बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 610, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनसप्ततितमोऽध्यायः ५६१
मूर्द्धादिहृदयांतं तु विन्यसेत्साधकोत्तमः । डकारादिक्षकारांतवर्णायं वह्निमण्डलम् ॥१४॥
ङंतं हृदादिपादांतं विन्यसेत्सुसमाहितः । अग्नीषोमात्मको न्यासः कथितः सर्वसिद्धिदः ॥१५॥
न्यसेत्सेन्दून्मातृकार्णाञ्जयांतपुरुषामने । नमोऽन्तेव्यापकं मंत्री हंसन्यासोऽयमीरितः ॥१६॥
अष्टावष्टौ स्वराञ्शेषांन्पंचपंच मितान्पुनः । उक्तादित्यमुखानेतान्विन्यसेच्च नवग्रहान् ॥१७॥
आधारलिंगयोर्नाभौ हृदि कण्ठे मुखांतरे । भ्रूमध्ये च तथा भाले ब्रह्मरंध्रे न्यसेत्क्रमात् ॥१८॥
हंसाख्यमग्नीषोमाख्यं मंडलत्रयमेव च । पुनर्न्यासत्रयं कुर्यान्मूलेन व्यापकं चरेत् ॥१९॥
एवं न्यासविधिं कृत्वा ध्यायेत्सूर्यं हृदंबुजे । दानाभयाब्जयुगलं धारयंतं करै रविम् ॥२०॥
कुंडलांगदकेयूरहारिणं च त्रयोतनुम् । ध्यात्वैवं प्रजपेन्मंत्रौ वसुलक्षं दशांशतः ॥२१॥
रक्तांभोजैस्तिलैर्वापि जुहुयाद्विधिवद्वसौ । प्रथमं पीठयजने धर्मादीनां स्थले यजेत् ॥२२॥
प्रभूतं विमलं शारं समाराध्यमनंतरम् । परमादिमुखं मध्ये खर्बिवातं प्रपूजयेत् ॥२३॥
सोमाग्निमंडलं पूज्य रविमंडलमर्चयेत् । दीप्ता सूक्ष्मा जया भद्रा विभूतिर्विमला तथा ॥२४॥
अमोघा विद्युता सर्वतोमुखी पीठशक्तयः । ह्रस्वत्रयोक्तिजाः क्लीवहीना वह्नींदुसंयुताः ॥२५॥
स्वरा बीजानि शक्तीनां तदाद्या पूजयेत्तु ताः । ब्रह्माविष्णुशिवात्मा ते सृष्टिः शेषान्विताप्यसौ ॥२६॥
एवं चान्ते योगपीठात्मने हृदयमोरयेत् । ताराद्योऽयं पीठमंत्रस्त्वनेनासनमादिशेत् ॥२७॥
ध्रुवो विर्याद्बिन्दुयुतं खं खखोल्काय हृन्मनुः । नवार्णाय च मनवे मूर्ति संकल्ययेत्सुधीः ॥२८॥
तथा अन्त में नमः शब्द से समन्वित चन्द्रमण्डल का मस्तक से लेकर हृदय तक न्यास करे । अग्निमण्डल से पहले
डकार से लेकर क्षकार तक वर्णों को जोड़कर और अन्त में चतुर्थी विभक्ति लगाकर हृदय से पैर तक सावधानी
से उसका विन्यास करे । अग्नि और चन्द्रमा के मन्त्रों का न्यास सकल सिद्धिदायक है ॥१३-१५॥ अनुस्वार सहित
मातृक वर्णों का न्यास करके अन्त में 'जपान्तपुरुषात्मने नमः' कहकर मन्त्रसाधक व्यापक न्यास करे, यही हंस
न्यास कहा गया है ॥१६॥ आठ-आठ स्वर वर्णों तथा शेष पाँच-पाँच अन्य वर्णों के साथ सूर्य आदि नवग्रहों का
आधार लिंग, नाभि, हृदय, कंठ, मुख के भीतर, भौंहों के बीच, ललाट तथा ब्रह्मरंध्र (मस्तक के मध्य में माना
जाने वाला एक छेद) में क्रमशः न्यास करे । हंस, अग्नि तथा चन्द्र नामक तीन मण्डल को रचना करके पुनः तीन
न्यास करे, और फिर मूल मन्त्र से व्यापक न्यास करे ॥१७-१९॥ इस प्रकार न्यास को विधि सम्पन्न करके हृदयार-
विन्द में सूर्य का ध्यान करे कि वे हाथों में दान तथा अभय की मुद्रा और दो कमल धारण किये हुए हैं; कुंडल,
अंगद तथा केयूर से उनका वेद रूप शरीर विभूषित है। ऐसा ध्यान करके साधक आठ लाख मन्त्र-जप करे ।
और उसका दशांश लालकमल या तिल से विधिवत् हवन करे । पहले पीठस्थल पर पश्चात् धर्म आदि के स्थान
पर प्रभूत, विमल, शार तथा समाराध्य का पूजन करे । अनन्तर मध्य में परमादिमुख तथा अंत में खर्बिब की
पूजा करे ॥२०-२३॥ फिर चन्द्र-मण्डल तथा अग्नि-मण्डल की पूजा करके सूर्यमण्डल की अर्चना करे। दीप्ता,
सूक्ष्मा, जया, भद्रा, विभूति, विमला, अमोघा, विद्युता तथा सर्वतोमुखी--ये पीठ-शक्तियाँ हैं। इनमें तीन ह्रस्व-
मात्रा तथा वह्नि (र्) और इन्दु (अनुस्वार) लगाकर नपुंसकता से रहित करे । फिर शत्रुओं के नाश के लिए उक्त
मन्त्र से पीठशक्तियों का पूजन करे । वे शक्तियां ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव रूप हैं और यह सृष्टि भी शेष से युक्त
है ॥२४-२६॥ इनके पूजन के अन्त में 'योगपीठात्मने नमः' का उच्चारण करना चाहिए । इस मन्त्र के आदि में
ओम् जोड़ देना चाहिए । इससे यह पीठ मंत्र बनता है । इससे देवता को आसन समर्पित करना चाहिए । 'गं हं
स्वं स्वं स्योल्काय नमः' यह नो अक्षरों का मंत्र है । विद्वान् इसके लिए प्रतिमा बनवाये । उस प्रतिमा में संसार