बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
इस ग्रन्थ के बारे में
बृहन्नारदीय पुराण, जिसे नारदपुराण भी कहा जाता है, परम्परा में महर्षि व्यास से जोड़ा जाता है। इसका पूर्वभाग सनक आदि कुमारों द्वारा नारद को दिए गए उपदेशों के रूप में है, जिनमें धर्म, भक्ति, व्रत, तीर्थ, मन्त्र-साधना और वेदाङ्गों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द) का विस्तृत वर्णन आता है। इसकी एक विशेषता अठारह पुराणों की विषय-सूची है, जिसमें प्रत्येक पुराण की श्लोक-संख्या और विषय बताए गए हैं; स्कैन में 'पञ्चविंशतिसाहस्रं...' और 'प्रभासस्य च माहात्म्यं...' जैसे श्लोक इसी अंश के हैं।
यह संस्करण हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग की पुराण-प्रकाशन योजना के अन्तर्गत छपा 'बृहन्नारदीयपुराणम् (पूर्वभागः)' है, जिसमें संस्कृत मूल के साथ व्याकरण-वेदान्ताचार्य तारिणीश झा का हिन्दी अनुवाद है। प्रथम संस्करण शक 1910, अर्थात् 1989 ई. में प्रकाशित हुआ; प्रकाशक सम्मेलन के प्रधान मन्त्री डॉ. प्रभात मिश्र शास्त्री थे।
प्रकाशकीय वक्तव्य इस पुराण के ही एक श्लोक से आरम्भ होता है, जिसमें कहा गया है कि जैसे नदियों में गंगा और सरोवरों में पुष्कर श्रेष्ठ है, वैसे ही पुराणों में नारदीय। पुस्तक 1008 पृष्ठों की है।
५१८ नारदीयपुराणम्
जनक उवाच
यत्कार्यं ब्राह्मणेनेह जन्मप्रभृति तच्छृणु । कृतोपनयनस्तात भवेद्वेदपरायणः ॥११॥
तपसा गुरुवृत्त्या च ब्रह्मचर्येण चान्वितः । देवतानां पितॄणां च ह्यतृष्णश्चानसूयकः ॥१२॥
वेदानधीत्य नियतो दक्षिणामपवर्त्य च । अभ्यनुज्ञामनुप्राप्य समावर्तेत वै द्विजः ॥१३॥
समावृत्तस्तु गार्हस्थ्ये सदारो नियतो वसेत् । अनसूयुर्यथान्यायमाहिताग्निरनादृते ॥१४॥
उत्पाद्य पुत्रपौत्रांश्च वन्याश्रमपदे वसेत् । तानेवाग्नीन्यथान्यायं पूजयन्नतिथिप्रियः ॥१५॥
सर्वानग्नीन्यथान्यायमात्मन्यारोप्य धर्मवित् । निर्द्वन्द्वो वीतरागात्मा ब्रह्मा श्रमपदे वसेत् ॥१६॥
शुक उवाच
उत्पन्ने ज्ञानविज्ञाने प्रत्यक्षे हृदि शाश्वते । न विना गुरुसंवासाज्ज्ञानस्याधिगमः स्मृतः ॥१७॥
किमवश्यं तु वस्तव्यमाश्रमेषु न वा नृप । एतद्भवंतं पृच्छामि तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥१८॥
जनक उवाच
न विना ज्ञानविज्ञाने मोक्षस्याधिगमो भवेत् विना गुरुसंबांधाज्ज्ञानस्याधिगमस्तथा ॥१९॥
आचार्यः प्लाविता तस्य ज्ञानं प्लव इहोच्यते । विज्ञाय कृतकृत्यस्तु तोर्णस्तत्रोभयं त्यजेत् ॥२०॥
अनुच्छेदाय लोकानामनुच्छेदाय कर्मणाम् । कृत्वा शुभाशुभं कर्म मोक्षो नामेह लभ्यते ॥२१॥
जनक बोले- जन्म से ब्राह्मणों को जो कुछ करना चाहिए उसको सुनो । तात ! जब ब्राह्मणपुत्र का उपनयन-
संस्कार हो जाय उसी दिन से वेदाध्ययन प्रारम्भ कर दे ॥११॥ अध्ययन के समय वह ब्रह्मचर्य का पालन करे
और तपस्या तथा गुरु सेवा में लगा रहे । तृष्णा से विमुख हो, देवता और पितरों की कभी निन्दा न करे ॥१२॥
जब नियमित रूप से वेदों का अध्ययन कर ले तब गुरु को गुरुदक्षिणा देकर उनसे आज्ञा लेकर समावर्तन संस्कार
करे ॥१३॥ समावर्तन संस्कार के बाद नियम पूर्वक विवाह करके स्त्री सहित गृहस्थाश्रम का पालन करे । इस
आश्रम में रहकर वह किसी की निन्दा न करे और विधिपूर्वक अग्नि की स्थापना करके प्रतिदिन आदरपूर्वक
अग्नि होम करे । पुत्र और पौत्रों को उत्पन्न करने के अनन्तर अरण्य-आश्रम (वानप्रस्थ) को अपनाये । उस आश्रम
में वह भी प्रेमपूर्वक अतिथियों की पूजा करे ॥१४-१५॥ और यथाशास्त्र अग्न्याधान करे अथवा धर्मज्ञ वह
वानप्रस्थाश्रमी आत्मा में ही शास्त्रानुसार अग्नि लीन करके द्वन्द्वातीतः और वीतराग होकर ब्रह्मा श्रम में प्रवेश
करे ॥१६॥
शुक बोले--राजन् ! बिना गुरु के ज्ञान का होना नहीं कहा गया है । तो यदि किसी को बिना गुरु
के ही हृदय में नित्य ज्ञानविज्ञान की प्रत्यक्षानुभूति हो जाय तो भी उसके लिए क्या शेष तीन आश्रमों में रहना
आवश्यक है ? इस शंका को पूछ रहा हूँ, इसका समाधान आप कर दें ॥१७-१८॥
जनक ने कहा--बिना ज्ञान-विज्ञान के मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती और गुरु के बिना ज्ञान-प्राप्ति भी
दुर्लभ ही है ॥१९॥ आचार्य ही इस संसार-सागर से पार लगाने वाला है और ज्ञान ही नौका है । ज्ञान की प्राप्ति
हो जाने पर मनुष्य कृतकृत्य एवं पवित्र हो जाता है तब वह शुभ-अशुभ दोनों प्रकार के कर्मों का त्याग कर दे ॥२०॥
लोक और कर्म का उच्छेद न हो जाय, इसलिए पहले शुभाशुभ कर्म करके तब मोक्ष को प्राप्त करना चाहिए ।
एकोनषष्टितमोऽध्यायः ५१६
भावितैः कारणैश्चाथ बहुसंसारयोनिषु । आसादयति शुद्धात्मा मोक्षं हि प्रथमाश्रमे ॥२२॥
तमासाद्य तु मुक्तस्य दृष्टार्थस्य विपश्चितः । त्रिष्वाश्रमेषु कोन्वर्थो भवेत्परमभीप्सतः ॥२३॥
राजसांस्तामसांश्चैव नित्यं दोषान्विसर्जयेत् । सात्त्विकं मार्गमास्थाय पश्येदात्मानमात्मना ॥२४॥
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । संपश्यन्नेव लिप्येत जले वारिचरो यथा ॥२५॥
पक्षीवत्पवनादूर्ध्वममुत्रानन्त्यमश्नुते । विहाय देहं निर्मुक्तो निर्द्वंद्वः शुभसंगतः ॥२६॥
अत्र गाथाः पुरा गीताः शृणु राज्ञा ययातिना । धार्यंते या द्विजैस्तात मोक्षशास्त्रविशारदैः ॥२७॥
ज्योतिश्चात्मनि नान्यत्र रत्नं तत्रैव चैव तत् । स्वयं च शक्यं तद्रष्टुं सुसमाहितचेतसा ॥२८॥
न बिभेति परो यस्मान्न बिभेति पराच्च यः । यश्च नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म संपद्यते स तु ॥२६॥
यदा भावं न कुरुते सर्वभूतेषु पापकम् । पूर्वैराचरितो धर्मश्चतुराश्रमसंज्ञकः ॥३०॥
अनेन क्रमयोगेन बहुजातिसुकर्मणाम् । कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म संपद्यते तदा ॥३१॥
संयोज्य तपसात्मानमीर्ष्यामुत्सृज्य मोहिनीम् । त्यक्त्वा कामं च लोभं च ततो ब्रह्मत्वमश्नुते ॥३२॥
यदा श्राव्ये च दृश्ये च सर्वभूतेषु चाव्ययम् । समो भवति निर्द्वंद्वो ब्रह्म संपद्यते तदा ॥३३॥
यदा स्तुतिं च निंदां च समत्वेन च पश्यति । कांचनं चाऽयसं चैव सुखदुःखे तथैव च ॥३४॥
शीतमुष्णं तथैवार्थमनर्थं प्रियमप्रियम् । जीवितं मरणं चैव ब्रह्म संपद्यते तदा ॥३५॥
अनेक जन्मों से सत्कर्म करते-करते जब सम्पूर्ण इन्द्रियां पवित्र हो जाती हैं, तब शुद्ध अन्तःकरण वाला पुरुष
प्रथम आश्रम में ही उत्तम मोक्ष रूप ज्ञान प्राप्त कर लेता है ॥२१-२२॥ उसे पाकर जब ब्रह्मचर्य आश्रम में
तत्त्व का साक्षात्कार एवं मुक्ति सुलभ हो जाय तब परमात्मा को चाहने वाले जीवन्मुक्त विद्वान् के लिए शेष
तीनों आश्रमों में जाने की क्या आवश्यकता है ? ॥२३॥ वह मुक्त पुरुष नित्य प्रति राजस और तामस दोषों का
सर्वथा त्याग कर दें । और सात्विक मार्ग का अवलम्बन कर अन्तःकरण में ही आत्मा का दर्शन करे । सब प्राणियों-
में आत्मभाव और अपने में ही सब प्राणियों को देखने वाला व्यक्ति इसी संसार में उसी प्रकार लिप्त नहीं
होता जिस प्रकार जल में रहने वाला जलचर ॥२४-२५॥ वह व्यक्ति पक्षी के समान पवन मण्डल से ऊपर उठकर
अत्यन्त सुख का अनुभव करता है । इस प्रकार वह मुक्त इस शरीर का त्याग कर द्वन्द्वातीव होकर शुभलोक में
स्थान पाता है ॥२६॥ इस विषय में राजा ययाति ने प्राचीन काल में जिस गाथा को कहा है उसको कहता हूँ ।
सुनो ! इस गाथा को मोक्षशास्त्र के ज्ञाता द्विज अवश्य हृदय में धारण करते हैं ॥२७॥ आत्मा में ही ज्योति रहती
है । क्योंकि जहाँ रत्न रहता है, वहीं ज्योति रहती है । उस आत्म-ज्योति का दर्शन एकाग्रचित्त होने पर स्वयं
हो जाता है ॥२८॥ जिससे दूसरे नहीं डरते और जो दूसरों से स्वयं नहीं डरता, जो स्वयं कुछ इच्छा नहीं
करता और न तो द्वेष ही करता है, और जो सब प्राणियों के प्रति पाप भावना नहीं रखता वही ब्रह्म पद प्राप्त
करता है । पूर्व के आचार्यों ने भी चतुराश्रम धर्म का पालन किया है ॥२९-३०॥ इस प्रकार क्रमशः जो मन,
वचन और कर्म से किसी भी प्राणी की बुराई नहीं करता, वही ब्रह्म पद प्राप्त करता है ॥३१॥ तपस्या में लीन
होकर जब ज्ञानी भ्रम में डाल देने वाली ईर्ष्या, काम और लोभ को छोड़ देता है, तब वह ब्रह्म पद का भागी
होता है ॥३२॥ जब दृष्टि में या श्रवण पथ में आने वाले पदार्थों और अखिल भूतों में स्थित अव्यय परमात्मा का
दर्शन करने लगता है, और जब उस द्वन्द्वातीत की सर्वत्र सम बुद्धि हो जाती है तब वह ब्रह्म पद प्राप्त
करता है ॥३३॥
जब स्तुति और निन्दा को साधक समभाव से देखता है, उसको सोना, और लोहा में भिन्नता नहीं दिखाई
देती, सुख-दुख शीत-उष्ण; अर्थ-अनर्थ प्रिय-अप्रिय; जीवन और मरण में उसकी समान भावना हो जाती है, तब वह
५२० नारदीयपुराणम्
प्रसार्येह यथांगानि कूर्मः संहरते पुनः । तथेंद्रियाणि मनसा संयंतव्यानि भिक्षुणा ॥३६॥
तमः परिगतं वेश्म यथा दीपेन दृश्यते । यथा बुद्धिप्रदीपेन शक्य आत्मा निरीक्षितुम् ॥३७॥
एतत्सर्वं प्रपश्यामि त्वयि बुद्धिमतांवर । यच्चान्यदपि वेत्तव्यं तत्त्वतो वेत्ति तद्भवान् ॥३८॥
