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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 516, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 516

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६७
विलोमगो ग्रहो यस्य यात्रालग्नोपगो यदि । तस्य भङ्गप्रदो राज्ञस्तद्वर्गोऽपि विलग्नगः ॥६३३॥
रव्योर्द्वयनयोर्यातमनुकूलं शुभप्रदम् । तदभावे दिवारात्रौ या यायाद्यातुर्वधोऽन्यथा ॥६३४॥
मूढे शुक्रे कार्यहानिः प्रतिशुक्रे पराजयः । प्रतिशुक्रकृतं दोषं हंतुं शक्ता ग्रहा न हि ॥६३५॥
वासिष्ठकाश्यपेयात्रिभारद्वाजाः सगौतमाः । एतेषां पञ्चगोत्राणां प्रतिशुक्रो न विद्यते ॥६३६॥
एकग्रामे विवाहे च दुर्भिक्षे राजविग्रहे । द्विजक्षोभे नृपक्षोभे प्रतिशुक्रो न विद्यते ॥६३७॥
नीचगोऽरिगृहस्थो वा वक्रगो वा पराजितः । यातुर्भंगप्रदः शुक्रः स्वोच्चस्थश्चेज्जयप्रदः ॥६३८॥
स्वाष्टलग्नेष्टराशौ वा शत्रुभात्त्राष्टमेऽपि वा । तेषामीशस्थराशौ वा यातुर्मृत्युर्न संशयः ॥६३९॥
जन्मेशाष्टमलग्रेशौ मिथो मित्रे व्यवस्थितौ । जन्मराश्यष्टपक्षोत्थदोषा नश्यंति भावतः ॥६४०॥
क्रूरग्रहेक्षितोयुक्तो द्विःस्वभावोऽपि भंगदः । याने स्थिरोदये नेष्टो भव्ययुक्तेक्षितः स्वयम् ॥६४१॥
वस्वंत्याद्यर्द्धादिपं च संग्रहं तृणकाष्ठयोः । याम्यदिग्गमनं शय्या न कुर्याद्गेहगोपनम् ॥६४२॥
लग्न में वक्रगति ग्रह या उसके षड्वर्ग (राशि-होरादि) हों तो यात्रा करने वाले राजाओं को पराजय
होती है ॥६३३॥
अब जिस अयन में सूर्य और चन्द्रमा दोनों हों, उस समय उस दिशा की यात्रा शुभ फल देने वाली होती
है। यदि दोनों भिन्न अयन में हों तो जिस अयन में सूर्य हों उधर दिन में तथा जिस अयन में चन्द्रमा हों उधर
रात्रि में यात्रा शुभ होती है। अन्यथा यात्रा करने से यात्री की पराजय होती है ॥६३४॥
शुक्रदोष-शुक्र अस्त हों तो यात्रा में हानि होती है। यदि वह सम्मुख हो तो यात्रा करने से पराजय
होती है। सम्मुख शुक्र के दोष को कोई भी ग्रह नहीं हटा सकता है। किन्तु वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, भरद्वाज और
गौतम-इन पाँच गोत्र वालों को सम्मुख शुक्र का दोष नहीं होता है। यदि एक ग्राम के भीतर ही यात्रा करनी
हो या विवाह में जाना हो या दुर्भिक्ष होने पर अथवा राजाओं में युद्ध होने पर तथा राजा या ब्राह्मणों का कोप
होने पर कहीं जाना पड़े तो इन अवस्थाओं में सम्मुख शुक्र का दोष नहीं होता है। शुक्र यदि नीच राशि में या
शत्रुराशि में अथवा वक्रगति या पराजित हो तो यात्रा करने वालों की पराजय होती है। यदि शुक्र अपनी उच्च
राशि (मीन) में हो तो यात्रा में विजय होती है ॥६३५-६३८॥
अपने जन्मलग्न या जन्मराशि से अष्टम राशि या लग्न में तथा शत्रु की राशि से अष्टम राशि में या
लग्न में अथवा इन सबों के स्वामी जिस राशि में हों उस लग्न या राशि में यात्रा करने वाले की निश्चय ही
मृत्यु होती है। परन्तु यदि जन्मलग्नराशिपति और अष्टम राशिपति में परस्पर मैत्री हो तो उक्त अष्टम राशि-
जन्य दोष स्वयं नष्ट हो जाता है ॥६३९-६४०॥
द्विस्वभाव लग्न यदि पापग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो यात्रा में पराजय होती है। तथा स्थिर राशि
पापग्रह से युक्त न हो तो भी वह यात्रालग्न में अशुभ है। यदि स्थिर लग्न में शुभग्रह का योग या दृष्टि हो तो शुभ
फल होता है ॥६४१॥
धनिष्ठा नक्षत्र के उत्तरार्ध से आरंभ करके (रेवती पर्यन्त) पांच नक्षत्रों में गृहार्थ तृणकाष्ठों का संग्रह,
दक्षिण की यात्रा, शय्या (तकिया, पलंग आदि) का बनाना, घर को छवाना आदि कार्य नहीं करने चाहिये ॥६४२॥
६३ ना० पु०

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