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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 900, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 900

एकाधिकशततमोऽध्यायः
श्री ब्रह्मोवाच
शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि पुराणं दशमं तव । ब्रह्मवैवर्तकं नाम वेदमार्गानुदर्शकम् ॥१॥
सावर्णिर्यत्र भगवान्साक्षाद्देवर्षये स्थितः । नारदाय पुराणार्थं प्राह सर्वमलौकिकम् ॥२॥
धर्मार्थकाममोक्षाणां सारः प्रीतिर्हरौ हरे । तयोरभेदसिद्धयर्थं ब्रह्मवैवर्तमुत्तमम् ॥३॥
रथंतरस्य कल्पस्य वृत्तांतं यन्मयोदितम् । शतकोटिपुराणे तत्संक्षिप्य प्राह वेदवित् ॥४॥
व्यासश्चतुर्द्धा संव्यस्य ब्रह्मवैवर्तसंज्ञिते । अष्टादशसहस्रं तत्पुराणं परिकीर्तितम् ॥५॥
ब्रह्मप्रकृतिविघ्नेशकृष्णखंडसमन्वितम् । तत्र सूतर्षिसंवादे पुराणोपक्रमस्ततः ॥६॥
सृष्टेःप्रकरणं त्वाद्यं ततो नारदवेधसोः । विवादः सुमहानेत्र द्वयोरासीत्पराभवः ॥७॥
शिवलोकगतिः पश्चाज्ज्ञानलाभः शिवात्तने । शिववाक्येन तत्पश्चान्मरीचेर्नारदस्य तु ॥८॥
गमनं चैव सावर्णेनार्थं सिद्धसेविते । आश्रमे सुमहापुण्ये त्रैलोक्याश्चर्यकारिणी ॥६॥
एतद्धि ब्रह्मखंडं हि श्रुतं पापविनाशनम् । ततः सावर्णि संवादो नारदस्य समीरितः ॥१०॥
कृष्णमाहात्म्यसंयुक्तो नानाख्यानकथोत्तरम् । प्रकृतेरंशभूतानां कलानां चापि वर्णितम् ॥११॥

अध्याय १०१
ब्रह्मवैवर्तपुराण की विषयानुक्रमणी
श्री ब्रह्मा बोले—वत्स ! सुनो, मैं ब्रह्मवैवर्तक नामक वेदमार्गानुदर्शक दशम पुराण को तुमसे कहता हूँ,
जिसमें साक्षात् भगवान् सावर्णि ने देवर्षि नारद से पुराण के अलौकिक अर्थ को बताया है हरि तथा हर में प्रेम
करना । धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का सार है। उन दोनों में अभेदसिद्धि करने के लिये उत्तम ब्रह्मवैवर्तपुराण
का निर्माण हुआ है । मैंने रथंतर कल्प का जो वृत्तान्त कहा था, उसे वेदवेत्ता व्यास ने सौ करोड़ श्लोक वाले
पुराण में संक्षेप से वर्णित किया है । व्यास ने अठारह हजार श्लोकों में ब्रह्मवैवर्त का निर्माण करके ब्रह्मप्रकृति,
गणेश तथा कृष्णखंड नामक चार भागों में इसे विभक्त कर दिया । सूत और शौनक के संवाद में पुराण का उप-
क्रम है । आदि में सृष्टि प्रकरण है। तत्पश्चात् नारद और ब्रह्मा का महान् विवाद, दोनों का पराभव,
शिवलोक में गति, शिव से ज्ञानलाभ और शिव के वाक्य से ज्ञान लाभ के लिये सिद्धों से सुसेवित, महापुण्य-
दायक एवम् तीनों लोक को आश्चर्यित करने वाले सावर्णि के आश्रम में मरीचि तथा नारद का गमन
बताया गया है। यही ब्रह्म खण्ड है, जिसे सुनने से सकल पापों का नाश होता है ॥१-९॥
प्रकृतिखंड में सावर्णि तथा नारद का संवाद, कृष्ण का माहात्म्य, अनेक आख्यानक, प्रकृति के अंश भूत
कलासमूह का माहात्म्य और पूजन आदि का विस्तृत रूप से वर्णन हुआ है। इस खंड के श्रवण करने से ऐश्वर्य
१११ ना० पु०