ब्रह्मर्षे विदितश्चासि विषयांस्तमुपागतः । गुरोश्चैव प्रसादेन तव चैवोपशिक्षया ॥३६॥
तस्य चैव प्रसादेन प्रादुर्भूतं महामुनेः । ज्ञानं दिव्यं समादीप्तं तेनासि विदितो मम ॥४०॥
अधिकं तव विज्ञानमधिक्रावगतिस्तव । अधिकं च तवैश्वयं तच्च त्वं नावबुध्यसे ॥४१॥
बाल्याद्वा संशयाद्वापि भयाद्वापि विमोहजात् । उत्पन्ने चापि विज्ञाने नाविगच्छंति तां गतिम् ॥४२॥
व्यवसायेन शुद्धेन मद्धिधैश्छिन्नसंशयाः । विमुच्य हृदयग्रंथीनातिमासादयंति ताम् ॥४३॥
भवांश्चोत्पन्नविज्ञानः स्थिरबुद्धिरलोलुपः । व्यवसायादृते ब्रह्मान्नासादयति तत्पदम् ॥४४॥
नास्ति ते सुखदुःखेषु विशेषो नास्ति वस्तुषु । नौत्सुक्यं नृत्यगीतेषु न राग उपजायते ॥४५॥
न बंधुषु निबंधस्ते न भयेष्वस्ति ते भयम् । पश्यामि त्वां महाभाग तुल्यनिंदात्मसंस्तुतिम् ॥४६॥
अहं च त्वानुपश्यामि ये चान्येऽपि मनीषिणः । आस्थितं परमं मार्गं अक्षयं चाप्यनामयम् ॥४७॥
यत्फलं ब्राह्मणस्येह मोक्षार्थश्चापदात्मकः । तस्मिन्वै वर्तसे विप्र किमन्यत्परिपृच्छसि ॥४८॥
सनंदन उवाच
एतच्छूत्वा तु वचनं कृतात्मा कृतनिश्चयः । आत्मनात्मानमास्थाय दृष्ट्वा चात्मानमात्मना ॥४६॥
ब्रह्मरूप हो जाता है ॥३४-३५॥ जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को फैला कर पुनः उनको समेट लेता है उसी
प्रकार भिक्षु को भी अपनी इन्द्रियों को मन के द्वारा अपने वश में करना चाहिए ॥३६॥ जिस प्रकार अंधेरे
से ढका हुआ घर दीपक से दिखाई देने लगता है उसी प्रकार बुद्धि के दीपक से आत्मा को देखा जा सकता
है ॥३७॥ बुद्धिमानों में श्रेष्ठ ! मैं इन सब विशेषताओं को तुममें देख रहा हूँ । इसके अतिरिक्त जो अन्य ज्ञातव्य
बातें हैं; उनको तुम भली भांति जानते हो ॥३८॥ ब्रह्मर्षि ! तुमको सारी बातें ज्ञात हैं। गुरु की कृपा और
शिक्षा के कारण तुमने विषय-वासनाओं को भी जीत लिया है। महामुनि व्यास के अनुग्रह से मुझे जो उत्कृष्ट
दिव्य ज्ञान प्राप्त है उसके द्वारा मुझे ज्ञात है कि तुम अधिक ज्ञानी हो। तुम्हारी पहुँच दूर तक है और तुम्हारा
ज्ञान वैभव उत्कृष्ट है जिसका अनुभव स्वयं तुमको नहीं है ॥३९-४१॥ चाहे इसका कारण तुम्हारी शिशुता
हो, संशय हो या विमोहजन्य भय हो । विज्ञान प्राप्त हो जाने पर भी मोक्ष गति प्राप्त नहीं होती है। शुद्ध
व्यवसाय के द्वारा अपने आन्तरिक संशयों तथा पीड़ा को नष्ट कर मेरे समान व्यक्ति उस गति को प्राप्त करते
हैं। आप तो स्थिरबुद्धि, संतोषी, विज्ञानो हैं। ब्रह्मन् ! आप ने तो अनायास ब्रह्म पद को प्राप्त कर लिया है
॥४२-४४॥ आपके लिए सुख-दुःख दोनों बराबर हैं। सब पदार्थों को समबुद्धि से देखते हैं। किसी वस्तु की
इच्छा नहीं है। नृत्य-गीतों के प्रति आपकी कोई आसक्ति नहीं है ॥४५॥ बन्धुओं के प्रति आप की ममता नहीं
है, और न तो आपको किसी से भय ही है। महाभाग, मैं आपको निन्दा और स्तुति के प्रति समान दृष्टि रखने
वाला देखता हूँ, ॥४६॥ मैं उन मनीषियों को भी देखता हूँ, जो अक्षय अनामय और परम मुक्ति पथ के पथिक हैं;
परन्तु सब में आप श्रेष्ठ हैं। इस लोक में ब्राह्मण कुल में जन्म लेने का जो फल होता है, और मुक्ति का जो स्वरूप
है, उसी में आपकी स्थिति है। अब दूसरी कौन सी वस्तु है, जिसके विषय में पूछते हैं ॥४७-४८॥
सनन्दन ने कहा- राजा जनक की उपर्युक्त बातों को सुनकर कृतात्मा शुक को आत्म निश्चय हो
गया। उन्होंने अपने अन्तःकरण में आत्म-भाव की प्रतिष्ठा की और उसमें ही परमतत्त्व का दर्शन किया ॥४९॥
षष्टितमोऽध्यायः ५२१
कृतकार्यः सुखी शांतस्तूष्णीं प्रायादुदङ्मुखः । शैशिरं गिरिमासाद्य पाराशर्यं ददर्श च ॥५०॥
शिष्यानध्यापयंतं च पैलादीन्वेदसंहिताः । आरणयो विशुद्धात्मा दिवाकरसमप्रभः ॥५१॥
पितुर्जग्राह पादौ च सादरं हृष्टमानसः । ततो निवेदयामास पितुः सर्वमुदारधीः ॥५२॥
शुको जनकराजेन संवादं मोक्षसाधनम् । तच्छ्रुत्वा वेदकर्तासो प्रहृष्टेनांतरात्मना ॥५३॥
समालिंग्य सुतं व्यासः स्वपार्श्वस्थं चकार च ॥५४॥
ततः पैलादयो विप्रा वेदान् व्यासादधीत्य च । शैलशृंगाद्भुवं प्राप्ता याजनाध्यापने रताः ॥५५॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥५९॥
अथ षष्टितमोऽध्यायः
सनंदन उवाच
अवतीर्णेषु विप्रेषु व्यासः पुत्रसहायवान् । तूष्णीं ध्यानपरो धीमानेकांते समुपविशत् ॥१॥
तमुवाचाशरीरी वाक् व्यासं पुत्रसमन्वितम् । भो भो महर्षे वासिष्ठ ब्रह्मघोषो न वर्तते ॥२॥
एको ध्यानपरस्तूष्णीं किमास्ते चिंतयन्निव । ब्रह्मघोषैर्विरहितः पर्वतोऽयं न शोभते ॥३॥
तस्मादधीष्व भगवन्सार्द्धं पुत्रेण धीमता । वेदान्वेदविदा चैव सुप्रसन्नमनाः सदा ॥४॥
अपना मनोरथ सफल जान कर शान्त और सुखी शुक देव चुपचाप उत्तर दिशा की ओर चले गए । हिमालय पर्वत
पर जाकर उन्होंने देखा कि व्यास जी पैल आदि शिष्यों को वेद संहिता पढ़ा रहे हैं ॥५०॥ शुद्धात्मा, सूर्य के
समान तेजस्वी अरणिकुमार ने प्रसन्न मन से आदर के साथ पिता के चरणों का स्पर्श किया । चरण-वन्दन के
अनन्तर उदारबुद्धि शुक ने राजा जनक से मोक्ष-साधन के विषय में जो कुछ वार्ता हुई थी, सब कह सुनाया
॥५१-५२॥ वेदकर्त्ता व्यास का अन्तःकरण पुत्र के मुख से सारी कथा को सुनकर खिल उठा । उन्होंने अपने शुक
को गले से लगा लिया और अपने बगल में बैठाया ॥५४॥ इसके बाद पैल आदि वेदपाठी ब्राह्मण व्यास मुनि से
सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन कर उस पर्वत के शिखर पर से उतर कर पृथ्वी पर आये और वेद पढ़ाने तथा यज्ञ
कराने के कार्य में संलग्न हो गए ॥५५॥
श्री नारदीय पुराण के पूर्वभाग में उनसठवां अध्याय समाप्त ॥५९॥
अध्याय ६०
सनत्कुमार का शुक को ज्ञानोपदेश
सनन्दन ने कहा—पैल आदि विप्रों के चले जाने पर पुत्र के साथ व्यास जी चुपचाप एकान्त में ध्यान
मग्न हो गए ॥१॥ उसी समय पुत्र के सहित ध्यान मग्न व्यास के प्रति आकाशवाणी हुई कि हे वासिष्ठ ! महर्षि !
इस समय ब्रह्मघोष (वेद ध्वनि) नहीं हो रही है, तुम क्यों एकान्त में ध्यानमग्न हो कर विचार करते हुए से
बैठे हो । वेद-ध्वनि के बिना इस पर्वत की शोभा नहीं हो रही है ॥२-३॥ इसलिये भगवन् ! सदा प्रसन्नमन से
इस वेदवेत्ता धीमान् पुत्र के साथ वेदों का अध्ययन करो ॥४॥ व्यास जी इस प्रकार की आकाशवाणी को सुन कर
६६ ना० पु०
५२२ नारदीयपुराणम्
तच्छ्रुत्वा वचनं व्यासो नभोवाणीसमीरितम् । शुकेन सह पुत्रेण वेदाभ्यासमथाकरोत् ॥५॥
तयोरभ्यसतोरेवं बहुकालं द्विजोत्तम । वातोऽतिमात्रं प्रववौ समुद्रानिलवोजितः ॥६॥
ततोऽनध्याय इति तं व्यासः पुत्रमवारयत् । शुको वारितमात्रस्तु कौतूहलसमन्वितः ॥७॥
अपृच्छत्पितरं तत्र कुतो वायुरभूदयम् । आख्यातुमर्हति भवान्सवं वायोर्विचेष्टितम् ॥८॥
शुकस्यैतद्वचः श्रुत्वा व्यासः परमविस्मितः । अनध्यायनिमित्तेऽस्मिन्निदं वचनमब्रवीत् ॥६॥
दिव्यं ते चक्षुरुत्पन्नं स्वस्थं ते निश्चलं मनः । तमसा रजसा चापि त्यक्तः सत्ये व्यवस्थितः ॥१०॥
तस्यात्मनि स्वयं वेदान्बुद्ध्वा समनुचिंतय । देवयानचरो विष्णोः पितृयानश्च तामसः ॥११॥
द्वावेतौ प्रत्ययं यातौ दिवं चाधश्च गच्छतः । पृथिव्यामंतरिक्षे च यतः संयांति वायवः ॥१२॥
सप्त ते वायुमार्गा वै तान्निबोधानुपूर्वशः । तत्र देवगणाः साध्याः समभूवन्महाबलाः ॥१३॥
तेषामप्यभवत्पुत्रः समानो नाम दुर्जयः । उदानस्तस्य पुत्रोऽभूद्व्यानस्तस्याभवत्सुतः ॥१४॥
अपानश्च ततो जज्ञे प्राणश्चापि ततः परम् । अनपत्योऽभवत्प्राणो दुर्धर्षः शत्रुमर्दिनः ॥१५॥
पृथक्कमीणि तेषां तु प्रवक्ष्यामि यथा तथा । प्राणिनां सर्वतो वायुश्चेष्टा वर्तयते पृथक् ॥१६॥
प्रीणनाच्चैव सर्वेषां प्राण इत्यभिधीयते । प्रेषयत्यभ्रसंघातान्धूमजांश्चोष्मजांस्तथा ॥१७॥
प्रथमः प्रथमे मार्गे प्रवह्यो नाम सोऽनिलः । अंबरे स्नेहमात्रेभ्यस्तडिद्भ्यश्चोत्तमद्युतिः ॥१८॥
आवहो नाम सोऽभ्येति द्वितीयः श्वसनो नदन् । उदयं ज्योतिषां शश्वत्सोमादीनां करोति यः ॥१९॥
पुत्र शुकदेव के साथ वेदाभ्यास करने लगे ॥५॥ द्विजोत्तम ! बहुत समय तक इन दोनों के इस प्रकार वेदाभ्यास करने के
बाद एकाएक समुद्री वायु प्रेरित होकर जोरों से आंधी बहने लगी ॥६॥ यह देखकर 'अब अनध्याय का समय हो गया,
यह कहकर व्यास ने पुत्र को पढ़ने से रोक दिया । इस प्रकार अध्ययन से रोके जाने पर शुकदेव को अत्यन्त आश्चर्य
हुआ ॥७॥ उन्होंने पिता से पूछा कि यह प्रचण्ड वायु कहाँ से उत्पन्न हुआ ? आप वायु के प्रत्येक व्यापारों का वर्णन
कीजिए ॥८॥ शुक के इस प्रश्न को सुनकर व्यास जी को परम विस्मय हुआ । उन्होंने अनध्याय के कारणभूत
वायु के विषय में आगे की बातें बताईं ॥९॥ कि-तुम्हें दिव्य चक्षु प्राप्त हो गया है, तुम्हारा स्वस्थ और निश्चल
मन तम और रज को छोड़ कर सत्य पर अटल हो गया है ॥१०॥ इसलिए अपने मन में वेदों का अनुचिन्तन कर
विचार करो । विष्णु लोक का पथ देवयान चर है और पितृ यान तमसाच्छन्न या तामस है ॥११॥ स्वर्ग और
पितर लोक को जाने वालों के लिये ये दो मार्ग हैं। पृथ्वी और अन्तरिक्ष में सात मार्ग से वायु बहता है, अतः उन
