैर्दधानां च अङ्कुशं पुस्तकं तथा ॥१५६७॥
पुष्पेषुमंबुजं चैव नृकपालाभये तथा । दधानां दक्षिणेर्हस्तैर्ध्यायेद् वीमनन्यधीः ॥१५६८॥
इत्येषैकादशी प्रोक्ता द्वादशीं शृणु नारद । त्वरितायांत्यमाद्यं स्याद्द्युतिदोहस्वरस्वयुक् ॥१५६९॥
हृच्च दाहक्षमास्वयुतं वञ्नेशीपञ्चमं तथा । मरुत्स्वयुक्तो मथ्याढचोदशम्याः परतः पुनः ॥१५७०॥
भूमी रसाक्षमास्वयुता वज्रेशीत्यष्टमः क्रमात् । षडक्षराणि त्वरिता तृतीयं तदनंतरम् ॥१५७१॥
द्युतिर्दाहचरस्वेन अस्या आचमनन्तरम् । उक्ता नीलपताकाख्या नित्या सप्तदशाक्षरी ॥१५७२॥
द्विद्विपक्षाक्षिषड्वर्णैर्मन्त्रोत्थैरंगकल्पनम् । श्रोत्रादिनासायुगले वाचि कण्ठे हृदि क्रमात् ॥१५७३॥
नामावाधारके ऽप्यापि पादसंधिषु च क्रमात् । मन्त्राक्षराणि क्रमशो न्यसेत्सप्तदशापि च ॥१५७४॥
व्यापकं च समस्तेन विदध्याच्च यथाविधि । इन्द्रनीलनिभां भास्वन्मणिमौलि विराजिताम् ॥१५७५॥
पञ्चवक्त्रां त्रिनयनामरुणांशुकधारिणीम् । दशहस्तां लसन्मुक्तामण्याभरणमंडिताम् ॥१५७६॥
०००मतः" - यह उनका मन्त्र है । उनकी उपासना करने से मनुष्य सुखी, आकाशगामी और तीनों लोक में
निग्रह तथा अनुग्रह करने में समर्थ होता है । दीर्घ मात्रा और स्वर वर्ण समेत अजपा मन्त्र तथा प्रणव से षडंगन्यास
करे ॥१५६-१६२॥ भौं के मध्य, कंठ, नाभि, गुह्य तथा मूलाधार में क्रमशः बिंदुयुक्त विद्याक्षरों का न्यास करके
पुनः विधिपूर्वक सामस्त्येन व्यापक न्यास करे । तदनन्तर अखिल सम्पत्ति की प्राप्ति के लिये सर्वात्मिका शिवा का
ध्यान करे । साधक तन्मनस्क होकर उदयकालीन सूर्यबिंब के समान आभा वाली, शुभ्र मणि का मुकुट तथा
पद्मरागमणि जटित रक्तवस्त्र धारण करने वाली, मन्द मुसकान से सुशोभित छः मुख कमल वाली, प्रत्येक मुख
में तीन-तीन नेत्रों वाली, बारह भुजाओं वाली, बायें हाथों में पाश, रुद्राक्ष, माधवी लता का धनुष, ढाल तथा
त्रिशूल धारण करनेवाली, दाहिने हाथों में अंकुश, पुस्तक, पुष्पबाण, कमल, नरकपाल, और अभयास्त्र रखने वाली
देवी का ध्यान करे ॥१५६३-१५६८॥
नारद ! यह ग्यारहवीं देवी का वर्णन किया है। अब बारहवीं के बारे में सुनो । नीलपताका नामक
नित्या देवी सत्रह अक्षरों वाली हैं। "त्वरिता ००००० अनन्तरम्" - यह उसका मन्त्र है। मन्त्र के चौदह
वर्णों से अंगन्यास करना चाहिये । कान, नाक, कंठ, हृदय, नाभि, मूलाधार तथा चरण संधियों में सत्रहों मन्त्रा-
क्षरों का क्रमशः न्यास करके विधिपूर्वक सम्पूर्ण रूप से व्यापक न्यास करना चाहिये । तदुपरान्त इन्द्रनील मणि
के समान कान्ति वाली, दैदीप्यमान मणि का मुकुट धारण करने वाली, पाँच मुख तथा तीन नेत्र वाली, रक्त
वस्त्र पहनने वाली, दशहस्त परिमित दीर्घाकृति वाली, मणि और मुक्ता के आभूषणों से अलंकृता, रत्नावली से
सुशोभित, मन्द मुसकान युक्त मुख वाली, बायें हाथों में पाश, पताका, चर्म, धनुष तथा वरास्त्र धारण करनेवाली

अष्टाशीतितमोऽध्यायः ८१५
रतनस्तबकसम्पन्नदेहां चारुस्मिताननाम् । पाशं पताकां चर्मापि शाङ्गं चापं वरं करैः ॥१७७॥
दधानां वामपार्श्वस्थैः सर्वाभरणभूषितैः । अंकुशं च तथा शक्तिं खड्गं बाणं तथाभयम् ॥१७८॥
दधानां दक्षिणैर्हस्तैरासीनां पद्मविष्टरे । स्वाकारवर्णवेषास्याण्यायुधविभूषणैः ॥१७६॥
शक्तिवृन्दैर्वृतां ध्यायेद्देवी नित्यार्चनक्रमे । त्रिषट्कोणयुतं पद्ममष्टपत्रं ततो बहिः ॥१८०॥
अष्टास्रं भूपुरद्वन्द्वावृतं तत्पुरयुग्मकम् । चतुर्द्वारयुतं दिक्षु शाखाभिश्च समन्वितम् ॥१८१॥
कृत्वा नामावृतां शक्तिं गणैस्तत्वार्चयेच्छिवाम् । एषा ते द्वादशी नित्या प्रोक्ता नीलपताकिनी ॥१८२॥
समरे विजयं खड्गपादुकांजनसिद्धिदा । वेतालपक्षणीचेटपिशाचादिप्रसाधिनी ॥१८३॥
निधानबिलसिद्धान्तसाधिनी कामचोदिता । अथ त्रयोदशीं नित्यां वक्ष्यामि शृणु नारद ॥१८४॥
रसो नमस्तथा दाहो व्याप्तक्षमावनपूर्विका । स्वेन युक्ता भवेन्नित्या विजयेकाक्षरा मुने ॥१८५॥
विद्याया व्यंजनैर्दीर्घस्वरयुक्तैश्चतुष्टयम् । शेषाभ्यां च द्वयं कुर्यात्षडंगानि करांगयोः ॥१८६॥
ज्ञानेन्द्रियेषु श्रोत्रादिष्वथ चित्ते च विन्यसेत् । अक्षराणि क्रमाद्विन्दुयुतान्यन्यत्तु पूर्ववत् ॥१८७॥
पञ्चवक्त्रां दशभुजां प्रतिवक्त्रं त्रिलोचनाम् । भास्वन्मुकुटविन्यासचन्द्रलेखाविराजिताम् ॥१८८॥
सर्वाभरणसंयुक्तां पीतांबरसमुज्ज्वलाम् । उद्यद्भास्वद्दिवबस्तुल्यदेहकांति शुचिस्मिताम् ॥१८६॥
शंखं पाशं खेटचापौ कह्लारं वामबाहुभिः । चक्रं तथांकुशं खड्गं सायकं मातुलुंगकम् ॥१६०॥
दधानां दक्षिणैर्हस्तैः प्रयोगे भीमदर्शनाम् । उपासनेति सौम्यां च सिंहोपरि कृतासनाम् ॥१६१॥
व्याघ्रारूढाभिरभितः शक्तिभिः परिवारिताम् । समरे पूजनेऽन्येषु प्रयोगेषु सुखासनाम् ॥१६२॥
शक्तयश्चापि पूजायां सुखासनसमन्विताः । सर्वा देव्याः समाकारमुखपाण्यायुधा अपि ॥१६३॥

दाहिने हाथों में अंकुश, शक्ति, खड्ग, बाण तथा अभयास्त्र रखने वाली, अरविन्द के आसन पर बैठने वाली, अपने
समान वर्ण, वेष, आभूषण, तथा आयुधों से युक्त शक्तिगणों से आवृत होने वाली देवी का ध्यान करके पूजन
करे । तब नौ कोण वाले अष्टदल कमल और आठ जगहों में निम्नीभूत भूपूर-द्वय का निर्माण करे, जो चार द्वारों
तथा शाखाओं से समन्वित हो । वहाँ शक्तियों के साथ शिवा की अर्चना करे । यह नीलपताकिनी नामक
बारहवीं नित्या देवी का वर्णन किया, जो समर में विजय तथा खड्ग, पादुका, अंजन, वेताल, यक्षिणी, चेट,
पिशाच, निधि, बिल, सिद्धान्त आदि की सिद्धि अविलम्ब प्रदान करती हैं ।
नारद ! अब इसके बाद तेरहवीं नित्या देवी के विषय में सुनो ॥१६६१-१८४॥ मुने ! "रसो........
