बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 359, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें३४० नारदीयपुराणम्
धैवतं च निषादं च वर्जयित्वा तु तावुभौ । शेषान्पंच स्वरांस्त्वन्ये पंचस्थानोत्थितान्विदुः ॥७०॥
पंचस्थानस्थितत्वेन सर्वस्थानाने धार्यते । अग्निगोतस्वरः षड्ज ऋषभौ ब्रह्मणोच्यते ॥७१॥
सोमेन गीतो गांधारो विष्णुना मध्यमः स्वरः । पंचमस्तु स्वरो गीतस्त्वयैवेति निधारय ॥७२॥
धैवतश्च निषादश्च गीतो तुंबुरुणा स्वरौ । आद्यस्य दैवतं ब्रह्मा षड्जस्याप्युच्यते बुधैः ॥७३॥
तीक्ष्णदीप्तप्रकाशत्वादृषभस्य हुताशनः । गावः प्रणीते तुष्यंति गांधारस्तेन हेतुना ॥७४॥
श्रुत्वा चैवोपनिष्ठंति सौरभेया न संशयः । सोमस्तु पंचमस्यापि दैवतं ब्रह्मराट् स्मृतम् ॥७५॥
निह्रासो यस्य वृद्धिश्च ग्राममासाद्य सोमवत् । अतिसंधीयते यस्मादेतान्पूर्वोत्थितान्स्वरान् ॥७६॥
तस्मादस्य स्वरस्यापि धैवतत्वं विधीयते । निषीदंति स्वरा यस्मान्निषादस्तेन हेतुना ॥७७॥
सर्वांश्चाभिभवत्येष यदादित्योऽस्य दैवतम् ॥७८॥
दारवी गात्रवीणा च द्वै वीणे गानजातिषु ॥७९॥
सामनी गात्रवीणा तु तस्यास्त्वं शृणु लक्षणम् । गात्रवीणा तु सा प्रोक्ता यस्यां गायंति सामगाः ॥८०॥
स्वरव्यंजनसंयुक्ता अंगुल्यंगुष्ठरंजिता । हस्तौ तु संयतौ धार्यो जानुभ्यामुपरिस्थितौ ॥८१॥
गुरोरनुकृतिं कुर्याद्यथान्या न मतिर्भवेत् । प्रणवं प्राक्प्रयुंजीत व्याहतीस्तदनंतरम् ॥८२॥
सावित्रीं चानुवचनं ततो वै गानमारभेत् । प्रसार्य चांगुलीः सर्वा रोपयेत्स्वरमंडलम् ॥८३॥
न चांगुलीभिरंगुष्ठमंगुष्ठेनांगुलीः स्पृशेत् । विरला नांगुलीः कुर्यान्मूले चैतां न संस्पृशेत् ॥८४॥
कहा जाता है ॥६९॥ अन्य विद्वान् धैवत और निषाद को छोड़कर शेष पाँच स्वरों को पाँच स्थानों से उत्पन्न
मानते हैं ॥७०॥ पाँच स्थानों में स्थित होने के कारण वह सब स्थानों में धारण किया जाता है। षड्ज स्वर अग्नि
द्वारा गाया जाता है। ब्रह्मा ऋषभ का गान करते हैं; सोम गान्धार का और विष्णु मध्यम स्वर का गान करते
हैं। पंचम स्वर का गान तुम्हीं करते हो ऐसा समझो ॥७१-७२॥ तुम्बुरु धैवत और निषाद स्वर में गाते हैं। आदि
स्वर के देवता ब्रह्मा हैं और षड्ज के भी देवता वही माने गए हैं। तीक्ष्ण और जाज्वल्यमान होने के कारण ऋषभ
के अग्नि देवता हैं। गायें गान्धार स्वर को सुनकर प्रसन्न होती हैं; गायें उस गान्धार को सुनकर उपस्थित हो
जाती हैं ॥७३-७४॥। पंचम स्वर के देवता सोम हैं, जिन्हें ब्राह्मणों का राजा कहा गया है। जैसे चन्द्रमा
शुक्ल पक्ष में बढ़ता है और कृष्ण पक्ष में घटता है, उसी प्रकार स्वरग्राम में प्राप्त होने पर जिस स्वर का ह्रास
होता और वृद्धि होती है तथा इन पूर्वोत्पन्न स्वरों की अतिसंधि होती है वह धैवत है। इसी से उसके धैवतत्व
का विधान किया गया है। निषाद में सब स्वरों का निषादन (अन्तर्भाव) होता है, इसलिए वह निषाद कह-
लाता है। यह सब स्वरों को अभिभूत कर लेता है ठीक उसी तरह, जैसे सूर्य सब नक्षत्रों को अभिभूत करता है,
क्योंकि सूर्य ही इसके अधिदेवता हैं ॥७५-७८॥
काठ की वीणा और गात्रवीणा दो प्रकार की वीणाएं गान में प्रयुक्त होती हैं। जो सामकी गात्र-
वीणा है उसका लक्षण सुनो। गात्रवीणा उसको कहते हैं जिस पर साम के गाने वाले गान करते हैं ॥७९॥
यह वीणा घुटनों के ऊपर रख कर बजाई जाती है। सबसे पहले वीणा को दो हाथों के बीच में भली भाँति
रख कर उसको स्वर व्यंजन के अनुकूल अंगुलियों से बजाया जाता है ॥८०-८१॥ इस विषय में गुरु का ही अनुकरण
करना चाहिए जिससे बुद्धि कहीं इतर वस्तु की ओर न जाय । पहले प्रणव को तत्पश्चात् सात महा व्याहृतियों
को उस वीणा पर बजाना चाहिए। फिर सावित्री की स्तुति तब गान का प्रारम्भ करना चाहिए। पाँचों
अंगुलियों को फैलाकर स्वरों पर रखना चाहिए ॥८२-८३॥ अंगुलियों से अंगूठे का और अंगूठे से अंगुलियों