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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 254

सप्तत्रिंशोऽध्यायः २३५
तस्य तुष्यंति विप्रेन्द्र ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः । हरिभक्तिपराणां तु संगिनां संगमात्रतः ॥६०॥
मुच्यते सर्वपापेभ्यो महापातुकवानपि । हरिपूजापराणां च हरिनामवतात्मनाम् ॥६१॥
शुश्रूषानिरता यांति पापिनोऽपि परां गतिम् ॥६२॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे विष्णुसेवाप्रभावो नाम षट्‍त्रिंशोऽध्यायः ॥३६॥
सप्तत्रिंशोऽध्यायः
सनक उवाच
भूयः शृणुष्व विप्रेन्द्र माहात्म्यं कमलापतेः । कस्य नो जायते प्रीतिः श्रोतुं हरिकथामृतम् ॥१॥
नराणां विषयान्धानां ममताकुलचेतसाम् । एकमेव हरेर्नाम सर्वपापप्रणाशनम् ॥२॥
सकृद्वा न नमेद्यस्तु विष्णुं पापहरं नृणाम् । श्वपचं तं विजानीयात्कदाचिन्नालपेच्च तम् ॥३॥
हरिपूजाविहीनं तु यस्य वेश्म द्विजोत्तम । श्मशानसदृशं तद्धि कदाचिदपि नो विशेत् ॥४॥
हरिपूजाविहीनाश्च वेदविद्वेषिणस्तथा । गोद्विजद्वेषनिरता राक्षसाः परिकीर्त्तिताः ॥५॥
यो वा को वापि विप्रेन्द्र विप्रद्वेषपरायणः । समर्चयति गोविन्दं तत्पूजा विफला भवेत् ॥६॥
रहता। जो व्यक्ति भगवद् भावना से हरि-भक्तों का सम्मान करता है, विप्रेन्द्र, उसके ऊपर ब्रह्मा, विष्णु और
महेश सब प्रसन्न हो जाते हैं। हरि-भक्तों के संयोजनों के संसर्ग, मात्र से बड़े पापी भी सब पापों से मुक्त हो
जाते हैं। हरि पूजा के प्रेमी और संकीर्तन प्रेमी भक्तों की सेवा में निरत रहने वाले घोर पापी भी परम गति को
पा जाते हैं ॥५७-६२॥
श्रीनारदीयमहापुराण में विष्णु-सेवा-प्रभाव वर्णन नामक छत्तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३६॥
अध्याय ३७
विष्णु का माहात्म्य वर्णन
सनक बोले— विप्रेन्द्र, फिर और भी भगवान् कमलापति का माहात्म्य सुनो। कौन ऐसा व्यक्ति होगा
जो हरि कथा रूपी अमृत का पान करना न चाहेगा ॥१॥ विषयासक्त, मोह से व्याकुल रहने वाले मनुष्यों के
सब पापों को दूर करने वाला एकमात्र हरि नाम ही है ॥२॥ जिसने मनुष्यों के सब पापों को दूर करने वाले
विष्णु को एक बार भी प्रणाम नहीं किया उसको चाण्डाल समझना चाहिए। और ऐसे व्यक्ति से कभी बातचीत
नहीं करनी चाहिए ॥३॥ द्विजोत्तम ! जिसके घर में कभी हरि की पूजा नहीं होती उसको श्मशान समझकर कभी उस
घर में प्रवेश नहीं करना चाहिए ॥४॥ हरि पूजा से विमुख, वेद निन्दक और गौ, ब्राह्मण से द्वेष करने वाले व्यक्ति
राक्षस कहे जाते हैं ॥५॥ विप्रेन्द्र ! जो कोई भी व्यक्ति ब्राह्मण द्वेष करते हुए गोविन्द की पूजा करता है उसकी