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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 402, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 402

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण लिप्यन्तरण (transcription) दिया गया है:

चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३८३
अथ स्वांशाधिकोने तु लवाढ्योनो हरो हरः । अंशस्त्वविकृतस्तत्र विलोमे शेषमुक्तवत् ॥२८॥
उद्दिष्टराशिः संक्षिप्सौ हृतोऽशै रहिता युतः । इष्टघ्नदृष्टेनैतेन भक्तंराशिरनीशितः ॥३०॥
योगोन्तरेणोनयुतोद्वितोराशीतसंक्रमे । राश्यंतरहृतं वर्गोत्तरं योगसुतश्च तौ ॥३१॥
गजघ्नीष्टकृतिकृतिध्येका दलिता चेष्टभाजिता । एकोऽस्य वर्गो दलितः सैको राशिः परो मतः ॥३२॥
द्विगुणेष्टहृतं रूपं श्रेष्ठं प्राग्रूपकं परम् । वर्गयोगांतरे व्येके राश्योर्वर्गोस्त एतयोः ॥३३॥
इष्टवर्गकृतिश्चेष्टघ्नोष्टघ्नो च सैककी । एषीस्यानामुखे व्यक्ते गणित व्यक्तमेव च ॥३४॥
गुणघ्नमूलोनयुतः सगुणार्द्धं कृतं पदम् । दृष्टस्य च गुणार्द्धो न युतं वर्गीकृतं गुणः ॥३५॥
यदा लघोनपुत्राशिदृश्यं भागोनयुग्भुवा । भक्तं तथा मूलगुणं ताभ्यां साध्योथ व्यक्तवत् ॥३६॥
विशेषका यह है कि जहाँ अपना अंश जोड़ा गया हो, वहाँ हर में अंश को घटाकर हर कल्पना करे और अंश
ज्यों का त्यों रहे । फिर दृश्य राशि में विलोम क्रिया उक्त रीति से करे तो अभीष्ट राशि होती है ॥२८-२९॥
अभीष्ट संख्या जानने के लिए इष्ट राशि की कल्पना करनी चाहिए । फिर प्रश्नकर्ताके कथनानुसार उस
राशि को गुणा या भाग करना चाहिए । कोई अंश घटाने को कहा गया हो तो जोड़ दे अर्थात् प्रश्न में जो-जो
क्रियायें कही गई हों, वे इष्ट राशि में करके फिर जो निष्पन्न हो, उससे कल्पित इष्ट-गुणित इष्ट में भाग दे,
उससे जो लब्धि प्राप्त हो, वही इष्ट राशि है ॥३०॥
संक्रमण-गणित में (यदि दो संख्याओं का योग और अन्तर ज्ञात हो तो) योग को दो जगह लिखकर एक
जगह अन्तर को जोड़कर आधा करे तो एक संख्या प्राप्त होगी और दूसरी जगह अन्तर को घटाकर आधा करे
तो दूसरी संख्या प्राप्त होगी—इस प्रकार दोनों राशियां (संख्यायें) ज्ञात हो जातीं वर्गसंक्रमण में (यदि दो
संख्याओं का वर्गान्तर तथा अन्तर ज्ञात हो तो) वर्गान्तर में अन्तर से भाग देने पर जो लब्धि आती है, वही
उनका योग है; योग का ज्ञान हो जाने पर फिर पूर्वोक्त प्रकार से दोनों संख्याओं का ज्ञान करना चाहिए ॥३१॥
वर्गकर्मगणित में इष्ट का वर्ग करके उसमें आठ से गुणा करे, फिर एक घटा दे, उसका आधा करे ।
तत्पश्चात्—उसमें इष्ट से भाग देने से एक राशि प्राप्त होगी । फिर उसका वर्ग करके आधा करे और उसमें
एक जोड़ दे तो दूसरी संख्या प्राप्त होगी । अथवा कोई इष्ट कल्पना करके उस द्विगुणित इष्ट से १ में भाग
देकर लब्धि में इष्ट को जोड़े तो प्रथम संख्या होगी और दूसरी संख्या १ होगी । ये दोनों संख्यायें वे ही होंगी,
जिनके वर्गों के योग और अन्तर में एक घटाने पर भी वर्गाङ्क ही शेष रहता है । किसी इष्ट के वर्ग का वर्ग तथा
पृथक् उसी का घन करके दोनों को पृथक्-पृथक् आठ से गुणा करे । फिर पहले में एक जोड़े तो दोनों संख्यायें
ज्ञात होंगी । यह विधि व्यक्त और अव्यक्त दोनों गणितों में उपयुक्त है ॥३२-३४॥
गुणकर्म में अपने इष्टाङ्कगुणित मूल से ऊन या युक्त होकर यदि कोई संख्या दृश्य हुई तो मूल गुणक के
आधे का वर्ग दृश्य-संख्या में जोड़कर मूल लेना चाहिए । उसमें क्रम से मूल गुणक का आधा जोड़ना और घटाना
चाहिए । (अर्थात् जहाँ इष्टगुणित मूल से ऊन होकर दृश्य हो वहाँ गुणार्ध को जोड़ना तथा यदि इष्टगुणित मूल
युक्त होकर दृश्य हो तो उक्त मूल में गुणकार्ध घटाना चाहिए ।) फिर उसका वर्ग कर लेने से प्रश्नकर्ता की
को अभीष्ट राशि (संख्या) सिद्ध होती है । यदि राशि मूलोन या मूलयुक्त होकर पुनः अपने किसी भाग से भी
ऊन या युत होकर दृश्य हो तो उस भाग को १ में ऊन या युत कर (यदि भाग ऊन हुआ हो तो घटा करके और यदि
युत हुआ हो तो जोड़ करके) उसके द्वारा पृथक्-पृथक् दृश्य और मूल गुणक में भाग दे; फिर इस नूतन दृश्य और
मूल गुणक से पूर्ववत् राशि का साधन करना चाहिए ॥३५-३६॥