बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 639, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें६२० नारदीयपुराणम्
मध्ये सिंहे स्वबीजं च लिखेत्पूर्ववदेव तु । श्रीबीजेन तु संवेष्ट्य वलयत्रयसंयुक्तम् ॥८८॥
पाशांकुशैश्च संवेष्ट्य पूजयेद्यंत्रमुत्तमम् । त्रैलोक्यमोहनं नाम सर्वकामार्थसाधनम् ॥८८½॥
चक्रराजं महाराजं सर्वचक्रेश्वरेश्वरम् । धारणाज्जयमाप्नोति सत्यं सत्यं न संशयः ॥९०॥
अथ यन्त्रांतरं वक्ष्ये शृणु नारद सिद्धिदम् । अष्टारं विलिखेद्यंत्रं श्लक्ष्णं कर्णिकया युतम् ॥९१॥
मूलमंत्रं लिखेत्तत्र प्रणवेन समन्वितम् । एकाक्षरं नारसिंहं मध्ये चैव ससाध्यकम् ॥९२॥
जपेदष्टसहस्रं तु सूत्रेणावेष्ट्य तद्बहिः । स्वर्णरौप्यमुताम्रैश्च वेष्टयेत्क्रमतः सुधीः ॥९३॥
लाक्षया वेष्टितं कृत्वा पुनर्मंत्रेण मंत्रयेत् । कंठे भुजे शिखायां वा धारयेद्यंत्रमुत्तमम् ॥९४॥
नरनारीनरेन्द्राश्च सर्वे स्युर्वशगा भुवि । दुष्टास्तं नैव बाधंते पिशाचोरगराक्षसाः ॥९५॥
यंत्रराजप्रसादेन सर्वत्र जयमाप्नुयात् । अथान्यत्संप्रवक्ष्यामि यंत्रं सर्ववशंकरम् ॥९६॥
द्वादशारं महाचक्रं पूर्ववद्विलिखेत्सुधीः । मात्राद्वादशसंभिन्नदलेन विलिखेद्बुधः ॥९७॥
मध्ये मंत्रं शक्तियुक्तं श्रीबीजेन तु वेष्टयेत् । कालांतकं नाम चक्रं सुरासुरवशंकरम् ॥९८॥
चक्रमुललेखयेद्भूर्जे सर्वशत्रुनिवारणम् । यस्य धारणमात्रेण सर्वत्र विजयी भवेत् ॥९९॥
अथ सर्वैष्टदं ज्वालामालिसंज्ञं वदाम्यहम् । बीजं हृद्भगवाञ्ङेतो नरं॑सिहाय तत्परम् ॥१००॥
ज्वालिने मालिने दीप्तदंष्ट्राय अग्निने पदम् । त्राय सर्वादिरक्षोघ्नाय च नः सर्वभूस्पदम् ॥१०१॥
हरिविनाशनार्थांते सर्वज्वरविनाशनः । नामांते दहयुग्मं च पचद्वयमुदीरयेत् ॥१०२॥
रक्षयुग्मं च वर्मास्त्रद्वयांतो ध्रुवादिकः । अष्टषष्ट्यक्षरैः प्रोक्तो ज्वालामाली मनूत्तमः ॥१०३॥
पुण्यादिकं तु पूर्वोक्तं त्रयोदशभिरक्षरैः । पंक्तिभी रुद्रसंख्याकैरष्टादशभिरक्षरैः ॥१०४॥
कर्णिका से युक्त हो । उस पर प्रणव युक्त मूल मन्त्र को लिख कर मध्य में साध्य सहित नरसिंह का एकाक्षर मन्त्र
लिखे । उस मन्त्र का एक सहस्र जप कर सूत्र से कमल को लपेट दे । उसको फिर धीमान् व्यक्ति सुवर्ण, चाँदी,
ताँबे तथा लाक्षा (लाह) से क्रमशः वेष्टित करे । अनन्तर उस उत्तम यन्त्र को मन्त्र से अभिमंत्रित कर गले में
या बाहु में या शिखा में बांध ले । ऐसा करने से नर, नारी तथा नरेन्द्र उसके वशीभूत हो जाते हैं । दुष्ट पिशाच,
सर्प तथा राक्षसों का उसे भय नहीं होता । यन्त्रराज की कृपा से उसकी सर्वत्र विजय होती है ॥८६-९५½॥
इसके बाद सब प्राणियों को वश में करने वाला दूसरा मन्त्र बतलाता हूँ । सुधी जन पहले की तरह
द्वादशकोणयुक्त महाचक्र को लिखे । उसके ऊपर बारह मात्राओं से युक्त कमल को लिख कर मध्य में शक्तियुक्त
मन्त्र को लिखे और उसे श्रीबीज में वेष्टित करे । उस चक्र का नाम कालांतक है, जो देवों तथा असुरों को वश
में करने वाला है । उस चक्र को भोजपत्र पर लिखना चाहिये । वह समस्त शत्रुओं का निवारण करने वाला है।
उसके धारण करने से सर्वत्र विजय होती है ॥९६-९९॥
अतःपर सकल कल्याणदायक ज्वालामाली नामक मंत्र को बतलाता हूँ। "बीजम्.......ध्रुवादिक" - यह
अड़सठ अक्षरों वाला ज्वालामाली मंत्र सर्वोत्तम है । तेरह अक्षरों वाला पुण्यादिक मंत्र तो पहले ही बतला
दिया गया है । साधक ग्यारह पंक्तियों, अट्ठारह अक्षरों और बारह करणों से अंगों की कल्पना करे । ज्वालामाली
नरसिंह देव के पूर्वोक्त रूप का ध्यान कर एक लाख जप करे और उसका दशांश कैली गाय के घी से हवन करे ।
यह उत्तम मंत्र मिरगी आदि भयंकर रोगों तथा भूतादि बाधाओं को नष्ट करता है । "प्राणः........" यह छह
अक्षरों वाला महामंत्र सकल कामनाओं को पूर्ण करने वाला है । इसके मुनि ब्रह्मा हैं, छंद पंक्ति है और देवता