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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 690, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 690

सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ६७१
कार्यसिद्धिस्तदा कुर्यात्त्रिवारं दीपजं विधिम् । तदा सुदुर्लभमपि कार्यं सिद्धयेन्न संशयः ॥११४॥
दीपप्रियः कार्तवीर्यो मार्तण्डो नतिवल्लभः । स्तुतिप्रियो महाविष्णुर्गणेशस्तर्पणप्रियः ॥११५॥
दुर्गार्चनप्रिया नूनमभिषेकप्रियः शिवः । तस्मात्तेषां प्रतोषाय विदध्यात्तत्तदादरात् ॥११६॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे कार्तवीर्यमाहात्म्यमन्त्रदीपकथनं
नाम षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥११७॥
सप्तसप्ततितमोऽध्यायः
नारद उवाच
साधु साधु महाप्राज्ञ सर्वतंत्रविशारद । त्वया मह्यं समाख्यातं विधानं तन्त्रगोपितम् ॥१॥
अधुना तु महाभाग कार्तवीर्यहनूमतोः । कवचे श्रोतुमिच्छामि तद्वदस्व कृपानिधे ॥२॥
सनत्कुमार उवाच
शृणु विप्रेन्द्र वक्ष्यामि कवचं परमाद्भुतम् । कार्तवीर्यस्य येनासौ प्रसन्नः कार्यसिद्धिकृत् ॥३॥
दीपविधि (दीपदान) करनी चाहिए । तब अत्यन्त दुर्लभ कार्य भी सिद्ध हो जायगा, इसमें संशय नहीं । कार्तवीर्य
दीपदान करने से संतुष्ट होते हैं, सूर्य नमस्कार से, महाविष्णु स्तुति से, गणेश तर्पण से, दुर्गा अर्चना से और
शिव अभिषेक से प्रसन्न होते हैं । इसलिए उन-उन देवता को प्रसन्न करने के लिए तत्तत् उपाय आदरपूर्वक
करना चाहिए ॥११२-११६॥
श्रीनारदीय पुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यान युक्त तृतीय पाद में कार्तवीर्य का माहात्म्य, मन्त्र तथा दीप
कथन नामक छिहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥७६॥
अध्याय ७७
श्री कार्तवीर्य का कवच
नारद बोले—महापण्डित ! सकलतंत्रविशारद ! साधु ! साधु ! आपने वह विधान मुझे बतला दिया
जो तंत्रों में गुप्त था । महाभाग ! कृपानिधान ! अब मैं कार्तवीर्य तथा हनुमान् का कवच सुनना चाहता हूँ,
(कृपया) बताइए ॥१—२॥
सनत्कुमार बोले—विप्रवर्य ! सुनो, मैं कार्तवीर्य का अत्यन्त आश्चर्यजनक कवच सुनाता हूँ, जिसके
पाठ से कार्यसिद्धिकर्ता कार्तवीर्य प्रसन्न हो जाते हैं। पहिले उनका इस प्रकार ध्यान करे कि वे अत्यन्त रमणीय