बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 357, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें३३८ नारदीयपुराणम्
रुपपादनाभिः श्लक्ष्णमित्युच्यते समं नामावापनिर्वापप्रदेशे प्रत्यंतरस्थानानां समासः
सममित्युच्यते सुकुमारं नाम मृदुपदवर्णस्वरकुहरणयुक्तं सुकुमारमित्युच्यते मधुरं नाम
स्वभावोपनीतललितपदाक्षरगुणसमृद्धं मधुरमित्युच्यते एवमेतैर्दशभिर्गुणैर्युक्तं गानं भवति ॥१॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः । काकस्वरं मूर्द्धगतं तथा स्थानविवर्जितम् ।
शंकितं भीषणं भीतमुद्घुष्टमनुनासिकम् ॥४४॥
विस्वरं विरसं चैव विश्लिष्टं विषमाहतम् । व्याकुलं तालहीनं च गीतिदोषाश्चतुर्दश ॥४५॥
आचार्याः सममिच्छंति पदच्छेदं तु पंडिताः । स्त्रियो मधुरमिच्छंति विक्रुष्टमितरे जनाः ॥४६॥
पद्मपत्रप्रभः षड्ज ऋषभः शुकपिंजरः । कनकाभस्तु गांधारो मध्यमः कुंदसन्निभः ॥४७॥
पंचमस्तु भवेत्कृष्णः पीतकं धैवतं विदुः । निषादः सर्ववर्णः स्यादित्येताः स्वरवर्णताः ॥४८॥
पंचमो मध्यमः षड्ज इत्येते ब्राह्मणाः स्मृताः । ऋषभो धैवतश्चापीत्येतौ वै क्षत्रियावुभौ ॥४९॥
गांधारश्च निषादश्च वैश्यावर्द्धेन वै स्मृतौ । शूद्रत्वं विधिनाऽर्द्धेन पतितत्वान्न संशयः ॥५०॥
ऋषभो मूर्च्छनावर्जितो धैवतसहितश्च पंचमो यत्र । निपतति मध्यमरागे स निषादं षाड़जवं विद्यात् ॥५१॥
यदि पंचमो विरमते गांधारश्चांतरस्वरो भवति । ऋषभो निषादसहितस्तं पंचममीदृशं विद्यात् ॥५२॥
गांधारस्याधिपत्येन निषादस्य गतागतैः । धैवतस्य च दौर्बल्यान्मध्यमग्राम उच्यते ॥५३॥
ईषत्पृष्टो निषादस्तु गांधारश्चाधिको भवेत् । धैवतः कंपितो यत्र स षड्जग्राम ईरितः ॥५४॥
युक्त गीत को श्लक्ष्ण कहा जाता है। स्वरों के अवाप और निर्वाप (उतार-चढ़ाव) प्रदेश में प्रत्यन्तर स्थानों
का समास सम कहा जाता है। मृदुपद, वर्ण, सर और कुहरण से युक्त गान को सुकुमार कहा जाता है। स्वभाव
से ही ललित पद, अक्षर और गुणों से युक्त गान विधि की मधुर संज्ञा है इस प्रकार दस गुणों से गान होता है।
इस विषय में और भी श्लोक कहे गए हैं—जिसका अभिप्राय यह है कि शंकित, भीषण, भीति, उद्घुष्ट, अनु-
नासिक, काकस्वर, मूर्द्धगत, स्थानवर्जित, विस्वर, विरस, विश्लिष्ट, विषमाहत, व्याकुल, तालहीन, ये चौदह
गीति के दोष हैं । ४४-४५॥ आचार्य सम स्वर को अधिक प्रिय समझते हैं, पंडित पदच्छेद को, स्त्रियां मधुर
स्वर को और अन्य लोग विक्रुष्ट को उत्तम समझते हैं । ॥४६॥
षड्ज पद्मपत्र के समान और ऋषभ शुक के समान कुछ पीलापन लिए हुए हरे रंग का, गांधार सोने के और
समान कान्तिवाला और मध्यम कुंद के समान श्वेत वर्ण का होता है ॥४७॥ पंचम काले रंग का धैवत पीले रंग
का और निषाद सब रंगों के मिले-जुले रंग का होता है। ये ही स्वरों के वर्ण (रंग) हैं ॥४८॥ पंचम, मध्यम और
षड्ज ब्राह्मण वर्ण कहे जाते हैं, ऋषभ और धैवत क्षत्रिय, गांधार और निषाद आधा वैश्य और आधा शूद्र वर्ण
के होते हैं क्योंकि ये पतित स्वर हैं (उच्चारण करने वाले अंगों के नीचे के भाग से निकलते हैं) ॥४९-५०॥ जहाँ
मूर्च्छना से रहित ऋषभ, धैवत सहित पंचम, मध्यम राग में मिलते हैं उस निषाद स्वरग्राम को षाड़जव जानना
चाहिए ॥५१॥ यदि मध्यम स्वर में पंचम का विराम हो और अन्तर स्वर गान्धार हो जाय तथा उसके बाद क्रम
से ऋषभ, निषाद एवं पंचम का उदय हो तो उस पंचम को भी ऐसा ही (षाडव या षाड्जव) समझना चाहिए
॥५२॥ गांधार की प्रधानता हो, निषाद बार-बार आता-जाता रहे और धैवत अप्रधान रूप से हो तो इसको
मध्यम ग्राम कहा जाता है ॥५३॥ निषाद का ईषत् स्पर्श हो, गांधार का अधिक हो और धैवत कंपित हो तो
उसको षड्ज ग्राम कहा जाता है ॥५४॥ जहाँ अन्तर स्वर से युक्त काकली (सूक्ष्म ध्वनि) दिखाई देती हो