भवेत्"-यह एकाक्षरा विजया देवी का मन्त्र है । मन्त्र के व्यंजन तथा दीर्घ स्वर वर्णों से अंगन्यास करना
चाहिये । कर्ण आदि ज्ञानेन्द्रियों में तथा चित्त में बिंदु युक्त अक्षरों का क्रमशः न्यास करना चाहिये । तत्पश्चात्
दैदीप्यमान मुकुट तथा चन्द्रलेखा से सुशोभित, समस्त आभूषणों से आभूषित, पीतवस्त्रधारिणी, उदयकालीन सूर्य
बिम्ब के समान देह कांतिवाली, पवित्र हास्यवाली, वाम करों में शंख, पाश, ढाल, धनुष तथा श्वेत कमल और
दक्षिण हस्तोँ में चक्र, अंकुश, खड्ग, बाण तथा बीजपूर धारण करनेवाली, देखने में भयंकर, उपासना करने में अत्यन्त
सौम्य, सिंह के ऊपर आरूढ, बाघों के ऊपर चढ़ी शक्तियों से परिवेष्टित, संग्राम, पूजन तथा अन्य प्रयोगों में सुख
से आसनोपविष्ट होनेवाली देवी का ध्यान करे । पूजा काल में शक्तियां भी उनके साथ सुख से आसनों पर बैठती
हैं । उनके समान ही उन शक्तियों की भी आकृति मुख तथा अस्त्रविशिष्ट हाथ हैं । ॥१८६-१९३॥ चार द्वार

८१६ नारदीयपुराणम्
चतुरस्रद्वयं कृत्वा चतुर्द्वारोपशोभितम् । शाखाष्टकसमोपेतं तत्र प्राग्वत्समर्चयेत् ॥१९४॥
तदंतर्वृत्तयुग्मांतरष्टकोणं विधाय तु । तदंतश्च तथा पद्मं षोडशच्छदसंयुतम् ॥१९५॥
तथैवाष्टच्छदं पद्मं विधायावाह्य तत्र ताम् । तत्तच्छक्त्या वृतां सम्यगुपचारैस्तथार्चयेत् ॥१९६॥
एषा त्रयोदशी प्रोक्ता वादे युद्धे जयप्रदा । चतुर्दशीं प्रवक्ष्येऽथ नित्यां वै सर्वमंगलाम् ॥१९७॥
हृद्वंबुवनयुक्तं खं नित्या स्यात्सर्वमंगला ॥१९८॥
एकाक्षर्यनया सिद्धो जायते खेचरः क्षणात् । षड्दीर्घाढ्यां मूलविद्यां षडंगेषु प्रविन्धसेत् ॥१९९॥
तां नित्यां जातरूपाभां मुक्तामाणिक्यभूषणाम् । माणिक्यधृन्मुकुटां नेत्रद्वयप्रैंखद्दयापराम् ॥२००॥
द्विभुजां शासनां पद्मे त्वष्टषोडशतद्वयेः । पत्त्रैरुपैते सचतुर्द्वारसूमद्मयुग्मके ॥२०१॥
मातुलुंगफलं दक्षे दधानां करपंकजे । वामेन निजभक्तानां प्रयच्छंतीं धनादिकम् ॥२०२॥
स्वसमानाभिरभितः शक्तिभिः परिवारिताम् । षट्सप्ततिभिरन्याभिरप्सरोत्थामिरन्विताम् ॥२०३॥
प्रयोगेष्वन्यदा नित्यं सपर्यासक्तशक्तिकाम् । एषा चतुर्दशी प्रोक्ता तथा पंचदशीं शृणु ॥२०४॥
भूः शून्यं नभसा भूश्च रसश्चाथ स्थिरांबु च । रयोगिना युतीज्यांबुमरुद्युक्तारखा मरुत् ॥२०५॥
नभश्च महता युक्तं रसा शून्येऽपि संयुते । गोत्रा चरेण सहिता अंबुपूवर्क्षरस्तथा ॥२०६॥
अंब्वग्नी हृच्च दाहांबुरसक्ष्मारयहृत्स्वयुक् । हंसश्च महता दाहः प्राणश्च महतायुतः ॥२०७॥
दाहः साग्निप्राणचरौ ज्यामरुत्सहितारयः । चरेणांबु च गोत्राहृत्साग्निर्ज्या'बुरसा स्वयुक् ॥२०८॥
रयः साग्निर्ज्या'बुरसा पुनरेतेजवो ततः । दाहेनानेन ते द्विः स्याद्ध्रस्वो दाहमरुत्स्वयुक् ॥२०९॥
हंसः सदाहवह्निस्त्रो दाहक्ष्मास्वयुतश्च सः । सप्तदाहास्ततोऽस्याः स्युरष्टमाद्यास्तु पंच ते ॥२१०॥
तथा आठ शाखा वाले चतुरस्र (चौकोर) पीठ बनाकर वहाँ पूर्ववत् अर्चना करे । उस पर अष्टकोण, षोडशदल
तथा अष्टदल कमल की रचना कर शक्ति समेत देवी का आवाहन करके सम्यक् उपचारों से उनका
पूजन करे । यह युद्ध में तथा वाद-विवाद में विजय देने वाली तेरहवीं देवी का वर्णन किया ।
अब सर्वमंगला नामक चौदहवीं देवी का वर्णन करूँगा । “हृत् ............”—यह उनका मंत्र है ।
वह एकाक्षरी देवी कहलाती हैं । उनके मन्त्र सिद्ध हो जाने पर मनुष्य तत्क्षण आकाश में विचरने की क्षमता
प्राप्त कर लेता है । छह दीर्घ मात्राओं से युक्त मूल मन्त्र से षडंगन्यास करना चाहिये । तदनन्तर देवी का इस
प्रकार ध्यान करे कि उनका वर्ण चांदी के समान धवल है, आभूषण मोती और मणि के हैं, मुकुट मणिमय है,
दोनों नेत्र दया से आर्द्र हैं, भुजायें दो हैं, चार द्वार वाले भूगृह में वे अष्टदल, षोडशदल तथा शतदल कमल पर
आसीन हैं, दाहिने करकमल में बीजपुर धारण किये हुई हैं, बायें हाथ से अपने भक्तों को धन आदि प्रदान करती
हैं, अपने समान शक्तिगणों से परिवेष्टित हैं और छिहत्तर अन्य अप्सराओं से भी युक्त हैं ॥१९४-२०३॥ प्रयोग
में तथा अन्य समय भी उक्त शक्तियों के साथ देवी की अर्चना करनी चाहिये । यह चौदहवीं देवी का वर्णन
किया । अब पन्द्रहवीं देवी का वर्णन सुनो । “भूः......”—यह उनका मंत्र है । वह ज्वालामालिनी नामक
नित्या देवी तिरसठ अक्षरों से युक्त हैं । मूलमंत्र के प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम तथा दशम अक्षरों से अंगन्यास
करे । आदि से छह कर तथा अंगों में न्यास करे । तदनन्तर शेष अक्षरों से व्यापकन्यास करके
सवातनी देवी का इस तरह ध्यान करे कि प्रज्वलित अग्नि के समान उनका वर्ण है, शुभ्र मणि का मुकुट है,
छह मुख हैं, बारह भुजायें हैं, वे समस्त आभूषणों से भूषिता हैं, करकमलों में पाश, अंकुश, खड्ग, ढाल, बाण

अष्टाशीतितमोऽध्यायः ५१७
उपांख्याधः स्थितं नीलपताकाया अनंतरम् । त्वरिता त्वं च भेरुंडाष्टमं च नवमं तथा ॥२११॥
सा ज्वालामालिनी नित्या त्रिषष्टचर्णा समीरिता । एकद्वयचतुःपंचचतुष्टयदशाक्षरैः ॥२१२॥
कुर्यादंगानि मूलार्णैरादितः षट्करांगयोः । शेषैस्तु व्यापकं कुर्यात्ततो ध्यायेत्सनातनीम् ॥२१३॥
ज्वलज्ज्वलनसंकाशां माणिक्यमुकुटोज्ज्वलाम् । षड्वक्त्रां द्वादशभुजां सर्वाभरणभूषिताम् ॥२१४॥