सात वायुमार्गों को तुम यथार्थ रूप से समझ लो ॥१२॥ सब से पहले साध्य नाम के अत्यन्त बलवान् देवगण
हुए। उनका समान नामक एक अजेय पुत्र हुआ, समान का पुत्र उदान और उदान के व्यान
नामक पुत्र हुआ। व्यान के अपान और अपान के प्राण नामक पुत्र हुआ। दुर्धर्ष और शत्रु
को पराजित करने वाले प्राण को कोई पुत्र नहीं हुआ ॥१३-१५॥ उनके जो पृथक् पृथक् कर्म हैं उनको कह रहा
हूँ। वायु ही सब प्राणियों को गति और स्फूर्ति प्रदान करता है ॥१६॥ सब प्राणियों को तृप्त करने के कारण
वायु को प्राण कहते हैं। मेघों को चाहे वे धुयें से उत्पन्न हुए हों या ताप से जो प्रथम मार्ग में ले जाता है वह प्रवह
नामक वायु है ॥१७॥ आकाश में सम्पूर्ण स्नेहभय पदार्थों और विद्युत् से भी उत्कृष्ट प्रकाश वाला जो दूसरा
अनिल है उसका नाम आवह है, जो ध्वनि करता हुआ बहता है ॥१८॥ जो सर्वदा चन्द्रमा आदि ज्योतिष्क
पिण्डों को उदित करता है और शरीर के भीतर संचरणशील जिस वायु को मनीषी उदान कहते हैं, जो चारों
षष्टितमोऽध्यायः ५२३
अंतर्देहेषु चोदानं यं वदंति मनीषिणः । यश्चतुर्भ्यः समुद्रेभ्यो वायुर्द्धारयते जलम् ॥२०॥
उद्धृत्य ददते चापो जीमूतेभ्यो वनेऽनिलः । योऽद्भिः संयोज्य जीमूतान्पर्जन्याय प्रयच्छति ॥२१॥
उद्वहो नाम बर्हिष्ठस्तृतोयः स सदागतिः । संनीयमाना बहुधा येन नीला महाधनाः ॥२२॥
वर्षमोक्षकृतारंभास्ते भवंति घनाघनाः । योऽसौ वहति देवानां विमानानि विहायसा ॥२३॥
चतुर्थः संवहो नाम वायुः स गिरिमर्दनः । येन वेगवता रुग्णाः क्रियन्ते तरुजा रसाः ॥२४॥
पंचमः स महावेगो विवहो नाम मारुतः । यस्मिन्परिप्लवे दिव्या वहंत्यापो विहायसा ॥२५॥
पुण्यं चाकाशयंमायास्तोयं तिष्ठति तिष्ठति । दूरात्प्रतिहतो यस्मिन्नेकरश्मिर्दिवाकरः ॥२६॥
योनिरंशुसहस्रस्य येन याति वसुंधराम् । यस्मादाप्यायते सोमो निधिर्दिव्योऽमृतस्य च ॥२७॥
षष्ठः परिवहो नाम स वायुर्जीवतांवरः । सर्वप्राणभृतां प्राणान्योऽन्तकाले निरस्यति ॥२८॥
यस्य धर्मेऽनुवर्तते मृत्युर्वैवस्वतावुभौ । सम्यगन्वीक्षता बुद्ध्या शांतयाऽध्यात्मनित्यया ॥२६॥
ध्यानाभ्यासाभिरामाणां योऽमृतत्वाय कल्पते । यं समासाद्य वेगेन दिशामंतं प्रपेदिरे ॥३०॥
दक्षस्य दश पुत्राणां सहस्राणि प्रजापतेः । येन वृष्ट्या पराभूतस्तोयान्येन निवर्तते ॥३१॥
परीवहो नाम वरो वायुः स दुरतिक्रमः । एवमेते दितेः पुत्रा मरुतः परमाद्भुताः ॥३२॥
अनारमंतः सर्वांतः सर्वगाः सर्वचारिणः । एतत्तु महदाश्चर्यं यदयं पर्वतोत्तमः ॥३३॥
कंपितः सहसा तेन पवमानेन वायुना । विष्णोर्निःश्वासवातोऽयं यदा वेगसमीरितः ॥३४॥
समुद्रों से जल खींचता है, जो जीमूत नामक मेघों से जल लेकर वनों में वर्षा करता है, जो पुनः जीमूतों को जल
से भर देता और पर्जन्य को जल से युक्त कर देता है, वह तीसरा सदा गतिशील रहने वाला और प्रशंसनीय उद्वह
कहलाता है ॥१९-२१॥ जो नील महामेघों को प्रायः इधर-उधर पहुँचाता है, जिसके कारण वे घने मेघ वर्षा
बरसाते और रोकते हैं और जो देव विमानों को आकाश में इधर-उधर उड़ाता है वह चौथा पर्वतों का मान
मर्दन करने वाला मारुत संवह है ॥२२-२३॥ जिस वेगवान् वायु से वृक्षों से उत्पन्न रस में रोग के कीटाणु घुस
जाते हैं वह पाँचवां महा वेग वाला मारुत विवह है ॥२४॥ जिसके आधार पर आकाश में दिव्य जल प्रवाहित
होते हैं, जो आकाश गंगा के पवित्र जल को धारण कर के स्थित है और जिसके द्वारा दूर से ही प्रतिहत होकर
सहस्रों किरणों के उत्पत्तिस्थान सूर्य देव एक ही किरण से युक्त प्रतीत होते हैं, जिनसे यह पृथ्वी प्रकाशित होती है
तथा अमृत की दिव्यनिधि चन्द्रमा का भी जिससे पोषण होता है, उस छठे वायु का नाम 'परिवह' है। वह सम्पूर्ण
जीवनधारियों में श्रेष्ठ है ॥२४-२७॥
जो सब प्राणियों के प्राण को मृत्यु के समय खींच लेता है, मृत्यु और वैवस्वत जिसके वशवर्ती हैं, ध्यान
और योगाभ्यास में लीन रहने वाले योगी जिसको नित्य अध्यात्म और शान्त बुद्धि से भली भाँति देखकर अमृतत्व
प्राप्त करते हैं, जिस वायु के वेग में पड़कर प्रजापति दक्ष के दश हजार पुत्र बड़े वेग से सम्पूर्ण दिशाओं के अन्त
में पहुँच गए तथा जिससे वृष्टि का जल तिरोहित होकर वर्षा बन्द होजाती है, वह परीवह नामक श्रेष्ठ वायु है
जिसको कोई किसी प्रकार अपने वश में नहीं कर सकता ॥२८-३१॥ इस प्रकार इतने दिते के परम
आश्चर्यजनक पुत्र वायु हैं। ये मरुत् सबके अन्तःकरण में प्रवेश करने वाले, सर्वत्र गतिशील, सर्वव्यापक और
सब स्थानों पर पहुँचने वाले हैं ॥३२॥ यह एक आश्चर्यजनक बात है, कि उस वायु के चलने से यह गिरि-
राज हिमालय भी सहसा हिल उठा । जब विष्णु के निःश्वास से निकला हुआ यह वायु बड़े वेग से सहसा
उठता है तो उस समय यह संसार इस वायु से अत्यंत व्यथित हो जाता है ॥३३-३४॥ ब्रह्मन् ! इसलिए
५२४ नारदीयपुराणम्
सहसोदीर्यते तात जगत्प्रव्यथते तदा । तस्माद्ब्रह्मविदो ब्रह्म न पठन्त्यतिवायुतः ॥३५॥
वायोर्वायुभयं ह्युक्तं ब्रह्म तत्पीडितं भवेत् । एतावदुक्त्वा वचनं पराशरसुतः प्रभुः ॥३६॥
उक्त्वा पुत्रमधीष्वेति व्योमगंगामगात्तदा । ततो व्यासे गते स्नातु शुको ब्रह्मविदां वरः ॥३७॥
स्वाध्यायमकरोद्ब्रह्मन्वेदवेदांगपारगः । तत्र स्वाध्यायसंसक्तं शुकं व्याससुतं मुने ॥३८॥
सनत्कुमारो भगवानेकांते समुपायतः । उत्थाय सत्कृतस्तेन ब्रह्मपुत्रो हि काष्णना ॥३९॥
ततः प्रोवाच विप्रेंद्र शुकं वेदविदां वरः । किं करोषि महाभाग व्यासपुत्रमहाद्युते ॥४०॥
शुक उवाच
स्वाध्याये संप्रवृत्तोऽहं ब्रह्मपुत्राधुना स्थितः । त्वद्दर्शनमनुप्राप्तः केनापि सुकृतेन च ॥४१॥
किंचित्त्वां प्रष्टुमिच्छामि तत्त्वं मोक्षार्थसाधनम् । तद्वदस्व महाभाग यथा तज्ज्ञानमाप्नुयाम् ॥४२॥
सनत्कुमार उवाच
नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नास्ति विद्यासमं तपः । नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम् ॥४३॥
निवृत्तिः कर्मणः पापात्सततं पुण्यशीलता । सद्वृत्तिः समुदाचारः श्रेय एतदनुत्तमम् ॥४४॥
मानुष्यमसुखं प्राप्य यः संज्जित स मुह्यति । नालं स दुःखमोक्षाय संगो वै दुःखलक्षणः ॥४५॥
सक्तस्य बुद्धिर्भवति मोहजालविवर्द्धिनी । मोहजालावृतो दुःखमिहामुत्र तथाश्नुते ॥४६॥
इस प्रकार के अद्भुत वायु के चलने के कारण ब्रह्मज्ञानी अपने वेदाध्ययन को बन्द कर देते हैं ॥३५॥ वायु
के द्वारा जो भय होता है उसको कह दिया गया, इस वायु से ब्रह्म भी पीड़ित होता है । पराशर पुत्र प्रभु व्यास
इस प्रकार पुत्र से कहकर ओर हे पुत्र ! अब स्वाध्याय करो, ऐसा कहकर व्योमगंगा में नहाने के लिए चले गये ।
नारद ! स्नान करने के लिए जब व्यास जी चले गये तब ज्ञानियों में श्रेष्ठ वेद-वेदांगों के पारगामी विद्वान्
शुकदेव जी ने अपना स्वाध्याय प्रारम्भ किया ॥३६-३७॥
मुने ! उस समय जब कि व्यासपुत्र शुकदेव जी एकान्त में स्वाध्याय में मग्न थे भगवान् सनत्कुमार
उनके समीप आये । व्यासपुत्र ने उठकरं ब्रह्मपुत्र का स्वागत किया । विप्रेंद्र ! शुकदेव से सत्कृत होने के बाद
वेदज्ञों में श्रेष्ठ ऋषि ने पूछा- व्यासपुत्र ! महाभाग ! महाद्युति ! क्या कर रहे हो ? ॥३८-४०॥
शुक ने कहा- ब्रह्मपुत्र ! इस समय यहाँ बैठा बैठा स्वाध्याय कर रहा हूँ, आज आपका यह दर्शन मेरे
किसी पूर्वजन्म के सुकृत से हुआ है ॥४१॥ महाभाग ! आज मैं आप से मोक्ष प्राप्ति के साधन के विषय में कुछ
पूछना चाहता हूँ, कृपा कर आप मुझे इस विषय में कुछ बतावें जिससे कि मोक्ष विषयक ज्ञान पा जाऊँ
॥४२॥
सनत्कुमार बोले- विद्या के समान नेत्र नहीं, न तो विद्या के समान कोई तपस्या ही है । राग के
समान कोई दुःख नहीं, न तो त्याग के समान सुख है ॥४३॥ समस्त पाप कर्मों से सर्वदा दूर रहना, सदा पुण्य का
संचय करते रहना, साधु पुरुषों के व्यवहार को अपनाना और उत्तम सदाचार का पालन करना, ये सर्वोत्तम श्रेय
हैं ॥४४॥ जो अश्रेयस्कर इन्द्रिय-सुखों में आसक्त होता है, अज्ञान के अन्धकार में पतित होता है, वह कभी
भी दुखों से मुक्त नहीं हो सकता क्योंकि संग (आसक्ति) ही दुःख का प्रधान लक्षण है ॥४५॥ आसक्त
व्यक्ति को मोह बढ़ाने वाली बुद्धि होती है और मोह-जाल में फँसा व्यक्ति दोनों लोकों में दुःख पाता है,
षष्टितमोऽध्यायः ५२५
सर्वोपायेन कामस्य क्रोधस्य च विनिग्रहः । कार्यः श्रेयोथिना तौ हि श्रेयोघातार्थमुद्यतौ ॥४७॥
नित्यं क्रोधात्तपो रक्षेच्छ्रियं रक्षेच्च मत्सरात् । विद्यां मानापमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः ॥४८॥
आनृशंस्यं परा धर्मः क्षमा च परमं बलम् । आत्मज्ञानं परं ज्ञानं सत्यं हि परमं हितम् ॥४९॥
येन सर्वं परित्यक्तं स विद्वान्स च पंडितः । इंद्रियैरिन्द्रियार्थेभ्यश्चरत्यात्मवशैर्रिह ॥५०॥
असज्जमानः शांतात्मा निर्विकारः समाहितः । आत्मभूतैरतद्भूतः सह चैव विनैव च ॥५१॥
स विमुक्तः परं श्रेयो न चिरेणाधिगच्छति । अदर्शनमसंसर्पस्तथैवाभाषणं सदा ॥५२॥
यस्य भूतैः सह मुने स श्रेयो विन्दते महत् । न हिंस्यात्सर्वभूतानि भूतैर्मैत्रायणश्चरेत् ॥५३॥
नेदं जन्म समासाद्य वैरं कुर्वीत केनचित् । आकिंचन्यं सुसंतोषो निराशिष्टवमचापलम् ॥५४॥
