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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 728, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 728

अशीतितमोऽध्यायः ७०६
तन्त्रस्यास्य क्रमप्राप्तं कथनीयं च यत्त्वया । तत्प्रब्रूहि महाभाग किं पृष्ट्वान्यद्विदांवर ॥४॥
सनत्कुमार उवाच
अथ वक्ष्ये कृष्णमंत्रान्भुक्तिमुक्तिफलप्रदान् । ब्रह्माद्या यान्समाराध्य सृष्ट्यादिकरणे क्षमाः ॥५॥
कामः कृष्णपदं ङेन्तं गोविंदं च तथाविधम् । गोपीजनपदं पश्चाद्वल्लभायाग्निसुंदरी ॥६॥
अष्टादशार्णो मंत्रोऽयं दुर्गाधिष्ठातृदैवतः । नारदोऽस्य मुनिश्चंदो गायत्री देवतां पुनः ॥७॥
श्रीकृष्णः परमात्मा च कामो बीजं प्रकीर्तितम् । स्वाहा शक्तिर्नियोगस्तु चतुर्वर्गप्रसिद्धये ॥८॥
ऋषिं शिरसि वक्त्रे तु छंदश्च हृदि देवताम् । गुह्ये बीजं पदोः शक्ति न्यसेत्साधकत्तमः ॥६॥
युगवेदाब्धिनिगमैर्द्वाभ्यां वर्णैर्मनूद्भवैः । पंचांगानि प्रविन्स्य तत्त्वन्यासं समाचरेत् ॥१०॥
हृदंतिमादिकांतार्णमपराद्यानि चात्मने । मद्यंतानि च तत्त्वानि जीवाद्यानि न्यसेत्क्रमात् ॥११॥
जीवं प्राणं मतिमहंकारं मनस्तथैव च । शब्दं स्पर्श रूपरसौ गंधं श्रोत्रं त्वचं तथा ॥१२॥
नेत्रं च रसनां घ्राणं वाचं पाणि पदेंद्रियम् । पायुं शिश्नमथाकाशं वायुं वह्नि जलं महीम् ॥१३॥
जीवं प्राणं च सर्वांगे मत्यादित्रितयं हृदि । मूर्द्धास्यहृद्गुह्यपादेष्वथ शब्दादिकान्न्यसेत् ॥१४॥
कर्णादिस्वस्वस्थानेषु श्रोत्रादीनींद्रियाणि च । तथा वागादींद्रियाणि स्वस्वस्थानेषु विन्यसेत् ॥१५॥
मूर्द्धास्यहृद्गुह्यपादेष्वाकाशादीन्न्सेत्ततः । हृत्पुंडरीकमर्केंदुर्वह्निविबान्व्यनुक्रमात् ॥१६॥
द्विरष्टहृष्टदशकलान्याप्तानि च तथा मतः । भूताष्टांगाक्षिपदगैर्वर्णैः प्राग्विन्न्यसेद्धृदि ॥१७॥
सुनाया वह मुझे अतीव रोचक लगा । विद्वद्वर ! अब आप तंत्र का जो सिलसिला चल रहा था, वही बतलाइये,
दूसरी बात मैं क्या पूछूं ? ॥१-४॥
सनत्कुमार बोले—अब मैं भोग-मोक्ष को देने वाले कृष्ण-मंत्रों को बतलाऊंगा, जिनकी आराधना करके
ब्रह्मा आदि देवता सृजन आदि कर्म करने में कुशल हुए । "क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा"-
यह अठारह अक्षरों का मंत्र है । दुर्गा इसकी अधिष्ठात्री देवता हैं । ऋषि नारद, छंद गायत्री, देवता श्रीकृष्ण-
परमात्मा, बीज क्लीं और शक्ति स्वाहा है । चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) की प्राप्ति के लिये इसका नियोग
किया जाता है । उत्तम साधक शिर में ऋषि, मुख में छंद, हृदय में देवता, गुह्य में बीज ओर चरणों में शक्ति का
न्यास करे । मंत्र के अठारहों अक्षरों से पंचांगन्यास कर तत्त्वन्यास करना चाहिये ॥५-१०॥ तत्त्वन्यास में क्रमशः
जीव, प्राण, मति, अहंकार, मन, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, कर्ण, त्वचा, नेत्र, रसना, नासिका, वाणी, हाथ,
पैर, इन्द्रिय, पायु, शिश्न, आकाश, वायु वह्नि, जल और पृथ्वो का न्यास किया जाता है । संपूर्ण अंगों में जीव
और प्राण का, हृदय में मति आदि तीनों का, मस्तक, मुख, हृदय, गुह्य और चरणों में शब्द आदि का, कर्ण
आदि अपने-अपने स्थानों में श्रोत्र आदि इन्द्रियों तथा वाक् आदि इन्द्रियों का न्यास करे । पुनः शिर, मुख, गुह्य
तथा चरणों में आकाश आदि का न्यास करना चाहिये । अनन्तर हृदयकमल में क्रमशः द्वादशकला व्याप्त
सूर्यमण्डल, षोडशकला व्याप्त चन्द्रमण्डल तथा दस कलाव्याप्त अग्निमण्डल का न्यास करे । साथ ही मन्त्र के
पदों में स्थित आठ-आठ और दो अक्षरों का भी क्रमशः उन मण्डलों के साथ योग करके उन सबका हृदय में न्यास
करे, यथा-क्लीं कृष्णाय गोविंदाय श्रं द्वादशकला व्याप्त सूर्यमण्डलात्मने नमः, गोपीजनवल्लभाय भों षोडशकला-
व्याप्तचन्द्रमण्डलात्मने नमः स्वाहा, मं दशकला व्याप्तवह्निमंडलात्मने नमः हृत्पुण्डरीके । तत्पश्चात् आकाश