बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 879, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें८६० नारदीयपुराणम्
विषाशनाय विहरद्वृषस्कंधानुपेषुषे । सरिद्दामसमाबद्धकपर्दाय नमो नमः ॥२२५॥
शुद्धाय शुद्धभावाय शुद्धानांमन्तरात्मने । पुरांतकाय पूर्णाय पुण्यनाम्ने नमो नमः ॥२२६॥
भक्ताय निजभक्तानां भुक्तिमुक्तिप्रदायिने । विवाससे निवासाय विश्वेशां पतये नमः ॥२२७॥
त्रिमूर्तिमूलभूताय त्रिनेत्राय त्रिशूलिने । त्रिधाम्ने धामरूपाय जन्मदाय नमो नमः ॥२२८॥
देवासुरशिरोरत्नकिरीटारुणितांघ्रये । कांताय निजकांतायै दत्तार्द्धाय नमो नमः ॥२२९॥
एतत्स्तोत्रं महेशस्य प्रोक्तं सर्वार्घनाशनम् । शिवसान्निध्यदं विप्र सर्वतंत्रप्रकाशकम् ॥२३०॥
एतत्ते सुमहत्तन्त्रं सर्वदेवप्रकाशकम् । लोकाभिलाषपूर्तिक्रियासाधनसंगतम् । ॥२३१॥
ये तु सामान्यतः प्रोक्तास्तंत्रेऽस्मिन्मनवो द्विज ।
ते तु लोकोपकाराय ज्ञातव्याः सिद्धिदायकाः ॥२३२॥
विशेषतो वैष्णवा ये मंत्राः सर्वोत्तमोत्तमाः । त एव साधनीयाः स्युश्चतुर्वर्गफलाप्तये ॥२३३॥
राममन्त्राः कृष्णमन्त्राः सांगा राधेशिमन्त्राः ।
शाक्ताः सौराश्च गाणेशाः शैवाः प्रोक्ताः शुभावहाः ॥२३४॥
तेषु स्वात्मप्रकाशाय भजेन्मुक्तिफलप्रदान् । एतत्ते सर्वमाख्यातं यत्त्वयाभ्यर्थितं मुने ।
देवताराधनं भक्त्या किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥२३५॥
इति श्री बृहन्नार० पूर्वभागे बृहदु० तृतीयपादे महेशमन्त्रकथनं नामैकनवतितमोऽध्यायः ॥६१॥
॥ इति तृतीय पादः ॥
वाले, कंदर्प के दर्प का दलन करने वाले, कालनाशन शिव को नमस्कार है । विष भक्षण करने वाले, विहरणशील
वृषभ के कन्धे पर बैठने वाले, गंगा रूपी रस्सी से आबद्ध जटा वाले शंकर को नमस्कार हैं । शुद्ध रूप, शुद्ध भाव
वाले, शुद्ध व्यक्तियों के अन्तरात्मा, पुरांतक, पूर्ण तथा पुण्यनामा शिव को नमस्कार है ॥२२२-२२६॥
भक्त, अपने भक्तों को भुक्ति-मुक्ति देने वाले दिगम्बर, विश्वपति शिव को नमस्कार है । त्रिमूर्तियों के
मूलभूत, त्रिनेत्र, त्रिशूल धारण करने वाले तीनों धाम वाले, धामरूप, जन्मदाता शिव को नमस्कार है । देवों तथा
असुरों के मस्तक स्थित मुकुटों के रत्नों से अरुणित चरण वाले, कमनीय रूप वाले, निज कांता को अर्धशरीर
प्रदान करने वाले शिव को नमस्कार है।" विप्र ! महेश का यह स्तोत्र समस्त पापों का नाश करने वाला, शिव
के सान्निध्य को देने वाला और समस्त रहस्यों को प्रकाशित करने वाला है ॥२२७-२३० ॥
द्विज ! सकल देवों का दर्शन कराने वाला, लोगों की अभिलाषा को पूर्ण करने वाला यह महान् तन्त्र मैंने
बतला दिया । इसमें जो मुख्य-मुख्य मन्त्र बताये गये हैं, वे सिद्धिदायक हैं । उन्हें लोकोपकार की दृष्टि से जान
लेना चाहिये । विशेष करके सर्वोत्तम वैष्णव मन्त्र जो कहे गये हैं, उनका साधन तो चतुर्वर्ग की प्राप्ति के लिये
अवश्य करना चाहिये । इसमें कल्याणकारक राममन्त्र, कृष्णमन्त्र, राधिकामन्त्र, शक्ति, सौर, गाणेश, तथा शैवमन्त्र
भी बताये गये हैं । आत्मप्रकाश के लिये उन मोक्षदायक मन्त्रों की साधना करनी चाहिये । मुने ! देवाराधना के
विषय में जो कुछ तुमने पूछा वह मैं बता चुका । अब क्या सुनना चाहते हो ॥२३१-२३५॥
श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीय पाद में महेश मन्त्र कथन नामक इक्यान्बेवां
अध्याय समाप्त ॥९१॥