बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३६७
तद्द्विघ्नांशकृतिद्वघ्नादार्थंयुता हरिः । त्रिभानांगार्कविश्लेषांशोंशोनघ्नाः पुरंदराः ॥१५७॥
हराप्तांलंबनं स्वर्णवित्रिभेर्काधिकोनके । विश्वघ्नलं अनकलाद्योनस्तु तिथिव्यगुः ॥१५८॥
शरोनोलंबनषड्घ्ने तल्लवाढयोनवित्रिभात् । नतांशस्तज्जांसाने प्राधृतस्तद्विवर्जितः ॥१५९॥
शब्देंदुलिप्तैः षड्भिस्तु भक्तानतिर्नतांशदिक् । तयोर्नट्योर्ह्यभिन्नेकद्दिक्शरः स्फुटतां व्रजेत् ॥१६०॥
ततश्छन्नस्थितिदले साध्ये स्थित्यर्द्धषट्त्रिभिः । अंशस्तैर्वित्रिभंद्विस्थंलंबने तयोः पूर्ववत् ॥१६१॥
संस्कृतेस्ताभ्यां स्थित्यर्द्धे भवतः स्फुटे । ताभ्यां हीनयुतो मध्यदर्शः कालौ मुखांतगौ ॥१६२॥
अर्काद्यूना विश्व ईशा नवपंचदशांशकाः । कलांशास्तैरूनयुक्ते रवौ ह्यास्तोदयौ विधोः ॥१६३॥
दृष्ट्वा ह्यादौ खेटबिंबं दृगोच्चये लंबमीक्ष्य च । तल्लं बपार्श्विावांतद्गौ व्याप्त रविघ्नभाः ॥१६४॥
भस्ते सावयवा ज्ञेया गतैष्यास्तिथयो बुधैः । व्यस्ते युक्रांतिभागैश्च द्विघ्नतिथ्याहृता स्फुटम् ॥१६५॥
अधिक हो जाय तो २ घटाकर शेष के आधे को उसो (वर्ग) में जोड़कर पुनः १२ में जोड़ने से 'हार' होता है।
'त्रिभोन' लग्न और सूर्य के अन्तरांश के दशमांश को १४ में घटाकर शेष को उसी दशमांश से गुणा करे। उसमें
पूर्वसाधित हार से भाग देने पर लब्धतुल्य घट्यादि लम्बन होता है। यह (लम्बन) यदि वित्रिभ सूर्य से अधिक
हो तो धन, न्यून हो तो ऋण होता है। अर्थात् साधित दर्शान्तकाल में इस लम्बन को जोड़ने-घटाने से पृष्ठस्था-
नीय दर्शान्तकाल प्राप्त होता है ॥१५६-१५७॥
घट्यादि लम्बन को १३ से गुणा करने पर गुणनफल कलादि होता है। उसको व्यग्वर्क में जोड़ या
घटाकर 'शर' बनाने से (पृष्ठीय दशान्तकालिक) शर (स्पष्ट) होता है। तथा घट्यादि लम्बन को ६ से गुणा
करके गुणनफल को अंशादि मानकर वित्रिभ में जोड़ या घटाकर नतांश-साधन करे । नतांश के दशमांश को १८
में घटाकर शेष को उसी दशांश से गुणा करे; गुणनफल को ६ अंश १८ कला में घटाकर जो शेष बचे, उससे गुणन-
फल में ही भाग देने से लब्धि अंगुलादि नतांश की दिशा की नति होती है। इस नति और पूर्वसाधित शर दोनों
के संस्कार (भिन्न दिशा हो तो अन्तर, एक दिशा हो तो योग करने) से स्पष्ट शर होता है। सूर्य-ग्रहण में उसी
शर से ग्रास और स्थित्यर्थ को ६ से गुणा करके अंशादि गुणनफल को वित्रिभ में घटाये और दूसरे स्थान में
जोड़े। इन दोनों पर से पूर्वविधि से पृथक् लम्बसाधन करके क्रमशः पूर्वविधि से साधित स्पर्श और मोक्षकाल में
संस्कार करने से स्पष्ट पृष्ठस्थानीय स्पर्श और मोक्षकाल होते हैं ॥१५८-१६२॥
ग्रहों के उदयास्तकालांश-१२, १७, १३, ११, ६, १५ ये क्रमशः चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और
शनि के कलांश हैं। अपने-अपने कलांश तुल्य सूर्य से पीछे ग्रह होते हैं तो अस्त और कलांशतुल्य सूर्य से आगे होते
हैं तो उदय होता है। (अर्थात् ग्रह अपने-अपने कलांश के भीतर सूर्य से पीछे या आगे जब तक रहते हैं, तब
तक सूर्य-सान्निध्यवश अस्त (अदृश्य) रहते हैं ॥१६३॥
ग्रहों के प्रतिबिम्ब द्वारा छायासाधन-समतल भूमि में रखे हुए दर्पण आदि में ग्रहों के प्रतिबिम्ब
को देखकर दृष्टि स्थान से भूमि पर्यन्त लम्ब पातकर दृष्टि की ऊँचाई का मान समझे। लम्बमूल और प्रतिबिम्ब
के अन्तर प्रमाण को दृष्टि की ऊँचाई से भाग देकर लब्धि को १२ से गुणा करने से प्राप्त फल उस समय उस ग्रह
की छाया का प्रमाण होता है ॥१६४॥
चन्द्रशृङ्गोन्नति-ज्ञान--सूर्यास्त समय में सावयव गत और एष्य तिथि का साधन करे। उस सावयव
तिथि को १६ से गुणा करे । गुणनफल में १५ से भाग देकर लब्धि (फल) की दिशा उत्तर समझे। उसमें सूर्य
की कान्ति का यथोक्त संस्कार (एक दिशा होने पर योग, भिन्न दिशा में होने पर अन्तर) करे। तथा चन्द्रमा
के शर और कान्ति का विपरीत संस्कार करके जो फल हो उसमें द्विगुणित तिथि से भाग देने पर जितनी