बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 565, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें५४६ नारदीयपुराणम्
इन्द्रियाणां च सामर्थ्यं संकल्पेनात्मवृत्तिना । करोत्यंतःस्थितं भूयस्ततोऽन्तःकरणं मनः ॥७३॥
मनोऽहंकारबुद्धयाख्यमस्त्यन्तःकरणं त्रिधा । इच्छासंरंभबोधाख्या वृत्तयःक्रमतोऽस्य तु ॥७४॥
ज्ञानेंद्रियाणि श्रोत्रं त्वक् चक्षुर्जिह्वा च नासिका । ग्राह्याश्च विषया ह्येषां ज्ञेयाःशब्दादयो मुने ॥७५॥
शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः शब्दादयो मताः । वाक्पाणिपादपायूपस्थास्तु कर्मेन्द्रियाण्यपि ॥७६॥
वचनादानगमनोत्सर्गानंदेषु कर्मसु । करणानि च सिद्धिर्ना न कृतिः करणैर्विना ॥७७॥
दशधा करणैश्चेष्टां कार्यमाविश्य कार्यान्ये । चेष्टंते कार्यमालंब्य विभुत्वात्करणानि तु ॥७८॥
तन्मात्राणि तु खंवायुस्तेजोऽम्भः क्ष्मेति पञ्च वै । तेभ्यो भूतान्येकगुणान्याख्यातानि भवंति हि ॥७६॥
इति पञ्चसु शब्दोऽयं स्पर्शो भूतचतुष्टये । रूपं त्रिषु रसश्चैव द्वयोर्गंधः क्षितौ तथा ॥८०॥
कार्याण्येषां क्रमेणैवावकाशो व्यूहकल्पनम् । पाकश्च संग्रहश्चैव धारणं चेति कथ्यते ॥८१॥
आशीतोष्णौ महावायौ शीतोष्णौ वारितेजसोः । भास्वदग्नौ जले शुक्लं क्षितौ शुक्लाद्यनेकधा ॥८२॥
रूपं त्रिषु रसोऽम्भःसु मधुरः षड्विधः क्षितौ । गन्धः क्षितावसुरभिः सुरभिश्च प्रकीर्तितः ॥८३॥
तन्मात्रं तद्भूतगुणं करणं पोषणं तथा । भूतस्य तु विशेषोऽयं विशेषरहितं तु तत् ॥८४॥
इमानि पञ्चभूतानि संनिविष्टानि सर्वतः । पञ्चभूतात्मकं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥८५॥
शरीरसंनिविष्टत्वमेषां तावन्निरूप्यते । देहेऽस्थिमांसकेशत्वङ्नखदन्ताश्च पार्थिवाः ॥८६॥
मूत्ररक्तकफस्वेदशुक्रादिषु जलस्थितिः । हृदि पंक्तौ दृशोः पित्ते तेजस्तद्धर्मदर्शनात् ॥८७॥
प्राणादिवृत्तिभेदेन वायुश्चैवात्र संस्थितः । वियत्सर्वासु नाडीषु गर्भवृत्त्यनुषंगतः ॥८८॥
के द्वारा इन्द्रियों में कार्य क्षमता उत्पन्न करता है। पुनः अन्तः स्थित हो जाता और उसकी संज्ञा अन्तःकरण हो
जाती है। अन्तःकरण के मन, अहंकार और बुद्धि नामक तीन भेद हैं और इनकी वृत्तियां क्रमशः इच्छा, संरंभ
(कोप) और बोध हैं। मुने ! श्रोत्र (कान), त्वक्, चक्षु, जिह्वा और नासिका ज्ञानेन्द्रियां हैं और इनके शब्द आदि
ग्राह्य विषय हैं ॥६१-७५॥ शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध की शब्द आदि में गणना होती है। वाक्, पाणि
(हाथ) पाद, गुदा और लिङ्ग कर्मेन्द्रियां हैं। ये वचन, ग्रहण, गमन (चलना), मल त्याग और आनन्दानुभूति कर्मों के
असाधारण कारण हैं, क्योंकि असाधारण कारणों के बिना कार्योत्पत्ति नहीं होती। इन दश कारणों से इच्छायें
उत्पन्न होतीं और तब कार्य सम्पन्न होते हैं। इन्द्रियों के व्यापक होने के कारण कार्य का आलम्बन कर (लक्षित
कर) चेष्टायें उत्पन्न होती हैं। पंच तन्मात्राओं से आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी-ये पंच महाभूत उत्पन्न होते
हैं और इन पंच महाभूतों से अनेक गुणों वाले अनगिनत जीव उत्पन्न होते हैं। इन पांचों महाभूतों में शब्द और
स्पर्श गुण चार में होते हैं, रूप तीन में, रस दो में और गन्ध केवल पृथ्वी में होता है ॥७६-८०॥ इन पंच महाभूतों
के कार्य भी क्रमशः अवकाश, व्यूह कल्पन, पाक, संग्रह और धारण हैं। अशीत, उष्ण; महावाय, शीत उष्ण जन
और तेज में होते हैं। अग्नि में भास्वर शुक्ल, तेज में अभास्वर शुक्ल और पृथ्वी में शुक्ल आदि अनेक रूप हैं।
रूप तीन भूतों (जल, तेज और क्षिति) में, मधुर रस जल में और पृथ्वी में छः प्रकार के रस हैं। गन्ध
पृथ्वी में होता है, जिसके दो भेद हैं सुरभि और असुरभि । तन्मात्राओं में उनके भूतों के ही गुण हैं। करण और
पोषण यह भूत समुदाय की विशेषता है। परमात्मतत्त्व निर्विशेष है। ये पांच महाभूत सर्वत्र और सब में सन्निविष्ट
हैं, यह सम्पूर्ण स्थावर जंगमात्मक जगत् पंचभूतात्मक है। पांच महाभूत शरीर में कहाँ-कहाँ रहते हैं इसका
निरूपण किया जा रहा है। इस देह में हड्डी, मांस, केश, चमड़ा, नख और दाँत पृथ्वी तत्त्व से बने हैं। मूत्र,
रक्त, कफ, पसीना और वीर्य आदि में जल तत्त्व है। हृदय, पंक्ति, नेत्र और पित्त में तेज तत्त्व है। क्योंकि इनमें
तेज के गुण दृष्टिगोचर होते हैं। और वायु प्राण, अपान आदि के रूप में इस देह में स्थित है। सब नाड़ियों तथा गर्भा-