बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 605, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें५८६ नारदीयपुराणम्
अन्नाप्तिरन्नहोमेन समिद्भिर्भवैतसां जलम् । वासांसि लभते हुत्वा कुसुंभकुसुमैः शुभैः ॥४०॥
अथ सर्वेष्टदं वक्ष्ये चतुरावृत्तितर्पणम् । मूलेनादौ चतुर्वारं प्रत्येकं च प्रतर्पयेत् ॥४१॥
पूर्वमंत्राक्षरैमंत्रैः स्वाहांतैश्च चतुश्चतुः । मूलमंत्रैश्चतुर्वारपूर्वकं संप्रतर्प्य च ॥४२॥
मिथुनादींस्ततः पश्चात्पूर्ववत्संप्लतर्पयेत् । देवेन सहितां शक्तिं शक्त्या च सहितं तु तम् ॥४३॥
एवं च षड्विंशतिधा मिथुनानि भवंति हि । स्वनामाद्यर्णबीजानि तानि सन्तर्पयेत्क्रमात् ॥४४॥
भवेत्संभूय सचतुश्चत्वारिंशच्चतुःशतम् । एवं संतप्य तत्पश्चात्पूर्ववत्सोपचारकैः ॥४५॥
सर्वाभीष्टं च संप्राथ्र्यं प्रणम्योद्वासयेत्सुधीः । भाद्रकृष्णचतुर्थ्यादिप्रतिमासमतंद्रितः ॥४६॥
आरभ्यार्कोदयं मंत्री यावच्चंद्रोदयो भवेत् । तावन्नोपविशेद्भूभौ जितवाक्स्थिरमानसः ॥४७॥
ततश्चंद्रोदये मन्त्री पूजयेद्गणनायकम् । पूर्वोक्तविधिना सम्यङ्नानापुष्पोपहारकैः ॥४८॥
एकविंशतिसंख्याकान्मोदकांश्च निवेदयेत् । तदग्रे प्रजपेन्मन्त्रमष्टोत्तरसहस्रकम् ॥४९॥
ततः कर्पूरकाश्मीररक्तपुष्पैः सचन्दनैः । अर्घ्यं दद्यात्तु मूलांते ङेतेगणपति ततः ॥५०॥
इदमर्घ्यं कल्पयामि हृदंतोऽर्घ्यमनुर्मतः । स्तुत्वा नत्वा विसृज्याथ यजेच्चंद्रमसं पुनः ॥५१॥
अर्घ्यं दद्याच्चतुर्वारं पूजयित्वा गुरुं ततः । निवेदितेषु विप्राय दद्यादर्घांश्च मोदकान् ॥५२॥
स्वयमर्द्धान्प्रभुंजीत ब्रह्मचारी जितेंद्रियः । एवं व्रतं यः कुरुते सम्यक्संवत्सरावधि ॥५३॥
पुत्रान्पौत्रान्सुखं वित्तमारोग्यं लभते नरः । सूर्योदयादशक्तश्चेदस्तमारभ्य मंत्रवित् ॥५४॥
दही से हवनकर सकल समृद्धियों को प्राप्त करता है । अन्न से हवन करने पर अन्न, समिधा से हवन करने पर
वन और कुसुंभ के फूलों से हवन करने पर उसे वस्त्रों की प्राप्ति होती है । ।३९-४०।।
इसके बाद मैं सकलकामनादायक चतुर्गुण तर्पण का वर्णन करूँगा । मूलमन्त्र से पहले चार बार प्रत्येक
का तर्पण करे । फिर पूर्वमन्त्र के अक्षरों के बराबर मन्त्रों से, जिनके अंत में स्वाहा शब्द जुड़ा हो, चार-चार
बार हवन करे । अनन्तर मूल-मन्त्रों से चार बार तर्पण करके मिथुनों (स्त्री-पुरुषों के जोड़ो) के लिए तर्पण करे ।
देवता सहित शक्ति और शक्ति सहित देवता को तर्पण करना यही मिथुनों का तर्पण कहलाता है । इसके बाद अपने
नाम के आद्य अक्षर से युक्त बीजाक्षरों का उच्चारण करके क्रमशः तर्पण करे । इस प्रकार सब मिलाकर चार सौ
चोवालीस बार पूर्ववत् उपचार के साथ तर्पण करके सकल कामनाओं के लिए प्रार्थना करे । फिर प्रणाम करके
विद्वान् साधक पूजा का विसर्जन करे । ।४१-४५॥
भाद्र-कृष्ण-चतुर्थी से लेकर प्रत्येक मास निरालस्यपूर्वक इस व्रत को करना चाहिए । मंत्रसाधक व्यक्ति
सूर्योदय से लेकर चन्द्रोदय तक भूमि पर न बैठे और वाणी तथा मन पर नियन्त्रण रखे । तदनन्तर चन्द्रोदय होने
पर वह पूर्वोक्त विधि से भली-भाँति अनेक पुष्पों एवं उपहारों से गणनायक का पूजन करे । उन्हें इक्कीस लड्डू
चढ़ाये । उनके आगे एक हजार आठ बार मन्त्रजप करे ।।४६-४९।। तत्पश्चात् 'गणपतये इदमर्घ्यं कल्पयामि,
इदं गणपतये नमः' यह कहकर कपूर, केसर, रक्तपुष्प तथा चंदन सहित अर्घ्य प्रदान करे । अनन्तर उनकी
स्तुति नमस्कार तथा विसर्जन करके चन्द्रमा का पूजन करे । चन्द्रमा को चार बार अर्घ्य देकर गुरु की पूजा करे।
फिर ब्राह्मण को आधे लड्डू देकर स्वयं आधे लड्डुओं को खाये और ब्रह्मचर्य तथा इन्द्रियों को वश में रखे । इस
प्रकार जो एक वर्ष तक भली-भाँति यह व्रत करता है, वह मनुष्य पुत्रों, पौत्रों, सुख, वित्त तथा आरोग्य लाभ
करता है ।।५०-५३॥ यदि मन्त्रवेत्ता जन सूर्योदय से व्रत करने में असमर्थ हो तो सूर्यास्त से लेकर चन्द्रोदय तक