एतदाहुः परं श्रेय आत्मज्ञस्य जितात्मनः । परिग्रहं परित्यज्य भव तात जितेन्द्रियः ॥५५॥
अशोकं स्थानमातिष्ठेह चामुत्र चाभयम् । निराशिनो न शोचंति त्यजेदाशिषमात्मनः ॥५६॥
परित्यज्याशिखं सौम्य दुःखग्रामाद्विमोक्ष्यसे । तपोनित्येन दांतेन मुनिना संयतात्मना ॥५७॥
अजितं जेतुकामेन भाव्यं संगेष्वसंगिना । गुणसंगेष्वनासक्त एकचर्यारतः सदा ॥५८॥
ब्राह्मणो न चिरादेव सुखमायात्यनुत्तमम् । द्वंद्वारामेषु भूतेषु वराको रमते मुनिः ॥५९॥
॥४६॥ श्रेयार्थी को सब प्रकार से काम और क्रोध को अपने वश में करना चाहिए क्योंकि ये दोनों श्रेय के
विघात में सर्वदा तत्पर रहते हैं ॥४७॥ नित्य प्रति क्रोध से तप की और मात्सर्य से श्री की रक्षा करनी
चाहिए। मान और अपमान से विद्या की और प्रमाद से आत्मा (ज्ञान) की रक्षा श्रेयस्कर है ॥४८॥ दया परम
धर्म और क्षमा परम बल है। आत्मज्ञान परम ज्ञान और सत्य परम हित है ॥४९॥ जिसने सर्वस्व का त्याग
कर दिया है वह पंडित और विद्वान् है। इस संसार में जितेन्द्रिय व्यक्ति विषयों का सेवन केवल इन्द्रियों से ही करते
हैं, उनमें आसक्त नहीं होते ॥५०॥ अनासक्त, शांतचित्त, निर्विकार, एकाग्रचित्त और आत्मीय जनों के भाव अथवा
अभाव दोनों अवस्थाओं में आसक्त न होने वाला व्यक्ति मुक्त है और उसको श्रेय शीघ्र प्राप्त हो जाता है ॥५१॥
मुने ! जो प्राणी को नहीं देखता, न उससे बोलता और न तो उनका स्पर्श करता है अर्थात् आत्माराम
है, उसको परम श्रेय प्राप्त होता है, ॥५२॥ किसी प्राणी की हिंसा न करे, सबसे मित्र भाव रखे और यह
मानव जन्म पाकर किसी से वैर न करे, ॥५३॥ आत्मज्ञ और जितात्मा के लिए दरिद्रता, संतोष, निराशा और
धीरता हो परम श्रेय माना गया है। आपने तो परिग्रह का त्याग कर जितेन्द्रियता प्राप्त कर ली है। अब इस
लोक और परलोक में अभय हो अशोक (निश्चिन्त) स्थान ग्रहण करें ॥५४-५५॥ किसी से कुछ आशा न
रखने वाले व्यक्ति किसी प्रकार की चिन्ता में नहीं पड़ते हैं। इसलिये अपने स्वार्थ को आशा का त्याग कर देना
चाहिए। सौम्य ! तुम आत्मसुख की भावना का परित्याग कर दुःखों और श्रम से मुक्त हो जाओगे ॥५६॥ नित्य
तपस्या में लीन रहने वाले संयमी उदार मुनि को चाहिए कि वह सम्पूर्ण संगों अर्थात् आसक्ति उत्पन्न करने
वाले विषयों को जीतने का प्रयत्न करे। सांसारिक विषयों में लिप्त न रहने वाला, सदा एकान्तवास करने वाला
ब्राह्मण अतिशीघ्र अनुत्तम सुख को प्राप्त करता है। पराक व्रतशील मुनि सुख-दुःखों के देने वाले विषयों में
कभी लिप्त नहीं होते हैं । स्वल्प ज्ञान वाले उस स्थित को प्राप्त नहीं करते हैं । परन्तु ज्ञानतृप्त व्यक्ति किसी
प्रकार का शोक नहीं करते हैं। ॥५७-५९॥
५२६ नारदीयपुराणम्
किंचित्प्रज्ञानतृप्तोऽसौ ज्ञानतृप्तो न शोचति । शुभैर्लभेत देवत्वं व्यामिश्रैर्जन्म मानुषम् ॥६०॥
अशुभैश्चाप्यधो जन्म कर्माभिलं भतेऽवशः । तत्र मृत्युजरादुःखैः सततं समभिद्रुतम् ॥६१॥
संसारं पश्यते जंतुस्तत्कथं नावबुध्यसे । अहिते हितसंज्ञस्त्वमध्रुवे ध्रुवसंज्ञकः ॥६२॥
अनर्थे चार्थसंज्ञस्त्वं किमर्थं नावबुध्यसे । संवेष्ट्यमानं बहुभिर्मोहतंतुभिरात्मजैः ॥६३॥
कोशकारवदात्मानं वेष्टितो नावबुध्यसे । अलं परिग्रहेणेह दोषवान् हि परिग्रहः ॥६४॥
कृमिर्हि कोशकारस्तु बध्यते स्वपरिग्रहात् । पुत्रदारकुटुंबेषु सक्ताः सीदंति जंतवः ॥६५॥
सरःपंकार्णवे मग्ना जीर्णा वनगजा इव । मोहजालसमाकृष्टान्पश्य जंतून्सुदुःखितान् ॥६६॥
कुटुंबं पुत्रदारं च शरीरं द्रव्यसंचयम् । पारक्यमध्रुवं सर्वं किं स्वं सुकृतदुष्कृते ॥६७॥
यदा सर्वं परित्यज्य गंतव्यमवशेन वै । अनर्थे किं प्रसक्तस्त्वं स्वमर्थं नानुतिष्ठसि ॥६८॥
अविश्रांतमनालंबमपाथेयमदैशिकम् । तमःकर्त्तारमध्वानं कथमेको गमिष्यसि ॥६९॥
नहि त्वां प्रस्थितं कश्चित्पृष्ठतोऽनुगमिष्यति । सुकृतं दुष्कृतं च त्वां गच्छंतमनुयास्यतः ॥७०॥
विद्या कर्म च शौर्यं च ज्ञानं च बहुविस्तरम् । अर्थार्थमनुशोयंते सिद्धार्थस्तु विमुच्यते ॥७१॥
निबंधिनी रज्जुरेषा या ग्रामे वसतो रतिः । छित्त्वैनां सुकृतो यांति नैनां छिंदंति दुष्कृतः ॥७२॥
शुभ कर्मों के करने से मनुष्य देवत्व प्राप्त करता है, शुभ-अशुभ दोनों कर्मों के कारण मानव-जन्म और
अशुभ कर्मों के कारण अवश प्राणी अधम योनियों में जन्म ग्रहण करता है ॥६०-६१॥ इस प्रकार जीव अपने
कर्मों के कारण भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म लेकर मृत्यु, बुढ़ापा और दुःखों से सर्वदा पीड़ित होकर संसार
में भ्रमण करता रहता है। इसको देखकर क्यों नहीं इसका रहस्य समझ लेते हो ? ॥६१-६२॥ तुम तो इस अहितकर
संसार में हितकर विषयों के ज्ञाता हो, अनित्य जगत् में नित्य के ज्ञाता और अनर्थ का त्याग कर अर्थवान्
(सार्थक) विषयों के ज्ञाता हो, तो क्यों नहीं इस रहस्य को समझ लेते हो ? ॥६२-६३॥ स्वयम् आत्म-अज्ञान के
कारण उत्पन्न मोह की रस्सियों में अपने को बाँध लेने वाले तुम अपने को रेशम के कीड़े की भाँति नहीं
पहचान पाते हो (अर्थात्) जीव अपने को अपने ही अज्ञान के जाल में फँसाकर अपने दुःख का कारण बनता
है ॥६३-६४॥ इस लिये परिग्रह (संग्रह) का त्याग करो । इससे कुछ भी लाभ नहीं है, क्योंकि संग्रह सर्वथा सदोष
होता है । रेशम का कीड़ा अपने ही तन्तुओं में बँध जाता है । उसी प्रकार जीव भी स्त्री, पुत्र और परिवार के
चक्कर में पड़कर सर्वदा कष्ट पाते रहते हैं ॥६४-६५॥ तालाब के कीचड़ में फँसे जंगल के बूढ़े हाथी के समान
मोह-जाल में फँसे इन अत्यन्त दुःखी जीवों को देखो ॥६६॥ जब कि कुटुम्ब पुत्र, स्त्री, शरीर, संचित द्रव्य
राशि, सुकृत, पाप आदि अनित्य और परकीय पदार्थों को छोड़कर अवश प्राणी को अवश्य ही इस लोक से चला
जाना है तब तुम इस रहस्य को जानते हुए भी क्यों नहीं आत्म कल्याणार्थ प्रयत्न करते हो ॥६७-६८॥ तुम इस
निरालंब, कभी भी विश्राम के लिए अवसर न पाने योग्य, पाथेय रहित, देश आदि से शून्य और अन्धकाराच्छन्न
परलोक मार्ग पर कैसे अकेले चल सकते हो ? ॥६९॥ जब तुम इस लोक को छोड़कर परलोक चलोगे तब तुम्हारे
पीछे-पीछे सहायता के लिए कौन जायेगा ? केवल तुम्हारे पाप-पुण्य ही तुम्हारा अनुसरण करेंगे ॥७०॥ केवल
स्वार्थसिद्धि के लिए पढ़ी हुई विद्या, किये हुए कर्म, शौर्य अथवा विस्तृत ज्ञान उस समय काम नहीं देते हैं।
केवल शुभ कार्य करने वाला सिद्धार्थ योगी ही मोक्ष का अधिकारी होता है ॥७१॥ विषय समूह अथवा लोक
में आसक्ति उत्पन्न करने वाली ममता जीव को बन्धन में डालने वाली रस्सी है । सुकृती जन इस रस्सी को तोड़-
कर मुक्त हो जाते हैं, परन्तु पापी इसको तोड़ नहीं पाते हैं ॥७२॥ जीव अपने ही समान जाति, रूप
षष्टितमोऽध्यायः ५२७
तुल्यजातिवयोरूपान् हृतान्पश्यसि मृत्युना । न च नामास्ति निर्वेदो लोहं हि हृदयं तव ॥७३॥
रूपकूलां मनःस्रोतां स्पर्शद्वीपां रसावहाम् । गंधपंकां शब्दजलां स्वर्गमार्गदुराग्रहाम् ॥७४॥
क्षमारित्रां सत्यमयीं धर्मस्थैर्यकराकराम । त्यागवाताध्वगां शीघ्रां बुद्धिनावं नदीं तरेत् ॥७५॥
त्यक्त्वा धर्ममधर्मं च ह्युभे सत्यानृते त्यज । त्यज धर्ममसंकल्पादधर्मं चाप्यहिंसया ॥७६॥
उभे सत्यानृते बुद्ध्वा बुद्धिं परमनिश्चयात् । अस्थिस्थूणं स्नायुयुतं मांसशोणितलेपनम् ॥७७॥
धर्मावनद्धं दुर्गन्धि पूर्णं मूत्रपुरीषयोः । जराशोकसमाविष्टं रोगायतनमस्थिरम् ॥७८॥
रजस्वलमनित्यं च भूतावासं समुत्सृज । इदं विश्वं जगत्सर्वमजगच्चापि यद्भवेत् ॥७६॥
महाभूतात्मकं सर्वमस्माद्यत्परमाणुमत् । इंद्रियाणि च पंचैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥८०॥
इत्येष सप्तदशको राशिरव्यक्तसंज्ञकः । सर्वैरिरिन्द्रियार्थैश्च व्यक्ताव्यक्तैर्हि बृंहितम् ॥८१॥
पंचविंशक इत्येष व्यक्ताव्यक्तमयो गणः । एतैः सर्वैः समायुक्तमनित्यमभिधीयते ॥८२॥
त्रिवर्गोऽथ सुखं दुःखं जीवितं मरणं तथा । य इदं वेद तत्त्वेन स वेद प्रभवाप्ययौ ॥८३॥
इन्द्रियैर्गृह्यते यद्यत्तद्वयक्तमभिधीयते । अव्यक्तमथ तज्ज्ञेयं लिंगग्राह्यमतीन्द्रियम् ॥८४॥
इन्द्रियैर्नियतैर्देही धाराभिरिव तर्प्यते । लोके विहितमात्मानं लोकं चात्मनि पश्यति ॥८५॥
परावरदृशः शक्तिर्ज्ञानवेलां न पश्यति । पश्यतः सर्वभूतानि सर्वावस्थासु सर्वदा ॥८६॥
और वायु वाले साथियों को मृत्य मुख में जाते हुए देखते हैं । परन्तु शोक है कि तुम्हारे सदृश जीवों
की आंखें यह देखकर भी नहीं खुलतीं और कुछ भी निर्वेद नहीं होता । सचमुच तुम्हारा हृदय लोहे का है,
॥७३॥ रूप रूपी तट, मन रूपी स्रोत, स्पर्श रूपी द्वीप, रस रूपी वेग, गंधरूपी पंक, शब्द रूपी जल और
स्वर्ग मार्ग की ओर कभी भी न ले जाने वाली संसार रूपी नदी को क्षमा रूपी पतवार वाली, सत्यमयी,
धर्म रूपी लंगर वाली और त्याग रूपी वायु के सहारे लेई जाने वाली शीघ्रगामिनी बुद्धि रूपी नाव से पार
करना चाहिए ॥७४-७५॥ धर्म और अधर्म की भावना को छोड़कर सत्य और असत्यद्वन्द्व का त्याग करो ।
धर्म को असंकल्प द्वारा और अहिंसा से अधर्म का नाश करो ॥७६॥ और सत्य तथा अनृत को भली भाँति
