सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 338, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 338

अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ३१६
पोषणं पुष्यमाणश्च स तेन ववृधे मुने । चचाराश्रमपर्यन्तं तृणानि गहनेषु सः ॥२०॥
दूरं गत्वा च शार्दूलत्रासाद्भयाद्ययौ पुनः । प्रातर्गत्वातिदूरं च सायमायात्याश्रमम् ॥२१॥
पुनश्च भरतस्याभूदाश्रमस्योटजांतरे । तस्य तस्मिन्मृगे दूरसमीपपरिवर्तिनि ॥२२॥
आसीच्चेतः समासक्तं न तथा ह्यच्युते मुने । विमुक्तराज्यतनयः प्रोज्झिताशेषबांधवः ॥२४॥
ममत्वं स चकारोच्चैस्तस्मिन्हरिणपोतके । किं वृकैर्भक्षितो व्याघ्रैः किं सिंहेन निपातितः ॥२५॥
चिरायमाणे निष्क्रांते तस्यासीदिति मानसम् । प्रीतिप्रसन्नवदनः पार्श्वस्थे चाभवन्मृगे ॥२६॥
समाधिभंगस्तस्यासीन्ममत्वाकृष्टचेतसः । कालेन गच्छता सोऽथ कालं चक्रे महीपतिः ॥२७॥
पितेव साश्रं पुत्रेण मृगपोतेन वीक्षितः । मृगमेव तदाद्राक्षीत्त्यजत्प्राणानसावपि ॥२८॥
मृगो बभूव स मुने तादृशीं भावनां गतः । जातिस्मरत्वादुद्विग्नः संसारस्य द्विजोत्तम ॥२९॥
विहाय मातरं भूयः शालग्राममुपाययौ । शुष्कैस्तृणैस्तथा पर्णैः स कुर्वन्नात्मपोषणम् ॥३०॥
मृगत्वहेतुभूतस्य कर्मणो निष्कृतिं ययौ । तत्र चोत्सृष्टदेहोऽसौ जज्ञे जातिस्मरो द्विजः ॥३१॥
सदाचारवतां शुद्धे योगिनां प्रवरे कुले । सर्वविज्ञानसंपन्नः सर्वशास्त्रार्थतत्त्ववित् ॥३२॥
अपश्यत्स मुनिश्रेष्ठः स्वात्मानं प्रकृतेः परम् । आत्मनोऽधिगतज्ञानाद्देवादीनि महामुने ॥३३॥
सर्वभूतान्यभेदेन ददर्श स महामतिः । न पपाठ गुरुप्रोक्तं कृतोपनयनः श्रुतम् ॥३४॥


पालन-पोषण प्राप्त कर वह मृग बढ़ने लगा ॥२० १/२॥ धीरे-धीरे वह आश्रम में इधर-उधर घूमने लगा और घास
चरने लगा । जब कभी वह गहन वन में दूर जाता था तब सिंह के भय से फिर लौट आता था ॥२१ १/२॥ प्रातः-
काल जंगल में बहुत दूर चरने के लिए चला जाता था, परन्तु सायंकाल आश्रम में लौट आता था और मुनि भरत
की कुटिया में विश्राम करता था ॥२२ १/२॥ मुनिवर ! उस मुनि का उस मृग के प्रति चाहे वह समीप रहता था
या दूर इतनी अधिक आसक्ति हो गई कि भगवान् की ओर भी इतनी आसक्ति न रही ॥२३ १/२॥ राज्य, पुत्र और
सब बन्धु-बान्धवों को छोड़ने वाले उस मुनि की उस हरिण के प्रति अत्यधिक ममता हो गई ॥२४ १/२॥ उसके बाहर
जाने पर यदि लौटने में विलम्ब होता था तो मुनि के मन में चिन्ता होती थी कि कहीं मृग को भेड़िये ने तो
नहीं मार डाला, बाघ ने कहीं अपना आहार तो नहीं बना डाला अथवा सिंह ने उसको अपना भक्ष्य तो नहीं
बना डाला । मृग जब उसकी बगल में बैठा रहता तब तो वह प्रसन्न मुख रहता था ॥२५-२६॥ मृग की ममता
से खिंच जाने पर मुनि की समाधि भी भग्न हो जाती थी । धीरे-धीरे समय बीतता गया और उस महीपति का
अन्तिम समय आ गया ॥२७॥ मृत्यु के समय जिस प्रकार पुत्र पिता को आंसुओं से युक्त होकर देखता है उसी
प्रकार उस मृग-पोत ने मुनि को देखा । मुनि ने भी ममतावश मृत्यु के समय भी मृग को ही देखा ॥२८॥ मुने !
वैसी मृगमय भावना होने के कारण वह जन्मान्तर में मृग ही हुआ । द्विजोत्तम ! उस योनि में भी पूर्व जन्म का
ज्ञान होने के कारण वह संसार से उद्विग्न रहता था ॥२९॥ अन्त में वह अपनी माता को छोड़कर शालग्राम के
समीप रहने लगा और सूखी पत्तियों और घास को खाकर जीवन बिताने लगा ॥३०॥ इस प्रकार उसके मृग-
योनि के कारणीभूत कर्मों का भोग द्वारा नाश हो गया । उस मृग शरीर को छोड़ने के बाद वह जन्मान्तर में
सदाचारी और शुद्ध योगी कुल में जातिस्मर (पूर्व जन्म का ज्ञान रखने वाला) ब्राह्मण हुआ ॥३१ १/२॥ वह सब
शास्त्रों का मर्मज्ञ, सर्वविज्ञानविद् मुनि श्रेष्ठ ब्राह्मण अपने को प्रकृति (संसार) से परे समझता था ॥३२ १/२॥
महामुने ! वह अध्यात्म ज्ञान के कारण देवता और सब प्राणियों में समान भाव रखता था ॥३३ १/२॥ यज्ञोपवीत
होने पर जब गुरुजी उसको शास्त्र पढ़ाते थे तब भी उस पाठ को नहीं पढ़ता था । उसने न तो किसी कर्म का
अनुष्ठान ही किया और न तो शास्त्रों का अध्ययन ही ॥३४ १/२॥ बहुत कुछ कहने पर जड़ की भाँति कुछ बोल