सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

कॉपीराइट समस्या बताएँ

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 484, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 484

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६५
शुभोऽर्को जन्मतस्तृणायदशषट्सु मुनीश्वर । नवपञ्चांबुरिष्फस्थैर्य्यर्किमविध्यते न चेत् ॥२७१॥
शुभो जन्मर्क्षतश्चन्द्रो द्यूनांगायारिसप्तत्रिषु । यष्टेष्टांत्यां बुधर्मस्थैर्विबुधैर्विध्यते न चेत् ॥२७२॥
व्यायारिषु कुजः श्रेष्ठो जन्मतो चेन्न विध्यते । व्ययेष्वंकस्थितैः सौरिसौम्यसूर्यैः शुभौषधात् ॥२७३॥
ज्ञः स्वायार्य्यष्टाष्टखायेषु जन्मतश्चेन्न विध्यते । धीत्र्यकादिगजांतस्थैः शशांकरहितैः शुभैः ॥२७४॥
जन्मराशेर्गुरुः श्रेष्ठः स्वायगोऽध्यस्तगो न चेत् । विध्यतैंत्याष्टखांबुत्रिगतैः खेटैर्मुनीश्वर ॥२७५॥
जन्ममादासृताष्टांतांत्यापष्विष्टो भृगोःसुतः । चेन्न विद्धोऽष्टसप्तांगम् खांकाद्यायारिरामगैः ॥२७६॥
न ददाति शुभं किंचिद्गोचरे वेधसंयुते । तस्माद्वेधं विचार्याय कथनीयं शुभाशुभम् ॥२७७॥
वामभेदविधानेन दुष्टोऽपि स्याच्छुभङ्करः । सौम्येक्षितोऽनिष्टफलः शुभदः पापवीक्षितः ॥२७८॥
निष्फलौ तौ ग्रहौ स्वेन शत्रुणां च विलोकितौ । नीचराशिगतः स्वस्य शत्रोः क्षेत्रगतोऽपि ॥२७९॥
शुभाशुभफलं नैव दद्यादस्तमितोऽपि वा । ग्रहेषु विषमस्थेषु शांतिं कुर्यात्प्रयत्नतः ॥२८०॥
हानिवृद्धिर्ग्रहाधीना तस्मात्पूज्यतमा ग्रहा । मणिमुक्ताफलं विद्रुमाख्यं मरकतं तथा ॥२८१॥
पुष्परागं तथा वज्र नीलं गोमेदसंज्ञितम् । वैदूर्यं भास्करादीनां तुष्ट्य धार्यं यथाक्रमम् ॥२८२॥

मुनीश्वर ! अपनी जन्म राशि से ३,११,१०,६ स्थान में सूर्य शुभ होता है; परन्तु यदि क्रमशः जन्मराशि
से हो ९,५,४ तथा १२ वें स्थान में स्थित शनि के अतिरिक्त अन्य ग्रहों से वह विद्ध न हो, तभी शुभ होता है ।
इसी प्रकार चन्द्रमा जन्मराशि से ७,६,११,१,१० तथा ३ मैं शुभ होते हैं; यदि क्रमशः २,१२,८,५,४ और ९ वें
में स्थित बुध से भिन्न ग्रहों से विद्ध न हों । मंगल जन्मराशि से ३,११,६ में शुभ हैं; यदि क्रमशः १२,५ तथा ९वें
स्थान में स्थित अन्य ग्रह से विद्ध न हों । शनि भी अपनी जन्मराशि से इन्हीं ३, ११, ६ स्थानों में शुभ हैं; यदि
क्रमशः १२, ५, ९ स्थानों में स्थित सूर्य के सिवा अन्य ग्रहों से विद्धन हों । बुध अपनी जन्मराशि से २,
४, ६, ८, १० और ११ स्थानों में शुभ हैं, यदि क्रमशः ५, ३, ९, १, ८, और १२ स्थानों में
स्थित चन्द्रमा के सिवा अन्य किसी ग्रह से विद्ध न हों । मुनीश्वर ! गुरु जन्मराशि से २, ११, ९, ५ और
७ इन स्थानों में शुभ होते हैं; यदि क्रमशः १२, ८, १०, ४ और ३ स्थानों में स्थित अन्य किसी ग्रह से विद्ध न
हों । इसी प्रकार शुक्र भी जन्मराशि से १, २, ३, ४, ५, ८, ९, १२ तथा ११ स्थानों में शुभ होते हैं; यदि क्रमशः
८, ७, १, १०, ९, ५, ११, ६, ३ स्थानों में स्थित अन्य ग्रह से विद्ध न हों ॥२७१-२७६॥
जो ग्रह गोचर में वेधयुक्त हो जाता है, वह शुभ या अशुभ फल को नहीं देता; इसलिए वेध का विचार
कर के ही शुभ या अशुभ फल समझना चाहिए ॥२७७॥ वामवेध होने (वेध स्थान में ग्रह और शुभ स्थान में
अन्य ग्रह के होने) से दुष्ट (अशुभ) ग्रह भी शुभकारक हो जाता है तथा शुभप्रद ग्रह भी पाप ग्रह से दृष्ट हो तो
अनिष्ट फल देता है। शुभ और पाप दोनों ग्रह यदि अपने शत्रु से देखे जाते हों अथवा नीच राशि में या अपने
शत्रु की राशि में हों तो निष्फल हो जाते हैं। इसी प्रकार जो ग्रह अस्त हो, वह भी अपने शुभ या अशुभ फल
को नहीं देता है। ग्रह यदि दुष्ट स्थान में हो तो यत्नपूर्वक उसकी शान्ति कर लेनी चाहिए । हानि और लाभ
ग्रहों के ही अधीन हैं, इसलिए ग्रहों की यत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिए ॥२७८-२८०३॥
सूर्य आदि नवग्रहों की तुष्टि के लिए क्रमशः मणि (पद्मराग-लाल), मुक्ता (मोती), विद्रुम (मूंगा), मरकत
(पन्ना), पुष्पराग (पुखराज), वज्र (हीरा), नीलम, गोमेदरत्न एवं वैदूर्य (लहसनिया) धारण करना चाहिए
॥२८१-२८२॥
५९ ना० पृ०