पाशांकुशौ खड्गखेटौ चापबाणौ गदादरौ । शूलवह्नी वराभीतौ दधानां करपंकजैः ॥२१५॥
स्वप्रमाणाभिरभितः शक्तिभिः परिवारिताम् । चारुस्मितलसद्वक्त्र सरोजां त्रीक्षणान्विताम् ॥२१६॥
ध्यात्वैवमुपचारैस्तैरर्चयेत्तां तु नित्यशः । चतुरस्रद्वयं कृत्वा चतुर्द्वारसमन्वितम् ॥२१७॥
सशाखमष्टपत्राब्जमंतरा त्र्यस्रकं ततः । षट्कोणं मध्यतस्त्यस्रं विधायाथ शिवां यजेत् ॥२१८॥
एषा पंचदशी प्रोक्ता षोडशीं शृणु नारद । वायुप्रणवतत्त्वैस्तु चित्रास्पादक्षरद्वया ॥२१९॥
या सिद्धा धनधान्यात्मनिधिलाभाय कल्प्यते । विद्याद्यवायुना कुर्याद्दीर्घस्वरयुजा क्रमात् ॥२२०॥
षडंगानि यथापूर्वं मातृकां विद्यया न्यसेत् । उद्यदादित्यबिंबाभां नवरत्नविभूषणाम् ॥२२१॥
नवरत्नकिरीटां च चित्रपट्टांशुकोज्ज्वलाम् । चतुर्भुजां त्रिनयनां शुचिस्मितलसन्मुखीम् ॥२२२॥
सर्वानंदमयीं नित्यां समस्तेप्सितदायिनीम् । चतुर्भुजेषु वै पाशमंकुशं वरदाभये ॥२२३॥
दधानां मंगलापद्मकर्णिकायोनिमध्यगाम् । तच्छक्तिभिश्च तच्चक्रे तथैवार्चनमीरितम् ॥२२४॥
प्राणदाहौ धरायुक्तौ पुनराद्यं रसे महत् । व्यासं मरुच्छक्तियुतं भूः स्वयुक्ता ततस्त्रयम् ॥२२५॥
अस्या आद्यं रसाक्षुब्धं चरणेन प्रयोजितम् । दाहेन वन्हिशक्तिभ्याम् युतो हंसस्ततः परम् ॥२२६॥
नभो दिहंत्सदाहांबुज्या शून्यं स्वेन संयुतम् । अंबु पश्चाद्विषयुतं मरुता तु नज्ञोयुतम् ॥२२७॥
शून्यं व्याप्तं भुजा हंसः पूर्वोक्त्यो स्यान्मनुत्रयम् । अस्याः षष्ठादिपंचाणां दैत्यास्यादाद्य ईरितः २२८॥
एकादशाक्षरादंत्या द्वितीयः खंड ईरितः । तृतीयः पंचविंशार्णः प्रोक्ता मंत्रा इति क्रमात् ॥२२९॥
बाण, गदा, त्रिशूल, अग्नि, वरास्त्र एवम् अभयास्त्र धारण किये हुई हैं। अपने सदृश शक्तियों से परिवेष्टित
रहती हैं, उनका मुखारविन्द मनोहर हास्य से सुशोभित है और नेत्र तीन हैं। इस प्रकार ध्यान करके सकल उप-
चारों से उनकी पूजा करे। तदनन्तर चार द्वार वाले भूगृह का निर्माण कर उसके भीतर अष्टदल कमल तथा
शाखाओं से युक्त चौकोर तथा षट्कोण पीठ की रचना करे। फिर वहाँ शिवा की अर्चना करे ॥२०४-२१८॥
नारद ! यह पन्द्रहवीं नित्या का वर्णन हुआ। अब सोलहवीं देवी का वर्णन सुनो। वायु और प्रणव तत्त्वों से
युक्त चित्रा देवी दो अक्षरों की हैं, जिनकी सिद्धि हो जाने पर धन, धान्य तथा आत्मनिधि का लाभ होता है,
दीर्घस्वर युक्त बीजमंत्र से क्रमशः षडंगन्यास तथा मातृकान्यास करना चाहिए। तत्पश्चात् उदयकालीन सूर्यबिंब
के समान कान्तिवाली, नौ रत्नों के आभूषण तथा मुकुट धारण करनेवाली, चित्र-पट्ट एवम् शुक्ल वस्त्र धारण
करने वाली, चार भुजाओं तथा तीन नेत्रों वाली मन्द मुस्कान से सुशोभित मुखवाली, सबको आनन्द देनेवाली,
सकल कामनाओं को पूर्ण करनेवाली, चारों भुजाओं में पाश, अंकुश, वरास्त्र तथा अभयास्त्र धारण करनेवाली,
और पद्मकर्णिका के समान बनी योनिमुद्रा के मध्य में बैठनेवाली मंगलमयी देवी का ध्यान करके शक्तियों समेत
उनकी अर्चना करे ॥२१९-२२४॥ तदुपारान्त "प्राण दाहो••••••••", "अस्या'•••••" एवम् "नभः••••
•••" इन तीन मंत्रों से षडंगन्यास करके बिखरे हुए केश वाली, नग्ना, रक्तवर्णा, आनंद स्वरूपिणी तथा हाथों
१०३ ना० पु०

८१८ नारदीयपुराणम्
बाला बीजत्रयाद्यैर्द्विस्त्रिर्मन्त्रैः षडंगकम् । विक्कीर्णकुंतलां नग्नां रक्ताभानन्दविग्रहाम् ॥२३०॥
दधानां चिंतयेद्रत्नचापपाशासृणी करैः । तत्समानायुधाकारवर्णा देव्यस्तु बाह्यगाः ॥२३१॥
ऋतुस्नाताः स्फुरद्योन्यः सदानंदारुणेक्षणाः । इत्येषा कुरुकुल्लांते प्रोक्ता चंद्रावली स्वयम् ॥२३२॥
वाराहीमभिधास्यामि ललितायाः परा तनुः । शुचिः स्वेनाथ शून्यं स्यान्नभसाभ्ररसस्थिरा ॥२३३॥
अंबु पश्चाद्वयः साग्निर्मरुताम्बुरयो तथा । इलायुतोऽग्निरेतानि पुनरंबुमरुद्यतम् ॥२३४॥
दाहारम्बुमरुनाहंसस्त्वग्निने तत्वयं पुनः । अम्बुदाहौ मरुद्व्यक्तौ हंसोऽथ धरया नमः ॥२३५॥
तेजोग्निना पुनः पंच वातः स्वेन समायुतः । तोयं चरेण तत्पूर्वं तोयमग्नियुतं ततः ॥२३६॥
शून्यं व्याप्येन शुचिना शून्यं शक्त्या नमो युतम् । दाहो धरा स्वसहितस्तोयं चरसमन्वितम् ॥२३७॥
एतत्पूर्वमधुः प्रोक्तं चतुष्टयमतः परम् । ज्याह्येन युक्ता सचरो रभश्चैतस्य पूर्वकम् ॥२३८॥
रसोऽग्निना पुनः प्रोक्तं चतुष्का अपयं ततः । शुभाभ्रता चरेणापि हंसः स्वेन सपूर्वकम् ॥२३९॥
हंसाऽग्निना प्राक् वितयं हृदयं स्वसमायुतम् । रसश्चरेण तत्पूर्वमग्निना चरसो युतः ॥२४०॥
पश्चादुक्तत्रयं वातो धरया च नभोन्वितम् । प्राणः स्वेन युतः पश्चाद्ध्रदयस्रयुतं रसः ॥२४१॥
व्याप्तमतत्वयं पश्चाद्दाहेनांबु समन्वितम् । गोत्राम्रायुता स्पर्शो नाद्युक्तो जबीयुतः ॥२४२॥
दाहेन पूर्वपूर्वं च पूर्व च मरुता युतम् । शून्यं मरुत्स्वसहितं हृद्दाहेनांबना चरः ॥२४३॥
स्पर्शा मरुत्स्वसहितो हृद्दाहेनाम्बुसंयुतम् । ज्याग्निः स्वसंयतो हंसस्तथाब मरुता सह ॥२४४॥
हृद्रूपेण स्वेन युतं रसश्च स्वेन संयुतः । प्राणदाहौ धरायक्तौ पुनस्तो वह्निना वियत् ॥२४५॥
वाह्निव्यक्तमंब स्याद्विषट्चास्रवसंयुक्तम् । पूर्वद्विरुक्तवर्णौ च शुद्धिः स्वेन युतस्तथा ॥२४६॥
स्थिरा रसा वतस्वेन दावो हंसा धरा स्वयुक् । युतिर्नादवती पश्चाद्दधदंबुमरुता युतम् ॥२४७॥
