सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

कॉपीराइट समस्या बताएँ

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 481, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 481

४६२ नारदीयपुराणम्
ध्वांक्षध्वजाख्यश्रीवत्सबज्रमुद्गरछत्रकाः । मित्रमानसपद्माख्यलुम्बोत्पातमृतयः ॥२३८॥
काणसिद्धिशुभा मृत्युर्मुशलांतककुंजराः । राक्षसाद्यवरस्थैर्यवर्द्धमानः क्रमादमी ॥२३६॥
योगाः स्वसंज्ञाफलदा अष्टाविंशतिरीरिताः । रविवारे क्रमादेव दस्रभादिन्दुभाद्विधौ ॥२४०॥
सार्पाद्सौमे बुधे हस्तान्मैत्रभात्सुरमंत्रिणि । वैश्वदेवाद्शुलुसले वारुणाद्भास्करात्मजे ॥२४१॥
हस्तक्षं च रवाविन्दौ चंद्रभं दस्रभं कुजे । सौम्ये मित्रभमाचार्य तिष्यः पौष्णं भृगोः सुते ॥२४२॥
रोहिणी मंदवारे च सिद्धियोगाह्वया अमी । आदित्यभौमयोर्नंदा भद्रा शुक्रशशांकयोः ॥२४३॥
जयासौम्ये गुरौ रिक्ता शनौपूर्णेति नो शुभाः । नन्दा तिथिः शुक्रवारे सौम्ये भद्रा कुजे जया ॥२४४॥
रिक्ता मंदे गुरोर्वारे पूर्णा सिद्धाह्वया अमी । एकादश्यामिंदुवारो द्वादश्यामर्कवासरः । ॥२४५॥
षष्ठी गुरौ तृतीया ज्ञेऽष्टमी शुक्रे शनैश्चरे । नवमी पञ्चमी भौमे दग्धयोगाः प्रकीर्तिताः ॥२४६॥
भरण्यर्कदिने चंद्रे चित्रा भोमे तु विश्वभम् । बुधे श्रविष्ठार्यभभे गुरौ ज्येष्ठा भृगोर्दिने ॥२४७॥
रेवती मंदवारे तु ग्रहजन्मर्क्षनाशनम् । विशाखादिचतुर्वर्गमर्कवारादिषु क्रमात् ॥२४८॥
८ श्रीवत्स, ९ वज्र, १० मुद्गर, ११ छत्र, १२ मित्र, १३ मानस, १४, पद्म, १५ लुम्ब, १६ उत्पात,
१७ मृत्यु, १८ काण, १६ सिद्धि, २० शुभ, २१ अमृत, २२ मुसल, २३ अन्तक (यम), २४ कुञ्जर (हाथी),
२५ राक्षस, २६ चर, २७ सुस्थिर और २८ वर्धमान—ये क्रमशः पठित २८ योग अपने-अपने नाम के समान
ही फल देने वाले कहे गये हैं ।
इन योगों को जानने की रीति—रविवार को अश्विनी नक्षत्र से, सोमवार को मृगशिरा से, मंगल-
वार को आश्लेषा से, बुधवार को हस्त से, गुरुवार को अनुराधा से, शुक्रवार को उत्तराषाढ़ से और शनिवार को
शतभिषा से आरम्भ करके उस दिन के नक्षत्र तक गणना करने पर जो संख्या हो, उसी संख्या वाला योग उस
दिन होगा ।।२३७-२४१॥
सिद्धियोग—रविवार को हस्त, सोमवार को मृगशिरा, मंगलवार को अश्विनी, बुधवार को अनुराधा,
बृहस्पतिवार को पुष्य, शुक्रवार को रेवती और शनिवार को रोहिणी हो तो सिद्धियोग होता है ।।२४२॥
रवि और मंगलवार को नन्दा (१, ६, ११), शुक्र और सोमवार को भद्रा (२, ७, १२), बुधवार को
जया (३, ८, १३), गुरुवार को रिक्ता (४, ९, १४) और शनिवार को पूर्णा (५, १०, १५) हो तो मृत्युयोग
होता है । अतः इसमें शुभ कर्म न करे ॥२४३॥
सिद्धयोग—शुक्रवार को नन्दा, बुधवार को भद्रा, मंगलवार को जया, शनिवार को रिक्ता और गुरुवार
को पूर्ण तिथि हो तो सिद्धयोग होता है ।।२४४॥
दग्धयोग—सोमवार को एकादशी, गुरुवार को षष्ठी, बुधवार को तृतीया, शुक्रवार को अष्टमी, शनिवार
को नवमी तथा मंगलवार को पञ्चमी तिथि हो तो दग्धयोग होता है ।।२४५-२४६।।
ग्रहों के जन्म नक्षत्र—रविवार को भरणी, सोमवार को चित्रा, मंगलवार को उत्तराषाढ़, बुधवार
को धनिष्ठा, गुरुवार को उत्तरा फाल्गुनी, शुक्रवार को ज्येष्ठा और शनिवार को रेवती क्रमशः सूर्यादि ग्रहों
के जन्म नक्षत्र होने के कारण शुभ कार्य के विनाशक होते हैं ।।२४७॥
यदि रवि आदि वारों में विशाखा आदि चार-चार नक्षत्र हों अर्थात् रविवार को विशाखा से सोम को
पूर्वाषाढ़ से, मंगल को धनिष्ठा से, बुध को रेवती से, गुरुवार को रोहिणी से, शुक्र को पुष्य से और शनि को
उत्तरा फाल्गुनी से चार-चार नक्षत्र हों तो क्रमशः उत्पात, मृत्यु, काण तथा सिद्ध नामक योग होते
हैं ।।२४८॥