समझकर अपनी निश्चयात्मिका बुद्धि द्वारा हड्डियों के ढाँचे और नसों से युक्त मांस और रक्त के लेप से
लिप्त, धर्म से बँधी, दुर्गन्धपूर्ण, मलमूत्र से भरी, जरा और शोक से घिरी, रोग का घर, अस्थिर, धूलि से
भरी इस अनित्य देह में आसक्ति न रखो ॥७७-७८१/२॥ यह सारा जगत् (चर) और अजगत् (अचर) रूपात्मक
विश्व तथा महाभूतात्मक पदार्थ इसके अतिरिक्त परमाणु वाले पदार्थ पाँचों इन्द्रियाँ, तम, सत्त्व, और रज ये सत्रह
प्रकार के पदार्थ अव्यक्त कहलाते हैं। ॥७६-८०१/२॥ इस संसार में सब इन्द्रिय-विषय व्यक्त और अव्यक्त का
समूह, पचीस प्रकार के पदार्थ व्यक्ताव्यक्त हैं। इन सबसे युक्त पदार्थ अनित्य कहे जाते हैं ॥८१-८२॥ त्रिवर्ग,
सुखदुःख, जीवन और मरण इन सबको जो यथार्थरूप से समझता है वह उत्पत्ति और विनाश दोनों को जानता
है ॥८३॥ इन्द्रियों से जिसको ग्रहण किया जाता है, उसको व्यक्त और जो इन्द्रियों से ग्रहण करने योग्य नहीं है और
जिसका अनुमान आदि से ग्रहण होता है, उसको अव्यक्त कहते हैं ॥८४॥ नियत इन्द्रियों से जल धारा के समान
आत्मा की तृप्ति होती है । संसार में अपने को और अपने में संसार को देखता है, जो आत्म दर्शन की शक्ति से
सम्पन्न है, वह ज्ञान वेला को नहीं देखता है ॥८५१/२॥ जो सर्वदा सब अवस्थाओं में सब प्राणियों को देखता है ।
और जो ब्रह्म स्वरूप है उसका अशुभ कभी नहीं होता है ॥८६१/२॥ ज्ञान के द्वारा ही कायिक विविध क्लेशों से छुट-
५२८ नारदीयपुराणम्
ब्रह्मभूतस्य संयोगो नाशुभेनोपपद्यते । ज्ञानेन विविधांक्लेशान् निवृत्तिश्च देहजात् ॥८७॥
लोकबुद्धिप्रकाशेन लोकमार्गो न रिष्यति । अनादिनिधनं जंतुमात्मनि स्थितमव्ययम् ॥८८॥
अकर्तारममूढं च भगवानाह तीर्थवित् । यो जन्तुः स्वकृतैस्तैस्तैः कर्मभिर्नित्यदुःखितः ॥८९॥
स्वदुःखप्रतिघातार्थं हंति जंतुरनेकधा । ततः कर्म समादत्ते पुनरन्यन्नवं बहु ॥९०॥
तप्यतेऽथ पुनस्तेन भुक्त्वाऽपथ्यमिवातुरः । अजस्रमेव मोहांतो दुःखेषु सुखसंज्ञितः ॥९१॥
बध्यते तप्यते चैव भयोत्पतकर्मभिः सदा । ततो निवृत्तो बंधात्स्वात्कर्मणामुदयादिह ॥९२॥
परिभ्रमति संसारे चक्रवद्द्बाहुवर्जितः । संयमेन च संबंधान्निवृत्त्या तपसो बलात् ॥९३॥
सम्प्राप्ता बहवः सिद्धि अव्याबाधां सुखोदयाम् । ॥९४॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे द्वितीयपादे बृहदुपाख्याने षष्टितमोऽध्यायः ॥६०॥
अथैकषष्टितमोऽध्यायः
सनत्कुमार उवाच
अशोकं शोकनाशार्थं शास्त्रं शांतिकरं शिवम् । निशम्य लभ्यते बुद्धिलंब्धायां सुखमेधते ॥१॥
हर्षस्थानसहस्राणि शोकस्थानशतानि च । दिवसे दिवसे मूढमाविशंति न पंडितम् ॥२॥
कारा नहीं होता है। केवल लौकिक ज्ञान के प्रकाश से लोक मार्ग पर नहीं चला जाता है अर्थात् लोक यात्रा
सफल नहीं होती है। इसके लिए अध्यात्म ज्ञान की भी आवश्यकता है ॥८७॥ आत्म-सन्तुष्ट, अव्यय, जन्म-मरण
से रहित, अकर्ता और अविवेकी जीव को भगवान् और तीर्थज्ञ कहा जाता है ॥८८॥ जो जीव अपने किये हुए
कर्मों के कारण नित्य दुःखी रहता है और अपने दुःखों के विनाश के लिए अनेक प्रकार के जीवों की हत्या करता
है, फिर अनेक कर्मों में अपने को फंसाता है, वह उन कर्मों से उसी प्रकार संतप्त होता है, जिस प्रकार
अपथ्य भोजन से रोगी ॥८९-९०॥ वह सर्वदा सुख के भ्रम से दुःखों में फंसकर कष्ट पाता और उन भयोत्पादक
कर्मों के कारण मृत्यु-कष्ट में पड़ता है ॥९१॥ पुनः अपने शुभ कर्मों के उदय से दुष्कर्मों के बन्धन से छूटकर इस
संसार में चक्र की भाँति परवश होकर भ्रमण करता है। इसके विपरीत संयम, निवृत्ति, भक्ति और तपस्या के
बल से सुखप्रद, शुभ सिद्धियों को मनुष्य प्राप्त करते हैं ॥९२-९४॥
श्रीनारदीयपुराण के पूर्वभाग के द्वितीयपाद में साठवां अध्याय समाप्त ॥६०॥
अध्याय ६१
सनत्कुमार बोले - शोक नाश के लिये शान्तिप्रद, शुभ, शोक-विनाशक शास्त्र का अध्ययन या श्रवण
करने से ज्ञान और ज्ञान से सुख की प्राप्ति होती है ॥१॥ प्रति दिन मूढ़ मानव सैकड़ों प्रकार के दुःख और सुखों
५२६
एकषष्टितमोऽध्यायः
अनिष्टसंप्रयोगाच्च विप्रयोगात्प्रियस्य च । मनुष्या मान सैर्दुःखैर्युज्यन्ते येऽल्पबुद्धयः ॥३॥
द्रव्येषु समतीतेषु ये गुणास्तान्न चिंतयेत् । ताननाद्रियमाणश्च स्नेहबन्धाद्विमुच्यते ॥४॥
दोषदर्शी भवेत्तत्र यत्र रागः प्रवर्त्तते । अनिष्टबुद्धितां यच्छेत्ततः क्षिप्रं विरज्यते ॥५॥
नार्थो न धर्मो न यशो योऽतीतमनुशोचति । अस्याभावेन युज्येत तच्चास्य तु निवर्तते ॥६॥
गुणैर्भूतानि युज्यंते तथैव च न युज्यते । सर्वाणि नैतदेकस्य शोकस्थानं हि विद्यते ॥७॥
मृतं वा यदि वा नष्टं योऽतीतमनुशोचति । दुःखेन लभते दुःखं महानर्थे प्रपद्यते ॥८॥
दुःखोपघाते शारीरे मानसे चाप्युपस्थिते । यस्मिन्न शक्यते कर्तुं यत्नस्तन्नानुचिंतयेत् ॥६॥
भेषज्यमेतद्दुःखस्य यदेतन्नानुचिंतयेत् । चिंत्यमानं हि न व्येति भूयश्चाभिव्रवर्द्धते ॥१०॥
प्रज्ञया मानसं दुःखं हन्याच्छारीरमौषधैः । एतद्विज्ञाय सामर्थ्यं न वान्यैः समतामियात् ॥११॥
अनित्यं जीवितं रूपं यौवनं द्रव्यसञ्चयः । आरोग्यं प्रियसंवासं न गृध्येत्पंडितः क्वचित् ॥१२॥
नाज्ञानप्रभवं दुःखमेकं शोचितुमर्हति । अशोचन्प्रतिकुर्वीत यदि पश्येदुपक्रमम् ॥१३॥
सुखात्प्रियतरं दुःखं जीविते नात्र संशयः । जरामरणदुःखैभ्यः प्रियमात्मानमुद्धरेत् ॥१४॥
मजंति हि शरीराणि रोगाः शारीरमानसाः । सायका इव तीक्ष्णाग्राः प्रयुक्ता दृढधन्विभिः ॥१५॥
व्याधितस्य चिकित्साभिस्त्रस्यतो जीवितेषिणः । आमयस्य विनाशाय शरीरमनुकृष्यते ॥१६॥
में फंसता है परन्तु पंडित नहीं ॥२॥ अवांछित वस्तु के संयोग और प्रिय वस्तु के वियोग से अल्प बुद्धि मनुष्यों को
मानसिक कष्ट प्राप्त होता है ॥३॥ अतीत वस्तुओं के गुणों का चिन्तन नहीं करना चाहिए । ऐसी वस्तुओं और
उनके गुणों की चिन्ता न करने वाला व्यक्ति स्नेह-बन्धन (आसक्ति) से मुक्त हो जाता है ॥४॥ जिस विषय की
ओर अनुरक्ति हो उस विषय के दोषों को ही देखना चाहिए । इस प्रकार उसको अपना अनिष्टकारक समझने
से मनुष्यों को उस विषय से विराग हो जाता है ॥५॥ जो अतीत विषयों का चिन्तन करता है उससे न तो उसका
कुछ प्रयोजन ही सिद्ध होता है और न धर्म या यश ही मिलता है। जो इस भाव से विचार करता है, वह कष्टों
से निवृत्त हो जाता है ॥६॥ प्राणी कभी विषय-गुणों में आसक्त होते हैं और कभी उससे विरक्त क्योंकि सब
पदार्थ एक ही व्यक्ति के लिये शोक के कारण नहीं होते हैं। ॥७॥ जो मृत, नष्ट अथवा बीती हुई घटनाओं के
लिए शोक करता है, वह अपनी इस दुःखजनक प्रवृत्ति के कारण दुःख पाता है और महान् अनर्थों के जाल में फंस
जाता है ॥८॥ यदि शारीरिक या मानसिक दुःख में पड़ जाने पर उस दुःख को दूर नहीं किया जा सकता तो फिर
उसके विषय में कुछ शोक करना ही व्यर्थ है ॥९॥ दुःख दूर करने की सबसे बड़ी ओषधि यह है कि उसकी चिन्ता
ही न करे, क्योंकि चिन्ता करने से दुःख बढ़ते ही हैं, घटते नहीं ॥१०॥ प्रज्ञा से मानस रोगों को और ओषधि से
शरीर के रोगों को नष्ट करना चाहिए, इस सिद्धान्त को समझकर अपनी शक्ति से दुःखों को नष्ट करना चाहिए,
इसके अतिरिक्त अन्य साधनों को अपनाने से समभाव को प्राप्ति नहीं होती ॥११॥ कभी और कहीं पर भी पंडित
जीवन, रूप, यौवन, धन-संग्रह, आरोग्य, प्रिय साहचर्य आदि अनित्य वस्तुओं की इच्छा न करे ॥१२॥ अज्ञान
के कारण उत्पन्न होने वाले एक दुःख की भी चिन्ता करना उचित नहीं, क्योंकि यदि मनुष्य किसी प्रकार की
चिन्ता न कर उसके मूल कारणों पर विचार करे तो वह अवश्य उन दुःखों को दूर कर सकता है ॥१३॥ इस
जीवन में निस्सन्देह सुख की अपेक्षा दुःख ही अधिक होता है। इसलिये बुढ़ापा, मृत्यु और दुःखों से अपने प्रिय
आत्मा का उद्धार करना चाहिए ॥१४॥ वीर धनुर्धारी के फेंके हुए नुकीले बाणों की भाँति शारीरिक और
मानसिक रोग मनुष्य के शरीर और मन में प्रवेश कर जाते हैं ॥१५॥ चिकित्साओं से भयभीत तथा जीने
के इच्छुक रोगी के रोग को दूर करने में उसके शरीर का ही नाश होता है ॥१६॥ परन्तु वस्तुतः नदी की धारा
६७ ना० पु०
५३० नारदीयपुराणम्
त्रंसंति न निवर्तंते स्रोतांसि सरितामिव । आयुरादाय मर्त्यानां राज्यहानिः पुनःपुनः ॥१७॥
अपयंत्ययमप्यंतं पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः । जातं मत्यं जरयति निमिषं नावतिष्ठते ॥१८॥
सुखदुःखामिभूतानामजरो जरयत्यसून् । आदित्यो ह्यस्तमभ्येति पुनःपुनरुदेति च ॥१९॥
अदृष्टपूर्वानादाय भावा नपरिशंकितान् । इष्टानिष्टा मनुष्याणां मतं गच्छन्ति रात्रयः ॥२०॥
यो यदिच्छेद्यथाकामं कामानां तत्तदाप्नुयात् । यदि स्यान्न पराधीनं पुरुषस्य क्रियाफलम् ॥२१॥
संयताश्चैव दक्षाश्च मतिमंतश्च मानवाः । दृश्यंते निष्फलाः संतः प्रहीनाश्च स्वकर्मभिः ॥२२॥
अपरे निष्फलाः संतो निर्गुणाः पुरुषाधमाः । आशाभिरप्यसंयुक्ता दृश्यन्ते सर्वकामिनः ॥२३॥
भूतानामपरः कश्चिद्धिंसाया सततोत्थितः । वंचनायां च लोकेषु ससुखेष्वेव जीर्यते ॥२४॥
अचेष्टमानमासीनं श्रीः कंचिदुपतिष्ठति । कश्चित्कर्माणि कुरुते न प्राप्यमधिगच्छति ॥२५॥