हंसश्च मरुता विद्यः दशात्तरशताक्षरी । वाराही पश्चमी विश्वविजया भद्रकौमुदी ॥२४८॥
वार्त्तालीति च विख्याता स्तंभनाद्यखिलेष्टदा । अंगानि कुर्यान्मन्त्राणैः सप्तभिःषड्भिरेव च ॥२४९॥
दशभिः सप्तभिः सप्तसंख्यैर्जातिभिरन्विताः । त्रिकोणवृत्तषट्कोणवृत्तद्वयसमन्वितम् ॥२५०॥
विधाय चक्रं तत्रैव स्वनामाल्लिख्य पूजयेत् । ध्यायच्च देवीँ कीलास्यां ततः कांचनसन्निभाम् ॥२५१॥
आकंठं वनितारूपां ज्वलत्पद्मपसरोरुहाम् । त्रिनेत्रामष्टहस्तां च चक्रं शंखमथांकुशम् ॥२५२॥
पाशं च मुशल शोभंममयं वरदं तथा । दधानां गरुडस्कन्धे सुखासीनां विचिंतयेत् ॥२५३॥
में बाण, धनुष, पाश एवम् अंकुश धारण करने वाली देवी और उनके समान आयुध, आकार एवम् वर्णवाली,
ऋतुस्नाता, स्फुरणशील योनिवाली और सदा आनन्द से लाल नेत्रों वालो अन्य देवियों का ध्यान करना
चाहिए। यह साक्षात् चन्द्रावली जैसी कुरुफुल्ला के बारे में कहा, अब ललिता की उत्कृष्ट रूप-वाराही के
विषय में कहूँगा। "शुचि.....विद्या" - यह उनका एक सौ दश अक्षरों का मंत्र है। स्तंभन आदि अखिल
कामनाओं का पूर्ण करनेवालो वाराही देवी पंचमी, विश्वविजया, भद्र कौमुदी तथा वार्ताली नाम से भी विख्यात
हैं। छह या सात मंत्राक्षरों से अंगन्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् त्रिकोणवृत्त और षट्कोणवृत्त सहित चक्र
का निर्माण कर वहाँ अपना नाम लिखकर पूजन करे ॥२२५-२५०॥ अनन्तर कोल के समान मुखवाली, सुवर्ण के
समान आभावाली, कंठ तक वनिता का रूप धारण करनेवाली तीन नेत्रों तथा आठ हाथों वाली, चक्र, शंख, अंकुश,
पाश, मुशल, अभयास्त्र, काल, तथा पोतरुमल धारण करने वाली ओर गरुड़ के कन्धे पर सुख से बैठने वाली

एकोननवतितमोऽध्यायः ६१६
नित्यपूजासु तच्छक्तीस्तत्तत्स मानाःस्मरेन्मुने। प्रयोगेषु [स्मरेद्देवीं सिंहस्थां व्याघ्रगामपि ॥२५४॥
गजारूढां हयारूढां तार्क्ष्यारूढां च शक्तिभिः । श्यामामप्यरुणां पीतामसितांभोजविग्रहाम् ॥२५५॥
तत्तत्प्रयोगेषु तथा ध्यायेत्तत्तदवाप्तये । अरूणां पंचमीं वश्ये पीतां स्तंभनके स्मरेत् ॥२५६॥
श्यामां च दुर्गे मार्गे सितां युद्धेऽरिनष्टये । धूम्रामुच्चाटने ध्यायेत्साधको द्विजसत्तमः ॥२५७॥
एताः षोडश नित्यास्ते संक्षेपात्समुदीरिताः । भजतामिष्टदाः सद्यः सर्वपापक्षयंकराः ॥२५८॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बहुदुपाख्याने तृतीयपादे राधादिमन्त्रनिरूपणं
नामाष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥८८॥
एकोननवतितमोऽध्यायः
सनत्कुमार उवाच
अथा सामावृत्तिस्थानां शक्तीनां समयेन च । नाम्नां सहस्रं वक्ष्यामि गुरुध्यानपुरःसरम् ॥१॥
नाथा नव प्रकाशाद्याः सुभगांताः प्रकीर्तिताः । भूम्यादीनि शिवांतानि विद्धि तत्त्वानि नारद ॥२॥
गुरुजन्मादिपर्वाणि दर्शान्तानि च सप्त वै । एतानि प्राङ्मनोवृत्त्या चिंतयेत्साधकोत्तमः ॥३॥
देवी का ध्यान करे । मुने ! नित्याओं की पूजा में तत्सदृश शक्तियों की भी अर्चना करे । प्रयोगकाल में सिंह, बाघ,
हाथी, अश्व तथा गरुड़ पर शक्तियों के साथ बैठी हुई देवी का ध्यान करना चाहिये । तदनन्तर श्याम, रक्त पीत
तथा श्वेत कमल के समान शरीर वाली देवी का ध्यान करे । पश्चात् वस्तुओं की प्राप्ति के लिये तत्तत् प्रयोगों
में उक्त प्रकार का ध्यान करना चाहिए । द्विजवर ! साधक वशीकरण में रक्तवर्ण वाली, स्तंभन में पीतवर्ण वाली
दुर्गम मार्ग में श्यामवर्ण वाली, युद्ध में शत्रुनाश के लिये शुक्ल वर्ण वाली और उच्चाटन में धूम्रवर्ण वाली देवी
का ध्यान करे । इस तरह मैंने सोलह नित्याओं का, जो भक्तों को सद्यः अभीष्ट फल देने वाली, तथा समस्त
पापों का क्षय करने वाल हैं, संक्षिप्त वर्णन कर दिया ॥२५१-२५८॥
श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीयपाद में राधादिमंत्र निरूपण नामक
अठ्ठासीवां अध्याय समाप्त ॥८८॥
अध्याय ८९
कवच सहित ललिता सहस्रनामस्तोत्र
सनत्कुमार बोले--इसके उपरान्त गुरु का ध्यान करके मैं सामवेद के अनुसार शक्तियों के सहस्र नामों
को यथार्थतः प्रतिपादन करूंगा । नारद ! प्रकाशा से लेकर सुभगा तक नौ देवियां स्वामिनी कहलाती हैं ।
भूमि से लेकर शिवा तक तत्त्वों को समझिये । गुरुजन्म से लेकर दर्श तक सात पर्व हैं । उत्तम साधक पहले

२२० नारदीयपुराणम्
गुरुस्तोत्रं जपेच्चापि तद्गतेनान्तरात्मना । नमस्ते नाथ भगवञ्छिवाय गुरुरूपिणे ॥४॥
विद्यावतारसंसिद्ध्यै स्वीकृतानेकविग्रह । नवाय नवरूपाय परमार्थैकरूपिणे ॥५॥
सर्वाज्ञानतमोभेदभानवे चिद्धनाय ते । स्वतंत्राय दयाक्लृप्तविग्रहाय शिवात्मने ॥६॥
परतन्त्राय भक्तानां भव्यानाम् भव्यरूपिणे । विवेकिनां विवेकाय विमर्शाय विमर्शिनाम् ॥७॥
प्रकाशानां प्रकाशाय ज्ञानिनां ज्ञानरूपिणे । पुरस्तात्पार्श्वयोः पृष्ठे नमः कुर्यादुपर्यधः ॥८॥
सदा मच्चित्तसदने विधेहि भवदासनम् । इति स्तुत्वा गुरुं भक्त्या परां देवीं विचिंतयेत् ॥६॥
गणेशग्रहनक्षत्रयोगिनीराशिरूपिणीम् । देवीं मंत्रमयीं नौमि मातृकापीठरूपिणीम् ॥१०॥
प्रणमामि महादेवीं मातृकाम् परमेश्वरीम् । कालहल्लोललोलोहकलानाशनकारिणीम् ॥११॥
यदक्षरैकमात्रेऽपि संसिद्धे स्पद्धंते नरः । रवितार्क्ष्यदुकन्दर्पः शंकरानलविष्णुभिः ॥१२॥
