बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 344, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
सनंदन उवाच
निशम्य तस्येति वचः परमार्थसमन्वितम् । प्रश्रयावनतो भूत्वा तमाह नृपतिर्द्विजम् ॥१॥
राजोवाच
भगवंस्त्वत्तया प्रोक्तं परमार्थमयं वचः । श्रुते तस्मिन्भ्रमंतीव मनसो मम वृत्तयः ॥२॥
एतद्विवेकविज्ञानं यदि शेषेषु जंतुषु । भवता दर्शितं विप्र तत्परं प्रकृतेर्महत् ॥३॥
नाहं वहामि शिविकां शिविका मयि न स्थिता । शरीरमन्यदस्मत्तो येनेयं शिविका धृता ॥४॥
गुणप्रवृत्तिर्भूतानां प्रवृत्तिः कर्मचोदिता । प्रवर्तंते गुणाश्चैते किं ममेति त्वयोदितम् ॥५॥
एतस्मिन्परमार्थज्ञ मम श्रोत्रपथं गते । मनो विह्वलतामेति परमार्थरतां गतम् ॥६॥
पूर्वमेव महाभाग कपिलर्षिमहं द्विज । प्रष्टुमभ्युद्यतो गत्वा श्रेयः किंत्वत्र संशये ॥७॥
तदंतरे च भवता यदिदं वाक्यमीरितम् । तेनैव परमार्थं त्वयि चेतः प्रधावति ॥८॥
कपिलर्षिर्भगवतः सर्वभूतस्य वै किल । विष्णोरंशो जगन्मोहनाशाय समुपागतः ॥९॥
स एव भगवान्नूनमस्माकं हितकाम्यया । प्रत्यक्षतामनुगतस्तथैतद्भवतोच्यते ॥१०॥
तन्मह्यं मोहनाशाय यच्छ्रेयः परमं द्विज । तद्वदाखिलविज्ञानजलवीच्युदधिर्भवान् ॥११॥
अध्याय ४६
परमार्थ का निरूपण
सनंदन बोले--भरत की उपर्युक्त परमार्थ तत्त्व से भरी हुई व्याख्या को सुनकर राजा ने नम्र होकर
पुनः उनसे पूछा ॥१॥
राजा ने कहा--भगवन्, आपने जो कुछ परम तत्त्व की बात कही उसको सुनकर मेरे मन की वृत्तियाँ
अभी भ्रम में पड़ी हुई सी हैं ॥२॥ इस प्रकार का विवेक-विज्ञान यदि शेष जन्तुओं के विषय में हो जाय तब तो
यह प्रकृति से परे का ज्ञान है ॥३॥ मैं पालकी नहीं ढोता, न तो वह मुझ पर अवस्थित है । शरीर हमसे पृथक् है,
जिसने इस पालकी को धारण किया है । भूतों की प्रवृत्ति गुणों की प्रेरणा है और गुण कर्म से प्रेरित होकर प्रवृत्त
होते हैं । इसलिए मेरा कर्तव्य क्या है, यह आपने कहा है । परमार्थज्ञ ! इस गूढ़ तत्त्व के सुन लेने से परमार्थ के
ज्ञान के पूर्व से ही उत्सुक मेरा मन इस समय और अधिक विह्वल हो रहा है ॥४-६॥ द्विज ! मैं पहले ही संशय में
पड़कर श्रेयस्कर तत्त्व को पूछने के लिए कपिल ऋषि के यहाँ जा रहा था । इसी बीच आपने ऐसी रहस्यमय
बातें सुनाईं । इस कारण अब आपसे ही परमार्थ तत्त्व को जानने की इच्छा से मेरा मन आप ही की ओर
उन्मुख हो रहा है ॥७-८॥ कपिल ऋषि अखिल प्राणियों के ईश विष्णु के अंश हैं, जो जगत् का मोह दूर करने
के लिए इस लोक में आए हुए हैं । इसलिए आप ऐसी बातें कहते हैं ॥९-१०॥ द्विज ! इसलिए हमारे मोह नाश के
लिए जिस परम श्रेय को आप उचित समझते हों, उसको कहिए । क्योंकि आप सम्पूर्ण विज्ञानरूपी तरंगों से
परिपूर्ण समुद्र हैं ॥११॥