बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 928, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशाधिकशततमोऽध्यायः ६०६
सूत्रमेतत्पुराणानां यन्मयोक्तं तवाधुना । तन्नित्यं शीलनीयं हि पुराणफलमिच्छता ॥४०॥
न दांभिकाय पापाय देवगुर्वसुसूयवे । देयं कदापि साधूनां द्विषे न शठाय च ॥४१॥
शांताय शमचित्ताय शुश्रूषाभिरताय च । निर्मत्सराय शुचये देयं सद्धैष्णवाय च ॥४२॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे ब्रह्मांडपुराणानुक्रमणीनिरूपणं
नाम नवोत्तरशततमोऽध्यायः ॥१०९॥
दशाधिकशततमोऽध्यायः
नारद उवाच
पुराणसूत्रमखिलं श्रुतं तव मुखाद्विभो । मरीचये यथा प्रोक्तं ब्रह्मणा परमेष्ठिना ॥१॥
अधुना तु महाभाग तिथीनां वै कथानकम् । क्रमतो मह्यमाख्याहि यथा स्याद्व्रतनिश्चयः ॥२॥
यस्मिन्मासे तु या पुण्या तिथियेन उपासिता । यद्विधानं च पूजादेस्तत्सर्वं वद सांप्रतम् ॥३॥
सनातन उवाच
शृणु नारद वक्ष्यामि तिथीनां ते व्रतं पृथक् । तिथीशानुक्रमादेव सर्वसिद्धिविधायकम् ॥४॥
चैत्रे मासि जगद्ब्रह्मा ससर्ज प्रथमेऽहनी । । शुक्लपक्षे समग्रं वै तदा सूर्योदये सति ॥५॥
पुराणों की अनुक्रमणिका तुमसे बतलाई गई है, उसका अनुशीलन पुराणफल के इच्छुक को अवश्य करना
चाहिये । पुराण दांभिक, पापी, देव-गुरु के निंदक, साधु-द्रोही तथा शठ को नहीं देना चाहिए । यह शांत, भगवदु-
पासक, शुश्रूषु, मत्सरशून्य, पवित्र एवम् वैष्णव को देना चाहिये ॥३८-४२॥
श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में ब्रह्मांडपुराणानुक्रमणीनिरूपण नामक एक सौ
नवां अध्याय समाप्त ॥१०९॥
अध्याय ११०
बारह मासों का प्रतिपदाव्रत
नारद बोले—विभो ! सूत ! जैसे परमेष्ठी ब्रह्मा ने मरीचि से कहा, उस प्रकार मैं अखिल पुराणों को
सुन चुका । महाभाग ! इस समय तिथियों के कथानक को सुनना चाहता हूँ । अतः क्रम से कहिये, जिससे व्रतों का
निश्चय हो जाय । जिस मास में जो पवित्र तिथि मानी गई है, जिसने उसकी उपासना की है और उसके पूजन
आदि का जो विधान बतलाया गया है, वह सब विस्तार से बताइये ।।१-३।।
सनातन बोले— नारद ! सुनो, में सकलसिद्धिदायक तिथियों का व्रत पृथक्-पृथक् क्रमशः बतलाऊंगा ।
बलि के राज्यकाल में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन में सूर्योदय होने के उपरान्त ब्रह्मा ने जगत् की सृष्टि