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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 936, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 936

द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः ६१७
ददाति वित्तं पुत्रांश्च मतिं धर्मे शुभावहाम् । अथाषाढतृतीयायां शुक्लायां शुक्लवाससा ॥१८॥
केशवं तु सलक्ष्मीकं सस्त्रीके तु द्विजऽर्चयेत् । भोजनैः सुरभीदानैर्वस्त्रैश्चापि विभूषणैः ॥१९॥
प्रियैर्वाक्यैश्च संप्रीता नारी सौभाग्यवांञ्छया । समुपास्य व्रतं चैतद्धनधान्यसमन्विता ॥२०॥
देवदेवप्रसादेन विष्णुलोकमवाप्नुयात् । नभःशुक्लतृतीयायां स्वर्णगौरीव्रतं चरेत् ॥२१॥
उपचारैः षोडशभिर्भवानीमभिपूजयेत् । पुत्रान्देहि धनं देहि सौभाग्यं देहि सुव्रते ॥२२॥
अन्यांश्च सर्वकामान्मे देहि देहि नमोऽस्तु ते । एवं संप्रार्थ्य देवेशीं भवानीं भवसंयुताम् ॥२३॥
व्रतसंपूर्तिकाम्रा तु वायनं दापयेत्तथा । एवं षोडशवर्षाणि कृत्वा नारी व्रतं शुभम् ॥२४॥
उद्यापने चरेद्भक्त्या वित्तशाठ्यविवर्जिता । मंडपे मण्डले शुद्धे गणेशादिसुरार्चनम् ॥२५॥
कृत्वा ताम्रमयं पात्रं कलशोपरि विन्यसेत् । सौवर्णी प्रतिमां तत्र भवान्या प्रतिपूजयेत् ॥२६॥
गंधपुष्पादिभिः सम्यक् ततो होमं समाचरेत् । वेणुपात्रैः षोडशभिः पक्वान्नं परिपूरितैः ॥२७॥
समर्प्य देव्यै नैवेद्यं द्विजेभ्येतन्निवेदयेत् । वायनं च ततः पश्चाद्दद्यात्संबन्धिबन्धुषु ॥२८॥
प्रतिमां गुरवे दत्त्वा द्विजेभ्यो दक्षिणां तथा । पूर्णं लभेतफलं नारी व्रताचरणतत्परा ॥२६॥
भाद्रशुक्लतृतीयायां व्रतं वै हारितालकम् । कुर्याद्भक्त्या विधानेन पाद्यार्घ्यार्चनपूर्वकम् ॥३०॥
ततस्तु कांचने पात्रे राजते चापि ताम्रके । वेणवे मृन्मये वापि विन्यस्यान्नं सदक्षिणम् ॥३१॥
सफलं च सवस्त्रं च द्विजाय प्रतिपादयेत् । तदंते पारणं कुर्यादिष्टबन्धुजनैः सह ॥३२॥
एवं कृतव्रता नारी भुक्त्वा भोगान्मनोरमान् । व्रतस्यास्य प्रभावेण गौरीसहचरी भवेत् ॥३३॥
सौभाग्यद्रव्यस्त्राणि वंशपात्राणि षोडश । दातव्यानि प्रयत्नेन ब्राह्मणेभ्यो यथाविधि ॥३४॥
कामना करने वाली महिला-अषाढ़-शुक्ल तृतीया के दिन श्वेत वस्त्र पहनकर लक्ष्मी सहित केशव की प्रतिमा
ब्राह्मण को समर्पित करती हुई उन्हें भोजन, गोदान, वस्त्र, आभूषण तथा प्रिय वचनों से संतुष्ट करे । इस व्रत
का आचरण करने वाला व्यक्ति धनधान्य से संपन्न होकर भगवान की कृपा से वैकुण्ठ को जाता है। श्रावण शुक्ल
तृतीया को स्वर्णगौरीव्रत का अनुष्ठान करना चाहिए ॥१८-२१। गौरी को षोडशोपचार पूजा कर उनसे प्रार्थना
करे-- 'सुव्रते ! पुत्र, धन, सौभाग्य तथा अन्य समस्त फल मुझे दीजिये । देवि ! आपको नमस्कार है । इस प्रकार
शंकर सहित भवानी देवी को प्रार्थना कर व्रत-पूर्ति के लिये इष्ट-मित्रों को वायन (या नैवेद्य) दे । सोलह वर्षों तक इस
व्रत के संपादन करने के उपरान्त भक्ति से इसका उद्यापन करना चाहिये । किन्तु उसमें धन रहते कृपणता न
करे ॥२२-२४३॥ मंडप के शुद्ध प्रदेश में गणेश आदि की पूजा कर कलश के ऊपर ताँबे के पात्र को रखकर उस
पर गंध, पुष्प आदि से गौरी की सुवर्णमयी प्रतिमा की पूजा करे । पश्चात् हवन करके पकवानों से भरी हुई सोलह
डालियां देवी को चढ़ाकर ब्राह्मणों को दे दे ॥२५-२७३॥ फिर भाई-बन्धुओं को बायन देकर गुरु को प्रतिमा तथा
द्विजों को दक्षिणा दे । इस प्रकार व्रतानुष्ठान करने वाली नारी पूर्ण फल को प्राप्त करती हैं। भाद्र-शुक्ल-तृतीया में
पाद्य, अर्घ्य एवं पूजन करती हुई वनिता विधिपूर्वक हरितालिका व्रत करे । वह सोने, चाँदी या ताँबे या बाँस या
मिट्टी के पात्र में अन्न, फल, वस्त्र तथा दक्षिणा रखकर ब्राह्मण को दे और अन्त में इष्ट-बन्धुओं के साथ स्वयं पारणा
करे ॥२८-३२॥ इस तरह व्रत करने वाली नारी मनोरम भोगों को भोगकर व्रत के प्रभाव से गौरी की सहचरी
होती है । उस दिन सौभाग्य द्रव्य, वस्त्र तथा सोलह वंश-पात्र ब्राह्मणों को देना चाहिये । देवी की प्रीति के लिए