बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 420, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४०१
होरे विषमभेकेदोः समभे शशिसूर्ययोः । आदिपञ्चनवाधीशाद्रेष्काणशाः प्रकीर्तिताः ॥३॥
पञ्चेष्टाष्टाद्रिपंचाशा कुजाकीज्यज्ञशुक्रगाः । ओजे विपर्ययाद्युग्मे त्रिंशांशेशाः समीरीताः ॥४॥
क्रियेणतौलिककर्किद्या मेषादिङ् नवांशकाः । स्वभाद्द्वादशभागेशाः षड्वर्गं राशिपूर्वकम् ॥५॥
गोजाश्च कर्कयुग्मेन रात्र्याख्या पृष्ठकोदयाः । शेषा दिनाख्यास्तूमयं तिमिः क्रूरः सौम्यः पुमान् ॥६॥
पुमान् स्त्री च क्लीबश्चरस्थिरद्विःस्वभावकाः । मेषाद्याः पूर्वतोदिक्स्थाः स्वस्वस्थानचरास्तथा ॥७॥
अजोक्षेणांगनाकीटझषजूका इनादितः । उच्चानि द्वित्रिमनुयुक्तिथ्येषुभनखांशकैः ॥८॥
तत्तत्सप्तमनीचानि प्राङ्मध्यांत्यांशकाः क्रमात् । वर्गोत्तमश्च राधेष्तुभावाद्द्वादश मूर्तिमान् ॥६॥
में पहले सूर्य की, फिर चन्द्रमा की होरा होती है तथा सम राशियों में पहले चन्द्रमा की, फिर सूर्य की होरा
होती है। आरम्भ के दश अंश तक उसी राशि का द्रेष्काण होता है और उस राशि के स्वामी ही उस द्रेष्काण के
स्वामी होते हैं। ग्यारह से बीसवें अंश तक उस राशि से पांचवीं राशि का द्रेष्काण होता है और उसी के स्वामी
उस द्रेष्काण के स्वामी कहे गये हैं। इक्कीसवें से तीसवें अंश तक उस राशि से नवीं राशि का द्रेष्काण होता
है और उसी के स्वामी उस द्रेष्काण के स्वामी होते हैं ॥३॥
विषम राशियों में पहले पाँच अंश तक मंगल, फिर पाँच अंश तक शनि, फिर आठ अंश तक बृहस्पति,
फिर सात अंश तक बुध और अन्तिम पाँच अंश तक शुक्र त्रिंशांशेश कहे गये हैं। सम राशियों में इसके विपरीत
क्रम से पहले पाँच अंश तक शुक्र, फिर सात अंश तक बुध, फिर आठ अंश तक बृहस्पति, फिर पाँच अंश तक
शनि और अन्तिम पाँच अंश तक मंगल त्रिंशांशेश कहे गये हैं ॥४॥ मेषादि राशियों के नवमांश मेष, मकर,
तुला और कर्क से प्रारम्भ होते हैं। (यथा- मेष, सिंह, धनु का मेष से; वृष, कन्या, मकर का मकर से; मिथुन,
तुला और कुम्भ का तुला से तथा कर्क, वृश्चिक और मीन का नवमांश कर्क से चलते हैं)। २१/२ अंश के द्वादशांश
होते हैं, जो अपनी राशि से प्रारंभ होकर अन्तिम राशि पर पूर्ण होते हैं और उन-उन राशियों के स्वामी ही
उन द्वादशांश के स्वामी कहे गये हैं। इस प्रकार ये राशि, होरा आदि षड्वर्ग कहलाते हैं ॥५॥
वृष, मेष, धनु, कर्क, मिथुन और मकर--ये रात्रि-संज्ञक हैं अर्थात् रात में बली माने गये हैं-ये
पृष्ठ भाग से उदय होने के कारण पृष्ठोदय राशियां कहलाती हैं (किन्तु मिथुन पृष्ठोदय नहीं है)। शेष राशियों
की दिन संज्ञा है (वे दिन में बली और शीर्षोदय माने गये हैं); मीन राशि को उभयोदय कहा गया है। मेष
आदि विषम राशियां क्रम से क्रूर और सौम्य (अर्थात् मेष आदि विषमराशियां क्रूर और वृष आदि सम राशियां
सौम्य हैं) ॥६॥ मेष आदि' राशियां क्रम से पुरुष, स्त्री और नपुंसक होती हैं (नवीन मत में दो विभाग हैं, मेष
आदि विषम राशियां पुरुष और वृष आदि सम राशियां स्त्री हैं)। इसी प्रकार मेष आदि राशियां क्रमशः चर,
स्थिर और द्विस्वभाव में विभाजित हैं (अर्थात् मेष चर, वृष स्थिर, और मिथुन द्विस्वभाव हैं, कर्क चर, सिंह
स्थिर और कन्या द्विस्वभाव हैं। इसी क्रम से अन्य राशियों को भी समझना चाहिए। मेष आदि राशियां क्रमशः
पूर्व आदि दिशाओं में स्थित हैं (यथा-- मेष, सिंह, धनु पूर्व में। वृष कन्या, मकर दक्षिण में; मिथुन, तुला, कुम्भ
पश्चिम में और कर्क, वृश्चिक, मीन उत्तर में स्थित हैं)। ये सब अपनी-अपनी दिशा में रहती हैं ॥७॥ सूर्य मेष, में
चन्द्रमा वृष में, मंगल मकर में, बुध कन्या में, गुरु कर्क में, शुक्र मीन में, तथा शनि तुला में उच्च होता है। सूर्य का मेष
में, १० अंश, चन्द्रमा का वृष में ३ अंश, मंगल का मकर में २८ अंश, बुध का कन्या में १५ अंश, गुरु का कर्क में ५
अंश, शुक्र का मीन में २७ अंश तथा शनि का तुला में २० अंश उच्चांश (परमोच्च) होता है ॥८॥ सूर्यादि ग्रहों की
जो उच्चराशियां कही गई हैं, उनसे सातवीं राशि उन ग्रहों का नीच स्थान है। चर राशि में प्रथम नवमांश वर्गोत्तम
है। स्थिर राशि में मध्य पाँचवाँ नवमांश और द्विस्वभाव राशि में अन्तिम (नवाँ) नवमांश वर्गोत्तम है। तनु (लग्न)
५१ ना० पु०