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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 427, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 427

४०८ नारदीयपुराणम्
मृगांत्यगे वामनकः सौरैर्द्वर्कनिरीक्षिते । ॥६२॥
धीनयोदपगैश्चांशैः पापास्तैरसिरोहदाः
रवीन्दुयुक्ते सिंहेगे माहेयार्किनिरीक्षिते ।
नेत्रहीना मिश्रखेटैर्दृष्टे बुद्बुदलोचनाः । ॥६३॥
व्ययेजो वामनयनं यक्षं सूर्यो विनाशयेत्
नेष्टा योगाः शुभैर्दृष्टाः पापाः स्युर्नार्त्र संशयः । मंदेऽस्ते मंदभांशेंगे निषेकेऽब्दत्रये जनिः ॥६४॥
द्वादशाब्दे शशिन्येवं सुतावपि विचितयेत् ॥६५॥
आधानेन्दुद्वादशांशा पापास्तद्राशिभिः पुरः ॥६६॥
शशांके जन्मभागादिद्विघ्नमष्टकलाः स्मृताः ॥६७॥
पितुः परोक्षे जन्मस्यादिन्दौ लग्नमपश्यति ॥६८॥
मध्याद्भ्रष्टेऽर्के विदेशस्थे जनने नारिजन्म वै । मंदेगस्थे कुजेस्ते च ज्ञोस्फुजि मध्यगे विधौ ॥६९॥
पापांगेब्जे त्रिभागे लौ स्वायगैः सद्भिहद्गतः । सूर्यस्तद्दृष्टिगो वापि ज्ञेयो ज्योतिर्विदां वरैः ॥७०॥
शनि, चन्द्रमा तथा सूर्य की दृष्टि हो तो गर्भस्थ शिशु वामन (बौना) होता है। पञ्चमस्थ नवमस्थ तथा लग्न के
द्रेष्काण में पापग्रह हों तो जातक क्रमशः पैर, मस्तक और हाथ से रहित होता है ॥६१-६२॥
गर्भाधान के समय यदि सिंह लग्न में सूर्य और चन्द्रमा हों तथा उन पर शनि और मंगल दृष्टि हो
तो शिशु नेत्रहीन होता है। यदि शुभ और पाप ग्रह दोनों की दृष्टि हो तो नेत्र में फूली होती है। यदि लग्न से
बारहवें भाव में चन्द्रमा हो तो बालक का वाम नेत्र और सूर्य हो तो दक्षिण नेत्र नष्ट होता है। ऊपर जो अशुभ
योग कहे गये हैं, उन पर शुभग्रह की दृष्टि हो तो उन योगों के फल पूर्ण नहीं होते हैं। ऐसी परिस्थिति में देवा-
राधन एवं चिकित्सा आदि यत्नों से अशुभ फल का निवारण हो जाता है ॥६३॥
यदि आधानलग्न में शनि का नवमांश हो और शनि सप्तम भाव में हो तो तीन वर्ष पर प्रसव होता है।
यदि इस स्थिति में चन्द्रमा हो (अर्थात् लग्न में चन्द्रमा का नवमांश हो और चन्द्रमा सप्तम भाव में स्थित हो)
तो बारह वर्ष पर प्रसव होता है। इन योगों का विचार जन्मकाल में भी करना चाहिए ॥६४-६५॥ आधानकाल
में जिस द्वादशांश में चन्द्रमा हो, उससे उतनी ही संख्या आगे राशि में चन्द्रमा के जाने पर बालक का जन्म
होता है। द्वादशांशयुक्त अंशादि को दो से गुणा करके उसमें ५ से भाग देने पर लब्धि राश्यादि मान की सूचक
होती है ॥६६-६७॥
जन्म-ज्ञान-- (शिशु की जन्मकुण्डली में) यदि चन्द्रमा जन्मलग्न को नहीं देखता हो तो पिता के परोक्ष
में बालक का जन्म कहना चाहिए। इसी योग में यदि सूर्य चर राशि में मध्य (दशम) भाव से आगे (११, १२) में
अथवा पीछे (६, ८) में हो तो पिता के विदेश रहने पर पुत्र का जन्म समझना चाहिए। (इससे यह सिद्ध होता
है कि यदि सूर्य स्थिर राशि में हो तो स्वदेश में रहते हुए पिता के परोक्ष में और द्विस्वभाव राशि में हो तो
स्वदेश और परदेश के मध्य स्थान में पिता के रहने पर बालक का जन्म होता है ।)
लग्न में शनि और सप्तम भाव में मंगल हो अथवा बुध और शुक्र के बीच में चन्द्रमा हो तो भी पिता
के परोक्ष में शिशु का जन्म समझना चाहिए। पापग्रह की राशि वाले लग्न में चन्द्रमा हो अथवा वह वृश्चिक
के द्रेष्काण में हो तथा शुभग्रह २, ११ भाव में स्थित हों तो सर्प का या सर्प से वेष्टित मनुष्य का जन्म सम-
झना चाहिए ॥६८-७०॥