बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तत्रिंशोऽध्यायः २३७
तेन पापान्यनेकानि कृतानि सुमहांति च । न तेषां शक्यते वक्तु संख्या वत्सरकोटिभिः ॥२२॥
स कदाचिन्महापापो जन्तूनामन्तकोपमः । सौवीरराज्ञो नगरं सर्वैश्वर्यसमन्वितम् ॥२३॥
योषिद्भिर्भूषिताभिश्च सरोभिर्निर्मलोदकैः । अलंकृतं विपणिभिर्यौ देवपुरोपमम् ॥२४॥
तस्योपवनमध्यस्थं रम्यं केशवमंदिरम् । छादितं हेमकलशैर्दृष्ट्वा व्याधो मुदं ययौ ॥२५॥
हरास्यत्र सुवर्णानि बहूनीति विनिश्चितम् । जगामाभ्यंतरं तस्य कीनाशश्चौर्यलोलुपः ॥२६॥
तत्रापश्यद्विजवरं शांतं तत्त्वार्थकोविदम् । परिचर्यापरं विष्णोरुत्तंकं तपसां निधिम् ॥२७॥
एकाकिनं दयालुं च निस्पृहं ध्यानलोलुपम् । चौर्यान्तरायकर्तारं तं दृष्ट्वा लुब्धको मुने ॥२८॥
द्रव्यजातं तु देवस्य हर्तुकामोऽतिसाहसी । उत्तं कं हंतुमारेभे विधुतासिर्मदोद्धतः ॥२६॥
पादेनाक्रम्य तद्वक्षो जटाः संगृह्य पाणिना । हंतुं कृतमतिं व्याधमुत्तंकः प्रेक्ष्य चाब्रवीत् ॥३०॥
उत्तंक उवाच
भो भो साधो वृथा मां त्वं हनिष्यसि निरागसम् । मया किमपराद्धं ते तद्वदस्व महामते ॥३१॥
कृतापराधिनां लोके शक्ताः शिक्षां प्रकुर्वते । न हि सौम्य वृथा घ्नंति सज्जना अपि पापिनः ॥३२॥
विरोधिष्वपि मूर्खेषु निरीक्ष्यावस्थितान् गुणान् । विरोधं नहि कुर्वति सज्जनाः शांतचेतसः ॥३३॥
बहुधा बोध्यमानोऽपि यो नरः क्षमयान्वितः । तमुत्तमं नरं प्राहुर्विष्णोः प्रियतरं सदा ॥३४॥
सुजनो न याति वैरं परहितबुद्धिर्विनाशकालेऽपि । छेदेऽपि चंदनतरुः सुरभयति मुखं कुठारस्य ॥३५॥
उस पापी ने इतने अधिक महान् पापों को किया था कि उसकी गणना करोड़ों वर्षों में भी नहीं हो
सकती है ॥२२॥ किसी समय प्राणियों के लिए यमराज के समान वह महापापी व्याध सब ऐश्वर्यों
से परिपूर्ण देवनगरी के समान सौवीर राजा के नगर में गया । वहाँ की स्त्रियाँ आभूषणों से सुशोभित
थीं। विमल जल वाली वावलियां और सजी हुई दूकानों से उस नगर की शोभा दुगुनी हो जाती थी ।
उस नगर के किसी उपवन के बीच एक रम्य केशव मन्दिर को, जो सुवर्णकलश से सुशोभित था, देखकर
वह अत्यन्त प्रसन्न हो गया । वह यमरा : "आज इस सुवर्ण-राशि को चुराऊँगा" ऐसा दृढ़ निश्चय
कर चोरी के लोभ से उस मन्दिर के भीतर गया ॥२३-२६॥ वहां उसने एक परम तत्त्व के जानने वाले
तपोनिधि, परम शान्त उत्तं क नामक ब्राह्मण को देखा जो विष्णु की आराधना में तल्लीन था ।
मुने ! उस निःस्पृह ध्यानलोलुप, दयालु और असहाय विप्र को चोरी में बाधक समझ कर उसे देव-
संपत्ति को चुराने की इच्छा करने वाले साहसी मदांधत व्याध ने हाथों में खड्ग लेकर मारने को
उद्यत हुआ ॥२७-२६॥ जब वह उसकी छाती पर पैर रखकर जटा को हाथ में पकड़कर मारने को तैयार
हुआ तो उसको देखकर उत्तंक ने कहा ॥३०॥
उत्तंक बोले--हे साधो! क्यों व्यर्थ में मुझ निरपराध को मार रहे हो? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है ?
हे महामति उसको बताओ ॥३१॥ इस लोक में बलवान् व्यक्ति अपराधी को दण्ड देते हैं, और सज्जन
पापियों को भी व्यर्थ दण्ड नहीं देते हैं ॥३२॥ जो सज्जन शान्त स्वभाव के होते हैं अपने विरोधी में भी
चाहे वह मूर्ख ही क्यों न हो-गुणों को देखकर उसका विरोध नहीं करते ॥३३॥ जो बहुधा उत्तेजित
करने पर क्षमा का त्याग नहीं करता उसी को उत्तम व्यक्ति कहा जाता है और सदा विष्णु का प्रिय
पात्र बना रहता है ॥३४॥ विनाश काल में भी परोपकार की भावना रखने वाले सुजन वैर नहीं करते ।
चन्दन वृक्ष काटा जाने पर भी कुठार के मुख को सुगन्धित ही बनाता है ॥३५॥ अहो, दैव बड़ा प्रबल है