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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 57, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 57

सप्तमोऽध्यायः
नारद उवाच
कोऽसौ राक्षसभावाद्धि मोचितः सगरान्वये । सगरः को मुनिश्रेष्ठ तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥१॥
सनक उवाच
शृणुष्व मुनिशार्दूल गङ्गामाहात्म्यमुत्तमम् । यज्जलस्पर्शमात्रेण पावितं सागरं कुलम् ॥
गतं विष्णुपदं विप्र सर्वलोकोत्तमोत्तमम् ॥२॥
आसीद्रविकुले जातो बाहुर्नाम वृकात्मजः । बुभुजे पृथिवीं सर्वां धर्मतो धर्मतत्परः ॥३॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चान्ये च जन्तवः । स्थापिताः स्वस्वधर्मेषु तेन बाहुर्विशांपतिः ॥४॥
अश्वमेधैरियाजासौ सप्तद्वीपेषु सप्तभिः । अतर्पयद्भूमिदेवान् गोभूस्वर्णांशुकादिभिः ॥५॥
अशासन्नीतिशास्त्रेण यथेष्टं परिपन्थिनः । मेने कृतार्थमात्मानमत्यातपनिवारणम् ॥६॥
चन्दनानि मनोज्ञानि बलिं यत्सर्वदा जनाः । भूषिता भूषणैर्दिव्यैस्तद्राष्ट्रे सुखिनो मुने ॥७॥
अकृष्टपच्यां पृथिवी फलपुष्पसमन्विता ॥८॥
ववर्ष भूमौ देवेन्द्रः काले काले मुनीश्वर । अधर्मनिरताराये प्रजा धर्मेण रक्षिताः ॥६॥
अध्याय ७
गंगा माहात्म्य-वर्णन
नारद बोले- मुनिश्रेष्ठ ! सगर के वंश में कौन था जो राक्षस भाव से मुक्त हुआ, सगर कौन थे ? इस
आख्यान को कृपा कर मुझसे कहिए ॥१॥
सनक बोले- मुनिशार्दूल ! जिस गंगा के पुनीत जल के स्पर्श मात्र से सगर कुल पवित्र हो गया
और विष्णु पद को प्राप्त कर लिया उस गंगा के परमोत्तम माहात्म्य को सुनिए । सूर्य वंश में वृक का पुत्र
बाहु नामक राजा उत्पन्न हुआ । इस धार्मिक राजा ने न्याय पूर्वक सम्पूर्ण पृथ्वी पर शासन किया और अपने
बाहु-बल से ब्राह्मण-क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अन्य समस्त प्रजाओं को अपने धर्मों एवं कर्त्तव्यों में लगाया, सातों
द्वीपों में सात अश्वमेध यज्ञ किये, ब्राह्मणों को गौ, स्वर्ण, भूमि और वस्त्रदान से संतुष्ट किया एवं अपने शत्रुओं
को इच्छानुसार नीति पूर्वक पराजित किया । उसने मनोहर चन्दन वृक्ष के समान दूसरों के कष्ट दूर करने के
कारण अपने को कृत-कृत्य समझा । प्रजा सर्वदा उसके मनोन्दुकूल आचरण करती थी । मुने ! उसके राज्य में
मनुष्य सर्वदा दिव्य आभूषणों से भूषित और सुखी रहते थे ॥२-७॥ पृथ्वी अनायास अन्न देती और फल पुष्पों से
सुशोभित रहती थी । मुनीश्वर ! इन्द्र समय-समय पर पृथ्वी पर वर्षा कर देते थे । प्रत्येक बाधाओं और अन्याय
से राजा धर्मपूर्वक प्रजा की रक्षा करता था । एक दिन उसके हृदय में सम्पत्ति का नाश करने वाला, राज्य