बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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नारदीयपुराणम्
उत्तरे प्रविभागे तु पुलस्त्यकुरुराजयोः । संवादे सर्वतीर्थानां माहात्म्यं विस्तरात्पृथक् ॥१३॥
अशेषधर्माश्चाख्याताः पौष्करं पुण्यपर्व च । इत्येवं तव वाराहं प्रोक्तं पापविनाशनम् ॥१४॥
पठतां शृण्वतां चैव भगवद्भक्तिवर्धनम् । कांचनं गरुडं कृत्वा तिलधेनुसमन्वितम् ॥१५॥
लिखित्वाैतच्च यो दद्याच्चैत्र्यां विप्राय मुदितः । स लभेद्वैष्णवं धाम देवर्षिगणवंदितः ॥१६॥
यो वानुक्रमणीमेतां शृणोत्यपि पठत्यपि । सोऽपि भक्तिं लभेद्विष्णौ संसारोच्छेदकारिणीम् ॥१७॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे वाराहपुराणानुक्रमणी
वर्णनं नाम त्र्युत्तरशततमोऽध्यायः ॥१०३॥
चतुरधिकशततमोऽध्यायः
ब्रह्मोवाच
शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि पुराणं स्कन्दसंज्ञकम् । यस्मिन्प्रतिपदं साक्षान्महादेवो व्यवस्थितः ॥१॥
पुराणे शतकोटौ तु यच्छैवं वर्णितं मया । लक्षं तस्यार्थजातस्य सारो व्यासेन कीर्तितः ॥२॥
स्कन्दाह्वयस्तत्र खण्डाः सप्तैव परिकल्पिताः । एकाशीतिसहस्रं तु स्कान्दं सर्वार्थकृन्मतम् ॥३॥
उत्तर भाग में पुलस्त्य और कुरुराज के संवाद में विस्तृत रूप से समस्त तीर्थों का पृथक्-पृथक् माहात्म्य-
वर्णन, अशेष धर्मों का आख्यान और पुष्कर नामक पुण्यतीर्थ का कथन हुआ है । यही पापनाशी वाराह पुराण है,
जिसे पढ़ने तथा सुनने से भगवान् की भक्ति बढ़ती है । जो व्यक्ति इसे लिखकर ब्राह्मण को भक्तिपूर्वक स्वर्ण
निर्मित गरुड़ तथा तिलधेनु सहित यह प्रदान करता है, वह देवर्षिगण से पूजित होते हुए वैकुण्ठ को जाता है ।
जो इस अनुक्रमणी का श्रवण एवम् पाठ करता है, उसे भी भवबन्धननाशिनी विष्णुभक्ति की प्राप्ति होती
है ॥१३-१७॥
श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में वाराह-अनुक्रमणी वर्णन नामक एक सौ
तीसरा अध्याय समाप्त ॥१०३॥
अध्याय १०४
स्कन्दपुराण की विषयानुक्रमणी
श्री ब्रह्मा बोले — वत्स ! अब स्कन्दपुराण को सुनो, जिसके प्रत्येक पद में श्री महादेव अवस्थित हैं ।
सौ करोड़ श्लोक वाले पुराण में एक लक्ष श्लोक युक्त शैवपुराण का जो मैंने वर्णन किया है, उसी के सारभूत
स्कन्दपुराण की रचना व्यास ने की है । अखिल पापनाशी स्कन्दपुराण में सात खण्ड और इक्यासी हजार श्लोक