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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 477, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 477

४५८ नारदीयपुराणम्
परार्द्धयुं जि क्रमशः संप्रीतिर्दम्पतोमिथः । जघन्यास्तोयदार्द्राहिपवनांतकनाकपाः ॥१९२॥
क्रमादितिद्विदैवत्या बृहत्ताराः पराः समाः । तासां प्रमाणघटिकास्त्रिंशन्नवतियष्टयः ॥१९३॥
क्रमादभ्युदिते चंद्रे नयत्यर्घसमानि च । अश्वश्रोत्रीज्यनक्षत्रंत्वष्ट्राब्जत्त्युत्तराभवाः ॥१९४॥
पितृद्विदैववस्वाख्यास्ताराः स्युः कुलसंज्ञिकाः । धातृज्येष्ठादितिस्वातीपौष्णार्कहरिदेवताः ॥१९५॥
अजाह्यंत्यकभौ जंगताराश्चैवाकुलाह्वयाः । शेषाः कुलाकुलास्तारास्तासां मध्ये कुलोडुषु ॥१९६॥
प्रयाति यदि भूपालस्तदाप्नोति पराजयम् । भेष्वकुलसंज्ञेषु जयमाप्नोति निश्चितम् ॥१९७॥
संधिर्वापि तयोः साम्यं कुलाकुलगणोडुषु । अर्कोकिभौमवारे चेद्भद्राया विषमांघ्रिभम् ॥१९८॥
त्रिपुष्करं त्रिगुणं द्विगुणं यमलाङ्घ्रिभम् । दद्यात्तद्दोषनाशाय गोत्रयं मूल्यमेव वा ॥१९९॥

रेवती से छह नक्षत्र पूर्वार्धयोगी, आर्द्रा से बारह नक्षत्र मध्ययोगी और धनिष्ठा से नौ नक्षत्र परार्धयोगी
हैं। इनमें से पूर्वयोगी में यदि वर और कन्या-दोनों के नक्षत्र पड़ते हों तो स्त्री का स्वामी में अधिक प्रेम होता
है। मध्ययोग में हों तो दोनों में परस्पर समान प्रेम होता है और परार्धयोगी में दोनों के नक्षत्र हों तो स्त्री में पति
का अधिक प्रेम होता है ॥१९११/२॥
**बृहत्, सम और अधम नक्षत्र-**शतभिषा, आर्द्रा, आश्लेषा, स्वाती, भरणी और ज्येष्ठा—ये छह
नक्षत्र जघन्य (अधम) कहे गये हैं। ध्रुवसंज्ञक, पुनर्वसु और विशाखा—ये नक्षत्र वृहत् (श्रेष्ठ) कहलाते हैं तथा
अन्य नक्षत्र समसंज्ञक हैं। इनका विशोपक मान क्रमशः ३०,६० और ६० घड़ी कहा गया है ॥१९२--१६३॥
यदि द्वितीया तिथि को बृहतसंज्ञक नक्षत्र में चन्द्रोदय हो तो अन्न सस्ता होता है। समसंज्ञक नक्षत्र में चन्द्रदर्शन
हो तो अन्नादि के भाव में समता होती है और जघन्यसंज्ञक नक्षत्र में चन्द्रोदय हो तो उस महीने में अन्न महँगा
हो जाता है ॥१९३१/२॥
**यात्रा करने वाले को जय तथा पराजय देने वाले नक्षत्र-**अश्विनी, कृत्तिका, मृगशिरा पुष्य,
मूल चित्रा, श्रवण, तीनों उत्तरा, पूर्वा फाल्गुनी, मघा, विशाखा, धनिष्ठा—ये नक्षत्र कुलसंज्ञक हैं। रोहिणी,
ज्येष्ठा, पुनर्वसु, स्वाती, रेवती, हस्त, अनुराधा, पूर्वाभाद्रपद, भरणी और आश्लेषा—ये नक्षत्र अकुलसंज्ञक हैं।
शेष नक्षत्र कुलाकुलसंज्ञक हैं। इनमें कुलसंज्ञक नक्षत्रों में विजय की इच्छा से यात्रा करने वाले राजा की पराजय
होती है अकुलसंज्ञक नक्षत्रों में यात्रा करने से वह निश्चय ही शत्रु पर विजय प्राप्त करता है। और कुलाकुल
संज्ञक नक्षत्रों में युद्धार्थ यात्रा करने पर शत्रुओं के साथ सन्धि होती है। अथवा यदि युद्ध हुआ तो भी दोनों में
समानता सिद्ध होती है। (किसी एक पक्ष की हार या जीत नहीं होती) ॥१९४–१६७१/२॥
त्रिपुष्कर द्विपुष्कर योग-- रवि, शनि या मङ्गल वार में भद्रा (२,१२) तिथि तथा विषम चरण
वाले नक्षत्र (कृत्तिका, पुनर्वसु, उत्तरा फाल्गुनी, विशाखा, उत्तराषाढ़ और पूर्व भाद्रपद) हों तो (इन तीनों के
संयोग से 'त्रिपुष्कर' नामक योग होता है। तथा उन्हीं रवि, शनि और मंगलवार एवं भद्रा तिथियों में दो
चरण वाले नक्षत्र (मृगशिरा, चित्रा और धनिष्ठा) हों तो 'द्विपुष्कर' योग होता है। त्रिपुष्करयोग त्रिगुणित (तीन
गुने) और द्विपुष्करयोग द्विगुणित लाभ और हानि को देने वाले होते हैं। अतः इनमें किसी वस्तु की हानि हो तो
उस दोष की शान्ति के लिए तीन गोदान या तीन गौओं का मूल्य तथा द्विपुष्कर दोष की शान्ति के लिए दो
गोदान या दो गौओं का मूल्य ब्राह्मणों को देना चाहिए। इससे उक्त (तिथि, वार और) नक्षत्र सम्बन्धी दोष का
निवारण हो जाता है ॥१९८-१९९१/२॥