बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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अष्टाविंशोऽध्यायः
निमंत्रितेषु विप्रेषु मिलितेषु द्विजोत्तम । प्रायश्चित्तविशुद्धात्मा तेभ्योऽनुज्ञां समाहरेत् ॥३०॥
श्राद्धार्थं समनुज्ञातो विप्रांन्भूयो निमंत्रयेत् । उभौ च विश्वेदेवार्थं पित्रर्थं त्रीन्यथाविधि ॥३१॥
देवतार्थं च पित्रर्थमेकैकं वा निमंत्रयेत् । श्राद्धार्थं समनुज्ञातः कारयेन्मंडलद्वयम् ॥३२॥
चतुरस्रं ब्राह्मणस्य त्रिकोणं क्षत्रियस्य वै । वैश्यस्य वर्तुलं ज्ञेयं शूद्रस्याभ्युक्षणं भवेत् ॥३३॥
ब्राह्मणानामभावे तु भ्रातरं पुत्रमेव च । आत्मानं वा नियुंजीत न विप्रं वेदवर्जितम् ॥३४॥
प्रक्षाल्य विप्रपादांश्च ह्याचांतानुपवेश्य च । यथावदर्चनं कुर्यात्स्मरन्नारायणं प्रभुम् ॥३५॥
ब्राह्मणानां तु मध्ये च द्वारदेशे तथैव च । अपहता इत्यृचा वै कर्त्ता तु विकिरेत्तिलान् ॥३६॥
यवैर्दभैश्च विश्वेषां देवानामिदमासनम् । दत्तेवेति भूयो दद्याच्च दैवे क्षणप्रतीक्षणम् ॥३७॥
अक्षय्यासनयोः षष्ठी द्वितीयावाहने स्मृता । अन्नदाने चतुर्थी स्याच्छेषाः संबुद्धयः स्मृताः ॥३८॥
आसाद्य पात्रद्वितयं दर्भशाखासमन्वितम् । तत्पात्रे सेचयेत्तोयं शन्नोदेवीत्यृचा ततः ॥३९॥
यवोसीति यवान् क्षिप्त्वा गंधपुष्पे च वाग्यतः । आवाहयेत्ततो देवान्विश्वे देवास इत्यृचा ॥४०॥
या दिव्या इतिमंत्रेण दद्यादर्घ्यं समाहितः । गंधैश्च पत्रपुष्पैश्च धूपैदीपैरथार्चयेत् ॥४१॥
देवैश्च समनुज्ञातो यजेत्पितृगणांस्तथा । तिलसंयुक्तदर्भैश्च दद्यात्तेषां सदासनम् ॥४२॥
पात्राण्यासादयेत्त्रीणि ह्यर्थाय पूर्ववद्द्विजः । शन्नो देव्या जलं क्षिप्त्वा तिलोसीति तिलान्क्षिपेत् ॥४३॥
उशन्त इत्यृचावाह्य पितॄन्विप्रः समाहितः । या दिव्या इति मंत्रेण दद्यादर्घ्यं च पूर्ववत् ॥४४॥
गंधैश्च पत्रपुष्पैश्च धूपैदीपैश्च सत्तम । वासोभिर्भूषणैश्चैव यथाविभवमर्चयेत् ॥४५॥
ततोऽन्नाग्रं तमादाय घृतयुक्तं विचक्षणः । अग्नौ करिष्य इत्युक्त्वा तेभ्योऽनुज्ञां समाहरेत् ॥४६॥
द्विजोत्तम ! निमन्त्रित विप्रों के आने पर प्रायश्चित्त से शुद्ध आत्मा वाला वह श्राद्ध-कर्त्ता उनसे आदेश प्राप्त करे ।
श्राद्ध के लिए अनुमति पा लेने पर पुनः उन विप्रों को निमन्त्रित करे । विधि के अनुसार विश्वेदेव के लिए दो और
पितृकार्य के लिए तीन विप्रों को निमन्त्रण दे ॥२९-३१॥ अथवा देवता और पितृकार्य के लिए एक-एक ब्राह्मण को ही
निमन्त्रण दे । श्राद्ध के निमित्त आज्ञा पाकर दो मण्डलों को बनाना चाहिए । ब्राह्मण का मण्डल चौकोना, क्षत्रिय के
लिए त्रिकोना, वैश्य का गोल और शूद्र के लिए तो केवल जलसिंचन से पवित्र की हुई भूमि हो पर्याप्त है । यदि श्राद्ध-
कार्य के लिए कोई ब्राह्मण न मिले तो अपने भाई या पुत्र को ही उस पद पर नियुक्त करे। अथवा स्वयं ही श्राद्धकर्म
करे परन्तु किसी वेद विमुख विप्र को उस कार्य में न लगावे ॥३२-३४॥
पहले ब्राह्मण के चरण धोये फिर आचमन कराकर आसन पर बैठाये तत्पश्चात् प्रभु नारायण का
स्मरण करता हुआ यथाविधि उसकी पूजा करे । कर्त्ता ब्राह्मणों के मध्य में और द्वार देश पर 'अपहता............'
इस ऋचा से इधर-उधर तिल फेंक दे । सब देवताओं को यव और कुशों का आसन दे । इसके अनन्तर पुनः
दैवेक्षण, और प्रतीक्षण (देख-रेख) करने का दायित्व सौंपे । अक्षय्य पान और आसन प्रदान करने में षष्ठी तिथि
विहित है । आवाहन में द्वितीया, अन्नदान में चतुर्थी और सम्बोधन करने में अन्य तिथियों का उपयोग करना
चाहिए । कुशशाखा से युक्त दो पात्रों को लेकर 'शन्नो देवी' इस मन्त्र को पढ़कर उस पात्र में जल छोड़े ।
'यवोऽसि' इस मन्त्र से यव छिड़ककर मौन होकर गन्ध और पुष्प अर्पित करे । तदनन्तर 'विश्वे देवाःस्म' इस
ऋचा से देवों का आवाहन करे ॥३५-३९॥ एकाग्र होकर 'या दिव्या' इस मन्त्र से अर्घ्य दे । फिर गन्ध, पत्र,
पुष्प, धूप और दीप से उन आवाहित देवों को पूजा करे । देवों की पूजा से निवृत्त होकर उनसे आदेश लेकर
पितरों की पूजा प्रारम्भ करे । पहले इनको तिल से युक्त कुशा का आसन दे । वह द्विज पूर्व की भाँति अर्घ्य के
लिए तीन पात्रों को रखे । 'शन्नो देव्या' इस मन्त्र से जल छिड़ककर 'तिलोऽसि' इस मन्त्र से तिल छिड़के
॥४०-४३॥ सावधान होकर वह विप्र 'उशन्तः' इस ऋचा से पितरों का आवाहन कर 'या देव्या' इस मंत्र से