बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 589, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें५७० अग्निपुराणम्
दीर्घमुख्या भारभूतस्तस्थीशो गोमुखोयुतः । स्थाणुनेत्रो दीर्घजिह्वा हुङ्कारः कुण्डोदरीयुतः ॥१०८॥
ऊर्ध्वकेश्या तु भृण्टीशो भौतिको विकृतास्यया । ज्वालामुख्या सद्योजातोऽनुग्रहो युतः ॥१०६॥
अक्रूर आस्थाया युतः सहविद्यो महासेन युतः । उमाविद्यया चण्डेशः पश्चिमेन सरस्वती ॥११०॥
पञ्चान्तकः सिद्धगौरी कुर्मेशश्च शिखस्तनः । त्रैलोक्यविद्यायुतस्तु शिवोत्तमेकवक्त्रकः ॥१११॥
कर्मेशः कमठीयुक्तो भूतधात्र्येकनेत्रकः । लम्बोदर्या चतुर्वक्त्रो द्राविणीयुतः ॥११२॥
सर्वेशो नगरायुक्तः सोमेशः खेचरीयुतः । मर्यादा लाङ्गलीशे दारुकेशेन रूपिणी ॥११३॥
वारुण्या त्वर्द्धनारीशो उमाकान्तो युनीश्वरः । काकोदरी ह्याषाढो पूतनासंयुतो मतः ॥११४॥
दंडीशो भद्रकाल्याऽत्रीशो योगिनीयुतः । मीनेशः शंखिनीयुक्तो मेषस्तर्जनीयुतः ॥११५॥
लोहितः कालरात्र्या च शिखीशः कुब्जनीयुतः । छलगण्डः कपर्दिन्या द्विरण्डेश्च वज्रया ॥११६॥
महाबलो जयायुक्तो बलेशः सुमुखेश्वरी । भुजङ्गेशो रेवतीयुक्तः पिनाकी माधवीयुतः ॥११७॥
खड्गीशो वारुणीयुक्तो बकेशो वायवीयुतः । श्वेतोऽरस्को विदारण्या भृगुः सह्जया युतः ॥११८॥
लकुलीशश्च लक्ष्म्यायुक्तः शिवेशा व्यापिनीयुतः । संवर्तको महामाया प्रोक्ता श्रीकण्ठमातृका ॥११९॥
यत्र स्वोशपदं नोक्तं तत्र सर्वत्र योजयेत् । मुनिस्तस्यादक्षिणामूर्तिर्गायत्रीच्छन्द ईरितम् ॥१२०॥
देवता चार्द्धनारीशो विनियोगोऽखिलाप्तये । हलो बीजानि चाख्यानि स्वराः शक्तय ईरिताः ॥१२१॥
कुर्याद्भृगुस्थाकाशेन षड्दीर्घाढ्येन चांगकम् । बन्धूकस्वर्णवर्णांगं वराक्षांकुशपाशिनम् ॥१२२॥
ऊर्ध्वकेशी के साथ भृण्टीश का, विकृतास्या के साथ भौतिक का, ज्वालामुखी के साथ सद्यो का, उल्कामुखी
के साथ अनुग्रहेश का, आस्था के साथ अक्रूर का, विद्या के साथ महासेन का, महाकाली के साथ क्रोधीश का,
सरस्वती के साथ चण्डेश का, सिद्धगौरी के साथ पञ्चान्तकेश का, त्रैलोक्यविद्या के साथ शिवोत्तभेश का, मन्त्र
शक्ति के साथ एकरुद्र का, कमठी के साथ कूर्मेश का, भूतमाता के साथ एकनेत्र का, लम्बोदरी के साथ चतु-
र्वक्त्र का, द्राविणी के साथ अजेश का, नागरा के साथ सर्वेश का, खेचरी के साथ सोमेश का, मर्यादा के साथ
लांगलीश का, दारुकेश के साथ रूपिणी का तथा वारिणी के साथ अर्धनारीश का न्यास करना चाहिए ॥१०६-१०३॥
काकोदरी के साथ उमाकान्त का और पूतना के साथ आषाढीश का न्यास करे । भद्रकाली के साथ दण्डीश का,
योगिनी के साथ अत्रीश का, शंखिनी के साथ मीनेश का, तर्जनी के साथ मेषेश का, कालरात्रि के साथ लोहितेश
का, कुब्जनी के साथ शिखीश का, कपर्दिनी के साथ छलगण्डेश का, वज्रा के साथ द्विरण्डेश का, जया के साथ
महाबलेश का, सुमुखेश्वरी के साथ बलेश का, रेवती के साथ भुजंगेश का, माध्वी के साथ पिनाकीश का, वारुणी
के साथ खड्गीश का, वायवी के साथ बकेश का, विदारणी के साथ श्वेतोतरश्केश का, सहजा के साथ भृगीश का,
लक्ष्मी के साथ लकुलीश का, व्यापिनी के साथ शिवेश का तथा महामाया के साथ संवर्तश का न्यास करे । यह
श्रीकण्ठमातृका कही गई है ॥११४-११९॥ जहाँ ईश पद न कह गया हो वहाँ सर्वत्र उसकी योजना कर लेनी
चाहिए । इस श्रीकण्ठमातृका न्यास के दक्षिणामूर्ति ऋषि और गायत्री छन्द कहा गया है । अर्धनारीश्वर देवता
है और सम्पूर्ण मनोरथों की प्राप्ति के लिए इसका विनियोग कहा गया है । इसके हल् बीज और स्वर शक्तियाँ
हैं ॥१२०-१२१॥ भृगु (स) में स्थित आकाश (ह) को छह दीर्घों से युक्त करके उसके द्वारा अंग न्यास करे ।
इसके बाद भगवान् शंकर का इस प्रकार ध्यान करे - उनका श्रीविग्रह बन्धूक पुष्प एवं सुवर्ण के समान है । वे
अपने हाथों में वर, अक्षमाला, अंकुश और पाश धारण करते हैं । उनके मस्तक पर अर्धचन्द्र का मुकुट सुशोभित
है । उनके तीन नेत्र हैं तथा सम्पूर्ण देवता उनके चरणों की वंदना करते हैं । ॥१२२३॥