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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 1008 में से

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सप्तमोऽध्यायः ४१
अपकीर्तिसमो मृत्युर्लोकेष्वन्यो न विद्यते । यदा बाहुर्वनं यातस्तदा तद्भागगा जनाः ॥३६॥
निन्दितो बहुशो बाहुर्मृतवत्कानने स्थितः । निहत्य कर्म च यशो लोके द्विजवरोत्तम ॥४०॥
नास्त्यकीर्तिसमो मृत्युर्नास्ति क्रोधसमो रिपुः । नास्ति निन्दासमं पापं नास्ति मोहसमासवः ॥४१॥
नास्त्यसूयासमा कीर्तिर्नास्ति कामसमोऽनलः । नास्ति रागसमः पाशो नास्ति सङ्गसमं विषम् ॥४२॥
एवं विलप्यबहुधा बाहुरत्यन्तदुःखितः । जीर्णाङ्गो मनसस्तापाद् वृद्धभावादभूदसौ ॥४३॥
गते बहुतिथे काले और्वाश्रमसमीपतः । स बाहुर्व्याधिना ग्रस्तो ममार मुनिसत्तम ॥४४॥
तस्य भार्या च दुःखार्ता कनिष्ठा गर्भिणी तदा । चिरं विलप्य बहुधा सह गन्तुं मनोदधे ॥४५॥
समानीय च सैधांसि चितां कृत्वातिदुःखिता । समारोप्य तमारूढं स्वयं समुपचक्रमे ॥४६॥
एतस्मिन्नन्तरे धीमानौर्वस्तेजोनिधिर्मुनिः । एतद्विज्ञातवान्सर्वं परमेण समाधिना ॥४७॥
भूतं भव्यं वर्तमानं त्रिकालज्ञा मुनीश्वराः । गतासूया महात्मानः पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषा ॥४८॥
तपोभिस्तेजसां राशिरौर्वपुण्यसमो मुनिः । संप्राप्तस्तत्र साध्वी च यत्र बाहुप्रिया स्थिता ॥४६॥
चितामारोढुमुद्युक्तां तां दृष्ट्वा मुनिसत्तमः । प्रोवाच धर्ममूलानि वाक्यानि मुनिसत्तमः ॥५०॥
और्व उवाच
राजवर्यप्रिये साध्वि मा कुरुष्वातिसाहसम् । तवोदरे चक्रवर्ती शत्रुहन्ता हि तिष्ठति ॥५१॥
बालापत्याश्च गर्भिण्यो ह्यदृष्टऋतवस्तथा । रजस्वला राजसुते ! नारोहति चितां शुभे ॥५२॥
वाले लोगों ने उसी प्रकार शक्ति का अनुभव किया जैसे जलन मिट जाने पर लोग करते हैं ॥३७-३६॥ लोक से अनेक
प्रकार का अयश पाकर वह राजा वन में मृतक के समान रहने लगा । उसका यश और पूर्व सत् कर्म सभी लुप्त-
से हो गए । द्विज ! इस संसार में अपयश के समान मृत्यु नहीं, न तो क्रोध के समान कोई दूसरा शत्रु ही है ।
निन्दा के समान कोई पाप नहीं और मोह के समान कोई दूसरा नशा भी नहीं है । असूया के समान कोई अयश
और काम के समान भस्म करने वाला अग्नि भी नहीं है । अनुराग के समान इस लोक में दूसरा बंधन नहीं
और संग (लोकासक्ति) के समान कोई विष नहीं है । इस प्रकार अपनी हीन दशा पर रोकर वह राजा अत्यन्त
दुःखी हो गया । मानसिक संताप के कारण वह दिन प्रति दिन शिथिल होने लगा और असमय में ही बूढ़ा हो
गया ॥४०-४३॥ मुनिश्रेष्ठ ! बहुत समय बीत जाने पर वह राजा बाहु और्व ऋषि के आश्रम के समीप व्याधि-
ग्रस्त होकर मर गया । उसकी छोटी भार्या, जो उस समय गर्भिणी थी, दुःख से कातर हो गई । बहुत विलाप
करने के बाद उसने सती होने का निश्चय किया । उस दुःखी रानी ने इधर-उधर से लकड़ियां लाकर चिता बनाई ।
उस पर अपने पति का शव रखकर स्वयं चिता में भस्म होने को उद्यत हुई । इसी बीच परम तेजोनिधि और
ज्ञानी मुनि और्व ने अपनी परम समाधि के द्वारा सारी बातें जान लीं । क्योंकि त्रिकालज्ञ, उदार और महात्मा
मुनीश्वर अपने ज्ञान चक्षु से भूत, भविष्यत् और वर्तमान सब कुछ जान लेते हैं ॥४४-४८॥ तपस्या और तेज-पुंज
के विधान पर पुण्यवान् मुनि और्व उस स्थान पर आये जहाँ वह साध्वी बाहु की प्रिय पत्नी सती होने को प्रस्तुत
थी । चिता पर आरूढ़ होने के लिए प्रस्तुत उस साध्वी को देखकर मुनिवर्य और्व धर्म-सम्मत उपदेश देने लगे ।
॥४६-५०॥
और्व बोले—'बाहु की प्रिय भार्या ! सती ! ऐसा घोर साहस मत करो । तुम्हारे उदर में शत्रुओं का
नाश करने वाला चक्रवर्ती सम्राट् है । शुभे ! राजसुते ! जिसका बच्चा छोटा हो, जो गर्भिणी हो, जिसको अभी
फा० ६—मा०