बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 436, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४५७
धर्मेध्यायारिगो जीवाद्दिकत्यरिगो विधोः । पृथ्यंत्यधीतपाः सुज्ञा ततोवृद्धंघत्यबंधुराः ॥१५२॥
वृद्धिगोंगात्सधनधीतपः स्वाराच्छशी शुभः । स्वद्व्वृध्यस्तादिषु पृधात्सप्ताष्टौ पंचयोभगः ॥१५३॥
षट्त्र्यायधीस्थो मंदाच्च ज्ञाद्विद्यायाष्टकेंद्रगः । ॥१५४॥
केंद्राष्टात्यांत्य इज्याद्वा ज्ञज्ञयायास्तत्र स्वे कवेः ॥१५५॥
वृद्धाविनात्सादिधिया मंगा मायारिगो विधोः । केंद्राष्टापार्थंगः स्वक्षान्मंदाद्गोष्टायकेंद्रगः ॥१५५॥
षट् त्रिधी भवतः सौम्यात्षड्वांशाष्टगो भृगोः । ॥१५६॥
कवेर्द्वर्चाषष्ठमोऽध्याये कर्मायव्ययषष्ठस्थो जीवाद्भौमः शुभः स्मृतः ॥१५७॥
सन्त्रोमंदान्सधीत्रये । साक्षास्ते भूमिजाज्जीवाद्यारिरिभवमृत्यगः ॥१५८॥
धर्मायारिसितांत्यैर्कात्साद्यत्रिस्र्वगता स्वभात् । ॥१५८॥
षट्स्वायाष्टानिधिखेष्विज्यात्सहायेषु विलग्नतः ॥१५९॥
विश्व्वाष्टाद्यस्तबंध्याये कुजात्खात्सत्रिके गुरुः । साध्यंके सन् रवेः शुकाद्धीखगो दिग्भवारिगः ॥१५९॥
चंद्राद्वीशार्यगोस्तेषु मन्दाद्वीत्रिषडंत्यगः । गोन्धिधीषट्खखाद्या ये ज्ञात्स्यूते विलग्नतः ॥१६०॥
६ में, गुरु से ९ । ५ । ११ । ६ में, चन्द्रमा से १० । ३ । ११, ६ में, बुध से इन्हीं १० । ३ । ११ । ६ और १२ ।
५ । ६ में भी वह शुभ होता है । लग्न से ३ । ६ । १० । ११ । १२ । ४ स्थानों में सूर्य शुभ होता है ॥१५१-
१५२॥
चन्द्रमा लग्न से ६, ३, १०, ११ स्थानों में; मंगल से २, ५, ६ सहित इन्हीं ६, ३, १०, ११ स्थानों में;
अपने स्थान से ३, ६, १०, ११, ७, १ में; सूर्य से ३, ६, १०, ७, ८ में; शनि से ६, ३, ११, ५ में; बुध से ५,
३, ८, १, ४, ७, १० में; गुरु से १, ४, ७, १०, ८, ११, १२ में और शुक्र से ४, ५, ९, ३, ११, ७, १० इन
स्थानों में शुभ होता है ॥१५३-१५४॥
मंगल सूर्य से ३, ६, १०, ११, ५ में; लग्न से ३; ६, १०, ११, ५ में; लग्न से ३, ६, १०, ११, १ में
चन्द्रमा से ३, ६, ११ में; अपने आश्रित स्थान से १, ४, ७, १०, ८, ११, २ में; शनि से ६, ८, ११, १, ४, ७,
१० में, बुध से ६, ३, ५, ११, में, शुक्र से ६, ११, २, ८ में; और गुरु से १०, ११, १२, ६ स्थानों में शुभ
होता है ॥१५५-१५६॥
बुध शुक्र से ५, ३ सहित २, १, ८, ६, ४, ११ स्थानों में; शनि और मंगल से १०, ७ सहित २, १, ८,
९, ४ और ११वें स्थान में; गुरु से १२, ६, ११, ८ वें स्थानों में; स्वाधिष्ठित स्थान से १, ३, १०, ६, ११, ६,
५, १२वें स्थानों में; चन्द्रमा से ६, १०, ११, ८, ४, १० में और लग्न से १ तथा पूर्वोक्त ६, १०, ११, ८, ४,
१० स्थानों में शुभ होता है ॥१५७-१५८॥
गुरु मंगल से १०, २, ८, १, ७, ४, ११ स्थानों में; अपने आश्रित स्थान से ३ सहित पूर्वोक्त (१०, २,
८, १, ७, ४, ११) स्थानों में; सूर्य से ३, ६ सहित पूर्वोक्त (१०, २, ८, १, ७, ४, ११) स्थानों में; शुक्र से ५,
२, ९, १०, ११, ६ में; चन्द्रमा से २, ११, ५, ९, ७ में; शनि से ५, ३, ६, १२ में; बुध से ९, ४, ५, ६, २,
१०, १, ११ में; तथा लग्न से ७ सहित पूर्वोक्त (९, ४, ५, ६, २, १०, १, ११) स्थानों में शुभ होता है
॥१५९-१६०॥
५६ ना० पृ०