बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 453, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें४३४ नारदीयपुराणम्
लग्नेन्दुयुक्तैस्त्रिंशांशैः फलमेतद्बलानुगम् । दृग्भैः मिथोंशे शुक्राकौ शुक्रे चेद्वा घटांशके ॥३०२॥
स्त्रीभिः स्त्री मैथुनं याति मदनानल्दीपिता । शून्ये कापुरुषो द्यूने बले क्लीबो न सद्दृशि ॥३०३॥
बुधाकर्योश्चरभे नित्यं परवेशपरायणः । तत्सृष्टा मदगे सूर्ये स्त्रीबालविधवा कुजे ॥३०४॥
पापदृष्टे शनौ द्यूने कन्यैवापद्यते जराम् । आग्नेयैर्विधवास्तस्थैः पुनर्भूमिश्रकैर्भवेत् ॥३०५॥
क्रूरे हीनबलेऽस्तस्थे परित्यक्ता न सद्दृशि । मिथोशगैः सितारौ तु कुरुतोऽन्यरतां स्त्रियम् ॥३०६॥
शीतरश्मिर्यदा द्यूने तदा भर्तुरनुज्ञया । सौरारक्षे लग्नगते सेंदुशुके तु बंधकी ॥३०७॥
मात्रा सार्द्धमसद्दृष्टे तथा कौजेंशकेऽस्तगे । मंददृष्टे व्याधियोनिः सद्ग्रहंशे पतिप्रिया ॥३०८॥
मंदर्क्षे वांशके द्यूने वृद्धो मूर्खः पतिः स्त्रियाः ।
स्त्रीलोलः क्रोधनः कौजे बौधे विद्वांश्च नैपुणः ॥३०८½॥
जितेंद्रियो गुणी जैवे चांद्रे कामी मृदुस्तथा । शौके सौभाग्ययुक्तकांतः सौरेति मृदुकर्मकृत् ॥३१०॥
शुक्र के नवमांश में शनि और शनि के नवमांश में शुक्र हो अथवा शुक्रराशि (वृष-तुला) लग्न में कुम्भ
का नवमांश हो तो इन दोनों योगों में जन्म लेने वाली स्त्री कामाग्नि से संतप्त हो स्त्रियों से भी रति क्रीड़ा
करती है ॥३०२½॥
पति-भाव—स्त्री के जन्मलग्न से सप्तम भाव में कोई ग्रह न हो और उस पर शुभग्रह की दृष्टि न हों
तो उसका पति कुत्सित होता है। सप्तम स्थान में बुध और शनि हो और शुभग्रह से दृष्ट न हो तो भी पति
नपुंसक होता है। यदि सप्तम भाव में चरराशि हो तो उसका पति परदेशवासी होता है। सप्तम भाव में सूर्य
हो तो उस स्त्री को पति त्याग देता है। मंगल हो तो वह स्त्री बालविधवा होती है। शनि सप्तम भाव में
पापग्रह से दृष्ट हों तो वह स्त्री कन्या (अविवाहिता) रहकर ही वृद्धावस्था को प्राप्त होती है ॥३०३-३०४½॥
यदि सप्तम भाव में एक से अधिक पापग्रह हों तो भी स्त्री विधवा होती है, शुभ और पाप दोनों हों
तो वह पुनर्भु होती है। यदि सप्तम भाव में पापग्रह निर्बल हो और उस पर शुभग्रह की दृष्टि न हों तो भी
स्त्री अपने पति द्वारा त्याग दी जाती है, अन्यथा शुभग्रह की दृष्टि होने पर वह पतिप्रिया होती है ॥३०५½॥
मंगल के नवमांश में शुक्र के नवमांश में मंगल हो तो वह स्त्री परपुरुष में आसक्त होती है। इस योग
में चन्द्रमा यदि सप्तम भाव में हो तो वह अपने पति की आज्ञा से कार्य करता है ॥३०६½॥
यदि चन्द्रमा और शुक्र से संयुक्त शनि एवं मंगल की राशि (मकर, कुम्भ, मेष और वृश्चिक) लग्न में
हों तो वह स्त्री कुलटा-स्वभाव वाली होती है। यदि उक्त लग्न पर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो वह स्त्री अपनी
माता सहित कुलटा होती है। यदि सप्तम भाव में मंगल का नवमांश हो और उस पर शनि की दृष्टि हो तो
वह नारी योनि रोग वाली होती है। यदि सप्तम भाव में शुभग्रह का नवमांश हो तब तो वह पति की प्रिया
होती है ॥३०८॥ शनि की राशि या नवमांश सप्तम भाव में हो तो उस स्त्री का पति वृद्ध और मूर्ख होता
है। सप्तम भाव में मंगल की राशि या नवमांश हो तो उसका पति स्त्रीलोलुप और क्रोधी होता है। बुध की
राशि या नवमांश हो तो विद्वान् और निपुण होता है। गुरु का नवांश राशि या हो तो जितेन्द्रिय और गुणी होता
है। चन्द्रमा की राशि या नवमांश हो तो कामी तथा मनोहर स्वरूप वाला होता है। शुक्र की राशि या
नवमांश सप्तम में हो तो उसका पति भाग्यवान् और मनोहर रूप वाला होता है। सूर्य की राशि या नवमांश सप्तम
भाव में हो तो उस स्त्री का पति अत्यन्त कोमल और कर्मठ होता है ॥३०९-३१०॥