प्रारब्धानि समाचक्षु पुरुष्य प्रधानतः । शुक्रमन्यत्र संभूतं पुनरन्यत्र गच्छति ॥२६॥
तस्य योनौ प्रसक्तस्य गर्भो भवति मानवः । आम्रपुष्पोपमा यस्य निवृत्तिरुपलभ्यते ॥२७॥
केषांचित्पुत्रकामानामनुसन्तानमिच्छताम् । सिद्धौ प्रयतमानानां नैवांडमुपजायते ॥२८॥
गर्भादुद्विजमानानां क्रुद्धादाशीविषादिव । आयुष्मान् जायते पुत्रः कथं प्रेतः पितेव सः ॥२९॥
देवानिष्ट्वा तपस्तप्त्वा कृपणेः पुत्रहेतुभिः । दशमासान्परिवृता जायन्ते कुलपांसनाः ॥३०॥
की भाँति रात और दिन मनुष्य की आयु को लेकर भागते ही जाते हैं और पीछे नहीं लौटते ॥१७॥ समय
शुक्ल और कृष्ण पक्ष के रूप में दूर होता जाता है और जन्मे हुए मनुष्य को बूढ़ा बना देता है । वह एक क्षण
भी रुकता नहीं ॥१८॥ अमर सूर्य प्रति दिन बारबार उदित होता और अस्त होता है, और सुख-दुःख से घिरे
प्राणियों को बूढ़ा बना देता है ॥१९॥ अनुकूल या प्रतिकूल रात्रियां मनुष्यों के समीप आशा के विपरीत अभूत-पूर्व
भाव (घटना) प्रस्तुत कर देती हैं ॥२०॥ मनुष्य अपनी इच्छा के अनुसार अवश्य अपने मनोरथों को प्राप्त कर लेता
यदि इसके कार्यों का फल दूसरे के अधीन न होता ॥२१॥ प्रायः संयमी-मतिमान् और कर्मकुशल मानव किसी अपने
कार्य का फल न पाने पर उस कार्य को छोड़ देते हैं । परन्तु दूसरे अधम और अज्ञानी मानव कर्मफल न पाने पर
भी और अपनी आशाओं की असफलता होने पर भी सब प्रकार की कामनाओं के पीछे मरते हुए देखे जाते हैं
॥२२-२३॥ इस संसार में प्राणियों में तीसरे प्रकार के लोग हैं जो सर्वदा हिंसा, वंचना आदि में ही लगे
रहते हैं परन्तु वे सुखपूर्वक अपने में बुढ़ापा को देखते हैं ॥२४॥ कोई किसी प्रकार की चेष्टा नहीं
करता, यों ही बैठा रहता है, परन्तु लक्ष्मी स्वयं उसके पास चली आती है। फिर कोई कर्म करता हुआ भी अपने
प्राप्य फल को नहीं पाता है ॥२५॥ इसमें पुरुष का प्रारब्ध ही प्रधान है। देखो, वीर्य अन्यत्र पैदा होता है और
अन्यत्र जाकर संतान उत्पन्न करता है। आम्रपुष्प के समान जिसको निवृत्ति प्राप्त होती है वह कभी तो योनि
में पहुँचकर गर्भ धारण करने में समर्थ होता है और कभी नहीं होता । कितने ही लोग पुत्र-पौत्र की इच्छा रखकर
उसकी सिद्धि के लिए यत्न करते रहते हैं, तो भी उनके संतान नहीं होती ॥२६-२८॥ और कितने ही मनुष्य
संतान को क्रोध में भरा हुआ सांप समझकर सदा उससे डरते हैं, तो भी उनके यहाँ दीर्घजीवी पुत्र उत्पन्न हो
जाता है; मानो वह स्वयं किसी प्रकार परलोक से आकर प्रकट हो गया हो ॥२९॥ कितने ही गर्भ ऐसे हैं, जो
पुत्र की अभिलाषा रखने वाले दीन स्त्री-पुरुषों द्वारा देवताओं की पूजा और तपस्या करके प्राप्त किये जाने हैं
और दस मास तक माता के उदर में धारण किये जाने के बाद जन्म लेने पर कुलांगार निकल जाते हैं ॥३०॥
५३१
एकषष्टितमोऽध्यायः
अपरे धनधान्यानि भोगांश्च पितृसंचितान् । विमलानभिजायन्ते लब्ध्वा तैरेव मङ्गलैः ॥३१॥
अन्योन्यं समभिप्रेत्य मैथुनस्य समागमे । उपद्रव इवादृष्टो योनौ गर्भः प्रपद्यते ॥३२॥
स्निग्धत्वाद्विद्रियार्थेषु मोहान्मरणमप्रियम् । परित्यजति यो दुःखं सुखमप्युभयं नरः ॥३३॥
अत्येति ब्रह्मसोऽत्यन्तं सुखमव्यश्नुते परम् । दुःखमर्था हि त्यज्यंते पालने च न ते सुखाः ॥३४॥
श्रुतैवै नाधिगमनं नाशमेषां न चिंतयेत् । अन्यामन्यां धनावस्थां प्राप्य वैशेषिका नराः ॥३५॥
अतृप्ता यांति विध्वंसं सन्तोषं यांति पंडिताः । सर्वे क्षयांता निचयाः पतनांताः समुच्छ्रयाः ॥३६॥
संयोगा विप्रयोगांता मरणांतं हि जीवितम् । अन्तो नास्ति पिपासायास्तुष्टिस्तु परमं सुखम् ॥३७॥
तस्मात्संतोषमेवेह धनं शंसन्ति पंडिताः । निमेषमात्रमपि हि योऽधिगच्छन्न तिष्ठति ॥३८॥
सशरीरेऽवनित्येषु नित्यं किमनुचिंतयेत् । भूतेषु भावं संचित्य ये बुद्ध्या तमसः परम् ॥३९॥
न शोचंन्ति गताध्वानः पश्यंति परमां गतिम् । संचिन्वन्तनेकमेवैनं कामानां वितृप्तकम् ॥४०॥
व्याघ्रपशुमिवासाद्य मृत्युरादाय गच्छति । अथाप्युपायं संपश्येद्दुःखस्यास्य विमोक्षणे ॥४१॥
अशोचन्नारभेन्नैव युक्तश्चाव्यसनी भवेत् । शब्दे स्पर्शे रसे रूपे गंधे च परमं तथा ॥४२॥
उन्हीं मांगलिक कृत्यों से प्राप्त हुए बहुत-से ऐसे पुत्र हैं, जो जन्म लेने के साथ ही पिता के संचित किये
हुए अपार धन-धान्य और विपुल भोगों के अधिकारी होते हैं ॥३१॥ फिर वही जीव विषयों में आसक्त
होने के कारण अप्रिय मृत्यु को प्राप्त कर किसी दम्पति के मैथुन-रत होने पर उसके गर्भ में प्रविष्ट हो जाता
है ॥३२॥
जो सुख और दुःख दोनों की चिन्ता छोड़ देता है, वह अविनाशी ब्रह्म को प्राप्त होता है और परमानन्द
का अनुभव करता है ॥३३॥ धन के उपार्जन में बड़ा कष्ट होता है, उसकी रक्षा में भी सुख नहीं है तथा उसके
खर्च करने में भी क्लेश ही होता है, अतः धन को प्रत्येक दशा में दुःखदायक समझकर उसके नष्ट होने पर
चिन्ता नहीं करनी चाहिए ॥३४॥ मनुष्य धन का संचय करते-करते पहले की अपेक्षा ऊँची स्थिति को प्राप्त
करके भी कभी तृप्त नहीं होते । वे और अधिक धन कमाने की आशा लिये हुए ही मर जाते हैं, और विद्वान्
पुरुष सदा सन्तुष्ट रहते हैं। संग्रह का अन्त है विनाश, सांसारिक ऐश्वर्य की उन्नति का अन्त है उस ऐश्वर्य की
अवनति । संयोग का अन्त है वियोग और जीवन का अन्त है मरण । तृष्णा का कभी अन्त नहीं होता । सन्तोष ही
परम सुख है ॥३५-३७॥ अतः पण्डित जन इस लोक में सन्तोष को ही उत्तम धन कहते हैं। आयु निरन्तर बीती
जा रही है। वह पल भर भी विश्राम नहीं लेती। जब अपना शरीर ही अनित्य है, तब इस संसार की दूसरी
किस वस्तु को नित्य समझा जाय ? ॥३८॥ जो मनुष्य सब प्राणियों के भीतर मन से परे परमात्मा की स्थिति
मानकर उन्हीं का चिन्तन करते हैं, वे संसार यात्रा समाप्त होने पर परमपद का साक्षात्कार करते हुए शोक
के पार हो जाते हैं ॥३९-४०॥
जैसे वन में नई-नई घास की खोज में विचरते हुए अतृप्त पशु को सहसा व्याघ्र आकर दबोच लेता है;
उसी प्रकार भोगों की खोज में लगे हुए अतृप्त मनुष्य को मृत्यु उठा ले जाती है । इसलिए छुटकारा पाने का
उपाय अवश्य सोचना चाहिए ॥४१॥ जो शोक छोड़कर साधन आरंभ करता है और किसी व्यसन में आसक्त
नहीं होता, उसकी मुक्ति हो जाती है। धनी हो या निर्धन, सबको उपभोगकाल में ही शब्द, स्पर्श, रूप, रस
और उत्तम गन्ध आदि विषयों में किञ्चित् सुख का अनुभव होता है। उपभोग के पश्चात् उनमें कुछ नहीं रहता
५३२ नारदीयपुराणम्
नोपभोगात्परं किंचिद्धनिनो वाऽधनस्य वा । प्राक्सं प्रयोगाद्भूतानां नास्ति दुःखमनामयम् ॥४३॥
विप्रयोगश्च सर्वस्य न वाचा न च विद्यया । प्रणयं परिसंहृत्य संस्तुतेष्वितरेषु च ॥४४॥
विचरेदसमुन्नद्ध स सुखी स च पंडितः । अध्यात्मगतमालीनो निरपेक्षो निरामिषः ॥४५॥
आत्मनैव सहायेन यश्चरेत्स सुखी भवेत् । सुखदुःखविपर्यासो यदा समुपपद्यते ॥४६॥
चैनं प्रज्ञा सुनियतं त्रायते नापि पौरुषम् । स्वभावाद्यस्तमातिष्ठेद्यत्नवान्नावसीदति ॥४७॥
उपद्रव इवानिष्टो योनि गर्भः प्रपद्यते । तानि पूर्वशरीराणि नित्यमेकं शरीरिणम् ॥४८॥
प्राणिनां प्राणसंरोधे मांसश्लेष्मविचेष्टितम् । निर्दग्धं परदेहेन परदेहं बलाबलम् ॥४९॥
विनश्यति विनाशांते नावि नावमिवाचलाम् । संगत्या जठरे न्यस्तं रेतोविंदुमचेतनम् ॥५०॥
केन यत्नेन जीवंतं गर्भं त्वमिह पश्यसि । अन्नपानानि जीर्यंते यत्र भक्ष्याश्च भक्षिताः ॥५१॥
तस्मिन्नेवोदरे गर्भः किं नान्नभिव जीर्यति । गर्भे मूत्रपुरीषाणां स्वभावनियता गतिः ॥५२॥
धारणे वा विसर्गं च न कर्तुं विद्यतेऽवशः । प्रभवंत्युदरे गर्भा जायमानास्तथापरे ॥५३॥
आगमेन सहान्येषां विनाश उपपद्यते । एतस्माद्योनिसंबंधाद्यो जीवनपरिमुच्यते ॥५४॥
पूजां न लभते कांचिद्द्वन्द्वेषु मज्जति । गर्भस्थ सह जातस्य सप्तमीमीदृशों दशाम् ॥५५॥
प्राप्नुवंति ततः पंच न भवंति शतायुषः । नाभ्युत्थाने मनुष्याणां योगाः स्युर्नात्र संशयः ॥५६॥
व्याधिभिश्च विवर्ध्यंते व्याघ्रैः क्षुद्रमृगा इव । व्याधिभिर्भक्ष्यमाणानां त्यजतां विपुलं धनम् ॥५७॥
वेदना नापकर्षन्ति यतमानाश्चिकित्सकाः । ॥५८॥
॥४२॥ प्राणियों को एक-दूसरे से संयोग होने के पहले कोई दुःख नहीं होता । जब संयोग के बाद
प्रिय का वियोग होता है तभी सब को दुःख हुआ करता है । अतः परिचित और अपरिचित
सभी के प्रति आसक्ति का त्याग कर निरभिमानपूर्वक जो विचरण करता है, वही सुखी और पण्डित
है ॥४३-४४॥ जो अपने स्वरूप में स्थित, निरपेक्ष, निर्द्वन्द्व तथा अकेला होकर विचरण करता है, वही सुखी
है ॥४५॥ जब सुख और दुःख में वैपरीत्य दिखाई पड़ता है तब न तो प्रज्ञा और न पुरुषार्थ हो उसको बचा
पाता है जो स्वाभाविक रूप से सुख-दुःख का उपभोग करता है तथा प्रयत्नशील रहता है, वह दुःखी नहीं
होता ॥४६-४७॥ शरीर छूटने पर वही फिर दूसरे प्राणी के गर्भ में प्रवेश करता है । तब उसको पूर्व शरीर का
स्मरण नहीं रहता है । पुनः प्राण वायु के अवरुद्ध हो जाने पर मांस, कफ आदि से युक्त इस शरीर को जला
दिया जाता है । विनाश के बाद फिर यह जीव किसी स्त्री-पुरुष के समागम द्वारा अचेतन शुक्र-बिन्दु के रूप में उदर
