बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 397, कुल 1008 में से
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३७८ नारदीयपुराणम्
सप्त पंचाशदधिकास्तुदादौ धातवः शतम् । स्वरितेतो रुधोनंदा परस्मैभाषितः कृती ॥६३॥
जिइंधीतोऽनुदात्तेतस्त्रयो धातव ईरिताः । उदात्तेतः शिषविषरुधाद्याः पंचविंशतिः ॥६४॥
स्वरितेतस्तनोः सप्त धातवः परिकीर्तिताः । मनुन्व्वात्मनेभाषौ स्वरितेत्कृञुदाहृतः ॥६५॥
ततो द्वौ कीर्तितौ विप्र धातवौ दश शाब्दिकैः । क्रूयाद्याः सप्तोभयभाषाः सौत्राः स्तंभ्वादिकास्तथा ॥६६॥
परस्मैपदिनः प्रोक्ताश्चत्वारोऽपि मुनीश्वर । द्वाविंशतिरुदात्तेतः क्रुधाद्या धातवो मताः ॥६७॥
वृङ्ङात्मनेपदी धातुः श्रैयाद्याश्चैकविंशतिः । परस्मैपदिनश्चाय स्वरितेद्ग्रह एव च ॥६८॥
क्रयादिकेषु द्विपंचाशद्धातवः कीर्तिता बुधैः । चुराद्या धातवो ण्यन्ता षड्विंशदधिकं शतम् ॥६९॥
चित्याद्यष्टादशाख्याता आत्मनेपदिनो मुने । चर्चाय आवृणीयास्तु ण्यंता वा परिकीर्तिताः ॥७०॥
अदंता धातवश्चैव चत्वारिंशत्तथाष्ट च । पदाद्यास्तु दश प्रोक्ता धातवो ह्यात्मनेपदे ॥७१॥
सूत्राद्या अष्ट चाप्यत्र ण्यन्ता प्रोक्ता मनीषिभिः । धात्वर्थे प्रातिपदिकाद्बहुल चेष्ठवन्मतम् ॥७२॥
तत्करोति तदाचष्टे हेतुमत्यदि णिर्मतः । धात्वर्थे कर्तृकरणाच्चित्राद्याश्चापि धातवः ॥७३॥
अष्ट संग्राम आख्यातोऽनुदात्तेच्छाब्दिकेर्बुधैः । स्तोभाद्याः षोडश तथा अदन्तस्य निदर्शनम् ॥७४॥
तथा बाहुलकादन्ये सौत्रलौकिकवैदिकाः । सर्वे सर्वगणीयाश्च तथानैकार्थवाचिनः ॥७५॥
सनाद्येता धातवश्च तथा वै नामधातवः । एवमानंत्यमुद्भाव्यं धातूनामिह नारद ।
संक्षेपोऽयं समुद्दिष्टो विस्तरस्तव तत्र च ॥७६॥
रुध् और नंद धातु स्वरितेत् हैं। कृती धातु परस्मैपदी है। विन्धी आदि तीन धातु अनुदात्तेत् हैं ।
शिष्, पिष्, रुध् आदि पचीस धातु उदात्तेत् हैं ॥६३-६४॥
तनु आदि सात धातु स्वरितेत् हैं। वनु और मनु धातु आत्मनेपदी हैंकृञ् को स्वरितेत् कहा गया
है । विप्र ! इसके अनन्तर वैयाकरणों ने तनादिगण में दस धातुओं की गणना की है ॥६५ १/२॥
क्री आदि सात उभयपदी हैं। सूत्र में पढ़े गए स्तंभु आदि चार धातु भी परस्मैपदी हैं। मुनीश्वर !
क्रुध् आदि बाईस धातु उदात्तेत् हैं ॥६६-६७॥ वृङ् धातु आत्मनेपदी है और श्रंथ् आदि इक्कीस धातु परस्मैपदी
हैं । ग्रह् धातु स्वरितेत् है। विद्वानों ने क्र्यादिगण में बावन धातु पढ़े हैं ॥६८ १/२॥
चुरादि गण में वित् धातु तक एक सौ छत्तीस धातु हैं। मुने ! चिती आदि अठारह धातु आत्मनेपदी हैं।
चर्च से लेकर धृषी धातु तक धातु णिन्त कहे गए हैं ॥६९-७०॥ अदन्त अडतालीस धातु भी उभयपदी हैं तथा पद्
आदि दश धातु आत्मनेपदी हैं ॥७१॥ मनीषियों ने सूत्र आदि आठ धातुओं को णित् कहा है। धात्वर्थ में प्राति
पदिक से णिच् और इष्ठवद्भाव विकल्प से होता है ॥७२॥ तत्करोति, (उसको करता है) और तदाचष्टे
(करने की इच्छा रखता है) अर्थ में, प्रेरणार्थक क्रियाओं से णिच् प्रत्यय होता है। धात्वर्थ की विवक्षा में कर्त्ता और
करण से भी णिच् प्रत्यय होता है। चित्र आदि आठ धातु उदात्तेत् है। इनसे णिच् प्रत्यय होता है। विद्वान्
वैयाकरणों ने संग्राम आदि आठ धातुओं को अनुदात्तेत् कहा है। स्तोम आदि सोलह और अदन्त धातुओं से
जो णिच् कहा गया है यह निदर्शन केवल बाहुलक है ॥७३-७४॥ इसके अतिरिक्त और भी धातु हैं, जिनसे णिच्
प्रत्यय होता है। इसी प्रकार बाहुलक के बल से अन्य सूत्र में पढ़े गए और लोक वेद प्रसिद्ध धातुओं से भी णिच्
प्रत्यय होता है। अथवा यों कहा जाय कि बाहुलक से सब धातु सब गणों में कहे गए हैं और सभी अनेकार्थ
वाची हैं ॥७५॥ नारद ! इन धातुओं के अतिरिक्त सन्, क्यच्, काम्यच् आदि प्रत्यय जिनके अन्त में हों,
उनकी भी धातु संज्ञा होती है। नाम धातु भी धातु ही हैं। नारद ! इस प्रकार अनन्त धातुओं की उद्भावना
हो सकती है। यहाँ संक्षेप से सब कुछ बताया गया है। इसका विस्तार तत्सम्बन्धी ग्रन्थों में है ॥७६॥