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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 535, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 535

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५१६ नारदीयपुराणम्
संलापालापकुशला भावज्ञाः सर्वकोविदाः । परं पंचाशतस्तस्य पाद्यादीनि व्यकल्पयन् ॥६४॥
देशकालोपपन्नेन साध्वन्नेनाप्यतर्पयन् । तस्य भुक्तवतस्तात तास्ततः पुरकाननम् ॥६५॥
सुरम्यं दर्शयामासुरेकैकत्वेन नारद । क्रीडंत्यश्च हसंत्यश्च गायंत्यश्चैव ताः शुकम् ॥६६॥
उदारसत्त्वं सत्त्वज्ञास्सर्वाः पर्य्यचरंस्तदा । आरणेयस्तु शुद्धात्मा जितक्रोधो जितेंद्रियः ॥६७॥
ध्यानस्थ एव सततं न हृष्यति न कुप्यति । पादशौचं तु कृत्वा वै शुकः संध्यामुपास्य च ॥६८॥
निषसादासने पुण्ये तमेवार्थं व्यचिंतयत् । पूर्वरात्रे तु तत्रासौ भूत्वा ध्यानपरायणः ॥६६॥
मध्यरात्रे यथान्याय्यं निद्रामाहारयत्प्रभुः । ततः प्रातः समुत्थाय कृत्वा शौचमनंतरम् ॥७०॥
स्त्रीभिः परिवृतो धीमान्ध्यानमेवान्वपद्यत । अनेन विधिना तत्र तदहः शेषमप्युत ॥७१॥
तां च रात्रिं नृपकुले वर्तयामास नारद ॥७२॥
इति श्रीबृहन्नारदी०पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयभागे शुकप्रलोभनं
नामाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५८॥

आभूषणों से सजी-धजी थीं, जो सब नारी-भावों को कुशल पंडिता, प्रत्येक प्रकार के आलाप में चतुर एवं सब
प्रकार की श्रृङ्गार कला में पारंगत थीं, उस मुनि का पाद्य आदि के द्वारा सत्कार किया ॥६३-६४॥ फिर देशकाला-
नुकूल मधुर अन्न को भोजन के लिए सामने रखा । जब मुनि कुमार शुक भोजन से तृप्त हो गये तब उन तरुणियों
ने क्रमशः नगर के एक-एक रम्य उपवन को दिखाया ॥६५ १/२॥ उन सब सुन्दरियों ने अपनी मधुर हंसी, मनोहर
कामक्रीड़ा और मादक गीतों से उस उदारचेता की परिचर्या की परन्तु उस जितेन्द्रिय, क्षमाशील, शुद्धात्मा अरणि-
कुमार का ध्यान भंग नहीं हुआ और उसके हृदय में किसी प्रकार का हर्ष या क्रोध नहीं उत्पन्न हुआ ॥६६-६७ १/२॥
सायंकाल शुकदेव ने पादप्रक्षालन आदि नित्य कृत्यों से निवृत्त होकर संध्योपासन किया और पवित्र आसन पर
आसीन होकर अपने मोक्षतत्त्व का चिन्तन किया । इस प्रकार रात के पहले पहर में वे ध्यान लगाये बैठे रहे । दूसरे
और तीसरे पहर भगवान् शुक ने न्यायपूर्वक निद्रा को स्वीकार किया ॥६८-६९ १/२॥ फिर प्रातःकाल उठकर
शौचादि से निवृत्त होकर स्त्रियों से घिरे रहने पर भी वह महात्मा ध्यान-साधना में ही लीन रहा ॥७० १/२॥ उस
राजभवन में इस विधि से योगी शुक ने दिन को बिता दिया और रात भी राज परिवार में रहकर ही बिताई
॥७१-७२॥
श्री नारदीय महापुराण के द्वितीय भाग में शुक-प्रलोभन नामक अट्ठावनवां अध्याय समाप्त ॥५८॥