यदक्षरशशिज्योत्स्नामंडितं भुवनत्रयम् । वन्दे सर्वेश्वरीं देवीं महाश्रीसिद्धमातृकाम् ॥१३॥
यदक्षरमहासूत्रप्रोतमेतज्जगत्त्रयम् । ब्रह्माण्डादिकटाहान्तं तां वन्दे सिद्धमातृकाम् ॥१४॥
यदेकादशमाधारं बीजं कोणत्रयोद्भवम् । ब्रह्माण्डादिकटाहान्तं जगद्व्यापि दृश्यते ॥१५॥
अकचादिटतोन्नद्धषट्पञ्चाक्षरवणिणीम् । ज्येष्ठांगबाहुहृत्कंठकटिपादनिवासिनीम् ॥१६॥
नौमीकाराक्षरोद्धारां सारात्सारां परात्पराम् । प्रणमामि महादेवीं परमानन्दरूपिणीम् ॥१७॥
अद्यापि यस्या जानंति न मनागपि देवताः । केयं कस्मात्क्व केनेति सरूपारूपभावनामू ॥१८॥

इन वस्तुओं का मनोयोग पूर्वक चिन्तन करे। पश्चात् गुरु में चित्त को लगाकर उनके स्तोत्र का इस प्रकार पाठ
करे— "नाथ ! आपको नमस्कार है। भगवन् ! गुरुरूप शिव को नमस्कार है ॥१-४॥ विद्या के अवतारों की
सिद्धि के लिये अनेक शरीर धारण करने वाले आपको नमस्कार है। नव, नवरूप और परमार्थैकरूप आपको
नमस्कार है। संपूर्ण अज्ञानरूपी तम को नष्ट करने वाले ! भानु, चित् एवम् घनरूप आपको नमस्कार है।
भक्तों के परतन्त्र, भव्यों के भव्य रूप, विवेकियां के विवेक रूप, विमर्शियों के विमर्श रूप, प्रकाशकों के प्रकाश
रूप और ज्ञानियों के ज्ञानरूप आपके आगे, पीछे, ऊपर, नीचे तथा दोनों पार्श्व भाग से नमस्कार करता हूँ। आप
सदा मेरे मानस मन्दिर में आसन जमाइये।" इस प्रकार भक्तिपूर्वक गुरु की स्तुति कर परा देवी का ध्यान
करे— "गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी, राशि तथा मातृका पीठ रूपिणी एवम् मंत्रमयी देवी को नमस्कार करता
हूँ। परमेश्वरी, मातृका तथा समयापहारी लोह-कला का नाश न करने वाली महादेवी को नमस्कार
करता हूँ। जिन देवी के मंत्र के एक अक्षर भी सिद्ध हो जाने पर मनुष्य सूर्य, चन्द्रमा, कन्दर्प, शंकर, अग्नि
तथा विष्णु से प्रतिस्पर्धा करता है तथा जिनके अक्षर से तीनों लोक व्याप्त हैं, उन महाश्री, सिद्धि तथा
मातृका रूप सर्वेश्वरी देवी की वंदना करता हूँ ॥५-१३॥ जिनके अक्षर रूप महासूत्र में ब्रह्मांड से
लेकर कटाह पर्यन्त तीनों जगत् ओत-प्रोत हैं, उन सिद्धमातृका को प्रणाम करता हूँ। ब्रह्माण्डादि कटाह
पर्यन्त जगत् जिनके त्रिकोणोत्पन्न एकादश आधार बीज में समाविष्ट होते हुए आज भी दीखता है, उन देवी
की मैं वंदना करता हूँ। अ, क, च, ट, प, य तथा श अक्षरों में और शिर, बाहु, हृदय, कंठ तथा चरणों
में निवास करनेवाली देवी को नमस्कार करता हूँ। ईकार अक्षर का उद्धार करनेवाली, सार से भी सार,
श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ, परमानन्द रूपिणी महादेवी को प्रणाम करता हूँ। देवगण जिनके विषय में कुछ भी नहीं
जानते हैं अर्थात् वे कौन हैं ? किससे हुईं ? कहाँ हुईं ? क्यों हुईं ? इस मूर्तामूर्त भावना को बिलकुल नहीं जानते

एकोननवतितमोऽध्यायः ८२१
वन्दे तामहमक्षय्यां क्षकाराक्षररूपिणीम् । देवीं कुलकलोल्लोलप्रोल्लसन्तीं शिवां पराम् ॥१९॥
वर्गानुक्रमयोगेन यस्याख्योमाष्टकं स्थितम् । वन्दे तामष्टवर्गोत्थमहासिद्धादिकेश्वरीम् ॥२०॥
कामपूर्णजकाराख्य सुपीठान्तन्निवासिनीम् । चतुराज्ञाकोशभूतां नौमि श्रीत्रिपुरामहम् ॥२१॥
एतत्स्तोत्रं तु नित्यानां यः पठेत्सुसमाहितः । पूजादौ तस्य सर्वास्ता वरदाः स्युर्न संशयः ॥२२॥
अथ ते कवचं देव्या वक्ष्ये नवरतात्मकम् । येन देवासुरनरजयी स्यात्साधकः सदा ॥२३॥
सर्वतः सर्वदात्मानं ललिता पातु सर्वगा । कामेशी पुरतः पातु भगमाली त्वनन्तरम् ॥२४॥
दिशं पातु तथा दक्षपार्श्वं मे पातु सर्वदा । नित्यक्लिन्नाथ भेरुण्डा दिशंमे पातु कौणपीम् ॥२५॥
तथैव पश्चिमं भागं रक्षताद्वह्निवासिनो । महावज्रेश्वरी नित्या वायव्ये मां सदावतु ॥२६॥
वामपार्श्वं सदा पातु इतोभेलांरता ततः । माहेश्वरी दिशं पातु त्वरितं सिद्धिदायिनी ॥२७॥
पातु मामूर्ध्वतः शश्वद्देवताकुलसुंदरी । अधोनीलपताकाख्या विजया सर्वतश्च माम् ॥२८॥
करोतु मे मंगलांनि सर्वदा सर्वमंगला । देहेंद्रियमनःप्राणाञ्ज्वालामालिनिविग्रहा ॥२९॥
पालयत्वनिशं वित्ता चित्तं मे सर्वदावतु । कामात्क्रोधात्तथा लोभान्मोहान्मानान्मदादपि ॥३०॥
पापान्मां सर्वतः शोकात्संशयात्सर्वतः सदा । असत्यात्क्रूरचिंतातो हिंसातश्चौरतस्तथा ॥३१॥
स्तैमित्याच्च सदा पांतु प्रेरयत्यः शुभं प्रति
नित्याः षोडश मां पांतु गजारूढाः स्वशक्तिभिः । तथा हयसमारूढाः पांतु मां सर्वतः सदा ॥३२॥
सिंहारूढास्तथा पांतु पांतु ऋक्षगता अपि । रथारूढाश्च मां पांतु सर्वतः सर्वदा रणे ॥३३॥
उन क्षकाराक्षर रूप वाली, कभी नष्ट न होने वाली, वाम-मार्ग के नाद से चंचल तथा शोभित होने वाली श्रेष्ठ
शिवा देवी को प्रणाम करता हूँ। वर्गों के अनुक्रम-योग से जिनके नाम पर उमाष्टक बना है, उन अष्ट वर्ग से
उद्भूत महासिद्धि आदि की स्वामिनी की मैं वन्दना करता हूँ। ॥१४-२०॥ कामपूर्ण जकार संज्ञक सुन्दर पीठ
के भीतर निवास करने वाली और चार आज्ञाकोशों से युक्त श्री त्रिपुरा को नमस्कार करता हूँ। पूजा के
आरम्भ में जो व्यक्ति अत्यन्त सावधानी से नित्याओं के इस स्तोत्र का पाठ करेगा, उसे सकल देवियों का वरदान
मिलेगा, इसमें संशय नहीं ॥२१-२२॥
इसके उपरान्त देवी के नवरतात्मक कवच को बता रहा हूँ। जिसके पाठ से साधक देवताओं, असुरों,
