बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 975, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें४५६ नारदीयपुराणम्
एवं कृतव्रतो मर्त्यो भुक्त्वा भोगानिहेप्सितान् । पितॄणां कोटिमुद्धृत्य यात्यंते वैष्णवं गृहम् ॥४६॥
एकादश्यामिवे शुक्ले विप्र पाशांकुशाह्वयाम् । उपोष्य विधिवद्विष्णोर्दिने विष्णुं समर्चयेत् ॥४७॥
ततः संभोज्य विप्राग्र्यान्दत्त्वा तेभ्यश्च दक्षिणाम् । भक्त्या प्रणम्य विसृजेदश्नीयाच्च स्वयं ततः ॥४८॥
एवं यः कुरुते भक्त्या नरः पाशांकुशाव्रतम् । स भुक्त्वेह वरान्भोगांन्याति विष्णोः सलोकताम् ॥४९॥
कार्तिके कृष्णपक्षे तु एकादश्यां द्विजोत्तम । रमामुपोष्य विधिवद्द्वादश्यां प्रातरर्चयेत् ॥५०॥
केशवं केशिहंतारं देवदेवं सनातनम् । भोजयेच्च ततो विप्रान्विसृजेल्लब्धदक्षिणाम् ॥५१॥
एवं कृतव्रतो विप्र भोगान्भुङ्क्तेह वांछितान् । व्योमयानेन संसिध्यं लभते च रमापतेः ॥५२॥
ऊर्जस्य शुक्लैकादश्यां समुपोष्य प्रबोधिनीम् । केशवं बोधयेद्रात्रौ सुप्तं गीतैर्मंगलैः ॥५३॥
ऋग्यजुःसाममंत्रैश्च वाद्यैर्नानाविधैरपि । द्राक्षेक्षुदाडिमैश्चान्यै रंभाशृंगाटकादिभिः ॥५४॥
समर्पयैस्ततो रात्र्यां व्यतीतायां परेऽहनि । स्नात्वा नित्यक्रियां कृत्वा गदादामोदरं यजेत् ॥५५॥
उपचारैः षोडशभिः पौरुषेणापि सूक्ततः । संभोज्य विप्रान्विसृजेद्दक्षिणाभिः प्रतोषितान् ॥५६॥
ततस्तां प्रतिमां हैमीं सधेनुं गुरवेऽर्पयेत् । एवं यः कुरुते भक्त्या बोधिनीव्रतमादृतः ॥५७॥
स भुक्त्वेह वरान्भोगान्वैष्णवं लभते पदम् । मार्गस्य कृष्णैकादश्यामुत्पन्नां समुपोष्य वै ॥५८॥
द्वादश्यां कृष्णमभ्यर्चेद्वंधाद्यैरुपचारकैः । ततः संभोज्य विप्राग्र्यान्दत्त्वा तेभ्यश्च दक्षिणाम् ॥५९॥
व्रत करने वाला मनुष्य अभिलषित भोगों को भोगकर करोड़ों पितरों का उद्धार करके अंत में विष्णुलोक को
जाता है ॥३६-४४॥
विप्र ! आश्विन-शुक्ल-एकादशी का नाम पाशांकुशा है । उस दिन उपवास कर द्वादशी में विधिपूर्वक
विष्णु की अर्चना करे । पश्चात् उत्तम ब्राह्मणों को खिलाकर दक्षिणा दे और भक्तिपूर्वक प्रणाम करते हुए विदा
करके स्वयं भोजन करे । जो नर इस प्रकार पाशांकुशाव्रत करता है, वह इस लोक में उत्तम भोगों का भोगकर
विष्णु के सालोक्यमोक्ष को प्राप्त करता है । द्विजश्रेष्ठ ! कार्तिक-कृष्ण-एकादशी का नाम रमा है । उस दिन
विधिवत् उपवास कर प्रातःकाल द्वादशी में केशी नामक राक्षस के मारने वाले, देवस्वामी, सनातन, केशव
भगवान् की अर्चना करे । तदनन्तर विप्रों को खिलाकर दक्षिणापूर्वक उन्हें विदा करे । विप्र ! इस प्रकार व्रत
करने वाला व्यक्ति ऐहलोकिक इष्ट भोगों को भोगकर विमान से वैकुण्ठ को जाता है ॥४५-५०॥
कार्तिक-शुक्ल-एकादशी का नाम प्रबोधिनी है । उस दिन उपवास करते हुए रात्रि में मांगलिक संगीत,
ऋग्, यजु तथा साम-मंत्र और विविध वाद्यों से केशव को जगाये । उन्हें दाख, ईख, अनार, केला और सिंघाड़ा
आदि फल चढ़ाये, रात बीत जाने पर दूसरे दिन स्नानोपरान्त नित्यक्रिया करके पुरुषसूक्त को पढ़ते हुए
दामोदर की षोडशोपचार अर्चना करे । पश्चात् विप्रों को खिलाकर दक्षिणा से उन्हें संतुष्ट करे और सुवर्णमयी
विष्णु की प्रतिमा धेनुसहित गुरु को समर्पित कर दे । जो मनुष्य इस प्रकार प्रबोधिनी व्रत को आदरपूर्वक करता
है, वह इस लोक में उत्तम भोगों को भोगकर विष्णुपद को प्राप्त करता है । अगहन-कृष्ण-एकादशी का नाम
उत्पन्ना है ॥५१-५६॥ उस दिन उपवास करते हुए द्वादशी में गंध आदि उपचारों से कृष्ण की अर्चना करे ।
तदनन्तर उत्तम ब्राह्मणों को खिलाकर उन्हें दक्षिणापूर्वक विदा करके इष्ट-मित्रों के साथ स्वयं भोजन करे ।
जो इस प्रकार भक्तिभाव से उत्पन्नाव्रत करता है, वह अन्त में विमान पर आरूढ़ होकर विष्णुलोक को जाता