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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 424, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 424

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४०५
लग्नांशाद्ग्रहयुग्दृष्ट्वा वर्णोऽन्बलयुताद्वदेत् । दृक्समानप्रमाणंश्च दृष्टे रेखां स्मरस्थितैः ॥३५॥
खगद्व्यंशे बलाग्नेने चरमांशे ग्रहान्विते । वांशे स्थलांबुजः सौरेन्द्वीक्षायोगभवा द्विजाः ॥३६॥
विबलैस्तनुचंद्रेज्यार्कैस्तरुणां जनिं वदेत् । स्थलांबुभेदोशकृतश्चेतरेषामुदाहतः ॥३७॥
स्थलांबु च पतिः खेटो लग्नाद्यावन्मिते गृहे । तावंत एव तरवः स्थलजा जलजास्तथा ॥३८॥
अंतःसारा रवौ सौरे दुर्भगाः क्षीरिणो विधौ । भौमे कंटकिनो वृक्षा ईज्ये ज्ञे सफलाफलौ ॥३९॥
पुष्पिता भार्गवे स्निग्धाश्चंद्रेऽथ कटुकाः कुजे । अशुमर्क्षे शुभः खेटः शुभं वृक्षं कुभूर्मिजम् ॥४०॥
कुर्याद्विलोमगो वापि स्वांशोक्तपरगैः समम् । कुजेंदुहेतुकं स्त्रीणां प्रतिमासमिहार्थवम् ॥४१॥
नेष्टस्येज्येऽन्यथास्ते स्त्रीयुक्तासन्नरेक्षिते । पापयुक्तेक्षिते द्यूने रुषा प्रीत्या शुभग्रहैः ॥४२॥
शुक्रार्केन्दुजैः स्वांशस्थैरीज्य चांगत्रिकोणगे । भवेदपत्यं विप्रेन्द्र पुंसां सद्वीर्यशालिनाम् ॥४३॥
सप्तम भाव में ग्रह हो तो उस ग्रह के समान (उस ग्रह का जैसा वर्ण कहा गया है वैसा) चिह्न उस वियोनि के
पीठ आदि अंगों में जानना चाहिए ॥३५॥
(पक्षि जन्म ज्ञान--) ग्रहयुत लग्न में पक्षिद्रेष्काण हो अथवा बुध का नवमांश हो या चर राशि का नव-
मांश हो तथा उस पर शनि या चन्द्रमा अथवा दोनों की दृष्टि हो तो क्रमशः शनि और चन्द्रमा की दृष्टि से
स्थलचर और जलचर पक्षी का जन्म समझना चाहिए ॥३६॥
(वृक्षादि जन्म-ज्ञान--) यदि लग्न, चन्द्र, गुरु और सूर्य-ये चारों निर्बल हों तो वृक्षों का जन्म जानना
चाहिए । स्थल या जल-सम्बन्धी वृक्षों के भेद लग्नांश के अनुसार जानने चाहिए । उस स्थल या जलचर नवांश
का स्वामी लग्न से जितने नवमांश आगे हो उतनी ही स्थल या जलसम्बन्धी वृक्षों की संख्या जाननी चाहिए
॥३७-३८॥ यदि उक्त अंश के स्वामी सूर्य हों तो अन्तः सार (सखुआ, शीशम आदि), शनि हो तो दुर्भग (किसी
उपयोग में न आने वाले कुर्कुस, फरहद आदि खोटे वृक्ष), चन्द्रमा हो तो दूध वाले वृक्ष, मंगल हो तो काँटे वाले,
गुरु हो तो फलवान् (आम आदि), बुध हो तो विफल (जिसमें फल नहीं होते ऐसे) वृक्ष, शुक्र हो तो पुष्प के वृक्षों
(गेंदा, गुलाब आदि) का जन्म समझना चाहिए । चन्द्रमा के अंशपति होने पर समस्त चिकने वृक्ष (देवदारु आदि)
तथा मंगल के अंशपति होने पर कडुए वृक्ष (निम्ब्रादि) का भी जन्म समझना चाहिए । यदि शुभग्रह अशुभ
राशि में हो तो खराब भूमि से सुन्दर वृक्ष और पापग्रह शुभ राशि में हो तो सुन्दर भूमि में खराब वृक्ष का जन्म
समझना चाहिए । इससे अर्थतः यह बात निकली कि यदि कोई शुभ ग्रह अंशपति हो और वह शुभ राशि में
स्थित हो तो सुन्दर भूमि में सुन्दर वृक्ष का जन्म जानना चाहिए और यदि पापग्रह अंशपति होकर पापराशि
में स्थित हो तो खराब भूमि में कुत्सित वृक्ष का जन्म जानना चाहिए । इसके अतिरिक्त वह अंशपति अपने
नवमांश से आगे जितनी संख्या पर अन्य नवमांश में हो, उतनी ही संख्या में और उतने ही प्रकार के वृक्षों का
जन्म समझना चाहिए ॥३९-४०३॥
आधान-ज्ञान-प्रतिमास मंगल और चन्द्रमा के कारण स्त्री को ऋतुधर्म हुआ करता है। जिस समय
चन्द्रमा स्त्री की राशि से नेष्ट (अनुपचय) स्थान में हो और शुभ पुरुषग्रह (बृहस्पति) से देखा जाता हो तथा
पुरुष को राशि से अन्यथा (इष्ट-उपचय स्थान में) हो और वृहस्पति से दृष्ट हो तो उस स्त्री को पुरुष का
संयोग प्राप्त होता है। आधान लग्न से सप्तम भाव पर पापग्रह का योग या दृष्टि हो तो रोषपूर्वक और शुभग्रह
का योग या दृष्टि हो तो प्रसन्नतापूर्वक पति-पत्नी का संयोग होता है ॥४१-४२॥ आधानकाल में शुक्र, रवि,
चन्द्रमा और मंगल अपने-अपने नवमांश में हों, गुरु लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो तो वीर्यवान् पुरुष को निश्चय