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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 248

पंचविंशोऽध्यायः २२६
अनाचारपरान्दृष्ट्वा नोपेक्षां कुरु शक्तितः । पूजयस्वातिथिं नित्यं स्वकुटुंबाविरोधतः ॥४८॥
पत्रैः पुष्पैः फलैर्वापि दूर्वाभिः पल्लवैरथ । पूजयस्व जगन्नाथं नारायणमकामतः ॥४९॥
देवान्ऋषीन्पितॄंश्चापि तर्पयस्व यथाविधि । अग्नेश्च विधिवद्विप्रं परिचर्यापरो भव ॥५०॥
देवतायतने नित्यं संमार्जनपरो भव । तथोपलेपनं चैव कुरुष्व सुसमाहितः ॥५१॥
शीर्णस्फुटितसंधानं कुरु देवगृहे सदा । मार्गशोभां च दीपं च विष्णोरायतने कुरु ॥५२॥
कंदमूलफलैर्वापि सदा पूजय माधवम् । प्रदक्षिणनमस्कारैः स्तोत्राणां पठनैस्तथा ॥५३॥
पुराणश्रवणं चैव पुराणपठनं तथा । वेदांतपठनं चैव प्रत्यहं कुरु शक्तितः ॥५४॥
एवं स्थिते तव ज्ञानं भविष्यत्युत्तमोत्तमम् । ज्ञानात्समस्तपापानां मोक्षो भवति निश्चितम् ॥५५॥
एवं प्रबोधितस्तेन वेदमालिर्महामतिः । तथा ज्ञानरतो नित्यं ज्ञानलेशमवाप्तवान् ॥५६॥
वेदमालिः कदाचित्तु ज्ञानलेशप्रचोदितः । कोऽहं मम क्रिया केति स्वयमेव व्यचिंतयत् ॥५७॥
मम जन्म कथं जातं रूपं कीदृग्विधं मम । एवं निवारणपरो दिवानिशमतंद्रितः ॥५८॥
अनिश्चितमतिर्भूत्वा वेदमालिद्विजोत्तमः । पुनर्जानंतिमागम्य प्रणम्येदमुवाच ह ॥५९॥
वेदमालिरुवाच
ममचित्तमतिभ्रांतं गुरो ब्रह्मविदां वर । कोऽहं मम क्रिया का च मम जन्म कथं वद ॥६०॥
जानंतिरुवाच
सत्यं सत्यं महाभाग चित्तं भ्रांतं सुनिश्चितम् । अविद्यानिलयं चित्तं कथं सद्भावमेष्यति ॥६१॥
रहते उपेक्षा न करो। अपने कुटुम्ब को कुछ हानि किये बिना अतिथि को नित्य सेवा करो । निष्काम भाव से
पत्र, पुष्प, फल, दूर्वा और पल्लव से विधिपूर्वक भगवान् को पूजा करो। विधिपूर्वक देव, ऋषि और पितरों
का तर्पण करो। विप्र ! विधिवत् अग्नि की पूजा करो ॥४८-५०॥ देवमन्दिर में जाकर नित्य प्रति झाडू लगाओ
और एकाग्र होकर उसको लीपो-पोतो। सदा देवमन्दिर की दरार या जीर्ण भाग की मरम्मत करो,
विष्णु-मन्दिर में दीपक जलाओ और वन्दनबार लगाकर द्वारों को सजाओ ॥५१-५२॥ कन्दमूल, फल, प्रदक्षिणा
नमस्कार, स्तुतिपाठ आदि से माधव की पूजा करो। प्रतिदिन शक्ति के अनुसार पुराण श्रवण, पुराण पाठ और
वेदान्त का अध्ययन करना चाहिए। ऐसा करने पर तुमको परमोत्तम ज्ञान प्राप्त होगा और ज्ञान द्वारा समस्त
पापों से मुक्ति मिल जाती है यह निश्चित है ॥५३-५५॥
मुनि से इस प्रकार का उपदेश पाकर महामति वेदमालि जो पहले अज्ञानान्धकार में ही डूबा रहता था,
ज्ञान का एक हल्का सा प्रकाश पा गया। किसी समय वह अपने उसी स्वल्पज्ञान की प्रेरणा से, मैं कौन हूँ, मेरा
कर्त्तव्य क्या है, आदि बातों पर विचार करने लगा ॥५६-५७॥ (अनन्तर वह) प्रतिदिन आलस्य त्यागकर यही
सोचा करता था कि 'मेरा जन्म कैसे हुआ, मेरा स्वरूप क्या है ? द्विजवर वेदमालि इन प्रश्नों का कोई निश्चित उत्तर
न पाकर पुनः जानंति के पास आया और प्रणाम करके पूछा--॥५८-५९॥
वेदमालि ने पूछा-ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ ! गुरुदेव ! मेरा कर्त्तव्य क्या है, मुझे सन्देह हो गया है कि मैं
कौन हूँ, मेरा जन्म कैसे हुआ और आप कृपा करके इस सन्देह का निराकरण कीजिए ॥६०॥
जानन्ति बोले-महाभाग ! यह सत्य है, तुम्हारा चित्त भ्रम में पड़ गया यह निश्चित हो है। अज्ञान का
स्थान चित्त भला कैसे सद्भाव प्राप्त करेगा ॥६१॥ जो 'यह मेरा है' ऐसा कहा जाता है यह भी भ्रम है।