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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 572, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 572

चतुःषष्टितमोऽध्यायः ५५३
चतुर्विंशतिवर्णो वा सप्तविंशतिवर्णवान् । क्षुधार्तः स तु विज्ञेयो मंत्रसिद्धिर्विवर्जितः ॥४८॥
एकादशाक्षरो वापि पंचविंशतिवर्णकः । त्रयोविंशतिवर्णो वा स मनुदृप्तसंज्ञकः ॥४६॥
षड्विंशत्यक्षरो वापि षट्त्रिंशद्वर्णकोऽपि वा । एकोनत्रिंशद्वर्णो वा मंत्रो हीनांगकः स्मृतः ॥५०॥
अष्टाविंशतिवर्णो वा तथैर्कात्रंशदर्णकः । अतिक्रूरः स विज्ञेयोऽखिलकर्मसु गर्हितः ॥५१॥
चत्वारिंशत्समारभ्य त्रिषष्टंचतस्तु यो मनुः । व्रीडितः स तु विज्ञेयः सर्वकर्मसु न क्षमः ॥५२॥
पञ्चषष्ट्यक्षरा मन्त्रा ज्ञेया वै शांतमानसाः । पञ्चषष्ट्यर्णमारभ्य नवन्तदाक्षरावधि ॥५३॥
ये मंत्रास्ते तु विज्ञेयाः स्थानभ्रष्टा मुनीश्वर । त्रयोदशार्णा ये मन्त्रास्तिथ्यर्थाश्च तथा पुनः ॥५४॥
विकलास्ते समाख्याताः सर्वतंत्वविशारदैः । शतं सार्द्धशतं वापि शतद्वयमथापि वा ॥५५॥
द्विनवत्येकहीनो वा शतत्रयमथापि वा । ये मंत्रा वर्णसंख्याका निःस्नेहास्ते प्रकीर्तिताः ॥५६॥
चतुःशतं समारभ्य सहस्रार्णावधि द्विज । अतिवृद्धाः प्रयोगेषु शिथिलास्ते समीरिताः ॥५७॥
सहस्रवर्णादधिका मंत्रास्ते पीडिताह्वयाः । तदूर्ध्वं चैव ये मंत्राः स्तोत्ररूपास्तु ते स्मृताः ॥५८॥
एवंविधाः समाख्याता मनवो दोषसंयुताः । दोषनेतान्विज्ञाय मंत्रानेताञ्जपन्ति ये ॥५९॥
सिद्धिर्न जायते तेषां कल्पकोटिशतैरपि । छिन्नादिदोषदुष्टानां मंत्राणां साधनं ब्रुवे ॥६०॥
योनिमुद्रासने स्थित्वा प्रजपेद्यः समाहितः । यं कांचदपि वा मंत्रं तस्य स्युः सर्वसिद्धयः ॥६१॥
सव्यपाष्णि गुदे स्थाप्य दक्षिणं च ध्वजोपरि । योनिमुद्राबंध एवं भवेवासनमुत्तमम् ॥६२॥
अन्योऽप्यत्र प्रकारोऽस्ति योनिमुद्रानिबंधने । तदग्रे सरहस्यं ते कथयिष्यामि नारद ॥६३॥
पारंपर्यक्रमप्राप्तो नित्यानुष्ठानतत्परः । गुर्वनुज्ञातः श्रीमानभिषेकसमन्वितः ॥६४॥

मोहित और चौबीस तथा सत्ताईस वर्ण वाला क्षुधार्त कहा जाता है जो कि मन्त्रसिद्धि से शून्य रहता है
॥४७-४८॥ ग्यारह, पचीस, तैंतीस वर्ण वाला दृप्त मन्त्र है ॥४९॥ छब्बीस छत्तीस और उनतीस वर्ण वाला
हीनांग है ॥५०॥ अट्ठाईस और इकतीस वर्ण वाला मन्त्र अति क्रूर है जो सब कर्मों में निन्दित समझा जाता
है ॥५१॥ चालीस से लेकर तिरसठ वर्ण वाले मन्त्र व्रीड़ित (लज्जित) है जो सब प्रकार के कार्यों में समर्थ नहीं
होता है ॥५२॥ पैंसठ अक्षर वाले मन्त्र शान्तमानस हैं। मुनीश्वर ! पैंसठ वर्णों से लेकर निन्यानबे वर्णों तक के
जितने मन्त्र हैं, उनको स्थान भ्रष्ट कहा जाता है ॥५३३॥ तेरह वर्ण वाले मन्त्रों और पन्द्रह वर्ण वाले मन्त्रों को
मन्त्राचार्यों ने विकल कहा है ॥५४३॥ सो, डेढ़ सौ, दो सौ, इक्यानबे अथवा तीन सौ वर्णों वाले जितने मन्त्र
हैं वे निःस्नेह कहे जाते हैं ॥५५-५६॥ चार सौ से लेकर हजार वर्ण वाले मन्त्र अति वृद्ध हैं और वे शिथिल कहे
जाते हैं ॥५७॥ हजार वर्णों से अधिक वर्ण वाले मन्त्र पीड़ित हैं और इनसे अधिक वर्ण वाले मन्त्र नहीं प्रत्युत
स्तोत्र हैं ॥५८॥ इस प्रकार मन्त्रों के दोष गिनाये गए हैं। जो इन दोषों को न जानकर ऐसे दोषों से दुष्ट मंत्र
को जपते हैं उनको सौ करोड़ कल्प में भी सिद्धि नहीं मिलती। ॥५९३॥
अब छिन्न आदि उपर्युक्त दोषों से दुष्ट मन्त्रों की साधन विधि बता रहा हूँ ॥६०॥ जो योनि मुद्रा में
स्थित होकर एकाग्र भाव से जिस किसी मन्त्र को जपता है उसको सब सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं ॥६१॥ बायें
पैर की एड़ी को गुदा द्वार पर लगाकर दाहिने पैर की एड़ी को लिङ्ग के ऊपर रखें तो उसे योनि मुद्रा बन्ध कहते
हैं ॥६२॥ यह सर्वोत्तम आसन है। योनि मुद्रा बन्ध के और भी प्रकार (तरीके) हैं जिनका भेद और रहस्य सहित
वर्णन आगे करूंगा ॥६३॥ परम्परा क्रम द्वारा मन्त्रों को सीखा हुआ, नित्य प्रति अनुष्ठान में तत्पर रहने वाला,
७० ना० पु०