बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तषष्टितमोऽध्यायः ५७६
इंद्रो वह्निर्यमो रक्षो वरुणः पवनो विधः । ईशानोऽथ विधिश्चैवमधस्तात्पन्नगाधिपः ॥८४॥
ऐरावतस्तथा मेषो महिषः प्रेतस्तिमिरमृगः । वाजी वृषो हंसकूर्मौ वाहनानि विदुर्बुधाः ॥८५॥
वज्रं शक्तिं दण्डखङ्गौ पाशांकुशगदा अपि । त्रिशूलं शंखचक्रे च क्रमाद्विद्रादिहेतयः ॥८६॥
समाप्यावरणार्चां तु देवतारातिकं चरेत् । शंखतोयं परिक्षिप्योद्वाहून्नृत्यन् पतेत्क्षितौ ॥८७॥
दंडवच्चाप्यथोत्थाय प्रार्थयित्वा निजेश्वरम् । दक्षिणे स्थंडिलं कृत्वा तत्र संस्कारमाचरेत् ॥८८॥
मूलेनेक्षणमस्त्रेण प्रोक्षणं ताडनं पुनः । कुशैस्तद्दर्भमाभ्युक्ष्य पूज्य तत्र न्यसेदसूम् ॥८९॥
प्रदाप्य तत्र जुहुयाद्ध्यात्वा चैवेष्टदेवताम् । महाव्याहृतिभिर्यस्तुसमस्ताभिश्चतुष्टयम् ॥९०॥
जुहुयात्सर्पिषा भक्तैस्तिलैर्वा पायसेन वा । सघृतैः साधकश्रेष्ठः पंचविंशतिसंख्यया ॥९१॥
पुनर्ब्याहृतिभिर्हुत्वा गंधाद्यैः पुनरर्चयेत् । देवं संयोजयेन्मूर्ती ततो वह्निं विसर्जयेत् ॥९२॥
भो भो वह्ने महाशक्ते सर्वमंत्रप्रसाधक । कर्मांतरेऽपि संप्राप्ते सान्निध्यं कुरु सादरम् ॥९३॥
विसृज्याग्निदेवतायै दद्यादाचमनीयकम् । अवशिष्टेन हविषा गंधपुष्पाक्षतान्वितम् ॥९४॥
देवताषार्षदेभ्योऽपि पूर्वोक्तेभ्योर्बलिं ददेत् । ये रौद्रा रौद्रकर्माणो रौद्रस्थाननिवासिनः ॥९५॥
योगिन्यो ह्यनुरूपाश्च गणानामधिपाश्च ये । विघ्नभूतास्तथा चान्ये दिग्विdictसुसमाश्रिताः ॥९६॥
सर्वे ते प्रीतम नसः प्रतिगृह्णन्त्विमं बलिम् । इत्यष्टदिक्षु दत्त्वा च पुनर्भूतबलिं चरेत् ॥९७॥
पानीयममृतीकृत्य मुद्रया धेनुसंज्ञया । देवतायाः करे दद्यात्पुनश्चाचमनीयकम् ॥९८॥
ईशान और विधि तथा पाताल के स्वामी शेषनाग क्रमशः दिशाओं के स्वामी हैं। ऐरावत, मेष, भैंसा, प्रेत, तिमि
(मछली), मृग, अश्व, बैल, हंस और कछुआ उपर्युक्त देवों के वाहन हैं यह पंडित लोग जानते हैं । ।।८३-८५।। वज्र,
शक्ति, दंड, खड्ग, पाश, कुश, गदा, त्रिशूल और यज्ञ तथा चक्र इनके अस्त्र हैं। आवरणार्चन समाप्त करने के
अनन्तर आरती करनी चाहिये। शंख जल को पृथ्वी पर गिरा कर दोनों हाथों को ऊपर उठाकर नाचते हुए पृथ्वी
पर गिर पड़े । इस प्रकार दण्डवत् प्रणाम करने के उपरान्त उठ कर अपने इष्ट देव की प्रार्थना कर दक्षिण भाग में
एक वेदी बनाकर उस पर संस्कार कर्म प्रारम्भ करे । मूल मन्त्र से उस वेदी का निरीक्षण कर अस्त्र से जल छिड़के
और हाथ से पीट कर उसको बराबर करे, कुश से उसको झाड़ कर उस वेदी पर जल छिड़के, पूजा करे और उस
पर अग्नि की स्थापना करे । अग्नि को प्रदीप्तकर अपने इष्ट देवता का ध्यान कर हवन करे ।।८६-८६।।
साधक पहले समस्त महाव्याहृतियों से चार बार घी का हवन करे । पच्चीस बार घी मिले हुए भात, तिल अथवा
पायस की आहुतियां दे । फिर व्याहृतियों से हवन कर गन्ध आदि से अग्नि की पूजा करे । प्रतिष्ठापित प्रतिमा में
देव को प्रतिष्ठित कर अग्नि देव का विसर्जन कर दे । हे हे महाशक्ति, सब कार्यों को सम्पन्न करने वाले वह्निदेव,
इस हवन कर्म के अतिरिक्त कर्मों में भी आप प्रेमपूर्वक सहायता करें, इस मन्त्र से अग्नि का विसर्जन करे । इस
कर्म के अनन्तर उनको आचमन करा दे । बची हुई हवन सामग्री से गन्ध, पुष्प, अक्षत के सहित पूर्वोक्त देव
पार्षदों को बलि दे । ।।६०-६४½।। बलि मन्त्र :-
'जो रौद्र' रौद्र कर्म करने वाले, रौद्र स्थान में निवास करने वाले, भयङ्कर रूप वाले, योगिनियाँ, गणों के
अधिपति और विभिन्न दिशाओं और दिगन्तरों में रहने वाले विघ्नकारक पार्षद हैं प्रसन्नता पूर्वक इस बलि को ग्रहण
करें । इस मन्त्र से आठों दिशाओं में बलि देकर भूत बलि दे ।।९५-९७।। तत्पश्चात् धेनुमुद्रा द्वारा जल का
अमृतीकरण करके इष्ट देवता के हाथ में पुनः आचमनीय के लिए जल दे। फिर मूर्ति में स्थित देवता का विसर्जन
करके पुनः उस मूर्ति में ही उनको प्रतिष्ठित करे। तत्पश्चात् भगवत्प्रसादभोजी पार्षद को नैवेद्य दे । महादेव जी