बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४४५
याम्यगोऽनिष्टफलदो भवेद्भेदकरो नृणाम् । विनोत्पातेन शशिनः कदाचिन्नोदय व्रजेत् ॥३८॥
अनावृष्ट्यग्निभयकृदनर्थनृपविग्रहः । वसुवैष्णवविश्वेशद्रुधातृभेषु चरन्बुधः ॥३९॥
भिनत्ति यदि तत्तारां बाधावृष्टिभयंकरः । आर्द्रादिपितृभांतेषु दृश्यते यदि चंद्रजः ॥४०॥
तदा दुर्भिक्षकलहरोगानावृष्टिभीतिकृत् । हस्तादिषट्सु तारासु विचरन्निदुनंदनः ॥४१॥
क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं कुरुते रोगनाशनम् । अहिर्बुध्न्यैर्यमाग्नेययाम्यभेषु चरन्बुधः ॥४२॥
भिषक्तुरंगवाणिज्यवृत्तीनां नाशकृत्तदा । पूर्वात्रयेचरन्सौम्यो योगं तारां भिनत्ति चेत् ॥४३॥
क्षुच्छस्त्रानलचौरेभ्यो भयदः प्राणिनां तदा । याम्याग्निधातृवाय्व्यधिष्ण्येषु प्राकृता गतिः ॥४४॥
रौद्रेन्दुसार्पपित्र्येषु ज्ञेया मिश्राह्वया गतिः । भान्त्रार्यमेज्यादितिषु संक्षिप्ता गतिरुच्यते ॥४५॥
गतिस्तीक्ष्णाजचरणाहिर्बुध्न्यभाश्विभेषुया । योगान्तिकातिविश्वांबुमूलमत्स्यैन्द्रजस्य च ॥४६॥
घोरा गतिर्हरित्वाष्ट्रवसुवारुणभेषु च । इंद्राग्निमित्रमार्तंडभेषु पापाह्वया गतिः ॥४७॥
प्राकृताद्यासु गतिषु ह्युदितोऽस्तमितोपि वा । यावंत्येव दिनान्येष दृश्यस्तावत्यदृश्यगः ॥४८॥
चत्वारिंशत्क्रमात्त्रिंशद्विशद् भूयसुतो नव । पंचदशैकादशभिर्दिवसैः शशिनंदनः ॥४९॥
प्राकृतायां गतः सौम्यः क्षेमारोग्यसुभिक्षकृत् । मिश्रसंक्षिप्तयोर्मध्ये फलदोऽन्यासु वृष्टिदः ॥५०॥
बुध-चार-फल—यदि कदाचित् आंधी, मेघ आदि उत्पात न होने पर (शुद्ध आकाश में) भी बुध का
उदय देखने में न आये तो अनावृष्टि, अग्निभय, अनर्थ और राजाओं में युद्ध होता है । धनिष्ठा, श्रवण,
उत्तराषाढ़, मृगशिरा और रोहिणी में चलता हुआ बुध यदि उन नक्षत्रों के योगताराओं का भेदन करे तो
वह लोक में बाधा और अनावृष्टि आदि और भय उत्पन्न करता है। यदि आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा
और मघा—इन नक्षत्रों में बुध दृश्य हो तो दुर्भिक्ष, कलह, रोग तथा अनावृष्टि आदि का भय उपस्थित
करता है। हस्त से छह (हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा तथा ज्येष्ठा) नक्षत्रों में बुध के रहने से लोक में
कल्याण, सुभिक्ष तथा आरोग्य होता है। उत्तरभाद्रपद, उत्तरा फाल्गुनी, कृत्तिका और भरणी में विचरने वाला बुध
वैद्य, घोड़े और व्यापारियों का नाश करता है। पूर्वाफाल्गुनी पूर्वाषाढ़ और पूर्वभाद्रपद में विचरता हुआ बुध यदि
इन नक्षत्रों के योग ताराओं का भेदन करे तो क्षुधा, शस्त्र, अग्नि और चोरों से प्राणियों को भय प्राप्त होता है
॥३८-४३३॥
भरणी, कृत्तिका, रोहिणी और स्वाती—इन नक्षत्रों में बुध की गति 'प्राकृतिकी' मानी जाती है। आर्द्रा,
मृगशिरा, आश्लेषा और मघा--इन नक्षत्रों में बुध की गति 'मिश्रा' मानी जाती है। पूर्वाफाल्गुनी, उत्तरा-
फाल्गुनी, पुष्य पुनर्वसु—इनमें बुध की 'संक्षिप्ता' गति कही गई है। पूर्वभाद्रपद, उत्तरभाद्रपद, रेवती और
अश्विनी--इनमें बुध की गति तीक्ष्णा' मानी जाती है। उत्तराषाढ़, पूर्वाषाढ़, और मूल में उनकी (योगान्तिका'
गति मानी गई है। श्रवण, चित्रा, धनिष्ठा और शतभिषा में 'घोरा' गति और विशाखा, अनुराधा तथा हस्त—
इन नक्षत्रों में बुध की 'पाप' संज्ञक गति होती है। इन प्राकृत आदि सात प्रकार की गतियों में उदित होने पर
जितने दिन तक बुध दृश्य रहता है, उतने ही दिन में उनमें अस्त होने पर अदृश्य रहता है। उन दिनों की संख्या
क्रम से ४०, ३०, २२, १८, ९, १५ और ११ है। बुध जब प्राकृत गति में रहता है, तब संसार में कल्याण,
आरोग्य और सुभिक्ष करता है। मिश्र और संक्षिप्त गति में मध्यम फल देता है तथा अन्य गतियों में अनावृष्टि