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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 373, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 373

३५४ नारदीयपुराणम्
शुश्रूषारहिता विद्या यद्यपि मेधागुणैः समुपयाति । वन्ध्येव यौवनवती न तस्य साफल्यवती भवति ॥२३६॥
इति दिङ्मात्रमुद्दिष्टं शिक्षाग्रंथं मया तव । ज्ञात्वा वेदांगमात्रं तु ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥२३७॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५०॥

अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
अथातः संप्रवक्ष्यामि कल्पग्रंथं मुनीश्वर । यस्य विज्ञानमात्रेण स्यात्कर्मकुशलो नरः ॥१॥
नक्षत्रकल्पो वेदानां संहितानां तथैव च । चतुर्थः स्यादांगिरसः शांतिकल्पश्च पंचमः ॥२॥
नक्षत्राधीश्वराख्यातं विस्तरेण यथातथम् । नक्षत्रकल्पे निर्दिष्टं ज्ञातव्यं तदिहापि च ॥३॥
वेदकल्पे विधानं तु ऋगादीनां मुनीश्वर । धर्मार्थकाममोक्षाणां सिद्धयै प्रोक्तं सविस्तरम् ॥४॥
मंत्राणामृषयश्चैव छंदांस्यथ च देवताः । निर्दिष्टाः संहिताकल्पे मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥५॥
तथैवांगिरसे कल्पे षट्कर्माणि सविस्तरम् । अभिचारविधानेन निर्द्दिष्टानि स्वयंभुवा ॥६॥

प्राप्ति के दूसरे साधन नहीं हैं ॥२३५॥ यद्यपि गुरु शुश्रूषा के बिना भी विद्या मेधा के प्रभाव से मनुष्य को प्राप्त
हो जाती है, परन्तु बन्ध्या युवती के समान वह सफल नहीं होती है । इस प्रकार मैंने संकेत रूप में शिक्षा ग्रन्थ की
यहाँ चर्चा की है। इस आद्य वेदांग को जान कर मनुष्य ब्रह्म (ज्ञान) प्राप्त करता है ॥२३६-२३७॥
श्रीनारदीय महापुराण में पचासवाँ अध्याय समाप्त ॥५०॥

अध्याय ५१
वेद के द्वितीय अंग कल्प, गणेशपूजन, ग्रहशान्ति तथा श्राद्ध का निरूपण
मुनीश्वर ! अब इसके बाद कल्प-ग्रन्थ का वर्णन कर रहा हूँ, जिसके ज्ञान मात्र से मनुष्य कर्म-कुशल हो
जाता है ॥१॥ कल्प पाँच प्रकार के माने गये हैं--नक्षत्र कल्प, वेद.कल्प, संहिता कल्प आंगिरस चौथा और शान्ति
कल्प पाँचवाँ है ॥२॥ विस्तारपूर्वक यथार्थ रूप से नक्षत्राधिपति का आख्यान नक्षत्र कल्प में कहा गया है। उसी
को यहाँ कह रहा हूँ, जो प्रत्येक विप्र के लिए जानने योग्य है ॥३॥ मुनीश्वर ! वेद कल्प में धर्म, अर्थ, काम और
मोक्ष की सिद्धि के लिए ऋग्यजुस् और साम आदि वेदों के विधान को विस्तार के साथ कहा गया है ॥४॥
तत्त्वदर्शी मुनियों ने संहिता कल्प में मन्त्रों के ऋषियों, छन्दों और देवताओं का निर्देश किया है ॥५॥ उसी प्रकार
आंगिरस कल्प में स्वयम्भू ने मारण, मोहन, उच्चाटण आदि अभिचार विधान से षट्कर्मों का वर्णन किया है ॥६॥