तथा मनुजों पर सदा विजय प्राप्त करता है। कवच-- "सर्वत्र गमन करने वाली ललितादेवी सदा सब ओर से
मेरी रक्षा करें। कामेशी अग्रभाग से और भगमाली पृष्ठ भाग से रक्षा करे। नित्यक्लिन्ना मेरे दक्षिण
पाश्र्वं तथा पूर्व दिशा की रक्षा करें। भेरुंडा उत्तर दिशा ओर वह्निवासिनी पश्चिम दिशा की रक्षा करें।
महावज्रेश्वरी दक्षिण दिशा की रक्षा करें। ललितादेवी सदा मेरे वामपार्श्व की रक्षा करें। सिद्धिदायिनी
माहेश्वरी समस्त दिशाओं में मेरी रक्षा करें। कुलसुन्दरी सदा ऊपर से और नीलपताका नीचे
से रक्षा करें। विजयादेवी सब ओर से मेरी रक्षा करें। सर्व मंगला सदा मेरा कल्याण करें। ज्वाला-
मालिनी देह, इंद्रिय, मन तथा प्राणों की रक्षा करें ॥२३-२९॥ वित्ता सदा मेरे चित्त की रक्षा करें। अपनी
शक्तियों समेत गजों पर आरूढ सोलह नित्यादेवियाँ रक्षा करें। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मान, मद, पाप,
शोक, क्षय, असत्य, क्रूर चिंता, हिंसा, स्तेय, तथा जड़ता से मुझे बचायें और शुभ कर्मों की प्रेरणा दें।
अश्वों पर आरूढ देवियाँ, सदा सब ओर से मेरी रक्षा करें। सिह्मरूढ, ऋक्षारूढ, तथा रथारूढ देवियाँ सदा

६२२ नारदीयपुराणम्
तार्क्ष्यारूढाश्च मां पांतु तथा व्योमगताश्च ताः । भूतगाः सर्वगाः पान्तु पान्तु देव्यश्च सर्वदा ॥३४॥
भूतप्रेतापिशाचाश्च परकृत्यादिकान् गदान् । द्रावयंतु स्वशक्तीनां भूषणैरायुधैर्मम ॥३५॥
गजाश्वद्वीपिपंचास्यतार्क्ष्यारूढाखिलायुधाः । असंख्‍याः शक्तयो देव्यः पान्तु मां सर्वतः सदा ॥३६॥
सायं प्रातर्जपन्नित्याकवचं सर्वरक्षकम् । कदाचिन्नाशुभं पश्येत्सर्वदानंदमास्थितः ॥३७॥
इत्येतत्कवचं प्रोक्तं ललितायाः शुभावहम् । यस्य संधारणात्मर्त्यो निर्भयो विजयो सुखी ॥३८॥
अथ नाम्नां सहस्रं ते वक्ष्ये सावरणार्चनम् । षोडशानामपि मुने स्वस्वक्रमगतात्मकम् ॥३६॥
ललिता चापि वा कामेश्वरी च भगमालिनी । नित्यक्लिन्ना च भेरुंडा कीर्तिता वह्निवासिनी ॥४०॥
वज्रेश्वरी तथा दूती त्वरिता कुलसुंदरी । नित्या संवित्त्था नीलपताका विजयाह्वया ॥४१॥
सर्वमंगळिका चापि ज्वालामालिनिसंज्ञिता । चित्रा चेति क्रमान्नित्याः षोडशापीष्टविग्रहाः ॥४२॥
कुरुकुल्ला च वाराही द्वे एते चेष्टविग्रहे । वशिनी चापि कामेशी मोहिनी विमलारुणा ॥४३॥
तपिनी च तथा सर्वेश्वरी चाध्यक्ष कौलिनी । मुद्राणंतनुरिष्वर्णरूपा चापार्णविग्रहा ॥४४॥
पाशवर्णशरीरा चाकुर्वर्णमुखपुंदरा । त्रिखंडा स्थापनी सन्निरोधनी चावगुंठनी ॥४५॥
सन्निधानेषु चापाख्या तथा पाशांकुशाभिधा । नमस्कृतिस्तथा संक्षोभणी विद्रावणी तथा ॥४६॥
आकर्षणी च विख्याता तथै वावेशकारिणी । उन्मादिनी महापूर्वा कुशाथो खेचरी मता ॥४७॥
बीजा शक्त्युत्थापना च स्थूलसूक्ष्मपरामिधा । अणिमा लघिमा चैव महिमा गरिमा तथा ॥४८॥
प्राप्तिः प्रकाम्यता चापि चेशिता वशिता तथा । भुक्तिः सिद्धिस्तथैवेच्छा सिद्धिरूपा च कीर्तिता ॥४९॥
ब्राह्मी माहेश्वरी चैव कौमारी वैष्णवी तथा । वाराहींद्राणी चामुंडा महालक्ष्मीस्वरूपिणी ॥५०॥
मेरी रक्षा करें। गरुड़ पर आसीन देवियां सदा मेरो रक्षा करें। आकाशगामिनी, भूतगामिनी तथा सर्वगामिनी
देवियां सर्वदा मेरी रक्षा करें। तथा अपनी शक्तियों के आयुधों से भूत, प्रेत, पिशाच, कृत्या आदिकों का संहार
करें। गज, अश्व, व्याघ्र, सिंह तथा गरुड़ पर आरूढ एवम् अखिल आयुधों से युक्त असंख्य शक्ति देवियां सदा
सब ओर से मेरी रक्षा करें ॥३०-३६॥ जो मानव प्रातःकाल तथा सायंकाल इस सर्वरक्षक नित्याकवच का
पाठ करता है, वह सर्वदा आनंद को प्राप्त करता है, अशुभ को तो कभी देखता ही नहीं। यह ललिता का मुख-
दायक कवच मैंने तुम्हें सुना दिया। जो मनुष्य इसको धारण करेगा, वह निर्भय, विजयी तथा सुखी होगा
॥३७-३८॥
मुने ! अब इसके बाद सोलह नित्याओं के सहस्र नामों को क्रमशः अर्चनविधि पूर्वक बताऊंगा-
'ललिता, कामेश्वरी, भगमालिनी, नित्यक्लिन्ना, भेरुंडा, वह्निवासिनी, वज्रेश्वरी, दूती, त्वरिता, कुलसुन्दरी,
संवित्, नीलपताका, विजया, सर्वमंगळिका, ज्वालामालिनी तथा चित्रा-ये सोलहों नित्यायै इष्टांवग्रहा कहलाती
हैं। कुरुकुल्ला तथा वाराही ये दोनों भी इष्टविग्रहा हैं। वशिनी, कामेशी, मोहिनी, विमला, अरुणा, तपिनी,
सर्वेश्वरी, कौलिनी, मुद्रातनु, इषूवर्णरूपां, चापवर्णविग्रहा, पाशवर्णशरीरा, चातुवर्णं देहा (?), त्रिखंडा,
स्थापनी, सन्निरोधनी, अवगुण्ठनी, समीपेष्वापा, पाशांकुशा, मनस्कृति, संक्षोभणी, विद्रावणी, आकर्षणी, आवेश-
कारिणी, उन्मादिनी, महापूर्वा, कुशा, खेचरी, बीजा, शक्त्युत्थापना, स्थूलसूक्ष्मपरा, अणिमा, लघिमा, महिमा,
गरिमा, प्राप्ति, प्रकाम्यता, ईशिता, वशिता, भुक्ति, सिद्धि, इच्छासिद्धि, ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी,
वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा, महालक्ष्मीस्वरूपिणी, कामा, बुद्धि, अहंकार-शब्द-स्पर्श-स्वरूपिणी, रूपरूपा, रसा,

एकोननवतितमोऽध्यायः ८२३
कामा बुद्धिरहंकारशब्दस्पर्शस्वरूपिणी । रूपरूपा रसाह्ला च गंधवित्तधृतिस्तथा ॥५१॥
नाभीबीजामृताख्या च स्मृतिदेहात्मरूपिणी । कुसुमा मेखला चापि मदना मदनातुरा ॥५२॥
