बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 585, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें५६६ नारदीयपुराणम्
दीर्घत्रयेन्दुयुग्व्योमपूर्वकेणैव पिबेज्जलम् । आत्मविद्याशिवैरेव शैवं स्वाहावसानिकैः ॥५२॥
वाग्लज्जाश्रीमुखैः प्रोक्तं शाक्तं स्वाहावसानिकैः । वाग्लज्जाश्रीमुखैः प्रोक्तं द्विजाचमनमर्थदम् ॥५३॥
तिलकं च ततः कुर्याद्भाले सुष्ठु गदाकृति । नंदकं हृदये शंखचक्रे चैव भुजद्वये ॥५४॥
शार्ङ्गबाणं मस्तके च विन्यसेत्क्रमशः सुधीः । कर्णमूले पार्श्वयोश्च पृष्ठे नाभौ ककुद्यपि ॥५५॥
एवं तु वैष्णवः कुर्यान्मृद्भिस्तीर्थोद्भववादिभिः । अग्निहोत्रोद्भवं भस्म गृहीत्वा त्र्यंबकेन तु ॥५६॥
किंवाग्निरिति मंत्रेणाभिमंत्र्य पञ्चमन्त्रकैः । क्रमात्तत्पुरुषाघोरसद्योजातादिनामभिः ॥५७॥
पञ्च कुर्यात्त्रिपुण्ड्राणि भालांसोदरहृत्सु च । शैवः शाक्तस्त्रिकोणाभं नारीवद्वा समाचरेत् ॥५८॥
कृत्वा तु वैदिकीं संध्यां तांत्रिकीं च समाचरेत् । आचम्य विधिवन्मन्त्री तीर्थान्यावाह्य पूर्ववत् ॥५९॥
ततस्त्रिवारं दर्भेण भूमौ तोयं विनिःक्षिपेत् । सप्तधा तज्जलेनाथ मूर्द्धानमभिषेचयेत् ॥६०॥
ततश्च प्राणानायम्य कृत्वा न्यासं षडंगकम् । आदाय वामहस्तेंऽबु दक्षिणेनाच्छाद्य पाणिना ॥६१॥
वियद्वातवह्नितोयक्ष्माबीजैः संम॑ध्य मंत्रवित् । मूलेन तस्मात् श्चोतद्भिर्बिन्दुभिस्तत्त्वमुद्रया ॥६२॥
स्वशिरः सप्तधा प्रोक्ष्यावशिष्टं तत्पुनर्जलम् । कृत्वा तदक्षरं मंत्री नासिकांतिकमानयेत् ॥६३॥
जलं तेजोमयं तच्चाकृष्यांतश्चेढया पुनः । प्रक्षाल्यांतर्गतं तेन कल्मषं तज्जलं पुनः ॥६४॥
कृष्णवर्णं पिंगलया रेचयेत्स्वाग्रतस्तथा । क्षिपेदस्त्रेण तत्पश्चात्कल्पिते कुलिशोपले ॥६५॥
दीर्घत्रय, इन्दु और व्योम से युक्त मन्त्र से जल पीना चाहिये । आत्मविद्या और शिव के नामों के अन्त
में स्वाहा जोड़ देने से शैव मन्त्र बनता है। वाक्, लज्जा, श्री के साथ स्वाहा जोड़ देने से जो मन्त्र बनते हैं,
उन मन्त्रों से अर्थात् "वाचे स्वाहा, लज्जायै स्वाहा, श्रियै स्वाहा" से आचमन करने पर अर्थ सिद्धि होती
है ॥५२-५३॥
इसके अनन्तर वह सुधी गदा के आकार का ललाट में तिलक लगाये, हृदय में नन्दक के आकार का और
दोनों भुजाओं पर शंख चक्र के आकार का और मस्तक पर धनुष-बाण के आकार का, कर्ण मूल, दोनों पसलियों
पर, पीठ पर नाभि तथा ककुद (गर्दन के पीछे) पर क्रमशः चन्दन लगाये । इस प्रकार वैष्णव तीर्थ की मिट्टी या
गोपी चन्दन का चन्दन सर्वाङ्गों में लगावे । इसके विपरीत शैव अग्निहोत्र के भस्म को लेकर त्र्यम्बकं यजामहे ॰॰॰॰॰॰
इस मन्त्र से या अग्निरिति भस्म ॰॰॰॰॰॰॰॰ इस मन्त्र से अभिमन्त्रित कर पंच मन्त्रकों से अर्थात् क्रमशः पुरुष, अघोर,
सद्योजात आदि नामों से ललाट, अंस (कन्धे के ऊपर,) उदर और हृदय पर पांच त्रिपुण्ड्र लगाये । शाक्त त्रिकोणाकार
या नारी जैसे वेंदी लगाती है उस तरह का तिलक धारण करें । इस विधि से वैदिकी सन्ध्या करने के बाद तान्त्रिकी
सन्ध्या करे ॥५४-५८॥ तान्त्रिक विधि—
मन्त्री (उपासक) विधिपूर्वक आचमन कर और पहले की भांति तीर्थों का आवाहन कर तीन वार कुश
से पृथ्वी पर जल छिड़के । इसी कुश से सात वार मस्तक पर भी जल छिड़के । अभिषेक के अनन्तर प्राणायाम
कर षडङ्गन्यास करे । बायें हाथ में जल रखकर दाहिने से उसको ढँक दे । फिर वह मन्त्रज्ञ आकाश, वायु, अग्नि,
जल और पृथ्वी के बीज से अभिमन्त्रित कर मूल मन्त्र से अपने हाथ से नीचे टपकते हुये जलबिन्दु से तत्त्व मुद्रा
से अपने शिर को सात वार सींचे । बचे हुये जल को वह मन्त्री अपनी नासिका के पास लावे ॥५९-६३॥ उस
तेजोमय जल को इड़ा नाड़ी द्वारा भीतर आकृष्ट करे और उसके द्वारा अपने अन्तः के पापों को धोकर कृष्णवर्ण
के उस जल को बाईं नासिका (पिंगला) से बाहर निकाल दे । और उस जल को अपने आगे कल्पित कुलिश
पत्थर (वज्र) पर फेंक दे । अर्थात् अपने आगे अपनी भावना के द्वारा कल्पित वज्र पर फेंक दे । यह सब प्रकार
के पापों को नष्ट करने वाला अघमर्षण है ॥६४-६५॥ इसके अनन्तर हाथों को जल से धोकर पहले की भांति