बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 582, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंषट्षष्टितमोऽध्यायः ५६३
जिह्वोल्लेखो वाग्भवेन मूलेन क्षालयेन्मुखम् । देवागारं ततो गत्वा निर्माल्यमपसार्य च ॥११॥
परिधायाम्बरं शुद्धं मंगलात्तिकं चरेत् । अस्त्रेण पात्रं संप्रोक्ष्य मूलेन ज्वालयेच्च तम् ॥१२॥
संपूज्य पात्राणादायापोत्थाय घंटां च वादयेत् । सुगोघृतप्रदीपेन भ्रामितेन समंततः ॥१३॥
वाद्यैर्गीतैर्मनोज्ञैश्च देवस्यारातिकं भवेत् । इति नीराजनं कृत्वा प्रार्थयित्वा निजेश्वरम् ॥१४॥
स्नातुं यायान्निम्नगादौ कीर्तयन्देवतागुणान् । गत्वा तीर्थं नमस्कृत्य स्नानीयं च निधाय वै ॥१५॥
मूलाभिमंत्रितमृदमादाय कटिदेशतः । विलिप्य पादपर्यंतं क्षालयेत्तीर्थवारिणा ॥१६॥
ततश्च पञ्चभिः पादौ प्रक्षाल्यांतर्जले पुनः । प्रविश्य नाभिमात्रे तु मृदं वामकरस्य च ॥१७॥
मणिबन्धे हस्ततले तदग्रे च तथा पुनः । कृत्वांगुल्या गांगमृदमादायास्त्रेण तत्पुनः ॥१८॥
निजोपरि च मंत्रज्ञो भ्रामयित्वा त्यजेत्सुधीः । तलस्थां च षडंगेषु तन्मंत्रैः प्रविलेपयेत् ॥१९॥
निमज्ज्य क्षालयेत्सम्यग् मलस्नानमितीरितम् । विभाव्येष्टमयं सर्वमेतन्मत्रं स्नानमाचरेत् ॥२०॥
अनंतादित्यसंकाशं निजभूषायुधैर्युतम् । मंत्रमूर्तिं प्रभुं स्मृत्वा तत्पादोदकसंभवाम् ॥२१॥
धारां च ब्रह्मरंध्रेण प्रविशंतीं निजां तनुम् । तथा संक्षालयेत्सर्वमंतर्देहगतं मलम् ॥२२॥
तत्क्षणाद्विरजा मंत्री जायते स्फटिकोपमः । ततः श्रौतोक्तविधिना स्नात्वा मन्त्री समाहितः ॥२३॥
जीभ को वाग्भव मन्त्र से और मूल मन्त्र से मुंह को धोये। स्वयं इस प्रकार शुद्ध होकर देव मन्दिर में
जाय और पहले की चढ़ी हुई पूजा सामग्री (फूल, अक्षत आदि) को दूर हटा दे। फिर स्वच्छ वस्त्र पहन कर
मंगला' आरती करे। मंगला आरती की विधि—अस्त्राय फट् कह कर पात्र पर जल छिड़के, मूल मन्त्र से उस
दीपक को जला दे। पात्र को पूजा कर उसको हाथ में ले ले और घंटी बजाने लगे या दूसरों को बजाने के लिए
कहें। शुद्ध गोघृत के दीपक को चारों ओर घुमा कर देव की आरती करे। उस समय मनोहर गीत और बाजे बजने
चाहिए। आरती के अनन्तर नीराजन कर अपने इष्ट देव की प्रार्थना कर देवता के गुणों का कीर्तन करते हुये
नदी या सरोवर आदि की ओर जावे। स्नान तीर्थ (नदी तट) पर जाकर तीर्थ को नमस्कार कर स्नानीय सामग्री
को भूमि पर रख दें ॥११-१५॥ मूल मन्त्र से अभिमन्त्रित की हुई मिट्टी को हाथ में लेकर कमर से नीचे पैर
तक लगावें फिर उसको जल से धो दें। तदनन्तर पाँच वार पैरों को धोकर कमर तक जल में घुस जाय और
बायें हाथ के मणिवन्ध (कलाई), हाथ के तलवे और अंगुलियों पर मिट्टी लगा दें। अपनी अंगुलियों से जल के
नीचे की मिट्टी निकाल कर 'अस्त्राय फट्' कह कर उसको अपने चारों ओर घुमाकर उस मिट्टी को स्नान
करने वाला वह व्यक्ति फेंक दे। बायें हाथ की मिट्टी को 'अस्त्राय फट्' एवं अन्य मन्त्रों से अपने छहों अंगों
में लगावें। फिर जल में डुबकी लगाकर अपने अंगों को मल मल कर धो डालें। स्नान के समय उस जल में
सब इष्ट माताओं का ध्यान अवश्य करना चाहिए। यही स्नान की विधि है ॥१६-२०॥
अनन्त सूर्य के समान कान्तिमान्, अपने आभूषण और अस्त्रों से युक्त मन्त्र मूर्ति प्रभु का स्मरण कर
उनके चरणोदक से निकली हुई गंगा के जल को नाक के छेदों से अपने शरीर में ले जाकर इससे शरीर के भीतर
के मल को बाहर निकाल दें। इस प्रकार अन्तःशुद्धि करने वाला साधक तत्काल रजोगुण से रहित होकर स्फटिक
के समान दिव्य देह हो जाता है। इस प्रकार शास्त्र विधि के अनुसार स्नान करने के उपरान्त वह मन्त्री सावधानी
से मन्त्र स्नान करे। मन्त्रस्नान की विधि निम्नलिखित है ॥२१-२३½॥
१. रात में चार बजे भगवान् को उठाकर जो आरती की जाती है ।