रेखा संवेगिनी चैव ह्यङ्कुशा मालिनीति च । संशोभिणी तथा विद्राविण्याकर्षणरूपिणी ॥५३॥
आह्लादिनीति च प्रोक्ता तथा संमोहिनीति च । स्तंभिनी जंभिनी चैव वशंकर्यथ रंजिनी ॥५४॥
उन्मादिनी तथैवार्थसाधिनीति प्रकीर्तिता । संपत्तिपूर्णा सा मंत्रमयी द्वंद्वक्षयंकरी ॥५५॥
सिद्धिः संपत्प्रदा चैव प्रियमंगलकारिणी । कामप्रदा निगदिता तथा दुःखविमोचिनी ॥५६॥
मृत्युप्रशमनी चैव तथा विघ्ननिवारिणी । अंगसुंदरिका चैव तथा सौभाग्यदायिनी ॥५७॥
ज्ञानेश्वर्यप्रदा ज्ञानमयी चैव च पंचमी । विंध्यवासनका घोरस्वरूपा पापहारीणी ॥५८॥
तथानंदमयी रक्षा रूपेप्सितफलप्रदा । जयिनी विमला चाथ कामेशी वज्रिणी भगा ॥५९॥
त्रैलोक्यमोहना स्थाना सर्वाशापरिपूरणी । सर्वसंक्षोभणगता सौभाग्यप्रदसंस्थिता ॥६०॥
सर्वार्थसाधकागारा सर्वरोगहरास्थिता । सर्वरक्षाकरास्थाना सर्वसिद्धिप्रदस्थिता ॥६१॥
सर्वानंदमयाधारबिंदुस्थानशिवात्मिका । प्रकृष्टा च तथा गुप्ता ज्ञेया गुप्ततरापि च ॥६२॥
संप्रदायस्वरूपा च कुलकौलनिनिर्गभा । रहस्यापरावरप्राकृत्यैवातिरहस्यका ॥६३॥
त्रिपुरा त्रिपुरेशी च तथैव पुरवासिनी । श्रीमालिनी च सिद्धान्ता महात्रिपुरसुंदरी ॥६४॥
नवरत्नमयद्वीपपवखंडविराजिता । कल्पकोद्यानसंस्था च ऋतुरूषेंद्रियार्चका ॥६५॥
कालमुद्रा मातृकाख्या रत्नदेशोपदेशिका । तत्त्वाग्रहाभिधा मूर्तिस्तथैव विषयद्विपा ॥६६॥
देशकालाकारशब्दरूपा संगीतयोगिनी । समस्तगुप्तप्रकटसिद्धयोगिनिचक्रयुक् ॥६७॥
वह्निसूर्येन्दुभूताह्ला तथात्माष्टाक्षराह्वया । पंचधाचार्यस्वरूपा च नानाव्रतसमाह्वया ॥६८॥
निषिद्धाचाररहिता सिद्धचिह्नस्वरूपिणी । चतुर्द्धा कूर्मभागस्था नित्यार्चास्वरूपिणी ॥६९॥
गंधवित्तधृति, नाभीबीजा, अमृता, स्मृतिदेहा, आत्मरूपिणी, कुसुमा, मेखला, मदना, मदनातुरा, रेखा, संवे-
गिनी, अंकुशा, मालिनी, संक्षोभिणी, विद्राविणी ।।४९ ५३।। आकर्षणरूपिणी, आह्लादिनी, संमोहिनी, स्तंभिनी,
जंभिनी, वशंकरी, रंजिनी, ।।५४।। उन्मादिनी, अर्थसाधिनी, संपत्तिपूर्णा, मंत्रमयी, द्वन्द्वक्षयकरी ।।५५।। सिद्धि,
संपत्प्रदा, प्रियमंगलकारिणी, कामप्रदा, निगदिता, दुःखविमोचिनी, ।।५६।। मृत्युप्रशमनी, विघ्ननिवारिणी,
अंगसुन्दरिका, सौभाग्यदायिनी, ।।५७।। ज्ञानेश्वर्यप्रदा, ज्ञानमयी, पंचमी, विंध्यवासनका, घोरस्वरूपा, पाप-
हारिणी, ।।५८।। आनन्दमयी, रक्षारूपा, ईप्सितफलप्रदा, जयिनी, विमला, कामेशी, वज्रिणी, भगा, ।।५९।।
त्रैलोक्यमोहनी, स्थाना, निखिल-आशा-परिपूरिणी, सबको संक्षुब्ध करने वाली, सौभाग्य-प्रद-संस्थिता ।।६०।।
समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाली, अखिल रोगों का नाश करने वाली, सब की रक्षा करने वाली, सकल
सिद्धियों को देने वाली, सर्वानन्दमया, मूलाधार और बिन्दु की स्थान, शिवालिका, प्रकृष्टा, गुप्ता, ज्ञेया,
गुप्ततरा, संप्रदायस्वरूपा, कौलकुलगर्भगामिनी, रहस्यरूपा, परात्परा, अतिरहस्यका, ।।६१-६३।। त्रिपुरा,
त्रिपुरेशी, पुरवासिनी, श्रीमालिनी, सिद्धान्ता, महात्रिपुरसुन्दरी, नवरत्नमय, द्वीपों तथा नवखण्डों में रहनेवाली,
कल्पसूपी उद्यान में रहनेवाली, ऋतुरूप इन्द्रियों से पूजित होने वाली, काल-मुद्रारूपिणी, मातृकारूपिणी, रत्न-
देशोपदेशिका, तत्त्वा, ग्रहसंज्ञका, मूर्ति, विषयद्विपा, देश-काल-आकार-शब्द-रूपा, संगीतयोगिनी, समस्त गुप्त
एवम् प्रकट सिद्धचक्र तथा योगिनी चक्र की अधिष्ठात्री, वह्नि, सूर्य चन्द्र तथा महाभूत कहलाने वाली,

८२४ नारदीयपुराणम्
।॥७०॥
दमनादित्रयभ्यर्चा षट्कर्मसिद्धिदायिनी । तिथिवारपृथग्द्रव्यसमर्चनशुभावहा ॥७१॥
वायोश्वानंगकुसुमा तथैवानंगमेखला । अनंगमदनानंगमदनातुरासाह्वया ॥७२॥
मददेविर्निका चैव तथा भुवनपालिनी । शशिलेखा समुद्दिष्टा गतिलेखाह्वया मता ॥७३॥
श्रद्धा प्रीती रतिश्चैव धृतिः कांतिर्मनोरमा । मनोहरा समाख्याता तथैव हि मनोरथा ॥७४॥
मदनोन्मादिनी चैव मोदिनी शंखिनी तथा । शोषिणी चैव शंकरी सिजिनी सुभगा तथा ॥७५॥
पुषाचैद्वासुमनसा रतिः प्रीतिधृतिस्तथा । ऋद्धिः सौम्या मरीचिश्व तथैव ह्यंशुमालिनी ॥७६॥
शशिनी चांगिरा छाया तथा संपूर्णमंडला । तुष्टिस्तथामृताख्या च डाकिनी साथ लोकपा ॥७७॥
बटुकेभास्वरूपा च दुर्गा क्षेत्रेशरूपिणी । कामराजस्वरूपा च तथा मन्मथरूपिणी ॥७७॥
कंदर्परूपिणी चैव तथा मकरकेतना । मनोभावस्वरूपा च भारती वर्णरूपिणी ॥७८॥
मदना मोहिनी लोला जंभिनी चोद्यमा शुभा । ह्लादिनी द्राविणी प्रोती रती रक्ता मनोरमा ॥७६॥
सर्वोन्मादा सर्वमुखा ह्यभंगा चामितोद्यमा । अनल्पाव्यक्तविभवा विविधाक्षोभविग्रहा ॥८०॥
रागशक्तिद्वेषशक्तिस्तथा शब्दादिरूपिणी । नित्या निरंजना विलिन्ना क्लेदिनी मदनातुरा ॥८१॥
मदद्रवा द्राविणी च द्रविणी चेति कीर्तिता । मदा विला मंगला च मन्मथानी मनस्विनी ॥८२॥
मोहा मोदा मानमयी माया मंदा मितावती । विजया विमला चैव शुभा विश्वा तथैव च ॥८३॥
विभूतिर्बिनता चैव विविधा विनता क्रमात् । कमला कामिनी चैव किराता कीर्तिरूपिणी ॥८४॥
कुट्टिनी च समुद्दिष्टा तथैव कुलसुंदरी । कल्याणी कालकोला च डाकिनी शाकिनी तथा ॥८५॥
लाकिनी काकिनी चैव राकिनी काकिनी तथा । इच्छाज्ञाना क्रियाख्या चाप्यायुधाष्टकधारिणी ॥८६॥
कपर्दिनी समुद्दिष्टा तथैव कुलसुंदरी । ज्वालिनी विस्फुलिंगा च मंगला सुमनोहरा ॥८७॥
