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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 63

अष्टमोऽध्यायः
सनक उवाच
एवमौर्वाश्रमे ते द्वे बाहुभार्ये मुनीश्वर । चक्राते भक्तिभावेन शुश्रूषां प्रतिवासरम् ॥१॥
गते वर्षाद्धिके काले ज्येष्ठा राज्ञी तु या द्विज । तस्याः पापमतिर्जाता सपत्न्याः संपदं प्रति ॥२॥
ततस्तया गरो दत्तः कनिष्ठायै तु पापया । न स्वप्रभावं चक्रे वै गरो मुनिनिषेवया ॥३॥
भूलेपनादिभिः सम्यग्रतः सानुदिनं मुनेः । चकार सेवां तेनासौ जीर्णपुण्येन कर्मणा ॥४॥
ततो मासत्रयेऽतीते गरेण सहितं सुतम् । सुषाव सुशुभे काले शुश्रूषानष्टकिल्बिषा ॥५॥
अहो सत्संगतिर्लोके किं पापं न विनाशयेत् । न ददातिसुखं किं वा नराणां पुण्यकर्मणाम् ॥६॥
ज्ञानाज्ञानकृतं पापं यच्चान्यत्कारितं परैः । तत्सर्वं नाशयत्याशु परिचर्या महात्मनाम् ॥७॥
जडोऽपि याति पूज्‍यत्वं सत्संगाज्जगतीतले । कलामात्रोऽपि शीतांशुः शंभुना स्वीकृतो यथा ॥८॥
सत्संगतिः परामृद्धिं ददाति हि नृणां सदा । इहामुत्र च विप्रेन्द्र सन्तः पूज्यतमास्ततः ॥९॥
अहो महद्गुणान्वक्तुं कः समर्थो मुनीश्वर । गर्भं प्राप्तो गरो जीर्णो मासत्रयमहोऽद्भुतम् ॥१०॥

अध्याय ८
गंगा माहात्म्य-वर्णन

सनक बोले--मुनीश्वर ! इस प्रकार राजा बाहु की दोनों स्त्रियां आश्रम में प्रति दिन मुनि की सेवा
करने लगीं । द्विज ! जब वर्षा ऋतु का आधा भाग बीत गया तब ज्येष्ठ रानी के मन में अपने सौत के प्रति ईर्ष्या
जाग उठी । उस पापिनी ने अपनी छोटी गर्भिणी सौत को विष दे दिया । परन्तु मुनि की सेवा के प्रभाव से उस
विष का कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि वह प्रति दिन (आश्रम में) भली-भांति भूमिलेपन आदि कार्यों से
मुनि की सेवा करती थी । उसी पुण्य के प्रभाव से उसका बाल भी बाँका नहीं हुआ । तत्पश्चात् तीन मास
बीत जाने पर उस रानी ने शुभ मुहूर्त्त में गर के (विष के) साथ ही पुत्र को उत्पन्न किया । मुनि की सेवा के कारण
उस विष का प्रभाव नष्ट हो चुका था, अतः बालक को किसी प्रकार की हानि नहीं हुई ॥१-५॥ अहो सत्संगति
मनुष्य के किस पाप को नष्ट नहीं कर देती है या मनुष्यों को पुण्य कर्मों के फलस्वरूप कौन-सा सुख नहीं देता है ?
महात्माओं की सेवा से जाने अनजाने अथवा दूसरों के द्वारा कराये गये पाप शीघ्र नष्ट हो जाते हैं । इस भूतल पर
मूर्ख भी सत्संगति के प्रभाव से पूज्य हो जाता है, जैसे शंभु कला मात्र अवशिष्ट चन्द्रमा को भी स्वीकार करते
हैं । सत्संगति मनुष्यों को सर्वदा उत्तम वैभव प्रदान करती हैं । विप्रेन्द्र ! इसीलिए सन्त इस लोक या परलोक में
सर्वत्र पूजित होते हैं । मुनीश्वर ! सत्संगति के महान् गुणों का वर्णन कोई कैसे कर सकता है ? क्योंकि तीन
महीने तक गर्भ में रहकर भी वह विष प्रभावकर नहीं हुआ प्रत्युत जीर्ण-शीर्ण हो गया, यह आश्चर्य की बात है ।