में पहुँचा दिया जाता है तथा वहां वह उसी प्रकार अचल हो जाता है, जैसे एक अचल नाव में बंधी हुई दूसरी
नाव ॥४८-५०॥ गर्भ में वह कैसे जीवन धारण कर लेता है? जब उदर में अन्न, पान तथा भक्षित सभी
पदार्थ जीर्ण हो जाते हैं तब यह गर्भ अन्न की ही तरह क्यों नहीं जीर्ण होता है ? ॥५१॥ गर्भ में मूत्र
और विष्ठा की गति स्वाभाविक है । उनके धारण और त्याग करने में कोई स्वतन्त्र नहीं हो सकता ॥५२॥ कुछ
गर्भ उदर में रहते हैं और कुछ उत्पन्न होते हैं जो आगमन के साथ ही विनाश भो लिये रहते हैं ॥५३॥ जो व्यक्ति
इस योनि-से मुक्त हो जाता है, वह किसी प्रकार की प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त करता है, वह पुनः (सुख दुःख आदि)
द्वन्द्वों में निमग्न हो जाता है ॥५४॥ गर्भ से निकलने पर जीव १२५ वर्ष की परमायु प्राप्त करता है । मनुष्यों के
उत्थान में योग उतने साधक नहीं होंगे जितना ज्ञानमार्ग, यह निश्चित है। जिस प्रकार बाघ क्षुद्र जीवों का वध कर
देता है उसी प्रकार रोग व्याधि उन मनुष्यों को पीड़ित कर देते हैं ॥५५-५६॥ मनुष्यों के रोगी हो जाने पर अत्यधिक
धन खर्च करने पर भी उनकी वेदना को चिकित्सक प्रयत्न करने पर दूर नहीं कर पाते हैं ॥५७-५८॥ यहाँ तक कि
एकषष्टितमोऽध्यायः ५३३
ते चापि विविधा वैद्याः कुशला संमतौषधाः । व्याधिभिः परिकृष्यंते मृगा व्याघ्रै रिवादिताः ॥५९॥
ते पिबंति कषायांश्च सर्पींषि विविधानि च । दृश्यंते जरया भग्ना नागैर्नागा इवोत्समाः ॥६०॥
कैर्वा भुवि चिकित्स्यंते रोगार्ता मृगपक्षिणः । श्वापदाश्च दरिद्राश्च प्रायो नार्ता भवंति ते ॥६१॥
घोरानपि दुराधर्षान्नृपतीनुग्रतेजसः । आक्रम्य रोग आदत्ते पशून्पशुपचो यथा ॥६२॥
इति लोकमनाक्रन्दं मोहशोकपरिप्लुतम् । स्रोतसा महता क्षिप्र ह्रियमाणं बलीयसा ॥६३॥
न धनेन न राज्येन नोग्रेण तपसा तथा । स्वभावा ह्यतिवर्तन्ते ये निर्मुक्ताः शरीरिषु ॥६४॥
उपर्युपरि लोकस्य सर्वो भवितुमिच्छति । यतते च यथाशक्ति न च तद्वर्तते तथा ॥६५॥
न म्रियेरन्नजीर्येरन्सर्वे स्युः सार्वकामिकाः । नाप्रियं प्रतिपद्येरन्नुत्थानस्य फलं प्रति ॥६६॥
ऐश्वर्यमदमत्ताश्च मानान्मथमदेन च । अप्रमत्ताः शठाः क्रूरा विक्रांताः पर्युपासते ॥६७॥
शोकाः प्रतिनिवर्तंते केषांचिदसमीक्षताम् । स्वं स्वं च पुनरन्येषां न कंचिदतिगच्छति ॥६८॥
महच्च फलवैषम्यं दृश्यते कर्मसंधिषु । वहंति शिविकामन्ये यांत्यन्ये शिविकारुहाः ॥६९॥
सर्वैषामृद्धिकामानामन्ये रथपुरःसराः । मनुजाश्च गतश्रीकाः शतशो विविधाः स्त्रियः ॥७०॥
द्वंद्वा रामेषु भूतेषु गच्छन्त्येकैकशो नराः । इदमन्यत्परं पश्य नात्र मोहं करिष्यसि ॥७१॥
धर्मं चापि त्यजाधर्मं त्यज सत्यानृतां धियम् । सर्वं त्यक्त्वा स्वरूपस्थः सुखी भव निरामयः ॥७२॥
वे वैद्य भी जो ओषधि प्रयोग में अत्यन्त कुशल होते हैं—रोगों के उसी प्रकार शिकार बन जाते हैं जिस प्रकार
मृग बाघ के शिकार बनते हैं । वे विभिन्न प्रकार की कसैली ओषधियाँ, घी आदि पीते हैं परन्तु बुढ़ापे के द्वारा
उसी प्रकार मरोड़ दिये जाते हैं जिस प्रकार बली हाथी निर्बल हाथी को मरोड़ देता है ॥५९-६०॥ इस लोक
में रोगपीड़ित मृग, पक्षी, कुत्ते आदि हिंसक जीव और दरिद्रों की कौन चिकित्सा करता है, परन्तु वे दुःखी नहीं
होते ॥६१॥ घोर, प्रचण्ड तेजस्वी राजाओं पर भी रोग आक्रमण कर (उन्हें) इस प्रकार मार डालते हैं जिस प्रकार
बधिक पशुओं को ॥६२॥ इस प्रकार मोह-शोक से व्याप्त, अपने शीघ्रगामी, शक्तिशाली प्रवाह में हठात् सब
को बहा ले जाने वाले और पार न पाने योग्य संसार से कोई धन, राज्य या उग्र तपस्या के द्वारा पार नहीं जा
सकता; परन्तु जो मुक्त पुरुष हैं वे सहज ही में उसको पार कर जाते हैं ॥६३-६४॥ सभी इस संसार में अपने
को सर्वोपरि बनाने के लिये इच्छुक रहते हैं और यथाशक्ति प्रयत्न भी करते हैं, परन्तु वे उस स्थिति में पहुँच
नहीं पाते ॥६५॥ सब अपनी मृत्यु और बुढ़ापे की संभावना नहीं करते, वे अपने को अमर और चिर युवक समझ
कर सब प्रकार की इच्छायें करते रहते हैं और अपने प्रारम्भ किये हुए कर्म फल के प्रति अप्रिय भावना नहीं
रखते ॥६६॥ जो ऐश्वर्य के मद से मत्त, गर्वी, प्रमादी, शठ, क्रूर और पराक्रमी पुरुष कर्म की उपासना करते
हैं, उन्हें शोक प्राप्त होते हैं; किन्तु ज्ञानमार्गियों को शोक नहीं होते फिर इस लोक में कर्म संधियों (अर्थात् कर्म
के मार्गों) में फल के विषयों में बहुत बड़ी विषमता देखी जाती है। कोई तो पालकी को कन्धे पर रखकर ढोता
है और कोई उस पर चढ़कर चलता है ॥६७-६९॥ विभव चाहने वाले सब पुरुषों में कोई-कोई तो रथ आदि पर चढ़
कर चलते हैं और अधिक संख्या में दरिद्र होते हैं, इसी प्रकार अधिकांश स्त्रियों की भी यही दशा है ॥७०॥ प्रायः
प्राणी सुख-दुःख के चक्कर में एक-एक कर के पड़ ही जाते हैं। तुम इनसे अतिरिक्त विषयों को ही देखो अर्थात्
सुखःदुख की भावना से अपने को ऊपर उठाओ । इस प्रकार तुम मोह में नहीं पड़ोगे ॥७१॥ तुम धर्म, अधर्म,
सत्य और असत्य की भावना को छोड़ो इस प्रकार सब प्रकार को द्वन्द्व भावना का परित्याग कर अपने स्वरूप
५६४ नारदीयपुराणम्
एतत्ते परमं गुह्यमाख्यातम्ऋषिसत्तम । येन देवाः परित्यज्य मर्त्यलोकं दिवं गताः ॥७३॥
सनंदन उवाच
इत्युक्त्वा व्यासतनयं समापृच्छ्य महामुनिः । सनत्कुमारः प्रययौ पूजितस्तेन सादरम् ॥७४॥
शुकोऽपि योगिनां श्रेष्ठः सम्यग्ज्ञात्वा ह्यवस्थितिम् । ब्रह्मणः पदमन्वेष्टुमुत्सुकः पितरं ययौ ॥७५॥
ततः पित्रा समागम्य प्रणम्य च महामुनिः । शुकः प्रदक्षिणीकृत्य ययौ कैलाशपर्वतम् ॥७६॥
व्यासस्तद्विरहाद्दनः पुत्रस्नेहसमावृतः । क्षणैकं स्थीयतां पुत्र इति चुक्रोश दुर्मनाः ॥७७॥
निरपेक्षः शुको भूत्वा निःस्नेहो मुक्तबन्धनः । मोक्षमेवानुसंचिन्त्य गत एव परं पदम् ॥७८॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे एकषष्टितमोऽध्यायः ॥६१॥
अथ द्विषष्टितमोऽध्यायः
सूत उवाच
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं नारदो भगवानृषिः । पुनः पप्रच्छ तं विप्र शुकाभिगमनं मुनिम् ॥१॥
में स्थित हो सुखी और निर्द्वन्द्व हो जाओ ॥७२॥ ऋषिवर ! इस परमगुप्त आख्यान को मैंने तुमसे कह दिया
जिसके प्रभाव से देवताओं ने इस मृत्युलोक को छोड़कर स्वर्ग में स्थान प्राप्त किया ॥७३॥
सनन्दन जी बोले--महामुनि ब्रह्मतनय ने व्यासपुत्र के पूछे हुए प्रश्नों का इस प्रकार उत्तर देकर उनसे
आदर पूर्वक पूजित होने के पश्चात् अपने स्थान को चले गए ॥७४॥ योगिवर शुक भी लोकस्थिति का भली
भांति ज्ञान प्राप्त कर ब्रह्मपद को ढूंढ़ने के लिये उत्सुक हो अपने पिता के पास गये ॥७५॥ महामुनि शुक पिता
से मिलकर प्रदक्षिणापूर्वक उन्हें प्रणाम करके कैलाश पर्वत को चले गये ॥७६॥ व्यास जी पुत्र विरह से व्याकुल
होकर पुत्र स्नेह के कारण दुःखी हो गए और पुत्र ! एक क्षण भी तो ठहरो, कह कर चिल्ला पड़े ॥७७॥ परन्तु
शुक ने निरपेक्ष और निर्मोही होकर सारे सांसारिक बन्धनों को छिन्न-भिन्न करके मोक्ष की ही चिन्ता करते हुए
परमपद प्राप्त कर लिया ॥७८॥
श्री नारदीय पुराण के पूर्वभाग के द्वितीय पाद में इकसठवां अध्याय समाप्त ॥६१॥
अध्याय ६२
मोक्ष-धर्म का निरूपण
सूत ने कहा--भगवान् नारद ऋषि ने इतने आख्यान को सुन लेने के बाद फिर शुकदेव जी को ही
लक्ष्य करके मुनि से पूछा ॥१॥
द्विषष्टितमोऽध्यायः ५३५
नारद उवाच
भगवन्सर्वमाख्यातं त्वयाऽतिकरुणात्मना । यच्छ्रुत्वा मानसं मेऽद्य शांतिमग्र्यामुपागतम् ॥२॥
पुनश्च मोक्षशास्त्रं मे त्वमादिश महामुने । नहि सम्पूर्णतामेति तृष्णा कृष्णगुणार्णवे ॥३॥
ये तु संसारनिर्मुक्ता मोक्षशास्त्रपरायणाः । कुत्र ते निवसंतीह संशयो मे महानयम् ॥
तं छिन्धि सुमहाभाग त्वत्तो नान्यो विदांवरः । ॥४॥
सनंदन उवाच
॥५॥
धारयामास चात्मानं यथाशास्त्रं महामुनिः ।
पादात्प्रभृति गात्रेषु क्रमेण क्रमयोगवित् । ततः स प्राङ्मुखो विद्वानादित्येन विरोचिते ॥६॥
पाणिपादं समाधाय विनीतवदुपाविशत् । न तत्र पक्षिसंघातो न शब्दो न च दर्शनम् ॥७॥
यत्र वैयासकिर्द्धाग्नि योक्तुं समुपचक्रमे । स ददर्श तदात्मानं सर्वसंगविनिःसृतः ॥८॥
प्रजहास ततो हासं शुकः सम्प्रेक्ष्य भास्करम् । स पुनर्योगमास्थाय मोक्षमार्गोपलब्धये ॥९॥
महायोगेश्वरो भूत्वा सोऽत्यक्रामद्विहायसम् । अंतरिक्षचरः श्रीमान्व्यासपुत्रः सुनिश्चितः ॥१०॥
तमुद्यंतं द्विजश्रेष्ठं वैनतेयसमद्युतिम् । ददृशुः सर्वभूतानि मनोमारुतरंहसम् ॥११॥
यथाशक्ति यथान्यायं पूजयांचक्रिरे तथा । पुष्पवर्षैश्च दिव्यैस्तमवचक्रु र्दिवौकसः ॥१२॥
तं दृष्ट्वा विस्मिताः सर्वे गंधर्वाप्सरसां गणाः । ऋषयश्चैव संसिद्धाः कोऽयं सिद्धिमूपागतः ॥१३॥
नारद बोले—अत्यन्त करुण हृदय आपने उन सब रहस्यों को बता दिया जिसको सुनकर आज मेरे मन
ने अत्यन्त श्रेष्ठ शान्ति प्राप्त की ॥२॥ मुने ! अब आप पुनः मोक्ष शास्त्र के विषय में मुझको कुछ उपदेश
दीजिए । मेरी पुण्य श्रवण की तृष्णा कृष्ण गुण गान रूपी सागर में निमग्न होकर भी शान्त नहीं हो रही है