आत्मरूपिणी, अष्टाक्षर कहलानेवाली, पंचपूजनस्वरूपा, अनेक व्रतों वाली, निषिद्ध आचरण से रहिता,
सिद्धचिह्नस्वरूपा, चार प्रकार से कर्म-भोगों में अवस्थिता नित्य आदि की पूजा स्वरूपा, दमना आदि को अर्चा-
रूपा, छह कर्मों को सिद्धि प्रदान करनेवाली, तिथि, दिन, द्रव्य, पूजन तथा मंगलरूपा, वायोश्वो, अनंगकुसुमा,
अनंगमेखला, अनंगमदना, अनंगमदनातुरा, मददेविर्निका, भुवनपालिनी, शशिलेखा, गतिलेखा, श्रद्धाप्रीति,
रति, धृति, कांति, मनोरमा, मनोहरा, मनोरथा ॥६३-७३॥
मदनोन्मादिनी, मोदिनी, शंखिनी, शोषिणी, शंकरी, सिजिनी, सुभगा, पूषा, वासुमनसा, रति, प्रीति, धृति,
ऋद्धि, सौम्या, मरीचि, अंशुमालिनी, शशिनो, आंगरा, छाया, संपूर्णमंडला, तुष्टि, अमृता, डाकिनी, लोकपा,
बटुका, भास्वरूपा, दुर्गा, क्षेत्रेशरूपिणी, कामराजस्वरूपा, मन्मथरूपिणी, कंदर्परूपिणी, मकरकेतना, मनो-
भवस्वरूपा, भारती, वर्णरूपिणी ॥७४-७८॥ मदना, मोहिनी, लोला, जंभिनी, उद्यमा, शुभा, ह्लादिनी,
द्राविणी, प्रीति, रति, रक्ता, मनोरमा, सर्वोन्मादा, सर्वमुखा, अभंगा, अमितोद्यमा, अनल्पा, तथा अव्यक्त विभव
वाली, विविधा, क्षोभविग्रहा, रागशक्ति, द्वेषशक्ति, शब्दादिरूपिणी, नित्या निरंजना, क्लिन्ना, क्लेदिनी, मदना-
तुरा, मदद्रवा, द्राविणी, द्रविणी, मदाविला, मंगला, मन्मथानी, मनस्विनी, मोहा, मोदा, मानमयी, माया, मंदा,
मितावती, विजया, विमला, शुभा, विश्वा, विभूति, विनता, कमला, कामिनी, किराता, कीर्तिरूपिणी, कुट्टिनी,
कुलसुन्दरी, कल्याणी, कालकोला, डाकिनी, शाकिनी, लाकिनी, काकिनी, राकिनी, इच्छा, ज्ञान एवंम् क्रिया-
रूपा, अष्टायुधधारिणी, कपर्दिनी, ज्वालिनी, विस्फुलिंगा, मंगला, सुमनोहरा, कनका, विनवा, विद्या, मेधा,

एकोननवतितमोऽध्यायः ८२५
कनका क्लिन्नना विद्या विविधा च प्रकीर्तिता । मेषा वृषाह्वया चैव मिथुना कर्कटा तथा ॥८८॥
सिंहा कन्या तुला कीटा चापा च मकरा तथा । कुम्भा मीना च सारा च सर्वभक्षा तथैव च ॥८९॥
विश्वात्मा विविधोद्भूतचित्ररूपा च कीर्तिता । निःसपत्ना निरांतंका याचनाचित्यवैभवा ॥९०॥
रक्ता चैव ततः प्रोक्ता विद्याप्राप्तिस्वरूपिणी । हृल्लेखा क्लेदिनी क्लिन्ना क्षोभिणो मदनातुरा ॥९१॥
निरंजना रागवती तथैव मदनावती । मेखला द्राविणी वेगवती चैव प्रकीर्तिता ॥९२॥
कमला कामिनी कल्पा कला च कलिताद्भुता । किराता च तथा काला कदना कौशिका तथा ॥९३॥
कंबुवादनिका चैव कातरा कपटा तथा । कीर्तिश्चापि कुमारी च कुंकुमा परिकीर्तिता ॥९४॥
भञ्जिनी वेगिनी नागा चपला पेशला सती । रतिः श्रद्धा भोगलोला मदोन्मत्ता मनस्विनी ॥९५॥
विह्वला कर्षिणी लोला तथा मदनमालिनी । विनोदा कौतुका पुण्या पुराणा परिकीर्तिता ॥९६॥
वागीशी वरदा विश्वा विभवा विघ्नकारिणी । बोजविघ्नहरा विद्या सुमुखी सुंदरी तथा ॥९७॥
सारा च सुमना चैव तथा प्रोक्ता सरस्वती । समया सर्वगा विद्या शिवा वाणी च कीर्तिता ॥९८॥
दूरसिद्धा तथा प्रोक्तार्थो विग्रहवती मता । नादा मनोन्मनी प्राणप्रतिष्ठारुणवैभवा ॥९९॥
प्राणापाना समाना च व्यानोदाना च कीर्तिता । नागा कूर्मा च कृकला देवदत्ता धनञ्जया ॥१००॥
फट्‍कारी किंकराराध्या जया च विजया तथा । हुंकारी खेचरी चंडा छेदिनी क्षपिणी तथा ॥१०१॥
स्त्रीहुंकारी क्षेमकारी चतुरक्षररूपिणी । श्रीविद्यामत्तवर्णांगी काली याम्या नृपर्णका ॥१०२॥
भाषा सरस्वती वाणी संस्कृता प्राकृता परा । बहुरूपा चित्तरूपा रम्यानंदा च कौतुका ॥१०३॥
त्रयाख्या परमात्मारूयाप्यमेयविभवा तथा । वाक्स्वरूपा बिंदुसर्गरूपा विश्वात्मिका तथा ॥१०४॥
वृषा, मिथुना, कर्कटा, सिंहा, कन्या, तुला, कीटा, चापा, मकरा, कुम्भा, मीना, सारा, सर्वभक्षा, विश्वात्मा,
विविधोद्भूतचित्ररूपा, निःसपत्ना, निरांतका, याचना, अर्चित्यवैभवा ॥७६-९०॥
रक्ता, विद्याप्राप्तिस्वरूपिणी, हृल्लेखा, क्लेदिनी, क्लिन्ना, क्षोभिणी, निरंजना, रागवती, मदनावती,
मेखला, वेगवती, कमला, कामिनी, कल्पा, कला, कलिता, अद्भुता, किराता, काला, कदना, कोशिका, कंबुवादनिका;
कातरा, कपटा, कीर्ति, कुमारी, कुंकुमा, भञ्जिनी, वेगिनी, नागा, चपला, पेशला, सती, रति, श्रद्धा, भोग-
लोला, मदोन्मत्ता, विह्वला, कषिणी, लील।, मदनमालिनी, विनोदा, कौतुका, पुण्या, पुराणा, वागीशी, वरदा,
विश्वा, विभवा, विघ्नकारिणी, बीजविघ्नहरा, विद्या, सुमुखी, सुन्दरी, सारा, सुमना, सरस्वती, समया, सर्वगा,
विद्या, शिवा, वाणी, दूरसिद्धा, विग्रहवती, नादा, मनोन्मनी, प्राणप्रतिष्ठा, अरुणवैभवा; प्राणा, अपाना, समाना,
व्याना, उदाना, नागा, कूर्मा, कृकला, देवदत्ता, धनञ्जया ॥९१-१००॥
फट्‍कारी, किंकराराध्या, जया, विजया, हुंकारी, खेचरी, चंडा, छेदिनी, क्षपिणी, स्त्रीहुंकारी, क्षेम-
कारी चतुरक्षररूपिणी, श्रीविद्या, श्रेष्ठवर्णांगी, काली, याम्या, नृपर्णका, भाषा, सरस्वती, वाणी, संस्कृता, प्राकृता,
परा, बहुरूपा, चित्तरूपा, रम्या, आनन्दा, कौतुका, त्रयाख्या, परमात्मारूपा, अमेयविभवा, वाक्स्वरूपा, बिंदु
सर्गरूपा, विश्वात्मिका, त्रैपुरकंदा, ज्ञात्रादित्रिविधात्मिका, आयु, लक्ष्मी, कीर्ति, भोग, सौंदर्य तथा आरोग्य
देने वाली, ऐहिक तथा पारलौकिक ज्ञानमयो, जीवा, विजया, विश्वविन्मयी ॥१०१-१०६॥ हृदादिविद्या,
१०४-ना० पु०