॥३॥ जो संसार से मुक्त और मोक्षशास्त्र के पारगामी विद्वान् हैं वे इस लोक में कहाँ निवास करते हैं, यह
मुझे बहुत बड़ा सन्देह है । महाभाग ! आप इस सन्देह को दूर कीजिये क्योंकि आपसे बढ़कर ज्ञानी इस लोक
में अन्य कौन है ? ॥४॥॥
सनन्दन बोले-उस क्रमयोग को जानने वाले महामुनि ने शास्त्रानुसार पैर से लेकर सर्वाङ्ग तक
धारणा (मन्त्रों द्वारा अंग स्पर्श) की । तदनन्तर वह विद्वान् पूर्वाभिमुख होकर सूर्य की किरणों से शोभित स्थान
पर हाथ और पैर जोड़कर विनीत मुद्रा में बैठ गया ॥५-६३॥ व्यासपुत्र शुक जिस स्थान पर योग साधना के
लिए आसीन हुए वहाँ न तो पक्षियों का कलरव होता था और न किसी प्रकार का शब्द सुनाई पड़ता था ।
यहाँ तक कि किसी अन्य प्राणी का दर्शन तक दुर्लभ था । वहाँ पर उन्होंने अपने को सब प्रकार के संग से मुक्त
देखा ॥७-८॥ उस समय सूर्य देव को देख कर वे हंस पड़े और पुनः मोक्ष मार्ग को पाने के लिये योगस्थ हो कर
आकाश में उड़ने लगे । श्रीमान् व्यासपुत्र निश्चित रूप से अन्तरिक्षचारी हो गए ॥९-१०॥ उस गरुड़ के समान
द्युति वाले, मन और वायु के समान तीव्र गति वाले द्विजवर को सब लोगों ने देखा और अपनी शक्ति के अनुसार
यथोचित पूजा की । देवताओं ने भी स्वर्गीय पुष्पों की वर्षा कर उनका सत्कार किया ॥११-१२॥ उनको इस
प्रकार लोकपूजित देखकर सब गन्धर्व, अप्सरोगण, ऋषि और सिद्ध विस्मित हो कहने लगे कि यह कौन महापुरुष
५३६ नारदीयपुराणम्
ततोऽसौ स्वाह्वयं तेभ्यः कथयामास नारद । उवाच च महातेजास्तानृषीन्संप्रहर्षितः ॥१४॥
पिता यद्यनुगच्छन्मां क्रोशमानः शुकेति वै । तस्मै प्रतिवचो देयं भवद्भिस्तु समाहितैः ॥१५॥
बाढमुक्तस्ततस्तैस्तु लोकान्हित्वा चतुर्विधाम् । तमो ह्यष्टविधं त्यक्त्वा जहौ पञ्चविधं रजः ॥१६॥
ततः सत्त्वं जहौ धीमांस्तदद्भुतमिवाभवत् । ततस्तस्मिन्पदे नित्ये निर्गुणे लिगपूजिते ॥१७॥
ततः स भृङ्गेऽप्रतिमे हिमवन्मेरुसन्निभे । संश्लिष्टे श्वेतपीते च रुक्मरूप्यमये शुभे ॥१८॥
शतयोजनविस्तारे तिर्यगूर्ध्वंच नारद । सोऽविशंकेन मनसा तथैवाभ्यपतच्छुकः ॥१९॥
ते शृङ्गेऽत्यंतसंश्लिष्टे सहसैव द्विधाकृते । अदृश्येत द्विजश्रेष्ठ तदद्भुतमिवाभवत् ॥२०॥
ततः पर्वतशृंगाभ्यां सहसैव विनिःसृतः । न च प्रतिजघानास्य स गतिं पर्वतोत्तमः ॥२१॥
ततो मंदाकिनीं दिव्यामूपरिष्टादभिव्रजन् । शुको ददर्श धर्मात्मा पुष्पितद्रुमकाननम् ॥२२॥
तस्यां क्रीडासु निरताः स्नांति चैवाप्सरोगणाः । निराकारं तु साकारा ददृशुस्तं विवाससः ॥२३॥
तं प्रक्रमंतमाज्ञाय पिता स्नेहसमन्वितः । उत्तमां गतिमास्थाय पृष्ठतोऽनुससार ह ॥२४॥
शुकस्तु मारुतादूर्ध्वं गतिं कृत्वाऽन्तरिक्षगाम् । दर्शयित्वा प्रभावं स्वं सर्वभूतोऽभवत्तदा ॥२५॥
अथ योगगतिं व्यासः समास्थाय महातपाः । निमेषांतरमात्रेण शुकाभिपतनं ययौ ॥२६॥
स ददर्श द्विधा कृत्वा पर्वताग्रं गतं शुकम् । शशंसुर्मुनयः सिद्धा गतिं तस्मै सुतस्य ताम् ॥२७॥
ततः शुकेतिशब्देन दीर्घेण क्रंदितं तदा । स्वयं पित्रा स्वरेणोच्चैस्त्रैलोकाननुनाद्य वै ॥२८॥
है, जिसने सिद्धि प्राप्त कर ली है ॥१३॥ नारद ! तदनन्तर उस महातेजस्वी ने अपना नाम बताया और प्रसन्न
होकर ऋषियों से कहा कि यदि मेरे पिता जो शुक ! शुक ! चिल्लाते हुए मेरी खोज में इधर आयें तो आप
लोग सावधानी से उत्तर देने की कृपा करें ॥१४-१५॥ उन लोगों का स्वीकारात्मक उत्तर पाकर वे चार प्रकार
के लोकों और आठ प्रकार के अन्धकार का त्याग कर पांच प्रकार के रजोगुण से भी मुक्ति प्राप्त कर ली ॥१६॥
तत्पश्चात् जब उस धीमान् ने सत्त्वगुण का भी परित्याग किया तब तो वहाँ एक अद्भुत सी घटना हो गई। उस
समय वे उस नित्य, निर्गुण और शिव लिंग पूजित, सशृंग, प्रतिमामय और मेरु के समान प्रकाशित, एक में एक
गुथे हुए, श्वेत पीतवर्ण वाले, शुभ, सुनहले और रुपहले, ऊर्ध्व और तिरछे, सौ योजन विस्तृत लोक में निःशंक
मन से उतरे ॥१७-१९॥ द्विजश्रेष्ठ ! वहाँ पर अत्यन्त एक में सटे हुए और सहसा दो भागों में विभक्त दो
शिखर दिखाई दिये । यह एक अद्भुत सी घटना हुई ॥२०॥ उन पर्वत शृंगों से भी वे सहसा आगे बढ़ गए परन्तु
उनकी प्रतिज्ञा के कारण वह पर्वतोत्तम उनकी (शुक की) गति को न बाधित कर सका ॥२१॥ वहाँ से आकाश
मार्ग से आगे बढ़कर दिव्य मन्दाकिनी को उस धर्मात्मा ने देखा जिसके तट पर एक अत्यन्त खिले हुए फूलों से
सुशोभित कानन को देखा । उस देव नदी में कितनी ही अप्सरायें जलकेलि में मग्न होकर नहा रही थीं। उन
वस्त्ररहित होकर नहाने वाली साकार अप्सराओं ने उस निर्गुण शुक को देखा । ॥२२-२३॥
उसी समय पुत्र को इस प्रकार की गतिविधि को जानकर व्यास जी पुत्र स्नेह से व्याकुल होकर उत्तम
गति प्राप्तकर शुक जी के पीछे-पीछे चले ॥२४॥ यह देखकर शुक देव अपनी उस अन्तरिक्षगामी गति को वायु से
तीव्रतर बनाकर सर्वभूत मय हो गए और अपने प्रभाव की व्यापकता को दिखलाने लगे । महात्मा व्यास भी
योग क्रिया के बल से एक पल में ही शुक के पीछे दौड़ पड़े ॥२५-२६॥ मार्ग में व्यास ने पर्वत शिखर को दो भागों
में विभक्त करके आगे जाते हुए शुक को देखा ॥२७॥ मुनियों और सिद्धों ने भी व्यास के पुत्र शुक देव की इस प्रकार
की सिद्धि का वर्णन किया । तदनन्तर व्यास जी बड़े जोर से 'शुक' कह कर चिल्ला पड़े जिससे तीनों लोक भी
द्विषष्टितमोऽध्यायः ५३७
शुकः सर्वगतिर्भूत्वा सर्वात्मा सर्वतोमुखः । प्रत्यभाषत धर्मात्मा भो शब्देनानुनादयन् ॥२६॥
तत एकाक्षरं नादं भोरित्येवमुदीरयन् । प्रत्याहरज्जगत्सर्वमुच्चैः स्थावरजंगमम् ॥३०॥
ततःप्रभृति वाद्यापि शब्दानुच्चारितान्पृथक् । गिरिगह्वरपृष्ठेषु व्याजहार शुकं प्रति ॥३१॥
अंतर्हितप्रभावं तं दर्शयित्वा शुकस्तदा । गुणान्संत्यज्य सत्त्वादीन्पदमध्यगमत्परम् ॥३२॥
महिमानं तु तं दृष्ट्वा पुत्रस्यामिततेजसः । सोऽनुनीतो भगवता व्यासो रुद्रेण नारद ॥३३॥
किमु त्वं ताम्यसि मुने पुत्रं प्रति समाकुलः । पश्यसि विप्र नायांतं ब्रह्मभूतं निजांतिके ॥३४॥
इत्येवमनुनीतोऽसौ व्यासः पुनरुपाव्रजत् । स्वाश्रमं स शुको ब्रह्मभूतो लोकांश्चचार ह ॥३५॥
तत कालांतरे ब्रह्मन्व्यासः सत्यवतीसुतः । नरनारायणौ द्रष्टुं ययौ बदरिकाश्रमम् ॥३६॥
तत्र दृष्ट्वा तु तौ देवौ तप्यमानो महत्तपः । स्वयं च तत्र तपसि स्थितः शुकमनुस्मरन् ॥३७॥
यावत्तत्र स्थितो व्यासःशुकःपरमयोगवित् । श्वेतद्वीपं गतस्तात यत्र त्वमगमः पुरा ॥३८॥
तत्र दृष्टप्रभावस्तु श्रीमन्नारायणः प्रभुः । दृष्टः श्रुतिविमृग्यो हि देवदेवो जनार्दनः ॥३६॥
स्तुतश्च शुकदेवेन प्रसन्नः प्राह नारद । त्वया दृष्टोऽस्मि योगीन्द्र सर्वदेवरहःस्थितः ॥४०॥
श्रीभगवानुवाच
सनत्कुमारादिष्टेन सिद्धो योगेन वाडव । त्वं सदागतिमार्गस्थो लोकान्पश्य यथेच्छया ॥४१॥
इत्युक्तो वासुदेवेन तं नत्वारणिसंभवः । वैकुंठं प्रययौ विप्र सर्वलोकनमसकृतम् ॥४२॥
प्रतिध्वनित हो उठे । सर्वात्मा, सर्वतोमुख (चारों ओर मुख वाले) धर्मात्मा शुक ने सर्वत्र गति होकर 'भोः'
शब्द का उच्चारण किया उनकी इस 'भोः' एकाक्षर ध्वनि के अनन्तर ही सारे स्थावर जंगमात्मक जगत् ने उच्च
स्वर से ऐसी ही प्रतिध्वनि को ।।२८-३०।। उसी समय से आज तक शुक की ध्वनि के प्रतिध्वनि करने के कारण
पर्वतों की गुफाओं में शब्द ध्वनि करने पर पृथक्-पृथक् प्रतिध्वनि निकलती है ।।३१।।
उस समय अपने योग के गुप्त प्रभाव को दिखाकर शुक देव ने सत्त्व आदि गुणों का परित्याग कर परम
पद को प्राप्त कर लिया ।।३२।। नारद ! अमित तेजस्वी अपने पुत्र की योग महिमा को देख कर व्यास जी
आश्चर्यचकित हो गए। यह देखकर भगवान् रुद्र ने व्यास को समझाया ।।३३।। कि मुने ! तुम क्यों पुत्र स्नेह से
आकुल होकर इस प्रकार खेद कर रहे हो ? विप्र ! क्या तुम अपने पुत्र को ब्रह्म रूप में अपने पास आते हुए नहीं
देख रहे हो ।।३४।। इस प्रकार रुद्र से समझाये जाने पर व्यास जी पुनः अपने आश्रम को लौट आये । वह शुक
देव भी ब्रह्ममय होकर लोक में विचरण करने लगे ।।३५।। कुछ समय बीत जाने पर सत्यवती-सुत व्यास जी
नर नारायण का दर्शन करने के लिये बदरिकाश्रम को गए ।।३६।। वहाँ उन दोनों देवों को महान् तपस्या में
लीन देखकर स्वयं व्यास भी शुक का स्मरण करते हुए वहीं पर तप करने लगे ।।३७।। तात ! जितनी देर तक
व्यास जी वहाँ तपस्या करते रहे उतने समय में शुकदेव जी श्वेत द्वीप को चले गये जहाँ पर आज से बहुत पहले
तुम गये थे ।।३८।। वहाँ दृष्ट प्रभाव वाले श्रुतियों के वन्द्य और उनके द्वारा खोजने योग्य देवदेव जनार्दन नारायण
प्रभु ने शुकदेव को दर्शन दिये और शुकदेव की स्तुति से प्रसन्न होकर बोले ।।३९३॥
योगीन्द्र ! तुमने सब देवताओं से एकान्त में रहने वाले मेरा दर्शन प्राप्त कर लिया ।।४०।। ब्राह्मण !
तुमने सनत्कुमार द्वारा दिखाये गये योगपथ से सिद्धि भी प्राप्त कर ली। अब तुम वायु मार्ग पर स्थित होकर
इच्छानुकूल लोकों का अवलोकन करो ।।४१।। वासुदेव ने अरणिसंभव शुक को इस प्रकार का वरदान दिया ।
विप्र ! शुक भी उन्हें प्रणाम करके सब लोकों में श्रेष्ठ वैकुण्ठ लोक में गये ।।४२।। नारद ! जो विमान विहारी
६८ ना० पु०